उत्तर काण्ड अध्याय 56

लक्ष्मण द्वारा सीता को त्याग दिए जाने की सूचना देना

राम के आदेश पर लक्ष्मण सीता को वन में त्यागने की सूचना देते हैं। सीता का विलाप और लक्ष्मण की वेदना का वर्णन है।

विवरण

राम के राज्य में जब सीता की पवित्रता को लेकर जनापवाद फैलता है, तो राम अत्यंत दुःखी होकर लोकनिन्दा के भय से सीता को त्यागने का निर्णय लेते हैं। वे लक्ष्मण को बुलाते हैं और उन्हें आदेश देते हैं कि वे सीता को गंगा तट के उस पार वाल्मीकि आश्रम के समीप छोड़ आएँ। लक्ष्मण यह सुनकर स्तब्ध रह जाते हैं, किंतु राम की आज्ञा का पालन करने के लिए वे सीता के पास जाते हैं। अत्यंत संकोच और दुःख के साथ वे सीता को राम के निर्णय की सूचना देते हैं। सीता यह सुनते ही मूर्छित हो जाती हैं और फिर विलाप करती हुई राम के इस अप्रत्याशित व्यवहार पर आश्चर्य व्यक्त करती हैं। लक्ष्मण उन्हें धैर्य बंधाते हैं और बताते हैं कि यह राजधर्म है। यह सर्ग रामायण के सबसे मार्मिक प्रसंगों में से एक है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ५६

(लक्ष्मण द्वारा सीता को त्याग दिए जाने की सूचना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षट्पञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रामचन्द्र के राज्य में जब सीता की पवित्रता पर जनसमाज में चर्चा होने लगी, तो राम ने लोकापवाद से बचने के लिए अत्यंत कठोर निर्णय लिया। उन्होंने लक्ष्मण को आदेश दिया कि वे सीता को वन में त्याग दें। यह सर्ग उस दुःखद घटना का प्रारम्भ है।

👑 राम का लक्ष्मण को आदेश (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततः कदाचिद्रामस्तु श्रुत्वा लोकापवादकम्।
सीतायाश्चरिते दोषं चिन्तयामास दुःखितः॥
स राजा धर्मनिलयः प्रजानां हितकाम्यया।
त्यक्तुकामो महाभागां सीतां पतिव्रतां वने॥
आहूय लक्ष्मणं वीरमिदं वचनमब्रवीत्।
सौमित्रे जनवादोऽयं सीताया मलिनीकृतः॥
तस्मात्त्वमद्य गच्छ त्वं सीतया सहितो वनम्।
त्यजैनां पुण्यशीलेति ममाज्ञां शिरसा वह॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; कदाचित् = किसी समय; रामः = राम; तु = तो; श्रुत्वा = सुनकर; लोकापवादकम् = लोकनिन्दा; सीतायाः = सीता के; चरिते = चरित्र में; दोषम् = दोष; चिन्तयामास = सोचने लगे; दुःखितः = दुःखी होकर; सः = वह; राजा = राजा; धर्मनिलयः = धर्म के आश्रय; प्रजानाम् = प्रजा की; हितकाम्यया = हित की इच्छा से; त्यक्तुकामः = त्यागने को इच्छुक; महाभागाम् = महाभागा; सीताम् = सीता को; पतिव्रताम् = पतिव्रता; वने = वन में; आहूय = बुलाकर; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण को; वीरम् = वीर; इदम् = यह; वचनम् = वचन; अब्रवीत् = बोले; सौमित्रे = हे सुमित्रापुत्र; जनवादः = जनापवाद; अयम् = यह; सीतायाः = सीता के; मलिनीकृतः = कलंकित किया है; तस्मात् = इसलिए; त्वम् = तुम; अद्य = आज; गच्छ = जाओ; त्वम् = तुम; सीतया = सीता के साथ; सहितः = सहित; वनम् = वन में; त्यज = त्याग दो; एनाम् = इसे; पुण्यशीलेति = पुण्यशीला है फिर भी; ममाज्ञाम् = मेरी आज्ञा; शिरसा = सिर पर; वह = धारण करो।
📖 भावार्थ : एक दिन राम ने सुना कि नगर में सीता के चरित्र को लेकर लोग तरह-तरह की बातें कर रहे हैं। यद्यपि वे जानते थे कि सीता नितान्त पवित्र और पतिव्रता हैं, फिर भी एक राजा होने के नाते उनके लिए यह आवश्यक था कि प्रजा की भावनाओं का सम्मान करें और राजधर्म का पालन करें। उन्होंने देखा कि यदि वे इस जनापवाद की उपेक्षा करते हैं, तो राज्य में धर्म की हानि होगी और प्रजा में अशांति फैलेगी। अतः अत्यन्त दुःखी मन से उन्होंने सीता को वन में त्यागने का निर्णय लिया। यह निर्णय उनके लिए अत्यन्त कठिन था, क्योंकि वे सीता को अपने प्राणों से भी अधिक प्रेम करते थे। किन्तु मर्यादा पुरुषोत्तम होने के कारण उन्होंने व्यक्तिगत सुख की अपेक्षा राजधर्म को प्राथमिकता दी। उन्होंने लक्ष्मण को बुलाकर कहा कि हे सौमित्र! तुम सीता को लेकर वन में जाओ और उन्हें गंगा के पार किसी सुरक्षित स्थान पर छोड़ आओ। यह मेरी आज्ञा है, इसे शिरोधार्य करो। लक्ष्मण यह सुनकर सन्न रह गए, क्योंकि उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि राम ऐसा कठोर आदेश दे सकते हैं। किन्तु वे राम की आज्ञा का पालन करने के लिए सदैव तत्पर रहते थे, अतः उन्होंने मौन रहकर आज्ञा स्वीकार कर ली।
॥ श्लोक ५-८ ॥
लक्ष्मणः प्राह दुःखार्तो रामं दीनस्वरस्तदा।
कथं त्यजामि वैदेहीं त्वयि जीवति राघव॥
न मे शक्यमिदं कर्तुं हृदयेन विदूयता।
रामः प्रोवाच धर्मात्मा मा विचारय पुत्रक॥
राज्ञां हि धर्म एवैको मुख्यो निजसुखं न हि।
लोकापवादभीतेन त्यज्यतेऽत्र पतिव्रता॥
इत्युक्तः स तथेत्युक्त्वा जगाम भवनं प्रति।
सीतायाः सन्निधिं वीरो विनयावनतः स्थितः॥
🔹 पदच्छेद : लक्ष्मणः = लक्ष्मण; प्राह = बोले; दुःखार्तः = दुःख से पीड़ित; रामम् = राम से; दीनस्वरः = दीन स्वर में; तदा = तब; कथम् = कैसे; त्यजामि = त्याग दूँ; वैदेहीम् = वैदेही को; त्वयि = आपके; जीवति = जीवित रहते; राघव = हे राघव; न = नहीं; मे = मुझसे; शक्यम् = शक्य; इदम् = यह; कर्तुम् = करना; हृदयेन = हृदय से; विदूयता = पीड़ित होते हुए; रामः = राम; प्रोवाच = बोले; धर्मात्मा = धर्मात्मा; मा = मत; विचारय = विचार करो; पुत्रक = हे पुत्र; राज्ञाम् = राजाओं का; हि = ही; धर्मः = धर्म; एव = ही; एकः = एक; मुख्यः = मुख्य; निजसुखम् = अपना सुख; न = नहीं; हि = ही; लोकापवादभीतेन = लोकनिन्दा से डरकर; त्यज्यते = त्यागा जाता है; अत्र = यहाँ; पतिव्रता = पतिव्रता; इत्युक्तः = इस प्रकार कहे जाने पर; सः = वह; तथा = वैसे ही; इति = ऐसा; उक्त्वा = कहकर; जगाम = गया; भवनम् = महल; प्रति = की ओर; सीतायाः = सीता के; सन्निधिम् = पास; वीरः = वीर; विनयावनतः = विनय से झुका हुआ; स्थितः = खड़ा हो गया।
📖 भावार्थ : लक्ष्मण ने यह सुनते ही हृदय विदीर्ण हो गया। उन्होंने राम से दीन स्वर में कहा – हे राघव! आप जीवित रहते हुए मैं कैसे माता सीता को वन में त्याग सकता हूँ? यह कार्य मेरे लिए असम्भव है, मेरा हृदय इसकी अनुमति नहीं देता। लक्ष्मण का यह विलाप देखकर राम ने धैर्यपूर्वक समझाया कि हे पुत्र! राजाओं के लिए व्यक्तिगत सुख से बढ़कर राजधर्म होता है। लोकापवाद के भय से ही इस पतिव्रता को त्यागा जा रहा है, अन्यथा मैं स्वयं उनसे पृथक् नहीं हो सकता। यह मेरा कर्तव्य है, तुम्हें भी इसे निभाना होगा। राम के इस उपदेश को सुनकर लक्ष्मण ने तथास्तु कहा और विनयपूर्वक सीता के महल की ओर प्रस्थान किया। वे अत्यन्त दुःखी थे, किन्तु राम की आज्ञा का पालन करना उनका परम धर्म था। यहाँ लक्ष्मण की रामभक्ति और आज्ञापालन की पराकाष्ठा देखने को मिलती है। वे राम के किसी भी आदेश को शिरोधार्य करने के लिए सदैव तत्पर रहते थे, चाहे वह कितना ही कठोर क्यों न हो।

💔 लक्ष्मण का सीता के पास जाना (श्लोक ९-१६)

॥ श्लोक ९-१२ ॥
प्रविश्यान्तःपुरं वीरो ददर्श जनकात्मजाम्।
देवतार्चननिरतां पूजयन्तीं सुरानपि॥
सा तु दृष्ट्वा तमायान्तं प्रहृष्टा वाक्यमब्रवीत्।
कच्चित्सौमित्रे कुशलं रामस्य च महात्मनः॥
लक्ष्मणः प्राह वैदेहीं दुःखादश्रूणि संस्तरन्।
रामस्य कुशलं देवि सर्वेषां च नृपात्मजः॥
त्वां तु द्रष्टुं समायातो रामस्य वचनात्प्रभोः।
गम्यतां चेति मामाह त्यागो दैवादुपस्थितः॥
📖 भावार्थ : लक्ष्मण अन्तःपुर में प्रवेश करते हैं, जहाँ सीता देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना में लीन थीं। वह अपने पति की लम्बी आयु और राज्य की समृद्धि के लिए पूजा कर रही थीं। लक्ष्मण को देखकर वे अत्यन्त प्रसन्न हुईं और बोलीं – हे सौमित्र! क्या राम और सभी कुशल से हैं? लक्ष्मण ने अश्रुपूरित नेत्रों से कहा – देवि! राम तथा सभी राजकुमार कुशल हैं। किन्तु मैं राम की आज्ञा से आपको देखने आया हूँ। उन्होंने मुझसे कहा है कि आपको वन में जाना है। यह त्याग दैव के कारण हुआ है। लक्ष्मण का यह कथन सुनकर सीता के हर्ष का तुरन्त विलाप में परिवर्तन हो गया। वे समझ गईं कि कुछ अनर्थ हुआ है। लक्ष्मण की आँखों में आँसू और उनका दीन स्वर स्पष्ट संकेत दे रहा था कि यह कोई साधारण यात्रा नहीं है। सीता का हृदय धड़क उठा, उन्हें आशंका हुई कि राम ने उन्हें किसी कारणवश त्यागने का निर्णय लिया है। फिर भी उन्होंने धैर्य नहीं खोया और लक्ष्मण से पूछा कि आखिर मामला क्या है।
॥ श्लोक १३-१६ ॥
सीता प्रोवाच दुःखार्ता किमिदं वदसे प्रियम्।
त्यागः केन निमित्तेन रामः किं वक्तुमर्हति॥
लक्ष्मणः प्राह वैदेहीं शृणु देवि वचो मम।
रामो राजा धर्मशीलः श्रुत्वा लोकापवादकम्॥
त्वदीये चरिते दोषं जनाः कथयन्ति हि।
तेन त्वां त्यक्तुकामोऽसौ वनेऽस्मिन्निर्जने प्रिये॥
इत्युक्ता सा तदा सीता पपात धरणीतले।
मूर्छिता पतिता भूमौ विललाप सुदुःखिता॥
📖 भावार्थ : सीता ने दुःखी होकर पूछा – हे प्रिय! यह तुम क्या कह रहे हो? किस कारण से राम ने मुझे त्यागने का निर्णय लिया? वे तो स्वयं मुझे बुलाकर यह कह सकते थे। लक्ष्मण ने कहा – हे देवि! सुनो। राम राजा हैं और धर्मशील हैं। उन्होंने लोकापवाद सुना है। लोग आपके चरित्र के बारे में निन्दा कर रहे हैं। इसी कारण वे आपको इस निर्जन वन में त्यागना चाहते हैं। यह सुनते ही सीता धरती पर गिर पड़ीं और मूर्छित हो गईं। यह सुनकर सीता को ऐसा आघात लगा कि वे सचेत न रह सकीं। उनके लिए यह विश्वास करना कठिन था कि राम, जो उनके प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं, उन्हें इस प्रकार त्याग सकते हैं। उन्होंने रावण के साथ अपने संघर्ष, अग्निपरीक्षा और सब कुछ याद किया। क्या उनकी पवित्रता अब भी संदिग्ध है? यह सोचकर उनका हृदय विदीर्ण हो गया। वे राम के व्यवहार को समझ नहीं पाईं, क्योंकि राम तो साक्षात् धर्म के अवतार थे। फिर यह अन्याय क्यों? उनके मन में अनेक प्रश्न उठे, किन्तु उनके पास कोई उत्तर नहीं था।

😢 सीता का विलाप और समर्पण (श्लोक १७-२६)

॥ श्लोक १७-२१ ॥
हा नाथ हा महाबाहो किं मामेवं परित्यजेः।
ननु त्वया कृतं सत्यं यदा मां परिगृह्यसे॥
अग्निशुद्धा च संजाता पुनर्जन्मनि मैथिली।
तथापि त्यजसे कस्मात्किमपराधं चकार सा॥
लक्ष्मणः प्राह वैदेहीं दैवमत्र गरीयसम्।
राजधर्मोऽपि रामस्य प्रजानां हितकाम्यया॥
तस्मात्त्वं गच्छ भद्रं ते वाल्मीकेराश्रमं प्रति।
स त्वां रक्षिष्यति प्राज्ञः पतिव्रतापरायणाम्॥
📖 भावार्थ : सीता विलाप करती हुई बोलीं – हा नाथ! हे महाबाहो! तुमने मुझे इस प्रकार क्यों त्याग दिया? क्या तुमने मुझसे विवाह करते समय जो वचन दिया था, वह सत्य नहीं था? मैं अग्नि में परीक्षित होकर शुद्ध सिद्ध हुई थी, फिर भी तुम मुझे क्यों त्याग रहे हो? मैंने कौन-सा अपराध किया है? लक्ष्मण ने उत्तर दिया – हे देवि! इसमें दैव ही बलवान है। राम का राजधर्म है कि वे प्रजा के हित की रक्षा करें। इसलिए आप वाल्मीकि आश्रम की ओर चली जाइए। वे महर्षि आपकी रक्षा करेंगे, क्योंकि आप पतिव्रता धर्म में निष्ठ हैं। सीता का विलाप अत्यन्त मार्मिक है। वे राम के प्रति अपने अगाध प्रेम और समर्पण को व्यक्त करती हैं। साथ ही, वे यह भी जानती हैं कि राम ने जो किया, वह उनके राजधर्म के कारण किया, व्यक्तिगत द्वेष से नहीं। फिर भी, एक स्त्री के रूप में उनका हृदय इस आघात को सहन नहीं कर पा रहा था। वे राम से कोई प्रश्न नहीं कर सकती थीं, क्योंकि पतिव्रता धर्म के अनुसार पति ही उनके लिए सर्वोपरि है। अतः उन्होंने मौन रहकर यह आघात सहने का निश्चय किया। लक्ष्मण के कथन से उन्हें यह आशा मिली कि वाल्मीकि जैसे महर्षि की छत्रछाया में वे सुरक्षित रह सकती हैं।
॥ श्लोक २२-२६ ॥
सीता प्रोवाच सौमित्रे नय मां यत्र राघवः।
आज्ञापयति धर्मात्मा नाहं जीवितुमुत्सहे॥
किन्तु त्वं मां समादाय गच्छ वत्स यथोदितम्।
रामस्याज्ञा मया ग्राह्या न मे किञ्चित्प्रियात्प्रियम्॥
एवमुक्त्वा रुदन्ती सा प्रस्थिता लक्ष्मणेन ह।
रथमारुह्य सीता तु गङ्गाकूले जगाम ह॥
लक्ष्मणोऽपि महातेजाः संयम्यात्मानमात्मना।
प्रायात्पुरः सीतायाः शिरस्याधाय तद्वचः॥
📖 भावार्थ : अन्त में सीता ने धैर्य धारण किया और लक्ष्मण से कहा – हे सौमित्रे! जहाँ राम की आज्ञा है, वहाँ मुझे ले चलो। धर्मात्मा राम की आज्ञा का पालन करना ही मेरा धर्म है। मैं उनके बिना जीवित नहीं रह सकती, किन्तु उनकी आज्ञा का उल्लंघन भी नहीं कर सकती। अतः तुम मुझे वहाँ ले चलो जहाँ वे कहते हैं। यह कहकर सीता अश्रुपूरित नेत्रों से लक्ष्मण के साथ चल दीं। वे रथ पर आरूढ़ हुईं और गंगा के तट की ओर प्रस्थान किया। लक्ष्मण ने अपने मन को बड़ी कठिनाई से संयत किया और राम की आज्ञा को सिर पर रखकर सीता के आगे-आगे चले। यह दृश्य अत्यन्त हृदयविदारक था। एक ओर सीता, जो स्वयं लक्ष्मी का अवतार मानी जाती हैं, वन की ओर जा रही हैं, दूसरी ओर लक्ष्मण, जो राम के प्रति अत्यन्त समर्पित हैं, उन्हें इस प्रकार त्यागते हुए जा रहे हैं। दोनों के हृदय में राम के प्रति अनन्य प्रेम था, फिर भि वे यह कठोर कर्म कर रहे थे। यह मानवीय संवेदनाओं और धर्म के बीच का द्वन्द्व है, जिसे वाल्मीकि ने बड़े ही मार्मिक ढंग से चित्रित किया है।

🏹 लक्ष्मण का राम के पास लौटना (श्लोक २७-३२)

॥ श्लोक २७-३२ ॥
गत्वा गङ्गातटं रम्यं सीतां विपिनवासिनीम्।
कृत्वा तु तां प्रणामं च लक्ष्मणः प्रस्थितः पुनः॥
सीता तु तत्र सञ्जाता वाल्मीकेराश्रमे शुभे।
लक्ष्मणोऽपि महाबाहुः प्रत्यागम्य पुरीं ततः॥
रामं दृष्ट्वा न्यवेदयत्सर्वं यद्वृत्तमग्रतः।
रामः श्रुत्वा न चोवाच किञ्चिद् दुःखेन तप्यते॥
लक्ष्मणोऽपि गृहं गत्वा शोकेन महताऽऽवृतः।
न किञ्चित्प्रत्यभाषिष्ट चिन्तयन्सीतया विना॥
📖 भावार्थ : लक्ष्मण सीता को गंगा के रमणीय तट पर ले गए, जहाँ वाल्मीकि आश्रम समीप था। उन्होंने सीता को प्रणाम किया और राम की आज्ञा का पालन करते हुए वहाँ से लौट आए। सीता वहाँ एकान्त में खड़ी रहीं, जब तक कि वाल्मीकि मुनि ने उन्हें आश्रम में आश्रय नहीं दिया। लक्ष्मण अयोध्या लौटे और सीधे राम के पास गए। उन्होंने राम को सारा वृत्तान्त सुनाया – कैसे उन्होंने सीता को गंगा तट पर छोड़ा और वे वाल्मीकि आश्रम में सुरक्षित हैं। राम ने यह सुना, किन्तु कोई उत्तर नहीं दिया। वे केवल मौन रहे और दुःख से तपते रहे। उनके हृदय में क्या चल रहा था, यह कोई नहीं जान सका। लक्ष्मण भी अत्यन्त शोकाकुल होकर अपने महल लौट गए। वे भी सीता के बिना राम की दशा को देखकर अत्यन्त व्याकुल थे। यहाँ राम का मौन उनके अन्तर्द्वन्द्व को दर्शाता है। वे एक ओर राजधर्म का पालन कर चुके थे, किन्तु दूसरी ओर अपने प्रियतमा से बिछुड़ने का दुःख उन्हें अन्दर ही अन्दर जला रहा था। वे न तो अपना दुःख प्रकट कर सकते थे और न ही किसी से सहानुभूति की आशा कर सकते थे। यही मर्यादा पुरुषोत्तम की वास्तविक पीड़ा है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 राजधर्म और व्यक्तिगत सुख का संघर्ष

यह सर्ग राजधर्म और व्यक्तिगत स्नेह के बीच के द्वन्द्व को उजागर करता है। राम एक आदर्श राजा हैं, उनके लिए प्रजा की भावनाएँ सर्वोपरि हैं। यद्यपि वे सीता की पवित्रता के प्रति आश्वस्त हैं, फिर भी लोकापवाद के कारण उन्हें यह कठोर निर्णय लेना पड़ता है। यह शासक के कर्तव्य की विडम्बना है कि उसे अपने निजी सुखों का बलिदान करना पड़ता है।

💧 सीता का धैर्य और पतिव्रता धर्म

सीता का विलाप और फिर राम की आज्ञा का पालन करना उनके पतिव्रता धर्म की पराकाष्ठा है। वे राम के निर्णय को चुनौती नहीं देतीं, बल्कि उसे स्वीकार करती हैं, चाहे उनका हृदय विदीर्ण क्यों न हो रहा हो। यह भारतीय नारी के आदर्श चरित्र का उत्कृष्ट उदाहरण है।

🤝 लक्ष्मण की आज्ञाकारिता और वेदना

लक्ष्मण का चरित्र इस सर्ग में अत्यन्त मार्मिक है। वे राम के प्रति पूर्ण समर्पित हैं, फिर भी उनके हृदय में सीता के प्रति गहरा स्नेह है। वे राम के आदेश का पालन करते हैं, किन्तु अन्दर ही अन्दर टूट जाते हैं। यह उनकी निष्ठा और करुणा का अद्भुत सम्मिश्रण है।

⚖️ लोकापवाद का भय और उसके परिणाम

इस सर्ग में लोकापवाद के भय को एक प्रमुख कारण के रूप में दिखाया गया है। राम को इस भय के कारण सीता का त्याग करना पड़ता है, जो बाद में अनेक दुःखद घटनाओं की नींव बनता है। यह दर्शाता है कि समाज की निन्दा कितनी विनाशकारी हो सकती है, चाहे वह निराधार ही क्यों न हो।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि एक आदर्श राजा को प्रजा के हित के लिए अपने निजी सुखों का त्याग करना पड़ता है। साथ ही, समाज में फैली नकारात्मक बातें किस प्रकार किसी के जीवन को तहस-नहस कर सकती हैं। हमें हमेशा सत्य और धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए, चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न आएँ।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे षट्पञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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