उत्तर काण्ड अध्याय 63

राजा नृग की कहानी का समापन

राम राजा नृग की कथा का समापन करते हुए बताते हैं कि कैसे भगवान कृष्ण ने द्वापर युग में उनका उद्धार किया और नृग को शाप से मुक्ति मिली।

विवरण

राम नृग की कथा को आगे बढ़ाते हुए बताते हैं कि राजा नृग ने लाखों वर्षों तक गिरगिट की योनि में दुःख भोगा। अन्ततः द्वापर युग में भगवान कृष्ण ने उस कुएँ का दर्शन किया जहाँ नृग थे। कृष्ण ने उनकी कथा सुनकर उन्हें पूर्व-जन्म का स्मरण दिलाया और गौ-दान के पुण्य से उन्हें शापमुक्त किया। नृग ने मोक्ष प्राप्त किया। राम इस कथा के माध्यम से लक्ष्मण को दान के महत्त्व और भगवत्-कृपा की अनिवार्यता का उपदेश देते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ६३

(राजा नृग की कहानी का समापन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रिषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पिछले सर्ग में राम ने राजा नृग की कथा प्रारम्भ की थी। इस सर्ग में वे उस कथा का समापन करते हुए बताते हैं कि कैसे भगवान कृष्ण ने नृग का उद्धार किया।

🦎 नृग का गिरगिट के रूप में दुःख भोगना (श्लोक १-६)

॥ श्लोक १-६ ॥
रामः प्रोवाच सौमित्रे नृगस्य चरितं शुभम्।
श्रापमोक्षं च वक्ष्यामि यथा कृष्णेन मोक्षितः॥
स कृमिर्गिरिगतो राजा वर्षकोटिशतैरपि।
न लेभे मोक्षणं तत्र स्वकर्मवशतः प्रभो॥
एकदा द्वापरस्यान्ते कृष्णः प्रादुरभूद्विभुः।
स कदाचिद्वनं गत्वा ददर्श कृमिसंयुतम्॥
कूपं च मुनिशार्दूलो देवकीनन्दनः प्रभुः।
तत्रापश्यन्महाकायं कृमिं गिरिगतं तदा॥
📖 भावार्थ : राम ने लक्ष्मण से कहा: "हे सौमित्रे! अब मैं नृग के चरित्र का शाप-मोक्ष का भाग सुनाता हूँ, कैसे कृष्ण ने उन्हें मुक्त किया। वह राजा गिरगिट के रूप में करोड़ों वर्षों तक उस गड्ढे में पड़ा रहा और अपने कर्मों के वशीभूत होकर मुक्ति नहीं पा सका। एक बार द्वापर युग के अन्त में भगवान कृष्ण प्रकट हुए। वे एक दिन वन में गए और उन्होंने उस गड्ढे को देखा, जिसमें एक विशालकाय गिरगिट था।" यहाँ राम नृग की दुर्दशा का वर्णन करते हैं। लाखों वर्षों तक एक ही स्थान पर पड़े रहना अत्यन्त कष्टदायक है। यह कर्म के दण्ड की कठोरता को दर्शाता है। परन्तु भगवान की कृपा से ही मुक्ति सम्भव है। कृष्ण का उस गड्ढे के पास आना संयोग नहीं, बल्कि नृग के पुण्य का प्रभाव है।

💬 कृष्ण और नृग का संवाद (श्लोक ७-१४)

॥ श्लोक ७-१४ ॥
तं दृष्ट्वा कृष्णो राजेन्द्र पप्रच्छ कृमिसत्तमम्।
कस्त्वं भो वद धर्मज्ञ किं कृतं पूर्वजन्मनि॥
कृमिः प्रोवाच राजंस्त्वं कृष्णं देवकिनन्दनम्।
अहं नृगो महाराजः सूर्यवंशसमुद्भवः॥
दानेन तेजसा युक्तः शापेन कृमितां गतः।
उद्धारं देहि मे कृष्ण गोप्रदानेन मोक्षय॥
कृष्णः प्रोवाच राजानं जानामि त्वां नृगोत्तम।
गोप्रदानेन ते मुक्तिरद्य भवितुमर्हति॥
📖 भावार्थ : उस गिरगिट को देखकर कृष्ण ने पूछा: "तुम कौन हो? पूर्वजन्म में क्या किया था?" गिरगिट ने उत्तर दिया: "हे देवकीनन्दन! मैं राजा नृग हूँ, सूर्यवंशी। दान और तेज से युक्त था, किन्तु शाप के कारण गिरगिट हुआ। हे कृष्ण! मेरा उद्धार करो, गौ-दान के प्रभाव से मुझे मुक्त करो।" कृष्ण ने कहा: "हे राजन्! मैं तुम्हें जानता हूँ। आज गौ-दान के प्रभाव से तुम्हें मुक्ति मिलेगी।" यह संवाद अत्यन्त भावुक है। नृग को अपने पूर्वजन्म का स्मरण है और वह कृष्ण से प्रार्थना करता है। कृष्ण तुरन्त उनकी पहचान कर लेते हैं और उन्हें मुक्ति का वचन देते हैं। यहाँ भगवान की कृपा का महत्त्व स्पष्ट होता है। नृग के दान का पुण्य ही उनके उद्धार का कारण बना।

✨ गौ-दान के प्रभाव से मुक्ति (श्लोक १५-२०)

॥ श्लोक १५-२० ॥
ततः कृष्णः समाहूय ब्राह्मणान्वेदपारगान्।
दापयामास गाः शुभ्रा नृगस्य पुण्यवर्धनाः॥
गोप्रदानेन राजेन्द्र नृगो मुक्तिं द्रुतं ययौ।
त्यक्त्वा कृमिशरीरं स दिव्यदेहमवाप्तवान्॥
विमानेनार्कवर्णेन दिव्यस्त्रीगणसंयुतः।
जगाम ब्रह्मसदनं पुण्येन स्वेन धीमतः॥
एतत्ते कथितं सर्वं नृगस्य चरितं महत्।
यथा स गोप्रदानेन मुक्तिं प्राप सुदुर्लभाम्॥
📖 भावार्थ : तब कृष्ण ने वेदपारंगत ब्राह्मणों को बुलाकर उन्हें अनेक गौएँ दान दीं, जिससे नृग के पुण्य में वृद्धि हुई। इस गौ-दान के प्रभाव से नृग तुरन्त मुक्त हो गया। उसने गिरगिट का शरीर त्यागकर दिव्य देह प्राप्त की। फिर वह सूर्य के समान दीप्तिमान विमान पर बैठकर अप्सराओं से घिरा हुआ ब्रह्मलोक को गया। राम कहते हैं: "यह नृग का चरित्र मैंने तुमसे कहा। कैसे उसने गौ-दान के प्रभाव से दुर्लभ मुक्ति पाई।" यहाँ गौ-दान की महिमा का बखान है। नृग ने पूर्व में असंख्य गौदान किए थे, उन्हीं के बल पर उन्हें अन्ततः मुक्ति मिली। भगवान कृष्ण ने उनके पुण्य को पूरा किया। यह दर्शाता है कि पुण्य कर्म कभी नष्ट नहीं होते, वे उचित समय पर फल देते हैं।

📚 राम द्वारा उपदेश (श्लोक २१-२८)

॥ श्लोक २१-२८ ॥
तस्मात्त्वं सौम्य कर्तव्यं दानं देयं विशेषतः।
गवां दानं महापुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्॥
धर्म एव परो लोके धर्मेण प्राप्यते सुखम्।
धर्मादर्थश्च कामश्च धर्मो मूलमिहोच्यते॥
सीताया वियोगो मे यः स धर्मादेव जायते।
धारयिष्यामि धर्मेण राज्यं वत्सरकोटिभिः॥
एवं रामः समाख्याय लक्ष्मणं प्रत्यपूजयत्।
ततः प्रविविशे वेश्म सभृत्यः सह बान्धवैः॥
📖 भावार्थ : राम ने उपदेश दिया: "इसलिए हे सौम्य! दान करना चाहिए, विशेषतः गौदान अत्यन्त पुण्यदायी और सब पापों का नाश करने वाला है। धर्म ही लोक में परम है, धर्म से सुख प्राप्त होता है। धर्म से अर्थ और काम भी प्राप्त होते हैं, धर्म ही मूल है। मेरा सीता से वियोग भी धर्म के कारण ही है। मैं धर्मपूर्वक करोड़ों वर्षों तक राज्य का पालन करूँगा।" इस प्रकार राम ने लक्ष्मण को समझाकर उनका सम्मान किया और फिर अपने परिवार और सेवकों के साथ महल में प्रवेश किया। राम का यह उपदेश धर्म की सर्वोच्चता को स्थापित करता है। वे स्वयं धर्म के मार्ग पर चलते हैं और दूसरों को भी उसी का उपदेश देते हैं। सीता-वियोग को भी वे धर्म का ही अंग मानते हैं, जो उनके त्याग और कर्तव्यपरायणता को दर्शाता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🐄 गौ-दान की महिमा

इस सर्ग में गौ-दान को महापुण्य बताया गया है। नृग को मुक्ति गौ-दान के प्रभाव से ही मिली। यह हिन्दू धर्म में गौ-दान के महत्त्व को रेखांकित करता है।

🕉️ भगवत्-कृपा

नृग का उद्धार भगवान कृष्ण की कृपा से हुआ। यह बताता है कि भक्ति और भगवत्-कृपा के बिना मुक्ति दुर्लभ है।

📿 धर्म का मूल होना

राम ने स्पष्ट किया कि धर्म ही अर्थ और काम का मूल है। धर्म से ही सब कुछ प्राप्त होता है।

😢 सीता-वियोग और धर्म

राम सीता-वियोग को धर्म से जोड़ते हैं, जो उनके चरित्र की महानता को दर्शाता है। वे व्यक्तिगत दुःख को धर्म के आगे नतमस्तक कर देते हैं।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि पुण्य कर्म कभी नष्ट नहीं होते और भगवत्-कृपा से मुक्ति मिलती है। धर्म का पालन ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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