उत्तर काण्ड अध्याय 61

लक्ष्मण का राम के पास लौटना

लक्ष्मण द्वारा सीता को वन में छोड़ने के बाद अयोध्या लौटना और राम से मिलना। राम का शोक और लक्ष्मण का सांत्वना देना।

विवरण

राम के आदेश पर लक्ष्मण सीता को वन में छोड़कर अयोध्या लौटते हैं। वे अत्यन्त दुःखी हैं किन्तु राजा की आज्ञा का पालन करते हैं। राम लक्ष्मण के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं और जब लक्ष्मण आते हैं, तो राम उनसे सीता के बारे में पूछते हैं। लक्ष्मण विनम्रतापूर्वक सारा वृत्तान्त सुनाते हैं। राम शोक में डूब जाते हैं, परन्तु धैर्य धारण करते हैं और राजधर्म का पालन करने की बात कहते हैं। लक्ष्मण राम को सांत्वना देते हैं और उन्हें धैर्य बनाए रखने की प्रेरणा देते हैं। यह सर्ग राम के मानसिक द्वन्द्व और लक्ष्मण की निष्ठा को दर्शाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ६१

(लक्ष्मण का राम के पास लौटना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम की आज्ञा से लक्ष्मण सीता को वन में त्याग कर लौटते हैं। यह सर्ग उसी लौटने की क्रिया और राम के हृदय के द्वन्द्व का वर्णन करता है।

🚶 लक्ष्मण का अयोध्या लौटना (श्लोक १-६)

॥ श्लोक १-६ ॥
ततः सीतां वने त्यक्त्वा लक्ष्मणः शोककर्शितः।
आजगाम पुरीं रम्यामयोध्यां रघुनन्दनः॥
रथेन वातजवेन क्षिप्रं प्राप्य नरेश्वरम्।
ददर्श रामं दीनार्तं शोकेन महता वृतम्॥
स दृष्ट्वा भ्रातरं ज्येष्ठं विनयावनतोऽभवत्।
अञ्जलिं प्राङ्मुखः कृत्वा प्रणनाम महीपतिम्॥
रामस्तमुत्थितं दृष्ट्वा परिष्वज्येदमब्रवीत्।
कच्चित्सीता वने तात सुखं वसति सा प्रिया॥
कच्चित्त्वं न परिश्रान्तः पन्थानं बहुकण्टकम्।
कच्चित्ते कुशलं सौम्य कच्चित्सीता न शोचति॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; सीताम् = सीता को; वने = वन में; त्यक्त्वा = छोड़कर; लक्ष्मणः = लक्ष्मण; शोककर्शितः = शोक से कृश हुए; आजगाम = आए; पुरीम् = नगरी को; रम्याम् = सुन्दर; अयोध्याम् = अयोध्या; रघुनन्दनः = रघुनन्दन; रथेन = रथ से; वातजवेन = वायु के समान वेगवान; क्षिप्रम् = शीघ्र; प्राप्य = पाकर; नरेश्वरम् = राजा को; ददर्श = देखा; रामम् = राम को; दीनार्तम् = दीन और आर्त; शोकेन = शोक से; महता = महान; वृतम् = घिरे हुए; सः = वह; दृष्ट्वा = देखकर; भ्रातरम् = भाई को; ज्येष्ठम् = बड़े; विनयावनतः = विनय से झुके; अञ्जलिम् = अञ्जलि; प्राङ्मुखः = सामने; कृत्वा = करके; प्रणनाम = प्रणाम किया; महीपतिम् = राजा को; रामः = राम; तम् = उसे; उत्थितम् = उठे हुए; दृष्ट्वा = देखकर; परिष्वज्य = गले लगाकर; इदम् = यह; अब्रवीत् = बोले; कच्चित् = क्या; सीता = सीता; वने = वन में; तात = हे तात; सुखम् = सुख से; वसति = रहती है; सा = वह; प्रिया = प्रिया; कच्चित् = क्या; त्वम् = तुम; न = नहीं; परिश्रान्तः = थके; पन्थानम् = मार्ग; बहुकण्टकम् = बहुत काँटों वाला; कच्चित् = क्या; ते = तुम्हारा; कुशलम् = कुशल; सौम्य = सौम्य; कच्चित् = क्या; सीता = सीता; न = नहीं; शोचति = शोक करती है।
📖 भावार्थ : सीता को वन में छोड़ने के बाद लक्ष्मण शोक से पीड़ित होकर अयोध्या लौटे। वे शीघ्र ही राम के पास पहुँचे और उन्हें अत्यन्त दुःखी देखा। लक्ष्मण ने विनम्रतापूर्वक राम को प्रणाम किया। राम ने उन्हें गले लगाकर पूछा कि क्या सीता वन में सुखपूर्वक रह रही हैं, क्या मार्ग में तुम्हें कोई कठिनाई नहीं हुई, और क्या तुम कुशल से लौटे हो। राम की वाणी में सीता के प्रति अगाध प्रेम और चिन्ता झलकती है। वे लक्ष्मण की थकान की भी चिन्ता करते हैं। इस संवाद से राम के कोमल हृदय का पता चलता है, जो राजधर्म के कठोर निर्णय के बावजूद अपने प्रियजनों के कल्याण की कामना करते हैं। लक्ष्मण के मौन और शोकाकुल मुद्रा से प्रतीत होता है कि उन्होंने यह कार्य अत्यन्त दुःख के साथ किया था। राम के प्रश्नों में एक राजा की औपचारिकता और एक भाई की आत्मीयता दोनों सम्मिलित हैं।

🗣️ लक्ष्मण का उत्तर और सीता का वर्णन (श्लोक ७-१२)

॥ श्लोक ७-१२ ॥
लक्ष्मणः प्राह राजेन्द्र यथा नियुक्तस्त्वया नृप।
सीता वने परित्यक्ता तापसाश्रमसन्निधौ॥
सा तु रुदित्वा बहुशो मामुवाच कृताञ्जलिः।
किं मया विप्रियं राज्ञः कृतं पूर्वं महात्मनः॥
न स्मरामि महाबाहो येन त्यक्ता वने प्रिया।
इत्युक्त्वा पतिता भूमौ मूर्छिता दीनवत्सला॥
तामुत्थाप्य च बाहुभ्यां सान्त्वयित्वा पुनः पुनः।
आश्रमं तापसानां च दर्शयित्वा गतस्त्वहम्॥
सा तु तत्र सुखं राजन् वसिष्यति तपोवने।
ऋषीणां सेवया साध्वी तापसीव तपस्विनी॥
📖 भावार्थ : लक्ष्मण ने कहा: "हे राजेन्द्र! आपकी आज्ञा के अनुसार मैंने सीता को तापस आश्रम के निकट वन में छोड़ दिया। वहाँ वह बहुत रोई और हाथ जोड़कर बोली: मैंने राजा का क्या अपराध किया है, जिसके कारण वे मुझे त्याग रहे हैं? मुझे तो कोई अप्रिय कार्य स्मरण नहीं आता। यह कहकर वह मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ीं। मैंने उन्हें बाहों में उठाकर बहुत सान्त्वना दी, और ऋषियों का आश्रम दिखाकर लौट आया। हे राजन्! वह साध्वी तपस्विनी की भाँति वन में ऋषियों की सेवा करते हुए सुखपूर्वक रहेगी।" लक्ष्मण के शब्दों में सीता की दशा का मार्मिक वर्णन है। वह सीता की निर्दोषिता और राम के प्रति उनके अटूट प्रेम को व्यक्त करता है। सीता का मूर्छित होना उनके आघात की गहराई को दर्शाता है। लक्ष्मण ने करुणा दिखाते हुए उन्हें सँभाला, किन्तु राजाज्ञा का पालन किया। इस प्रकार लक्ष्मण ने अपने कर्तव्य और मानवता के बीच संतुलन बनाए रखा। वे राम को आश्वस्त करते हैं कि सीता वन में ऋषियों के सान्निध्य में सुखी रहेंगी।

😢 राम का शोक और विलाप (श्लोक १३-१८)

॥ श्लोक १३-१८ ॥
लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा रामः शोकपरिप्लुतः।
निपपात महीं तत्र विललाप च दुःखितः॥
हा सीते सुकुले जाते धर्मज्ञे सत्यवादिनि।
कथं त्वं वनमाश्रित्य वत्स्यसि क्षुत्पिपासिता॥
किं त्वया मेऽपराद्धं स्याद्येन त्वं त्याजिता वने।
नूनं मे दुष्कृतं कर्म पुरा जन्मान्तरे कृतम्॥
येन त्वां द्रष्टुमक्षम्यो वियोगेन दहाम्यहम्।
विना त्वया महाभागे जीवितं मे निरर्थकम्॥
इति विलप्य बहुधा रामः शोकसमन्वितः।
मुहूर्तं स्थित्वा धैर्येण लक्ष्मणं प्रत्यभाषत॥
📖 भावार्थ : लक्ष्मण के वचन सुनकर राम शोक से व्याकुल हो गए और भूमि पर गिर पड़े। वे विलाप करने लगे: "हा सीते! कुलीन, धर्मज्ञ और सत्यवादिनी! तुम कैसे वन में भूख-प्यास से व्याकुल होकर रहोगी? मैंने तुम्हारा क्या अपराध किया है, जो तुम्हें त्यागना पड़ा? निश्चय ही मेरे किसी पूर्व जन्म के पाप का फल है कि मैं तुम्हें नहीं देख पा रहा हूँ और वियोग में जल रहा हूँ। तुम्हारे बिना मेरा जीवन निरर्थक है।" इस प्रकार विलाप करने के बाद राम ने कुछ धैर्य धारण किया और लक्ष्मण से बोले। यहाँ राम का मानवीय पक्ष उभरकर आता है। वे एक राजा होते हुए भी पत्नी-वियोग में सामान्य मनुष्य की भाँति व्यथित हैं। उनका आत्मग्लानि और पूर्वजन्म के कर्मों का स्मरण करना उनके चिन्तन की गहराई को दर्शाता है। फिर भी वे धैर्य पकड़ते हैं, जो उनके चरित्र की दृढ़ता को प्रदर्शित करता है।

🧘 लक्ष्मण की सांत्वना और धैर्य का उपदेश (श्लोक १९-२६)

॥ श्लोक १९-२६ ॥
ततः सौमित्रिरव्यग्रो रामं धैर्येण योजयन्।
उवाच वचनं काले धर्मार्थसहितं शुभम्॥
न शोकेन च शोचन्ति पण्डिता निर्ममा नृप।
धैर्यमालम्ब्य कर्तव्यं राज्ञा धर्मपरायण॥
त्वया हि लोकपालानां धृतिर्धैर्यं च रक्ष्यते।
सीता च तपसा युक्ता पुनः प्राप्स्यसि सत्कृताम्॥
राजधर्मं पुरस्कृत्य त्यागः सीताय कारितः।
न त्वया दुष्कृतं किञ्चिद्दैवमेवात्र कारणम्॥
तस्मात्त्वं धैर्यमास्थाय पालयेमां वसुंधराम्।
सीताप्राप्तिर्भवेदेव काले दैवात्सुखावहा॥
📖 भावार्थ : तब लक्ष्मण ने धैर्यपूर्वक राम को सांत्वना देते हुए धर्म और अर्थ से युक्त वचन कहे: "हे राजन्! पण्डित और निर्मम पुरुष शोक से नहीं शोचते। राजा को धैर्य धारण करके धर्मपरायण होना चाहिए। आप ही लोकपालों की धृति और धैर्य की रक्षा करते हैं। सीता तपस्या में लीन हैं, वे पुनः आपको मिलेंगी। राजधर्म को प्रधान मानकर ही सीता का त्याग कराया गया, उसमें आपका दोष नहीं, दैव ही कारण है। अतः आप धैर्य धारण करके इस पृथ्वी का पालन करें। समय आने पर सीता की प्राप्ति सुखदायक होगी।" लक्ष्मण के इन वचनों में गहन दार्शनिकता है। वे राम को उनके राजधर्म की याद दिलाते हैं और उन्हें भावनाओं में बहने से रोकते हैं। वे सीता के पुनर्मिलन की आशा भी दिलाते हैं। लक्ष्मण का यह उपदेश राम के लिए एक मार्गदर्शन है, जो उन्हें राजा के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए प्रेरित करता है। वे बताते हैं कि दैव की गति निराली है, अतः धैर्य ही सबसे बड़ा आलम्बन है।

👑 राम का धैर्य धारण करना और राज्य-पालन का संकल्प (श्लोक २७-३२)

॥ श्लोक २७-३२ ॥
लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा रामः संयम्य तां व्यथाम्।
उत्थाय च महाबाहुः प्रत्युवाच कृताञ्जलिः॥
सत्यं वदसि सौमित्रे धर्मज्ञो ह्यसि मे मतः।
करिष्ये वचनं तुभ्यं धारयिष्ये महीमिमाम्॥
न मे शोकः सीतया वै कर्तव्यो राज्यपालने।
यदि सीता प्रिया मेऽस्ति तदर्थं धर्मरक्षणम्॥
त्वया सह महाबाहो भरतेन शत्रुघ्नेन च।
पालयिष्ये प्रजाः सर्वा धर्ममार्गेण लक्ष्मण॥
इत्युक्त्वा राघवो राजा लक्ष्मणं परिषस्वजे।
ततः प्रविविशे वेश्म कृतकृत्य इवाभवत्॥
📖 भावार्थ : लक्ष्मण के वचन सुनकर राम ने अपनी व्यथा पर संयम पाया और उठकर हाथ जोड़कर कहा: "हे सौमित्रे! तुम सत्य कहते हो, तुम धर्मज्ञ हो। मैं तुम्हारा वचन पालन करूँगा और इस पृथ्वी का धारण करूँगा। राज्यपालन में सीता के लिए शोक करना उचित नहीं। यदि सीता मेरी प्रिया है, तो उसके लिए धर्म की रक्षा करना ही उचित है। हे लक्ष्मण! तुम्हारे, भरत और शत्रुघ्न के साथ मिलकर मैं धर्ममार्ग से सब प्रजा का पालन करूँगा।" ऐसा कहकर राम ने लक्ष्मण को गले लगाया और अपने महल में प्रवेश किए, मानो उनका कर्तव्य पूरा हो गया हो। यहाँ राम ने अपने व्यक्तिगत दुःख को त्यागकर राजधर्म को प्राथमिकता दी। उनका कथन कि सीता के प्रेम का सच्चा अर्थ धर्म की रक्षा है, अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। वे यह स्वीकार करते हैं कि राजा के रूप में उनका प्रथम कर्तव्य प्रजापालन है, और इसमें परिवार के स्नेह को बाधक नहीं बनने देना चाहिए। यह राम के आदर्श चरित्र का उत्कृष्ट उदाहरण है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

😢 राम का वियोग और कर्तव्यपालन

इस सर्ग में राम के मानवीय स्वरूप का सुन्दर चित्रण है। वे एक ओर पत्नी-वियोग में विलाप करते हैं, तो दूसरी ओर राजधर्म के लिए अपने दुःख को त्याग देते हैं। यह उनके चरित्र की महानता को दर्शाता है।

🤝 लक्ष्मण की निष्ठा और बुद्धि

लक्ष्मण ने केवल आज्ञापालन ही नहीं किया, बल्कि राम को धैर्य बंधाने वाले उपदेश भी दिए। वे एक आदर्श अनुज और मंत्री की भूमिका में हैं।

⚖️ धर्म और दैव का समन्वय

लक्ष्मण ने स्पष्ट किया कि सीता का त्याग दैव के वश था, राम का दोष नहीं। यह कर्म और भाग्य के सहअस्तित्व का संकेत है।

🏛️ राजधर्म की प्रधानता

राम ने व्यक्तिगत सुख से ऊपर उठकर राजधर्म को सर्वोपरि माना। यह शासक के लिए अनुकरणीय आदर्श है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि कर्तव्यपालन में व्यक्तिगत सुख-दुःख बाधक नहीं बनने चाहिए। धैर्य और संयम से ही महान कार्य सम्पन्न होते हैं।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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