उत्तर काण्ड अध्याय 65

अप्सरा उर्वशी का श्राप

राम लक्ष्मण को अप्सरा उर्वशी के श्राप की कथा सुनाते हैं, जो राजा पुरूरवा से सम्बन्धित है। उर्वशी के श्राप के कारण पुरूरवा को अलगाव सहना पड़ा, पर बाद में दोनों का मिलन हुआ।

विवरण

राजा पुरूरवा ने अप्सरा उर्वशी से विवाह किया था, परन्तु उर्वशी को एक शर्त थी कि वह उसे कभी नग्न न देखे। इन्द्र ने उर्वशी को वापस बुलाने के लिए एक योजना बनाई। रात्रि में उर्वशी सो रही थी, इन्द्र ने बिजली चमकाई और पुरूरवा ने उर्वशी को नग्न देख लिया। उर्वशी गायब हो गई। बाद में पुरूरवा ने घोर तप किया और उर्वशी को पुनः प्राप्त किया। यह कथा प्रेम, विश्वास और तप की महिमा को दर्शाती है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ६५

(अप्सरा उर्वशी का श्राप)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम लक्ष्मण को उर्वशी और पुरूरवा की प्रसिद्ध प्रेम कथा सुनाते हैं, जिसमें शर्त, वियोग और पुनर्मिलन का वर्णन है।

💞 पुरूरवा और उर्वशी का मिलन (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-८ ॥
रामः प्रोवाच सौमित्रे शृणु राजर्षिसत्तमम्।
पुरूरवा नाम राजा चन्द्रवंशसमुद्भवः॥
तस्य कीर्तिर्बभौ लोके दानधर्मपरायणः।
स कदाचिद्वने राजन्नुर्वशीमप्सरोत्तमाम्॥
ददर्श मुनिशार्दूल गच्छन्तीं रूपसंपदा।
तां दृष्ट्वा कामबाणेन विद्धः प्रणयमोहितः॥
उवाच राजा तां देवीं भजस्व मां वरानने।
उर्वशी प्राह राजेन्द्र शृणु मे वचनं नृप॥
📖 भावार्थ : राम ने लक्ष्मण से कहा: "हे सौमित्रे! राजर्षि पुरूरवा की कथा सुनो, जो चन्द्रवंशी थे। उनकी कीर्ति लोक में फैली थी। एक बार वे वन में गए और वहाँ अप्सरा उर्वशी को देखा, जो अत्यन्त सुन्दर थी। उन्हें देखते ही कामबाण से विद्ध हो गए और बोले: हे देवि! मुझे वरो। उर्वशी ने कहा: हे राजन्! मेरी बात सुनो।" यहाँ पुरूरवा और उर्वशी का प्रथम साक्षात्कार है। पुरूरवा तुरन्त मोहित हो जाते हैं। उर्वशी, जो एक अप्सरा है, राजा के प्रस्ताव पर विचार करती है। यह प्रेम की उत्पत्ति का सुन्दर चित्रण है।

⚖️ उर्वशी की शर्त (श्लोक ९-१६)

॥ श्लोक ९-१६ ॥
यदि त्वं मां नरश्रेष्ठ भजसे काममोहितः।
तच्छृणुष्व वचो मह्यं नियमं पालयस्व च॥
न त्वया सह शय्यायां द्रष्टव्यं नग्नतां विना।
यदा त्वं मां तथा पश्येस्तदा गच्छाम्यहं दिवम्॥
राजा प्रत्यब्रवीद्देवि यथा त्वं वदसे तथा।
करिष्ये नात्र सन्देहः सत्येनायुधमालभे॥
एवं सञ्चिन्त्य तौ राजन्नुभौ प्रीत्या समन्वितौ।
रेमाते तत्र राजेन्द्र बहुवर्षगणान्बहून्॥
📖 भावार्थ : उर्वशी ने शर्त रखी: "हे नरश्रेष्ठ! यदि तुम मुझसे प्रेम करते हो, तो मेरी बात मानो। मेरे साथ शय्या पर कभी मुझे नग्न नहीं देखना। यदि तुमने ऐसा किया, तो मैं तुरन्त अन्तर्धान हो जाऊँगी।" राजा ने कहा: "हे देवि! जैसा तुम कहती हो, वैसा ही करूँगा। सत्य की शपथ।" फिर दोनों ने प्रसन्नतापूर्वक अनेक वर्षों तक साथ बिताया। यह शर्त प्रेम में विश्वास और नियमों के पालन का प्रतीक है। राजा ने शपथ ली कि वह शर्त का उल्लंघन नहीं करेगा। दोनों का जीवन सुखमय व्यतीत होता है।

🌩️ इन्द्र का षड्यंत्र और शर्त-भंग (श्लोक १७-२५)

॥ श्लोक १७-२५ ॥
अथ देवगणाः सर्वे शच्या सह महर्षयः।
ऊचुः सुरपतिं देवं कथमुर्वश्यप्सरोगता॥
ततः शक्रः समालोक्य ददर्शोर्वश्यहं तदा।
पुरूरवससंयुक्तां रममाणां यथासुखम्॥
स चिन्तयित्वा देवेन्द्र उपायं कर्तुमिच्छति।
यथा सा मानुषं त्यक्त्वा देवलोकमुपागता॥
ततः शक्रः समादिश्य प्रदोषे विद्युतां गणान्।
चकार विद्युतं तीव्रां यथा राजा न संशयः॥
निशीथे समनुप्राप्ते राजा त्वरितविक्रमः।
ददर्शोर्वशीमात्मीयां नग्नां संभ्रान्तमानसः॥
📖 भावार्थ : देवताओं और शची ने इन्द्र से कहा: "उर्वशी मनुष्य के साथ रह रही है, इसे वापस लाओ।" इन्द्र ने उर्वशी को पुरूरवा के साथ सुखपूर्वक देखा। उन्होंने एक उपाय सोचा। रात्रि में उन्होंने प्रबल बिजली चमकाई। राजा पुरूरवा ने घबराकर उर्वशी को नग्न अवस्था में देख लिया। तुरन्त उर्वशी अन्तर्धान हो गई। यहाँ इन्द्र का हस्तक्षेप और उर्वशी का शर्त पूर्वक अन्तर्धान होना दर्शाया गया है। राजा की घबराहट ने उन्हें शर्त भुला दी। यह दिखाता है कि कैसे बाहरी ताकतें प्रेम में बाधा डाल सकती हैं।

😢 पुरूरवा का विलाप और तप (श्लोक २६-३२)

॥ श्लोक २६-३२ ॥
हा प्रिये क्व गता सुभ्रूरिति विलप्य दुःखितः।
चचार विपिने राजा तपस्तीव्रं समाहितः॥
उर्वशीस्मरणेनैव दिवारात्रमतन्द्रितः।
निराहारो निरालम्बो वर्षपूगाननेकशः॥
ततः प्रीता महाभागा उर्वशी तस्य कर्मभिः।
प्रादुरासीन्नरश्रेष्ठं प्रोवाचेदं वचस्तदा॥
तपसा ते महाराज प्रीतास्मि वरवर्णिनी।
वृणीष्व वरमिष्टं त्वं यथा त्वां प्राप्नुयामहम्॥
📖 भावार्थ : उर्वशी के अन्तर्धान होने पर पुरूरवा विलाप करते हुए वन में घूमने लगे। उन्होंने उर्वशी के स्मरण में घोर तप किया, निराहार रहकर। कई वर्षों के बाद उर्वशी प्रसन्न हुई और प्रकट होकर बोली: "हे महाराज! तुम्हारे तप से मैं प्रसन्न हूँ। वर माँगो, जिससे मैं तुम्हें प्राप्त हो सकूँ।" यहाँ पुरूरवा का प्रेम और तप अद्वितीय है। उन्होंने अपने प्रिय के लिए कठोर तपस्या की, जो उनके समर्पण को दर्शाता है। उर्वशी उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर वापस आई।

🤝 पुनर्मिलन और उपदेश (श्लोक ३३-३७)

॥ श्लोक ३३-३७ ॥
राजा प्रोवाच यदि त्वं मे प्रीता देवि तपोबलात्।
तदा मां संगतं कुर्याः सार्धं त्वया सुरोत्तमे॥
उर्वशी प्राह राजेन्द्र गन्धर्वत्वं वृणु ध्रुवम्।
ततः समागमो नित्यं भविष्यति न संशयः॥
राजा तथेति संकल्प्य गन्धर्वत्वमवाप्तवान्।
उर्वश्या सह संयुक्तो रेमे कालाननेकशः॥
एतत्ते कथितं सौम्य पुरूरवस उत्तमम्।
तपसा प्राप्यते सर्वं धर्मेण नियमेन च॥
📖 भावार्थ : राजा ने कहा: "हे देवि! यदि तुम मुझ पर प्रसन्न हो, तो मुझे अपने साथ रहने का वर दो।" उर्वशी ने कहा: "हे राजेन्द्र! तुम गन्धर्व योनि प्राप्त करो, तब हमारा नित्य मिलन होगा।" राजा ने वैसा ही किया और गन्धर्व बनकर उर्वशी के साथ सुखपूर्वक रहा। राम ने कहा: "हे सौम्य! यह पुरूरवा की उत्तम कथा है। तप, धर्म और नियम से सब कुछ प्राप्त होता है।" इस प्रकार राम ने लक्ष्मण को प्रेम और तप की महिमा समझाई। पुरूरवा ने तप से उर्वशी को पुनः पाया। यह बताता है कि सच्चा प्रेम और तप असंभव को भी सम्भव कर सकता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

💘 प्रेम और विश्वास

पुरूरवा और उर्वशी की कथा प्रेम में विश्वास और शर्तों के महत्त्व को दर्शाती है। एक छोटी-सी चूक से वियोग हो जाता है।

🧘 तप की शक्ति

पुरूरवा ने कठोर तप से उर्वशी को पुनः प्राप्त किया। यह तप की अपरिमित शक्ति को दर्शाता है।

👼 देवताओं का हस्तक्षेप

इन्द्र ने उर्वशी को वापस बुलाने के लिए षड्यंत्र रचा। यह दर्शाता है कि देवता भी मानवीय सुख से ईर्ष्या कर सकते हैं।

🔄 गन्धर्व योनि

पुरूरवा को गन्धर्व योनि प्राप्त करनी पड़ी, जो मानव और देव के बीच की योनि है। यह आत्म-विकास का प्रतीक हो सकता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि सच्चे प्रेम के लिए तप और समर्पण आवश्यक है। कठिनाइयों के बाद भी मिलन सम्भव है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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