अप्सरा उर्वशी का श्राप
राम लक्ष्मण को अप्सरा उर्वशी के श्राप की कथा सुनाते हैं, जो राजा पुरूरवा से सम्बन्धित है। उर्वशी के श्राप के कारण पुरूरवा को अलगाव सहना पड़ा, पर बाद में दोनों का मिलन हुआ।
विवरण
राजा पुरूरवा ने अप्सरा उर्वशी से विवाह किया था, परन्तु उर्वशी को एक शर्त थी कि वह उसे कभी नग्न न देखे। इन्द्र ने उर्वशी को वापस बुलाने के लिए एक योजना बनाई। रात्रि में उर्वशी सो रही थी, इन्द्र ने बिजली चमकाई और पुरूरवा ने उर्वशी को नग्न देख लिया। उर्वशी गायब हो गई। बाद में पुरूरवा ने घोर तप किया और उर्वशी को पुनः प्राप्त किया। यह कथा प्रेम, विश्वास और तप की महिमा को दर्शाती है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ६५
(अप्सरा उर्वशी का श्राप)
🔆 प्रस्तावना : राम लक्ष्मण को उर्वशी और पुरूरवा की प्रसिद्ध प्रेम कथा सुनाते हैं, जिसमें शर्त, वियोग और पुनर्मिलन का वर्णन है।
💞 पुरूरवा और उर्वशी का मिलन (श्लोक १-८)
पुरूरवा नाम राजा चन्द्रवंशसमुद्भवः॥
तस्य कीर्तिर्बभौ लोके दानधर्मपरायणः।
स कदाचिद्वने राजन्नुर्वशीमप्सरोत्तमाम्॥
ददर्श मुनिशार्दूल गच्छन्तीं रूपसंपदा।
तां दृष्ट्वा कामबाणेन विद्धः प्रणयमोहितः॥
उवाच राजा तां देवीं भजस्व मां वरानने।
उर्वशी प्राह राजेन्द्र शृणु मे वचनं नृप॥
⚖️ उर्वशी की शर्त (श्लोक ९-१६)
तच्छृणुष्व वचो मह्यं नियमं पालयस्व च॥
न त्वया सह शय्यायां द्रष्टव्यं नग्नतां विना।
यदा त्वं मां तथा पश्येस्तदा गच्छाम्यहं दिवम्॥
राजा प्रत्यब्रवीद्देवि यथा त्वं वदसे तथा।
करिष्ये नात्र सन्देहः सत्येनायुधमालभे॥
एवं सञ्चिन्त्य तौ राजन्नुभौ प्रीत्या समन्वितौ।
रेमाते तत्र राजेन्द्र बहुवर्षगणान्बहून्॥
🌩️ इन्द्र का षड्यंत्र और शर्त-भंग (श्लोक १७-२५)
ऊचुः सुरपतिं देवं कथमुर्वश्यप्सरोगता॥
ततः शक्रः समालोक्य ददर्शोर्वश्यहं तदा।
पुरूरवससंयुक्तां रममाणां यथासुखम्॥
स चिन्तयित्वा देवेन्द्र उपायं कर्तुमिच्छति।
यथा सा मानुषं त्यक्त्वा देवलोकमुपागता॥
ततः शक्रः समादिश्य प्रदोषे विद्युतां गणान्।
चकार विद्युतं तीव्रां यथा राजा न संशयः॥
निशीथे समनुप्राप्ते राजा त्वरितविक्रमः।
ददर्शोर्वशीमात्मीयां नग्नां संभ्रान्तमानसः॥
😢 पुरूरवा का विलाप और तप (श्लोक २६-३२)
चचार विपिने राजा तपस्तीव्रं समाहितः॥
उर्वशीस्मरणेनैव दिवारात्रमतन्द्रितः।
निराहारो निरालम्बो वर्षपूगाननेकशः॥
ततः प्रीता महाभागा उर्वशी तस्य कर्मभिः।
प्रादुरासीन्नरश्रेष्ठं प्रोवाचेदं वचस्तदा॥
तपसा ते महाराज प्रीतास्मि वरवर्णिनी।
वृणीष्व वरमिष्टं त्वं यथा त्वां प्राप्नुयामहम्॥
🤝 पुनर्मिलन और उपदेश (श्लोक ३३-३७)
तदा मां संगतं कुर्याः सार्धं त्वया सुरोत्तमे॥
उर्वशी प्राह राजेन्द्र गन्धर्वत्वं वृणु ध्रुवम्।
ततः समागमो नित्यं भविष्यति न संशयः॥
राजा तथेति संकल्प्य गन्धर्वत्वमवाप्तवान्।
उर्वश्या सह संयुक्तो रेमे कालाननेकशः॥
एतत्ते कथितं सौम्य पुरूरवस उत्तमम्।
तपसा प्राप्यते सर्वं धर्मेण नियमेन च॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
💘 प्रेम और विश्वास
पुरूरवा और उर्वशी की कथा प्रेम में विश्वास और शर्तों के महत्त्व को दर्शाती है। एक छोटी-सी चूक से वियोग हो जाता है।
🧘 तप की शक्ति
पुरूरवा ने कठोर तप से उर्वशी को पुनः प्राप्त किया। यह तप की अपरिमित शक्ति को दर्शाता है।
👼 देवताओं का हस्तक्षेप
इन्द्र ने उर्वशी को वापस बुलाने के लिए षड्यंत्र रचा। यह दर्शाता है कि देवता भी मानवीय सुख से ईर्ष्या कर सकते हैं।
🔄 गन्धर्व योनि
पुरूरवा को गन्धर्व योनि प्राप्त करनी पड़ी, जो मानव और देव के बीच की योनि है। यह आत्म-विकास का प्रतीक हो सकता है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि सच्चे प्रेम के लिए तप और समर्पण आवश्यक है। कठिनाइयों के बाद भी मिलन सम्भव है।