उत्तर काण्ड अध्याय 62

राम द्वारा लक्ष्मण को राजा नृग की कहानी सुनाना

राम लक्ष्मण को राजा नृग की कथा सुनाते हैं, जो एक दानी राजा थे किन्तु एक ब्राह्मण के गौ-दान में हुई भूल के कारण गिरगिट बन गए थे।

विवरण

लक्ष्मण के लौटने के बाद राम उन्हें सांत्वना देते हुए राजा नृग की कथा सुनाते हैं। नृग एक अत्यन्त दानी राजा थे, जिन्होंने असंख्य गौएँ दान में दीं। एक बार उनकी एक गाय, जो किसी ब्राह्मण की थी, अनजाने में किसी अन्य ब्राह्मण को दान कर दी गई। इस भूल के कारण उन्हें श्राप मिला और वे गिरगिट बन गए। यह कथा राम लक्ष्मण को कर्म के फल और दान की शुद्धता के महत्त्व को समझाने के लिए सुनाते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ६२

(राम द्वारा लक्ष्मण को राजा नृग की कहानी सुनाना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ द्विषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पिछले सर्ग में लक्ष्मण के लौटने पर राम ने धैर्य धारण किया। अब वे लक्ष्मण को राजा नृग की शिक्षाप्रद कथा सुनाते हैं, जो दान की पवित्रता और कर्म के फल को दर्शाती है।

👑 राजा नृग का परिचय और उनका दान (श्लोक १-७)

॥ श्लोक १-७ ॥
रामः प्रोवाच सौमित्रे शृणु राजर्षिसत्तमम्।
नृगो नाम महाराजो राजसूयादिभिर्यजुः॥
येन दत्ता मही पूर्वा ब्राह्मणेभ्यो महात्मना।
गावश्च शतसाहस्राः स्वर्णशृङ्गीः पयस्विनीः॥
दीनान्धकृपणानां च अन्नवस्त्रादिदानतः।
तृप्तिमासादिताः सर्वे वर्षकोटिशतैरपि॥
स कदाचिन्महाराजो ददौ गां ब्राह्मणाय वै।
सा च गौर्ब्राह्मणस्यासीत्पूर्वमेव महात्मनः॥
अन्यस्मै ब्राह्मणायाथ प्रादात्तां नृपसत्तमः।
स विस्मितो महाराज गवां स्वामी तपोधनः॥
📖 भावार्थ : राम ने लक्ष्मण से कहा: "हे सौमित्रे! राजर्षि नृग की कथा सुनो। वे महान राजा थे, जिन्होंने राजसूय आदि यज्ञ किए। उन्होंने पृथ्वी और सैकड़ों सहस्र गौएँ, जिनके सींग सोने के थे, ब्राह्मणों को दान दीं। उन्होंने दीन-अन्ध-कृपणों को अन्न-वस्त्र आदि दान देकर सबको तृप्त किया। एक बार उन्होंने एक ब्राह्मण को गाय दान दी। पर वह गाय पहले से ही किसी अन्य ब्राह्मण की थी। राजा ने अनजाने में वही गाय दूसरे ब्राह्मण को दे दी।" यहाँ राम नृग के महान दानी होने का वर्णन करते हैं, ताकि लक्ष्मण समझें कि कैसे एक छोटी-सी भूल भी बड़े परिणाम ला सकती है। नृग ने असंख्य दान किए, फिर भी एक अनजाने अपराध के कारण उन्हें भुगतना पड़ा। यह कर्म के नियम की कठोरता को दर्शाता है।

⚖️ दान में भूल और ब्राह्मणों का विवाद (श्लोक ८-१४)

॥ श्लोक ८-१४ ॥
ततो गृहीत्वा तां गां स द्वितीयो ब्राह्मणो ययौ।
तां दृष्ट्वा प्रथमः प्राह मम गौर्दीयतामिति॥
तयोर्विवादः सुमहानासीद्राजन् समीपतः।
राजा तु श्रुत्वा तद्वाक्यं विस्मयं परमं ययौ॥
स पप्रच्च तदा राजा ब्राह्मणौ वेदपारगौ।
कथं गौर्मम विज्ञेया सत्येन वदतं मम॥
प्रथमो ब्राह्मणः प्राह मम गौः पूर्वमेव हि।
द्वितीयः प्राह मे दत्ता राज्ञा धर्मेण भामिनी॥
राजा तु बहु संचिन्त्य न लेभे निश्चयं तदा।
मोहितः कर्मणा स्वेन धर्माधर्मविमोहितः॥
📖 भावार्थ : दूसरा ब्राह्मण गाय को लेकर चला गया। पहले ब्राह्मण ने उसे देखकर कहा: "यह मेरी गाय है, मुझे दो।" दोनों में विवाद हुआ और वे राजा के पास पहुँचे। राजा नृग ने दोनों वेदपारंगत ब्राह्मणों से पूछा: "यह गाय किसकी है? सत्य बताओ।" पहले ने कहा: "यह पहले से मेरी है।" दूसरे ने कहा: "राजा ने धर्मपूर्वक मुझे दी है।" राजा ने बहुत सोचा, पर अपने कर्म के मोह के कारण वे निश्चय नहीं कर पाए। यहाँ दान की भूल का परिणाम सामने आता है। राजा नृग ने अनजाने में पर-द्रव्य का दान कर दिया। वे दोनों ब्राह्मणों के बीच फँस गए। उनकी स्थिति अत्यन्त दुविधापूर्ण थी। वे दानी थे, किन्तु इस भूल ने उन्हें अपराधी बना दिया। यह प्रसंग बताता है कि दान करते समय वस्तु की स्वामित्व-शुद्धि अत्यन्त आवश्यक है।

🦎 श्राप और गिरगिट बनना (श्लोक १५-२२)

॥ श्लोक १५-२२ ॥
ततस्तौ ब्राह्मणौ क्रुद्धौ शापं दातुमुपस्थितौ।
राजन् यस्मात्त्वया पापं कृतमज्ञानतोऽपि हि॥
तस्मात्त्वं कृमिरूपेण पतितो भव दारुणे।
अथवा त्वां ग्रहीष्यन्ति दुष्कृतानि स्वकर्मभिः॥
इत्युक्त्वा तौ जग्मतुस्तु ब्राह्मणौ यत्र कामतः।
राजा तु भयसंविग्नः पपात धरणीतले॥
ततः कालेन महता स राजा कृमिरूपधृक्।
जज्ञे गिरिगतो राजन् स विलीनो दिवानिशम्॥
तस्योद्धारं तु कृष्णेन कृतं द्वापरयोगतः।
गोप्रदानेन राजेन्द्र मुक्तः स नृपसत्तमः॥
📖 भावार्थ : तब दोनों ब्राह्मण क्रोधित होकर शाप देने लगे: "हे राजन्! तुमने अज्ञानवश पाप किया है, इसलिए तुम कीड़े के रूप में पतित होओगे। या तुम्हारे दुष्कर्म तुम्हें ग्रस लेंगे।" यह कहकर वे चले गए। राजा भय से व्याकुल होकर भूमि पर गिर पड़े। बहुत समय बाद वे गिरगिट (कृमि) के रूप में एक गड्ढे में जन्मे और वहाँ दिन-रात पड़े रहे। अन्त में द्वापर युग में भगवान कृष्ण ने गौ-दान के प्रभाव से उनका उद्धार किया। यह श्राप का प्रसंग अत्यन्त मार्मिक है। राजा नृग ने असंख्य पुण्य किए थे, फिर भी एक अनजानी भूल ने उन्हें योनि-भ्रमण करा दिया। लेकिन उनके दान का पुण्य भी साथ था, जिसके कारण कृष्ण ने उन्हें मुक्त किया। यह कथा बताती है कि पुण्य और पाप दोनों का फल मिलता है। यहाँ राम इस कथा के माध्यम से लक्ष्मण को समझाते हैं कि कर्म अत्यन्त सूक्ष्म है, अतः सावधानी आवश्यक है।

📜 राम द्वारा कथा का उपदेश (श्लोक २३-२९)

॥ श्लोक २३-२९ ॥
एतत्ते सर्वमाख्यातं नृगस्य चरितं महत्।
यथा स दुष्कृतैर्युक्तो गतो गिरिगतां दशाम्॥
तस्मात्त्वं सौम्य कर्तव्यं धर्ममेव सदा नरैः।
दानं देयं विधानेन शुद्धभावेन सर्वदा॥
नाविचार्य प्रदातव्यं परद्रव्यं कदाचन।
अज्ञानादपि संमोहात्पतनं तस्य कर्मणः॥
धर्मः सूक्ष्मः सदा ज्ञेयो ब्राह्मणानां च पूजनम्।
एवं वर्तयितुं राज्ञा प्रजापालनमुत्तमम्॥
📖 भावार्थ : राम ने कहा: "यह राजा नृग का चरित्र मैंने तुमसे कहा। कैसे वे दुष्कर्मों के कारण गिरगिट की दशा को प्राप्त हुए। इसलिए हे सौम्य! मनुष्यों को सदा धर्म का ही आचरण करना चाहिए। दान विधिपूर्वक और शुद्ध भाव से देना चाहिए। कभी भी बिना विचारे पराया धन नहीं देना चाहिए। अज्ञान या मोह से भी ऐसा करने पर पतन होता है। धर्म अत्यन्त सूक्ष्म है, उसे जानना चाहिए और ब्राह्मणों की पूजा करनी चाहिए। राजा को प्रजापालन करते हुए ऐसा ही आचरण करना चाहिए।" राम इस कथा का नैतिक पक्ष स्पष्ट करते हैं। वे लक्ष्मण को धर्म की सूक्ष्मता और दान की पवित्रता का पाठ पढ़ाते हैं। उनका कहना है कि केवल दान करना पर्याप्त नहीं, उसकी शुद्धता भी आवश्यक है। पर-द्रव्य का दान कभी नहीं करना चाहिए। यह उपदेश आज भी प्रासंगिक है।

🙏 लक्ष्मण की प्रतिक्रिया और राम का आशीर्वाद (श्लोक ३०-३५)

॥ श्लोक ३०-३५ ॥
लक्ष्मणः प्राह धर्मज्ञ धर्मस्ते वदतां वर।
अनुगृहीतोऽस्मि त्वत्तः कथया धर्मसंहितया॥
नरः श्रुत्वा कथामेतां नृगस्य पापनाशिनीम्।
सर्वपापैः प्रमुच्येत धर्मनिष्ठो न संशयः॥
रामः प्रोवाच सौमित्रे सत्यमेतदुदीरितम्।
यश्चेमां पठते नित्यं कथां स याति सद्गतिम्॥
इत्युक्त्वा राघवो राजा लक्ष्मणं परिषस्वजे।
आशीर्भिश्च समायुक्तं प्रेषयामास वै गृहम्॥
📖 भावार्थ : लक्ष्मण ने कहा: "हे धर्मज्ञ! हे वदतां वर! आपने धर्मयुक्त कथा से मुझे अनुगृहीत किया। जो मनुष्य इस नृग की पापनाशिनी कथा को सुनता है, वह सब पापों से मुक्त होकर धर्मनिष्ठ हो जाता है।" राम ने कहा: "हे सौमित्रे! यह सत्य है। जो इस कथा का नित्य पाठ करता है, वह सद्गति को प्राप्त होता है।" ऐसा कहकर राम ने लक्ष्मण को गले लगाया और आशीर्वाद देकर उन्हें उनके महल भेज दिया। इस प्रकार लक्ष्मण ने कथा को सुनकर उसकी महिमा स्वीकार की। राम ने भी कथा के श्रवण-पाठ के लाभ बताए। यहाँ कथा का फल बताकर राम ने इसकी महत्ता स्थापित की। लक्ष्मण का गले लगना और आशीर्वाद देना उनके पारस्परिक स्नेह को दर्शाता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🔄 कर्म का सिद्धान्त

राजा नृग की कथा कर्म के अटल नियम को दर्शाती है। अच्छे कर्मों के साथ-साथ अनजाने में हुए पाप का भी फल भोगना पड़ता है। यह जीवन में सावधानी का पाठ पढ़ाता है।

🎁 दान की शुद्धता

दान देते समय यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि दी जाने वाली वस्तु अपनी हो और उस पर किसी अन्य का अधिकार न हो। पर-द्रव्य का दान पुण्य नहीं, पाप देता है।

🧐 धर्म की सूक्ष्मता

धर्म अत्यन्त सूक्ष्म है। उसे समझने के लिए विवेक और ज्ञान आवश्यक है। यहाँ राम ने लक्ष्मण को धर्म का मार्ग दिखाया।

🙇‍♂️ गुरु और शिष्य

राम और लक्ष्मण के बीच यह संवाद गुरु-शिष्य के आदर्श सम्बन्ध को प्रस्तुत करता है। राम उपदेश देते हैं और लक्ष्मण श्रद्धापूर्वक ग्रहण करते हैं।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि दान देते समय पात्र और वस्तु की शुद्धता का ध्यान रखना चाहिए। छोटी-सी भूल भी बड़ा दुःख दे सकती है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे द्विषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।