उत्तर काण्ड अध्याय 59

सुमंत्र द्वारा लक्ष्मण को सांत्वना देना

लक्ष्मण सीता को त्यागकर अत्यन्त दुःखी हैं। सुमंत्र उन्हें धैर्य बंधाते हैं और राजधर्म का स्मरण दिलाते हैं।

विवरण

लक्ष्मण सीता को गंगा तट पर छोड़कर अयोध्या लौटे, किन्तु उनका मन अत्यन्त व्यथित था। वे अपने महल में एकान्त में बैठकर सीता के विलाप को याद कर रहे थे और स्वयं को धिक्कार रहे थे। तभी सुमंत्र, जो राम के परम विश्वासपात्र और मन्त्री थे, लक्ष्मण के पास आए। उन्होंने लक्ष्मण को देखा तो उनकी दशा पर द्रवित हो गए। सुमंत्र ने लक्ष्मण को समझाया कि यह सब राजधर्म के कारण हुआ है, इसमें किसी का दोष नहीं। उन्होंने लक्ष्मण को राम के प्रति उनके कर्तव्य का स्मरण दिलाया और कहा कि ऐसे समय में धैर्य धारण करना ही श्रेयस्कर है। सुमंत्र के उपदेश से लक्ष्मण को कुछ सांत्वना मिली और उन्होंने अपने कर्तव्यों का पालन करना स्वीकार किया। यह सर्ग लक्ष्मण के मानसिक द्वन्द्व और सुमंत्र की वयोवृद्ध बुद्धिमत्ता को दर्शाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ५९

(सुमंत्र द्वारा लक्ष्मण को सांत्वना देना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ नवपञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : सीता को त्यागकर आए लक्ष्मण अत्यन्त दुःखी थे। उनके मन में आत्मग्लानि और पश्चाताप था। तब राम के मन्त्री सुमंत्र ने उन्हें धैर्य बंधाया और राजधर्म का उपदेश दिया।

😔 लक्ष्मण का शोक (श्लोक १-७)

॥ श्लोक १-४ ॥
लक्ष्मणः पुनरागम्य गङ्गातीरात्सुदुःखितः।
विवेश निजमावासं ध्यायन्सीतां पतिव्रताम्॥
न किञ्चित्प्रत्यभाषिष्ट न चैव स्म विचेष्टितः।
शोकेन महताविष्टो नष्टसंज्ञ इवाभवत्॥
तं दृष्ट्वा चिन्तया व्याप्तं सुमन्त्रः प्राज्ञसत्तमः।
उपेत्य विनयोपेत इदं वचनमब्रवीत्॥
किमिदानीं त्वया वीर नाभिभाष्येत किञ्चन।
कच्चित्कुशलमेतत्ते न शोके कारणं क्वचित्॥
🔹 पदच्छेद : लक्ष्मणः = लक्ष्मण; पुनः = फिर; आगम्य = लौटकर; गङ्गातीरात् = गंगा तट से; सुदुःखितः = अत्यन्त दुःखी; विवेश = प्रवेश किया; निजम् = अपने; आवासम् = महल में; ध्यायन् = ध्यान करते हुए; सीताम् = सीता का; पतिव्रताम् = पतिव्रता; न = नहीं; किञ्चित् = कुछ; प्रत्यभाषिष्ट = उत्तर दिया; न = नहीं; चैव = और भी; स्म = ही; विचेष्टितः = चेष्टा करता; शोकेन = शोक से; महता = बड़े; आविष्टः = व्याप्त; नष्टसंज्ञः = मूर्छित सा; इव = जैसे; अभवत् = हो गया; तम् = उसे; दृष्ट्वा = देखकर; चिन्तया = चिन्ता से; व्याप्तम् = व्याप्त; सुमन्त्रः = सुमन्त्र; प्राज्ञसत्तमः = बुद्धिमानों में श्रेष्ठ; उपेत्य = समीप जाकर; विनयोपेतः = विनय सहित; इदम् = यह; वचनम् = वचन; अब्रवीत् = बोला; किम् = क्या; इदानीम् = अब; त्वया = तुमसे; वीर = हे वीर; न = नहीं; अभिभाष्येत = बोला जाता; किञ्चन = कुछ भी; कच्चित् = क्या; कुशलम् = कुशल; एतत् = यह; ते = तुम्हारा; न = नहीं; शोके = शोक में; कारणम् = कारण; क्वचित् = कहीं।
📖 भावार्थ : लक्ष्मण गंगा तट से लौटकर सीधे अपने महल में आए, किन्तु उनका मन अत्यन्त व्यथित था। वे सीता के विलाप और उनकी दशा को बार-बार याद कर रहे थे। उन्होंने किसी से बात नहीं की, न ही किसी प्रकार की चेष्टा की। वे मूर्छित से हो गए थे, शोक से आविष्ट। तब सुमन्त्र, जो राजमन्त्री और अत्यन्त बुद्धिमान थे, लक्ष्मण के पास आए। उन्होंने लक्ष्मण की दशा देखी तो चिन्तित हो गए। विनयपूर्वक उनसे पूछा – हे वीर! तुम कुछ क्यों नहीं बोल रहे? क्या तुम कुशल तो हो? इस शोक का क्या कारण है? सुमन्त्र का यह पूछना लक्ष्मण के प्रति उनके स्नेह और चिन्ता को दर्शाता है। वे समझ गए कि लक्ष्मण के मन में कोई गहरा दुःख है। लक्ष्मण सामान्यतः अत्यन्त धैर्यवान और वीर हैं, किन्तु आज उनकी दशा देखकर सुमन्त्र को आश्चर्य हुआ। वे जानना चाहते थे कि आखिर ऐसा क्या हुआ जिससे लक्ष्मण इतने व्यथित हैं।
॥ श्लोक ५-७ ॥
लक्ष्मणः प्राह सुमन्त्रं शृणु मन्त्रिन्वचो मम।
यदर्थं मम दुःखोऽयं हृदि संपरिवर्तते॥
सीता मया परित्यक्ता रामाज्ञापालनेन हि।
गङ्गातीरे निरालम्बा सिंहव्याघ्राकुले वने॥
तदिदं मम दुःखस्य कारणं हृदि वर्तते।
कथं नु सा पतिव्रता वने तिष्ठेन्निराश्रया॥
📖 भावार्थ : लक्ष्मण ने सुमन्त्र को अपने दुःख का कारण बताया – हे मन्त्रिवर! सुनो, मेरे हृदय में जो दुःख है, उसका कारण यह है कि मैंने राम की आज्ञा का पालन करते हुए सीता को त्याग दिया। उन्हें गंगा तट पर बिना किसी सहारे के, सिंह-व्याघ्रों से भरे घने वन में अकेला छोड़ दिया। यही मेरे दुःख का कारण है। मैं सोच रहा हूँ कि वह पतिव्रता सीता वहाँ कैसे रह पाएगी? निराश्रय, निःसहाय। लक्ष्मण का यह कथन उनकी मानवीय संवेदना को प्रकट करता है। वे राम के आदेश का पालन तो करते हैं, किन्तु उनका हृदय सीता के प्रति दया और करुणा से भरा है। वे जानते हैं कि सीता अकेली वन में कितने कष्ट झेलेगी। उनके मन में यह विचार बार-बार आ रहा है कि कहीं कोई हिंसक पशु उन पर आक्रमण न कर दे, या वे भूख-प्यास से व्याकुल न हो जाएँ। यह चिन्ता उन्हें व्यथित कर रही है। सुमन्त्र के पूछने पर लक्ष्मण अपना दुःख प्रकट करते हैं, जो इस सर्ग का मुख्य भाग है।

🧠 सुमंत्र का उपदेश (श्लोक ८-१८)

॥ श्लोक ८-१२ ॥
सुमन्त्रः प्राह सौमित्रे मा शोकं कर्तुमर्हसि।
राज्ञां हि धर्म एवैको जीवितं च सुखं च हि॥
रामेण धर्ममास्थाय सीता त्यक्ता न संशयः।
प्रजानां हितकाम्येन लोकापवादभीरुणा॥
न च सीता विनश्येत तपोबलसमन्विता।
रक्षिता स्वेन तेजश्च रामभक्त्या च मैथिली॥
तस्मात्त्वं धैर्यमालम्ब्य कर्तव्ये मन आतिष्ठ।
रामस्यानुग्रहे यत्नं कुरु वत्स न संशयः॥
📖 भावार्थ : सुमन्त्र ने लक्ष्मण को समझाते हुए कहा – हे सौमित्रे! तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए। राजाओं के लिए धर्म ही सबसे बड़ा है, जीवन और सुख तो गौण हैं। राम ने धर्म का आश्रय लेकर ही सीता का त्याग किया है, इसमें संशय नहीं। उन्होंने प्रजा के हित और लोकापवाद के भय से ऐसा किया है। और सीता का नाश नहीं होगा। वे तपोबल से सम्पन्न हैं, अपने तेज से और राम-भक्ति से वे सुरक्षित हैं। इसलिए तुम धैर्य धारण करो और अपने कर्तव्य में लग जाओ। राम के अनुग्रह के लिए प्रयत्न करो, यही तुम्हारा कर्तव्य है। सुमन्त्र का यह उपदेश अत्यन्त तर्कसंगत और धर्मसम्मत है। वे लक्ष्मण को यह स्मरण दिलाते हैं कि राम ने जो किया, वह राजधर्म के कारण किया, व्यक्तिगत इच्छा से नहीं। और सीता केवल एक साधारण स्त्री नहीं हैं, वे देवी हैं, उनके पास तपोबल है, और राम की भक्ति उनकी रक्षा करेगी। अतः लक्ष्मण को निराश नहीं होना चाहिए।
॥ श्लोक १३-१८ ॥
लक्ष्मणः प्राह धर्मात्मा सुमन्त्रं वाक्यकोविदम्।
सत्यमुक्तं त्वया मन्त्रिन्धैर्यमालम्ब्यते मया॥
रामस्य वचनं श्रुत्वा सीतात्यागनिमित्तकम्।
अहं तु करवाण्येव यद्यपि दुःखितः सदा॥
एवमुक्त्वा तु सौमित्रः सुमन्त्रं प्रियवादिनम्।
जगाम रामसदनं कृत्वा चित्तं सुधैर्यतः॥
तत्र दृष्ट्वा रामचन्द्रं ध्यानमग्रतो द्विज।
चकार परिचर्यां च भक्त्या परमया युतः॥
📖 भावार्थ : लक्ष्मण ने सुमन्त्र के वचनों को सुना और उनकी सत्यता स्वीकार की। उन्होंने कहा – हे मन्त्रिन्! तुमने सत्य कहा है। अब मैं धैर्य धारण करूँगा। यद्यपि सीता के त्याग का स्मरण कर मैं सदा दुःखी रहता हूँ, फिर भी राम की आज्ञा का पालन करूँगा। यह कहकर लक्ष्मण ने सुमन्त्र को विदा किया और स्वयं को धैर्यपूर्वक तैयार किया। वे राम के पास गए और वहाँ जाकर देखा कि राम ध्यानमग्न हैं। लक्ष्मण ने भक्तिपूर्वक उनकी सेवा की। यहाँ लक्ष्मण की रामभक्ति और आज्ञापालन की पराकाष्ठा दिखती है। वे स्वयं अत्यन्त दुःखी हैं, फिर भी राम के प्रति अपने कर्तव्यों को नहीं भूलते। वे राम के पास जाकर उनकी सेवा में लग जाते हैं, क्योंकि यही उनका धर्म है। सुमन्त्र के उपदेश ने उन्हें सही मार्ग दिखाया और उनके मन को कुछ शान्ति मिली। इस प्रकार यह सर्ग लक्ष्मण के मानसिक द्वन्द्व और उसके समाधान का वर्णन करता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🤝 लक्ष्मण की मानवीय संवेदना

इस सर्ग में लक्ष्मण का वह पक्ष देखने को मिलता है जो प्रायः छिपा रहता है – उनकी संवेदनशीलता और करुणा। वे केवल एक आज्ञाकारी भाई नहीं हैं, बल्कि सीता के प्रति गहरा स्नेह रखते हैं। उनका दुःख यह दर्शाता है कि वे भी मानवीय भावनाओं से परिपूर्ण हैं।

🧓 सुमन्त्र की बुद्धिमत्ता और अनुभव

सुमन्त्र का चरित्र एक वयोवृद्ध, अनुभवी सलाहकार का है। वे लक्ष्मण को केवल सांत्वना ही नहीं देते, बल्कि तर्कपूर्ण ढंग से समझाते हैं कि यह राजधर्म है और इसमें दुःखी होने की आवश्यकता नहीं। उनकी बातें लक्ष्मण को सही दिशा दिखाती हैं।

📿 धैर्य और कर्तव्य का महत्त्व

यह सर्ग धैर्य और कर्तव्य के महत्त्व को रेखांकित करता है। लक्ष्मण का धैर्य धारण करना और राम की सेवा में लग जाना यह सिखाता है कि व्यक्तिगत दुःख के बावजूद अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

💡 राजधर्म की जटिलता

सुमन्त्र के उपदेश में राजधर्म की जटिलता को समझाया गया है। राजा को प्रजा के हित के लिए व्यक्तिगत सुखों का त्याग करना पड़ता है, चाहे वह कितना ही कठोर क्यों न हो। यह एक आदर्श राजा के लक्षण हैं।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जीवन में कठिन परिस्थितियों में धैर्य नहीं खोना चाहिए। अनुभवी लोगों के उपदेश को सुनना और उस पर अमल करना हितकर होता है। कर्तव्य का पालन ही सच्चा धर्म है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे नवपञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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