लक्ष्मण का राम के पास लौटना
लक्ष्मण द्वारा सीता को वन में छोड़ने के बाद अयोध्या लौटना और राम से मिलना। राम का शोक और लक्ष्मण का सांत्वना देना।
विवरण
राम के आदेश पर लक्ष्मण सीता को वन में छोड़कर अयोध्या लौटते हैं। वे अत्यन्त दुःखी हैं किन्तु राजा की आज्ञा का पालन करते हैं। राम लक्ष्मण के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं और जब लक्ष्मण आते हैं, तो राम उनसे सीता के बारे में पूछते हैं। लक्ष्मण विनम्रतापूर्वक सारा वृत्तान्त सुनाते हैं। राम शोक में डूब जाते हैं, परन्तु धैर्य धारण करते हैं और राजधर्म का पालन करने की बात कहते हैं। लक्ष्मण राम को सांत्वना देते हैं और उन्हें धैर्य बनाए रखने की प्रेरणा देते हैं। यह सर्ग राम के मानसिक द्वन्द्व और लक्ष्मण की निष्ठा को दर्शाता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ६१
(लक्ष्मण का राम के पास लौटना)
🔆 प्रस्तावना : राम की आज्ञा से लक्ष्मण सीता को वन में त्याग कर लौटते हैं। यह सर्ग उसी लौटने की क्रिया और राम के हृदय के द्वन्द्व का वर्णन करता है।
🚶 लक्ष्मण का अयोध्या लौटना (श्लोक १-६)
आजगाम पुरीं रम्यामयोध्यां रघुनन्दनः॥
रथेन वातजवेन क्षिप्रं प्राप्य नरेश्वरम्।
ददर्श रामं दीनार्तं शोकेन महता वृतम्॥
स दृष्ट्वा भ्रातरं ज्येष्ठं विनयावनतोऽभवत्।
अञ्जलिं प्राङ्मुखः कृत्वा प्रणनाम महीपतिम्॥
रामस्तमुत्थितं दृष्ट्वा परिष्वज्येदमब्रवीत्।
कच्चित्सीता वने तात सुखं वसति सा प्रिया॥
कच्चित्त्वं न परिश्रान्तः पन्थानं बहुकण्टकम्।
कच्चित्ते कुशलं सौम्य कच्चित्सीता न शोचति॥
🗣️ लक्ष्मण का उत्तर और सीता का वर्णन (श्लोक ७-१२)
सीता वने परित्यक्ता तापसाश्रमसन्निधौ॥
सा तु रुदित्वा बहुशो मामुवाच कृताञ्जलिः।
किं मया विप्रियं राज्ञः कृतं पूर्वं महात्मनः॥
न स्मरामि महाबाहो येन त्यक्ता वने प्रिया।
इत्युक्त्वा पतिता भूमौ मूर्छिता दीनवत्सला॥
तामुत्थाप्य च बाहुभ्यां सान्त्वयित्वा पुनः पुनः।
आश्रमं तापसानां च दर्शयित्वा गतस्त्वहम्॥
सा तु तत्र सुखं राजन् वसिष्यति तपोवने।
ऋषीणां सेवया साध्वी तापसीव तपस्विनी॥
😢 राम का शोक और विलाप (श्लोक १३-१८)
निपपात महीं तत्र विललाप च दुःखितः॥
हा सीते सुकुले जाते धर्मज्ञे सत्यवादिनि।
कथं त्वं वनमाश्रित्य वत्स्यसि क्षुत्पिपासिता॥
किं त्वया मेऽपराद्धं स्याद्येन त्वं त्याजिता वने।
नूनं मे दुष्कृतं कर्म पुरा जन्मान्तरे कृतम्॥
येन त्वां द्रष्टुमक्षम्यो वियोगेन दहाम्यहम्।
विना त्वया महाभागे जीवितं मे निरर्थकम्॥
इति विलप्य बहुधा रामः शोकसमन्वितः।
मुहूर्तं स्थित्वा धैर्येण लक्ष्मणं प्रत्यभाषत॥
🧘 लक्ष्मण की सांत्वना और धैर्य का उपदेश (श्लोक १९-२६)
उवाच वचनं काले धर्मार्थसहितं शुभम्॥
न शोकेन च शोचन्ति पण्डिता निर्ममा नृप।
धैर्यमालम्ब्य कर्तव्यं राज्ञा धर्मपरायण॥
त्वया हि लोकपालानां धृतिर्धैर्यं च रक्ष्यते।
सीता च तपसा युक्ता पुनः प्राप्स्यसि सत्कृताम्॥
राजधर्मं पुरस्कृत्य त्यागः सीताय कारितः।
न त्वया दुष्कृतं किञ्चिद्दैवमेवात्र कारणम्॥
तस्मात्त्वं धैर्यमास्थाय पालयेमां वसुंधराम्।
सीताप्राप्तिर्भवेदेव काले दैवात्सुखावहा॥
👑 राम का धैर्य धारण करना और राज्य-पालन का संकल्प (श्लोक २७-३२)
उत्थाय च महाबाहुः प्रत्युवाच कृताञ्जलिः॥
सत्यं वदसि सौमित्रे धर्मज्ञो ह्यसि मे मतः।
करिष्ये वचनं तुभ्यं धारयिष्ये महीमिमाम्॥
न मे शोकः सीतया वै कर्तव्यो राज्यपालने।
यदि सीता प्रिया मेऽस्ति तदर्थं धर्मरक्षणम्॥
त्वया सह महाबाहो भरतेन शत्रुघ्नेन च।
पालयिष्ये प्रजाः सर्वा धर्ममार्गेण लक्ष्मण॥
इत्युक्त्वा राघवो राजा लक्ष्मणं परिषस्वजे।
ततः प्रविविशे वेश्म कृतकृत्य इवाभवत्॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
😢 राम का वियोग और कर्तव्यपालन
इस सर्ग में राम के मानवीय स्वरूप का सुन्दर चित्रण है। वे एक ओर पत्नी-वियोग में विलाप करते हैं, तो दूसरी ओर राजधर्म के लिए अपने दुःख को त्याग देते हैं। यह उनके चरित्र की महानता को दर्शाता है।
🤝 लक्ष्मण की निष्ठा और बुद्धि
लक्ष्मण ने केवल आज्ञापालन ही नहीं किया, बल्कि राम को धैर्य बंधाने वाले उपदेश भी दिए। वे एक आदर्श अनुज और मंत्री की भूमिका में हैं।
⚖️ धर्म और दैव का समन्वय
लक्ष्मण ने स्पष्ट किया कि सीता का त्याग दैव के वश था, राम का दोष नहीं। यह कर्म और भाग्य के सहअस्तित्व का संकेत है।
🏛️ राजधर्म की प्रधानता
राम ने व्यक्तिगत सुख से ऊपर उठकर राजधर्म को सर्वोपरि माना। यह शासक के लिए अनुकरणीय आदर्श है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि कर्तव्यपालन में व्यक्तिगत सुख-दुःख बाधक नहीं बनने चाहिए। धैर्य और संयम से ही महान कार्य सम्पन्न होते हैं।