उत्तर काण्ड अध्याय 57

लक्ष्मण का सीता को गंगा तट पर छोड़ना

लक्ष्मण सीता को गंगा तट पर छोड़कर अयोध्या लौट आते हैं। सीता अकेली वन में विलाप करती हैं, तब वाल्मीकि मुनि वहाँ आते हैं।

विवरण

लक्ष्मण राम की आज्ञा का पालन करते हुए सीता को गंगा के तट पर ले जाते हैं। वे सीता से विदा लेते हैं और उन्हें धैर्य रखने का आदेश देते हैं। सीता अकेली वन में खड़ी होकर राम और अयोध्या का स्मरण करती हैं और विलाप करती हैं। उनका विलाप अत्यन्त करुण है – वे राम के प्रति अपने प्रेम और उनके द्वारा किए गए इस अन्याय पर विस्मय व्यक्त करती हैं। इसी बीच महर्षि वाल्मीकि गंगा स्नान के लिए आते हैं और सीता को देखते हैं। वे उनकी दशा देखकर द्रवित हो जाते हैं और उन्हें आश्रम ले जाने का निर्णय लेते हैं। यह सर्ग सीता के वनवास की करुण गाथा प्रस्तुत करता है और वाल्मीकि के आगमन की पृष्ठभूमि तैयार करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ५७

(लक्ष्मण का सीता को गंगा तट पर छोड़ना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तपञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम की आज्ञा से लक्ष्मण सीता को गंगा के तट पर ले गए। वहाँ उन्हें अकेला छोड़कर लक्ष्मण लौट आए। इस सर्ग में सीता के विलाप और वाल्मीकि मुनि के आगमन का वर्णन है।

🚤 लक्ष्मण सीता को गंगा तट पर छोड़ते हैं (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततो लक्ष्मणमायान्तं सीता दृष्ट्वा वनान्तिके।
उवाच दीनया वाचा बाष्पसंरुद्धया गिरा॥
किं त्वं मां नेतुमिच्छसि रामस्य वचनादिह।
त्यक्त्वा गच्छसि मामेकां नूनं दैवपरायणाम्॥
लक्ष्मणः प्राह वैदेहीं नाहं त्यक्तुं त्वमर्हसि।
रामाज्ञा यत्नतः कार्या मया देवि न संशयः॥
इमं तीरं समासाद्य गङ्गायाः पुण्यवाहिनीम्।
वाल्मीकेराश्रमोऽभ्याशे तत्र त्वं वस शोभने॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण को; आयान्तम् = आते हुए; सीता = सीता; दृष्ट्वा = देखकर; वनान्तिके = वन के समीप; उवाच = बोलीं; दीनया = दीन; वाचा = वाणी से; बाष्पसंरुद्धया = आँसुओं से रुकी हुई; गिरा = वाणी से; किम् = क्या; त्वम् = तुम; माम् = मुझे; नेतुम् = ले जाना; इच्छसि = चाहते हो; रामस्य = राम के; वचनात् = वचन से; इह = यहाँ; त्यक्त्वा = त्यागकर; गच्छसि = जा रहे हो; माम् = मुझे; एकाम् = अकेली; नूनम् = निश्चय; दैवपरायणाम् = भाग्य के भरोसे; लक्ष्मणः = लक्ष्मण; प्राह = बोले; वैदेहीम् = वैदेही से; न = नहीं; अहम् = मैं; त्यक्तुम् = त्यागना; त्वम् = तुम; अर्हसि = योग्य हो; रामाज्ञा = राम की आज्ञा; यत्नतः = यत्नपूर्वक; कार्या = करनी चाहिए; मया = मुझे; देवि = हे देवी; न = नहीं; संशयः = संशय; इमम् = इस; तीरम् = तट को; समासाद्य = प्राप्त करके; गङ्गायाः = गंगा की; पुण्यवाहिनीम् = पुण्यवाहिनी; वाल्मीकेः = वाल्मीकि का; आश्रमः = आश्रम; अभ्याशे = समीप; तत्र = वहाँ; त्वम् = तुम; वस = रहो; शोभने = हे शोभने।
📖 भावार्थ : लक्ष्मण सीता को गंगा के उस स्थान पर ले गए जहाँ घना जंगल था और आसपास कोई मानव-बस्ती नहीं थी। सीता ने जब देखा कि लक्ष्मण उन्हें एक सुनसान जगह पर ले आए हैं और अब वापस जाने की तैयारी कर रहे हैं, तो उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। उन्होंने दीन स्वर में लक्ष्मण से पूछा – हे लक्ष्मण! क्या तुम सचमुच मुझे यहाँ अकेली छोड़कर जा रहे हो? क्या यही राम की आज्ञा है? लक्ष्मण ने अत्यन्त विनम्रता और दुःख के साथ उत्तर दिया – हे देवी! मैं आपको त्यागना नहीं चाहता, किन्तु राम की आज्ञा का पालन करना मेरा परम कर्तव्य है। यह गंगा का पुण्य तट है। समीप ही महर्षि वाल्मीकि का आश्रम है। आप वहाँ निवास कर सकती हैं। वे आपकी रक्षा करेंगे। लक्ष्मण के इन शब्दों से सीता को कुछ सांत्वना मिली, किन्तु उनका हृदय यह सोचकर व्यथित था कि राम ने उन्हें इस प्रकार क्यों त्याग दिया। वे यह भी जानती थीं कि लक्ष्मण स्वयं इस कार्य को करते हुए अत्यन्त दुःखी हैं, अतः उन्होंने लक्ष्मण पर कोई दोष नहीं लगाया।
॥ श्लोक ५-८ ॥
सीता प्रोवाच सौमित्रे गच्छ त्वं राघवान्तिकम्।
मम दुःखेन सन्तप्तं न निवेदय राघवम्॥
कथं नु कथयिष्यामि रामस्य चरितं महत्।
मम भाग्यविपर्यासादिदं दुःखमुपस्थितम्॥
लक्ष्मणः प्राह वैदेहीं मा विषादं कृथाः शुभे।
दैवमेव परं मन्ये पौरुषं तु निरर्थकम्॥
इत्युक्त्वा प्रणिपत्यैनां लक्ष्मणः प्रस्थितस्तदा।
सीतायाश्चिन्तयन्नेव गतेनाश्रुपरिप्लुतः॥
📖 भावार्थ : सीता ने लक्ष्मण से कहा – हे सौमित्रे! तुम अब राम के पास लौट जाओ। किन्तु मेरे दुःख की बात उनसे मत कहना, क्योंकि उन्हें और अधिक व्यथित होना पड़ेगा। मैं राम के महान चरित्र को भली-भाँति जानती हूँ। यह मेरे भाग्य का ही दोष है कि मुझे यह दुःख भोगना पड़ रहा है। लक्ष्मण ने सीता को सांत्वना देते हुए कहा – हे देवि! आप विषाद न करें। मैं तो समझता हूँ कि दैव ही सबसे बलवान है, पौरुष तो निरर्थक है। यह कहकर लक्ष्मण ने सीता को प्रणाम किया और अश्रुपूरित नेत्रों से वहाँ से प्रस्थान किया। वे बार-बार सीता की दशा का स्मरण कर रहे थे और उनका हृदय व्यथित हो रहा था। यहाँ लक्ष्मण का यह कथन कि पौरुष निरर्थक है, एक गहरे दार्शनिक अर्थ को प्रकट करता है। कभी-कभी मनुष्य के सभी प्रयास विफल हो जाते हैं और भाग्य ही सामने आता है। सीता के साथ जो हुआ, वह भी एक प्रकार से दैव का ही खेल था। लक्ष्मण के हृदय में यह विश्वास और गहरा हो गया कि राम जैसे धर्मात्मा को भी भाग्य के आगे झुकना पड़ता है।

😭 सीता का एकाकी विलाप (श्लोक ९-१८)

॥ श्लोक ९-१३ ॥
सीता तु विजने दृष्ट्वा नदीतीरे रुदत्यपि।
उवाच दीनया वाचा रामं स्मृत्वा पतिव्रता॥
हे राम त्वं महाबाहो किं मामेवं परित्यजेः।
अग्निशुद्धा च सीता ते किं न जानासि राघव॥
यन्मां त्यजसि धर्मज्ञ लोकापवादभीरुकः।
सत्यं ब्रवीमि ते राम न मां वेत्सि यथातथम्॥
पितुर्निदेशात्त्वं राम वनं प्राप्तो महावने।
मयाप्यनुगता साध्वी धर्मं जानासि राघव॥
📖 भावार्थ : लक्ष्मण के जाने के बाद सीता ने स्वयं को एकदम अकेला पाया। चारों ओर घना जंगल था, केवल गंगा का कलकल निनाद सुनाई दे रहा था। उनकी आँखों से अश्रुधारा बह रही थी। वे राम का स्मरण करके विलाप करने लगीं – हे राम! हे महाबाहो! तुमने मुझे इस प्रकार क्यों त्याग दिया? मैं अग्नि परीक्षा में शुद्ध सिद्ध हुई थी, क्या तुम यह नहीं जानते? हे धर्मज्ञ! यदि तुम लोकापवाद के भय से मुझे त्याग रहे हो, तो मैं सत्य कहती हूँ कि तुम मुझे नहीं जानते। जब तुम पिता के आदेश से वन गए थे, तो मैंने भी पतिव्रता धर्म का पालन करते हुए तुम्हारा अनुसरण किया था। तुम धर्म को जानते हो, फिर यह अन्याय क्यों? सीता का यह विलाप अत्यन्त करुण है। वे राम के व्यवहार को समझने में असमर्थ हैं। उनके मन में अनेक प्रश्न उठ रहे हैं – क्या राम को उनकी पवित्रता पर संदेह है? क्या लोकापवाद इतना बलवान है कि राम जैसे धर्मात्मा को भी झुकना पड़ा? वे स्वयं को धिक्कार रही हैं कि शायद उनके भाग्य में यह दुःख लिखा था। फिर भी, वे राम के प्रति किसी प्रकार का द्वेष नहीं रखतीं, केवल अपने भाग्य को रोती हैं।
॥ श्लोक १४-१८ ॥
किं नु वक्ष्यन्ति मां दृष्ट्वा वनवासिन एव हि।
रामपत्नी वनं प्राप्ता केन वा परित्यजा॥
हा नाथ हा महाबाहो क्व गतोऽसि न मां विना।
नाहं जीवितुमिच्छामि त्वया हीना कथंचन॥
इति विलप्य बहुधा सीता दुःखसमन्विता।
निश्चेष्टा पतिता भूमौ मूर्छिता दैवमोहिता॥
ततस्तु सा समाश्वस्ता कृच्छ्रादुत्थाय मैथिली।
ध्यानमास्थितवत्युग्रं राम एव मनोगता॥
📖 भावार्थ : सीता सोचती हैं कि अब इस वन में रहने वाले लोग मुझे देखकर क्या कहेंगे? वे पूछेंगे कि राम की पत्नी यहाँ अकेली कैसे? किसने त्यागा? उनके मन में यह विचार आते ही वे और अधिक व्यथित हो जाती हैं। वे पुकार उठती हैं – हे नाथ! हे महाबाहो! तुम कहाँ चले गए? तुम्हारे बिना मैं जीवित नहीं रह सकती। इस प्रकार विलाप करते-करते सीता मूर्छित होकर धरती पर गिर पड़ीं। कुछ समय पश्चात जब उन्हें कुछ होश आया, तो वे कठिनाई से उठीं और ध्यान में लीन हो गईं। उनका मन राम में ही लीन था। वे राम का ही चिन्तन कर रही थीं। यह सीता के अटूट प्रेम और पतिव्रता धर्म का प्रमाण है कि विपरीत परिस्थितियों में भी उनके मन से राम का स्मरण नहीं हटता। वे राम को ही अपना सब कुछ मानती हैं। मूर्छित होने के बाद भी जब होश आता है, तो सबसे पहले राम का ही ध्यान आता है। यह दृश्य अत्यन्त मार्मिक है और भारतीय नारी के आदर्श चरित्र को उजागर करता है।

🧘 वाल्मीकि का आगमन (श्लोक १९-२६)

॥ श्लोक १९-२२ ॥
ततः कतिपयाहस्य वाल्मीको मुनिसत्तमः।
गङ्गास्नानाय संप्राप्तः शिष्यैः परिवृतः स्वयम्॥
स ददर्श वरे स्त्रीणां सीतां तां विजने वने।
तपस्विनीवेशधरां रुदतीं दीनमानसाम्॥
उपेत्य मुनिशार्दूलः पप्रच्छ कुशलं तदा।
का त्वं कस्यासि भद्रं ते किमर्थं रोदिषि प्रिये॥
सीता प्रोवाच विप्रर्षे जनकस्य सुताहम।
रामपत्नीति विख्याता सीता नाम्ना तपोधन॥
📖 भावार्थ : कुछ दिनों के बाद महर्षि वाल्मीकि अपने शिष्यों के साथ गंगा में स्नान करने आए। उन्होंने देखा कि एक स्त्री, जो तपस्विनी के समान वस्त्र पहने हुए है, वन में अकेली बैठी रो रही है। वे समीप गए और उससे कुशल पूछी – हे सुभगे! तुम कौन हो? किसकी हो? और क्यों रो रही हो? सीता ने उत्तर दिया – हे महर्षे! मैं राजा जनक की पुत्री सीता हूँ और राम की पत्नी के रूप में विख्यात हूँ। यह सुनकर वाल्मीकि को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने सीता को पहचान लिया, क्योंकि वे राम के वृत्तान्त से परिचित थे। उन्होंने देखा कि यह वही सीता हैं, जिन्होंने रावण का वध कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और अग्नि परीक्षा देकर अपनी पवित्रता सिद्ध की थी। अब वे यहाँ अकेली कैसे? यह सोचकर वे द्रवित हो गए। उनके मन में यह भी आया कि निश्चय ही कोई बड़ा कारण हुआ होगा। वाल्मीकि का आगमन सीता के लिए एक दैवीय सहारा सिद्ध हुआ।
॥ श्लोक २३-२६ ॥
ततः प्रोवाच मुनिराट् शृणु सीते शुभव्रते।
आश्रमोऽयं ममाभ्याशे रम्यः पुण्यजनाश्रयः॥
तत्र त्वं वस कल्याणि मया सह सुखं विना।
यावद्रामः समायाति त्वां नेतुं पुनरर्हति॥
रामस्य मनसा ज्ञात्वा धर्मज्ञस्य महात्मनः।
अवश्यं त्वां समेष्यति कालेनैव न संशयः॥
इत्युक्ता सा तदा सीता मुनिना धर्मचारिणा।
जगाम सहिता तेन वाल्मीकेराश्रमं शुभम्॥
📖 भावार्थ : वाल्मीकि ने सीता से कहा – हे सीते! तुम शुभव्रता हो। मेरा आश्रम इसी के समीप है, जो अत्यन्त रमणीय और पुण्यमय है। तुम वहाँ मेरे साथ रह सकती हो। जब तक राम तुम्हें लेने न आएँ, तब तक तुम वहाँ निवास करो। मैं जानता हूँ कि धर्मज्ञ महात्मा राम अवश्य ही तुम्हें पुनः लेने आएँगे। समय आने पर वे ऐसा करेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं। वाल्मीकि के इन आश्वासन भरे वचनों से सीता को कुछ सांत्वना मिली। उन्होंने मुनि के साथ आश्रम जाना स्वीकार कर लिया। इस प्रकार सीता वाल्मीकि आश्रम में पहुँचीं, जहाँ उन्हें सुरक्षा और सम्मान मिला। वाल्मीकि ने उन्हें अपनी पुत्री के समान रखा और उनके ध्यान तथा राम-भक्ति में कोई बाधा न आने दी। यह घटना सीता के जीवन में एक नया अध्याय प्रारम्भ करती है, जहाँ वे वाल्मीकि की देखरेख में रहकर आगे चलकर लव-कुश को जन्म देंगी।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

💧 सीता का करुण विलाप

इस सर्ग में सीता का विलाप मानवीय संवेदनाओं की चरम अभिव्यक्ति है। यह दर्शाता है कि कैसे एक निष्ठावान पत्नी को अपने पति के निर्णय पर विश्वास न होने पर भी उसे सहना पड़ता है। सीता का राम के प्रति प्रेम और उनके व्यवहार पर आघात, दोनों ही अत्यन्त मार्मिक हैं।

🧘 वाल्मीकि का करुणा और आश्रय

वाल्मीकि का आगमन सीता के लिए ईश्वरीय सहारा है। वे केवल एक आश्रम ही नहीं देते, बल्कि आश्वासन भी देते हैं कि राम अवश्य लौटेंगे। यह दर्शाता है कि संतजन दीनों की सहायता के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।

🙏 धैर्य और भक्ति की विजय

सीता का धैर्य और राम में अटूट भक्ति ही उन्हें इस कठिन घड़ी में सहारा देती है। वे राम पर दोष नहीं लगातीं, बल्कि भाग्य को दोष देती हैं। यह भक्ति की पराकाष्ठा है – भक्त अपने इष्ट से कभी द्वेष नहीं करता।

🌊 गंगा का पुण्य तट

गंगा का तट यहाँ केवल एक स्थान नहीं, बल्कि पवित्रता और मोक्ष का प्रतीक है। सीता का इस पवित्र स्थान पर आना यह संकेत है कि उनका जीवन भी पवित्र है और आगे चलकर वे महान संतानों को जन्म देंगी।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि जीवन में कठिन से कठिन परिस्थितियाँ आने पर भी धैर्य और ईश्वर-भक्ति नहीं छोड़नी चाहिए। सज्जनों का सहयोग सदैव दुःख में काम आता है। सीता का धैर्य ही उन्हें आगे चलकर महान बनाता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे सप्तपञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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