उत्तर काण्ड अध्याय 54

राम का लक्ष्मण को सीता को आश्रम छोड़ने की आज्ञा देना

राम अपने भाइयों से विचार-विमर्श के बाद लक्ष्मण को स्पष्ट आदेश देते हैं कि वे सीता को वाल्मीकि आश्रम में छोड़ आएँ। लक्ष्मण इस कठिन कार्य को स्वीकार करते हैं।

विवरण

भाइयों से परामर्श के पश्चात राम ने लक्ष्मण को बुलाया और उन्हें आदेश दिया कि वे सीता को रथ पर बिठाकर वाल्मीकि आश्रम ले जाएँ और वहाँ उन्हें छोड़ दें। राम ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय लोकापवाद के कारण लिया गया है, न कि सीता के किसी दोष के कारण। लक्ष्मण ने यह सुनकर अत्यन्त दुःख का अनुभव किया, परन्तु राम की आज्ञा का पालन करना अपना धर्म समझा। उन्होंने राम से पूछा कि सीता को कैसे सूचित किया जाए? राम ने कहा कि वे स्वयं उचित समझें। लक्ष्मण ने सीता से केवल इतना कहा कि राम ने उन्हें वन में कुछ समय बिताने का आदेश दिया है। यह सर्ग लक्ष्मण के मनोद्वन्द्व और राम के प्रति उनकी निष्ठा को दर्शाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ५४

(राम का लक्ष्मण को सीता को आश्रम छोड़ने की आज्ञा देना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुःपञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : भाइयों की सहमति के बाद राम ने लक्ष्मण को अन्तिम आदेश दिया। यह सर्ग उस आदेश और लक्ष्मण की मानसिक स्थिति का वर्णन करता है। लक्ष्मण के लिए यह कार्य अत्यन्त कठिन था, फिर भी उन्होंने राम की आज्ञा का पालन किया।

🗡️ राम का आदेश (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततो रामः समाहूय लक्ष्मणं प्रियदर्शनम्।
उवाच परमोद्विग्नो बाष्पव्याकुललोचनः॥
हे लक्ष्मण महाबाहो ममाज्ञां कर्तुमर्हसि।
सीतां गृहीत्वा गच्छ त्वं वाल्मीकेश्चाश्रमं प्रति॥
तत्रैनां त्यज धर्मज्ञे वने विजन एव च।
न हि दोषो मया दृष्टः सीताया लक्ष्मण क्वचित्॥
किन्तु लोकापवादेन राजधर्मः प्रवर्तते।
तस्मात्त्यागो विधातव्यो मम धर्मानुरोधतः॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; रामः = राम; समाहूय = बुलाकर; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण को; प्रियदर्शनम् = प्रिय दर्शन वाले; उवाच = बोले; परमोद्विग्नः = अत्यन्त व्याकुल; बाष्पव्याकुललोचनः = अश्रुओं से व्याकुल नेत्र वाले; हे = हे; लक्ष्मण = लक्ष्मण; महाबाहो = महाबाहो; ममाज्ञाम् = मेरी आज्ञा; कर्तुम् = करने के लिए; अर्हसि = योग्य हो; सीताम् = सीता को; गृहीत्वा = लेकर; गच्छ = जाओ; त्वम् = तुम; वाल्मीकेः = वाल्मीकि के; आश्रमम् = आश्रम; प्रति = की ओर; तत्र = वहाँ; एनाम् = इसे; त्यज = छोड़ दो; धर्मज्ञे = हे धर्मज्ञ; वने = वन में; विजने = एकान्त में; एव = ही; च = और; न = नहीं; हि = निश्चय; दोषः = दोष; मया = मेरे द्वारा; दृष्टः = देखा गया; सीतायाः = सीता में; लक्ष्मण = हे लक्ष्मण; क्वचित् = कहीं भी; किन्तु = परन्तु; लोकापवादेन = लोकापवाद से; राजधर्मः = राजधर्म; प्रवर्तते = प्रवृत्त होता है; तस्मात् = इसलिए; त्यागः = त्याग; विधातव्यः = करना चाहिए; मम = मेरे; धर्मानुरोधतः = धर्म के अनुरोध से।
📖 भावार्थ : तब राम ने प्रियदर्शन लक्ष्मण को बुलाकर, अत्यन्त व्याकुल और अश्रुपूर्ण नेत्रों से कहा: "हे महाबाहो लक्ष्मण! तुम मेरी आज्ञा का पालन करने के योग्य हो। सीता को लेकर वाल्मीकि आश्रम जाओ। वहाँ हे धर्मज्ञ! उसे एकान्त वन में छोड़ दो। हे लक्ष्मण! मैंने सीता में कहीं भी कोई दोष नहीं देखा। परन्तु लोकापवाद के कारण राजधर्म प्रवृत्त होता है। इसलिए धर्म के अनुरोध से मुझे उसका त्याग करना ही उचित है।" यहाँ राम पुनः सीता की निर्दोषता पर बल देते हैं। वे लक्ष्मण से स्पष्ट कहते हैं कि सीता में कोई दोष नहीं है। फिर भी राजधर्म के कारण त्याग आवश्यक है। उनका "धर्मानुरोधतः" कहना बताता है कि वे यह कार्य व्यक्तिगत इच्छा से नहीं, बल्कि धर्म के आग्रह पर कर रहे हैं। लक्ष्मण के लिए यह सुनना अत्यन्त कष्टदायक रहा होगा, क्योंकि वे सीता का बहुत आदर करते थे।
॥ श्लोक ६-८ ॥
तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणो वाक्यं दुःखशोकसमन्वितः।
प्रोवाच राघवं विनीतं प्राञ्जलिः प्रणतो भृशम्॥
यदाज्ञापयसे राजंस्तत्करिष्ये न संशयः।
किन्तु मे हृदयं दुःखाद् दीर्यते राघव प्रभो॥
सीता हि देवी साध्वी च पतिव्रतपरायणा।
तस्यास्त्यागेन मे नाथ किं वक्ष्यन्ति जनाः क्षितौ॥
🔹 पदच्छेद : तत् = वह; श्रुत्वा = सुनकर; लक्ष्मणः = लक्ष्मण; वाक्यम् = वचन; दुःखशोकसमन्वितः = दुःख और शोक से युक्त; प्रोवाच = बोले; राघवम् = राघव से; विनीतम् = विनीत भाव से; प्राञ्जलिः = हाथ जोड़कर; प्रणतः = झुककर; भृशम् = अत्यधिक; यत् = जो; आज्ञापयसे = आज्ञा देते हो; राजन् = राजन्; तत् = वह; करिष्ये = करूँगा; न संशयः = इसमें संशय नहीं; किन्तु = परन्तु; मे = मेरा; हृदयम् = हृदय; दुःखात् = दुःख से; दीर्यते = फट रहा है; राघव = हे राघव; प्रभो = प्रभो; सीता = सीता; हि = निश्चय; देवी = देवी; साध्वी = साध्वी; च = और; पतिव्रतपरायणा = पतिव्रत धर्म में तत्पर; तस्याः = उसके; त्यागेन = त्याग से; मे = मेरे; नाथ = नाथ; किम् = क्या; वक्ष्यन्ति = कहेंगे; जनाः = लोग; क्षितौ = पृथ्वी पर।
📖 भावार्थ : उनका वचन सुनकर लक्ष्मण दुःख और शोक से भर गए। उन्होंने विनीत होकर हाथ जोड़े, अत्यधिक झुककर राघव से कहा: "हे राजन्! आप जैसी आज्ञा देते हैं, वह मैं निःसंदेह करूँगा। परन्तु हे प्रभो राघव! दुःख से मेरा हृदय फट रहा है। सीता तो देवी, साध्वी और पतिव्रत धर्म में तत्पर हैं। हे नाथ! उनके त्याग से पृथ्वी पर लोग क्या कहेंगे?" यहाँ लक्ष्मण का मनोद्वन्द्व स्पष्ट होता है। वे राम की आज्ञा का पालन तो करेंगे, परन्तु उनका हृदय इस कार्य से सहमत नहीं है। वे सीता की महानता को रेखांकित करते हैं – "देवी, साध्वी, पतिव्रता" – और व्यथित हैं कि ऐसी निर्दोष स्त्री का त्याग कैसे किया जा सकता है? वे यह भी सोचते हैं कि लोग क्या कहेंगे? यह लक्ष्मण की संवेदनशीलता और सीता के प्रति उनके अगाध सम्मान को दर्शाता है।

💬 राम का उत्तर और लक्ष्मण की स्वीकृति (श्लोक ९-१८)

॥ श्लोक ९-१४ ॥
रामः प्रोवाच लक्ष्मणं दुःखितं दुःखितो भृशम्।
जानामि सीतां धर्मज्ञे पतिव्रतपरायणाम्॥
न च दोषो मया दृष्टो नापि पापं कथञ्चन।
किन्तु राज्ञां कुलीनानां लोकयात्रा गरीयसी॥
यदि लोको विरज्येत किं तेन क्रियते फलम्।
तस्माल्लोकापवादोऽयं मया त्याज्यो न संशयः॥
गच्छ लक्ष्मण मद्वाक्यात्सीतां नीत्वाश्रमं प्रति।
वाल्मीकेः सन्निधौ त्यक्त्वा पुनरेहि न संशयः॥
🔹 पदच्छेद : रामः = राम; प्रोवाच = बोले; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण से; दुःखितम् = दुःखी को; दुःखितः = दुःखी होकर; भृशम् = अत्यधिक; जानामि = जानता हूँ; सीताम् = सीता को; धर्मज्ञे = हे धर्मज्ञ; पतिव्रतपरायणाम् = पतिव्रत धर्म में तत्पर; न = नहीं; च = और; दोषः = दोष; मया = मेरे द्वारा; दृष्टः = देखा गया; न = नहीं; अपि = भी; पापम् = पाप; कथञ्चन = किसी प्रकार; किन्तु = परन्तु; राज्ञाम् = राजाओं के; कुलीनानाम् = कुलीनों के; लोकयात्रा = लोक की मर्यादा; गरीयसी = अत्यधिक महत्वपूर्ण; यदि = यदि; लोकः = लोक; विरज्येत = विरक्त हो जाए; किम् = क्या; तेन = उससे; क्रियते = होता है; फलम् = फल; तस्मात् = इसलिए; लोकापवादः = लोकापवाद; अयम् = यह; मया = मेरे द्वारा; त्याज्यः = त्यागने योग्य है; न संशयः = इसमें संशय नहीं; गच्छ = जाओ; लक्ष्मण = हे लक्ष्मण; मद्वाक्यात् = मेरे वचन से; सीताम् = सीता को; नीत्वा = ले जाकर; आश्रमम् = आश्रम; प्रति = की ओर; वाल्मीकेः = वाल्मीकि के; सन्निधौ = समीप; त्यक्त्वा = छोड़कर; पुनः = फिर; एहि = आओ; न संशयः = इसमें संशय नहीं।
📖 भावार्थ : राम ने उस अत्यन्त दुःखी लक्ष्मण से, स्वयं भी अत्यन्त दुःखी होकर कहा: "हे धर्मज्ञ! मैं जानता हूँ कि सीता पतिव्रता हैं। मैंने उनमें कहीं कोई दोष नहीं देखा, न कोई पाप। परन्तु कुलीन राजाओं के लिए लोकमर्यादा अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यदि लोक विरक्त हो जाए, तो उससे क्या फल? इसलिए इस लोकापवाद का त्याग करना मेरे लिए आवश्यक है, इसमें संशय नहीं। हे लक्ष्मण! तुम मेरे आदेश से सीता को लेकर आश्रम जाओ, वाल्मीकि के समीप उन्हें छोड़ दो, और फिर वापस आ जाओ – इसमें संशय नहीं।" राम ने लक्ष्मण की व्यथा को समझा और स्वयं भी दुःखी होकर उत्तर दिया। वे पुनः सीता की निर्दोषता की पुष्टि करते हैं, परन्तु लोकमर्यादा को राजाओं के लिए सर्वोपरि बताते हैं। उनका कहना है कि यदि प्रजा ही विरक्त हो जाए, तो राज्य का क्या अर्थ? यह राजधर्म का मूल सिद्धान्त है। वे लक्ष्मण को स्पष्ट आदेश देते हैं कि सीता को वाल्मीकि आश्रम छोड़कर वापस आ जाएँ।
॥ श्लोक १५-१८ ॥
तथेत्युक्त्वा लक्ष्मणस्तु रामं प्रदक्षिणीकृत्य।
जगाम सीतायाः कक्षं यत्र सीता व्यवस्थिता॥
तां दृष्ट्वा लक्ष्मणो दीनः प्रोवाच प्राञ्जलिर्वचः।
देवि रामाज्ञया यासि वनं पुण्यं च राघवः॥
इति श्रुत्वा तु सीता सा प्रहृष्टा वाक्यमब्रवीत्।
याहि त्वं लक्ष्मण शीघ्रं सज्जोऽहं गमनं प्रति॥
🔹 पदच्छेद : तथा = वैसे ही; इति = ऐसा; उक्त्वा = कहकर; लक्ष्मणः = लक्ष्मण; तु = तो; रामम् = राम की; प्रदक्षिणीकृत्य = परिक्रमा करके; जगाम = गए; सीतायाः = सीता के; कक्षम् = कक्ष में; यत्र = जहाँ; सीता = सीता; व्यवस्थिता = स्थित थीं; ताम् = उसे; दृष्ट्वा = देखकर; लक्ष्मणः = लक्ष्मण; दीनः = दीन; प्रोवाच = बोले; प्राञ्जलिः = हाथ जोड़कर; वचः = वचन; देवि = हे देवी; रामाज्ञया = राम की आज्ञा से; यासि = जाओ; वनम् = वन; पुण्यम् = पुण्य; च = और; राघवः = राघव; इति = ऐसा; श्रुत्वा = सुनकर; तु = तो; सीता = सीता; सा = वह; प्रहृष्टा = अत्यन्त प्रसन्न; वाक्यम् = वचन; अब्रवीत् = बोली; याहि = जाओ; त्वम् = तुम; लक्ष्मण = हे लक्ष्मण; शीघ्रम् = शीघ्र; सज्जः = तैयार; अहम् = मैं; गमनम् = जाने के लिए; प्रति = प्रति।
📖 भावार्थ : लक्ष्मण ने "तथास्तु" कहकर राम की परिक्रमा की और सीता के कक्ष में गए, जहाँ सीता स्थित थीं। उन्हें देखकर दीन लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर कहा: "हे देवी! राम की आज्ञा से आप वन जाइए, राघव ने यह पुण्य वन बताया है।" यह सुनकर सीता अत्यन्त प्रसन्न हुईं और बोलीं: "हे लक्ष्मण! तुम शीघ्र जाओ, मैं जाने के लिए तैयार हूँ।" यहाँ लक्ष्मण ने सीता को सत्य नहीं बताया, केवल इतना कहा कि राम ने उन्हें वन जाने का आदेश दिया है। सीता इसे राम की इच्छा समझकर प्रसन्न हो जाती हैं, क्योंकि वे सदा राम के सुख में ही अपना सुख मानती हैं। उनकी प्रसन्नता और लक्ष्मण की दीनता के बीच गहरा अन्तर है – सीता को नहीं पता कि यह त्याग है, वे समझती हैं कि शायद कोई धार्मिक कार्य है। लक्ष्मण का हृदय इस छल से भारी है, परन्तु वे राम की आज्ञा का पालन कर रहे हैं।

🚶 सीता का प्रस्थान (श्लोक १९-३२)

॥ श्लोक १९-२५ ॥
ततः सीता ययौ शीघ्रं लक्ष्मणेन समन्विता।
रथमारुह्य धर्मज्ञा वाल्मीकेश्चाश्रमं प्रति॥
नदीस्तीर्त्वा वनान्तेषु गिरींश्च विविधान्बहून्।
प्राप्ता वाल्मीकिमाश्रमं पुण्यं रम्यं मनोरमम्॥
तत्र दृष्ट्वा मुनिश्रेष्ठं वाल्मीकिं तपसान्वितम्।
लक्ष्मणः प्राञ्जलिर्भूत्वा प्रोवाच प्रियवत्सलः॥
अयं रामाज्ञया देवी सीता त्वत्सन्निधौ स्थिता।
रक्षितव्या त्वया ब्रह्मन् यथान्यायं यथाविधि॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; सीता = सीता; ययौ = गई; शीघ्रम् = शीघ्र; लक्ष्मणेन = लक्ष्मण के साथ; समन्विता = सहित; रथम् = रथ पर; आरुह्य = चढ़कर; धर्मज्ञा = धर्मज्ञ; वाल्मीकेः = वाल्मीकि के; आश्रमम् = आश्रम; प्रति = की ओर; नदीः = नदियों को; तीर्त्वा = पार करके; वनान्तेषु = वनों के भीतर; गिरीन् = पर्वतों को; च = और; विविधान् = अनेक प्रकार के; बहून् = बहुत से; प्राप्ता = प्राप्त हुई; वाल्मीकिम् = वाल्मीकि के; आश्रमम् = आश्रम; पुण्यम् = पुण्य; रम्यम् = रमणीय; मनोरमम् = मनोहर; तत्र = वहाँ; दृष्ट्वा = देखकर; मुनिश्रेष्ठम् = मुनियों में श्रेष्ठ; वाल्मीकिम् = वाल्मीकि को; तपसान्वितम् = तप से युक्त; लक्ष्मणः = लक्ष्मण; प्राञ्जलिः = हाथ जोड़कर; भूत्वा = होकर; प्रोवाच = बोले; प्रियवत्सलः = प्रिय में स्नेह रखने वाले; अयम् = यह; रामाज्ञया = राम की आज्ञा से; देवी = देवी; सीता = सीता; त्वत्सन्निधौ = आपके समीप; स्थिता = स्थित है; रक्षितव्या = रक्षा करनी चाहिए; त्वया = आपको; ब्रह्मन् = हे ब्रह्मन्; यथान्यायम् = न्याय के अनुसार; यथाविधि = विधि के अनुसार।
📖 भावार्थ : तब धर्मज्ञ सीता लक्ष्मण के साथ रथ पर चढ़कर शीघ्र ही वाल्मीकि आश्रम की ओर चल पड़ीं। वे अनेक नदियों को पार करते हुए, वनों और पर्वतों के बीच से होते हुए, पुण्य, रमणीय और मनोहर वाल्मीकि आश्रम पहुँचीं। वहाँ तपस्या से युक्त मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकि को देखकर लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर प्रियवत्सल भाव से कहा: "हे ब्रह्मन्! राम की आज्ञा से यह देवी सीता आपके समीप स्थित है। आप इनकी न्याय और विधि के अनुसार रक्षा करें।" यह यात्रा-वर्णन सीता के अन्तिम प्रस्थान को दर्शाता है। लक्ष्मण ने वाल्मीकि से सीता की रक्षा का अनुरोध किया, यह बताते हुए कि यह राम की आज्ञा है। वे सीता को "देवी" कहकर सम्बोधित करते हैं, जो उनके प्रति उनके आदर को दर्शाता है।
॥ श्लोक २६-३२ ॥
वाल्मीकिः प्राह लक्ष्मणं सीतां दृष्ट्वा कृताञ्जलिः।
यथावत्पालयिष्यामि रामाज्ञा मे गरीयसी॥
गच्छ लक्ष्मण मा चिन्ता सीता मम गृहे स्थिता।
रक्षितव्या प्रयत्नेन यथा रामस्य वल्लभा॥
इत्युक्त्वा लक्ष्मणो रामं प्रणम्य मुनिपुंगवम्।
प्रययौ रथमारुह्य अयोध्यां पुनरागतः॥
सीतापि तत्र सा देवी वाल्मीकेराश्रमे सुखम्।
उवास धर्मनिरता तपस्विन्यो गणैः सह॥
🔹 पदच्छेद : वाल्मीकिः = वाल्मीकि; प्राह = बोले; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण से; सीताम् = सीता को; दृष्ट्वा = देखकर; कृताञ्जलिः = हाथ जोड़कर; यथावत् = यथावत्; पालयिष्यामि = पालन करूँगा; रामाज्ञा = राम की आज्ञा; मे = मेरे लिए; गरीयसी = महान है; गच्छ = जाओ; लक्ष्मण = हे लक्ष्मण; मा चिन्ता = चिन्ता मत करो; सीता = सीता; मम = मेरे; गृहे = घर में; स्थिता = स्थित है; रक्षितव्या = रक्षा करनी चाहिए; प्रयत्नेन = प्रयत्नपूर्वक; यथा = जैसे; रामस्य = राम की; वल्लभा = प्रिया; इति = ऐसा; उक्त्वा = कहकर; लक्ष्मणः = लक्ष्मण; रामम् = राम को; प्रणम्य = प्रणाम करके; मुनिपुंगवम् = मुनिश्रेष्ठ को; प्रययौ = चले गए; रथमारुह्य = रथ पर चढ़कर; अयोध्याम् = अयोध्या; पुनः = फिर; आगतः = आ गए; सीता = सीता; अपि = भी; तत्र = वहाँ; सा = वह; देवी = देवी; वाल्मीकेः = वाल्मीकि के; आश्रमे = आश्रम में; सुखम् = सुखपूर्वक; उवास = रहीं; धर्मनिरता = धर्म में तत्पर; तपस्विन्यः = तपस्विनियों के; गणैः = समूहों के साथ; सह = सहित।
📖 भावार्थ : वाल्मीकि ने सीता को देखकर हाथ जोड़कर लक्ष्मण से कहा: "मैं यथावत् पालन करूँगा; राम की आज्ञा मेरे लिए महान है। हे लक्ष्मण! तुम जाओ, चिन्ता मत करो। सीता मेरे घर में स्थित हैं, मैं प्रयत्नपूर्वक उनकी रक्षा करूँगा, जैसे कि राम की प्रिया की रक्षा करनी चाहिए।" ऐसा कहकर लक्ष्मण ने उस मुनिश्रेष्ठ को प्रणाम किया और रथ पर चढ़कर अयोध्या लौट आए। सीता देवी भी वहाँ वाल्मीकि आश्रम में धर्म में तत्पर होकर, तपस्विनियों के साथ सुखपूर्वक रहने लगीं। वाल्मीकि का आश्वासन लक्ष्मण को कुछ सान्त्वना देता है। वे सीता की रक्षा का वचन देते हैं। सीता आश्रम में तपस्विनियों के साथ रहकर धर्ममय जीवन व्यतीत करती हैं। वे यह नहीं जानतीं कि उनका यह वास त्याग है, बल्कि वे इसे राम की इच्छा मानकर सन्तुष्ट हैं। यह सर्ग सीता के वनवास की शुरुआत का वर्णन करता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

😢 लक्ष्मण का द्वन्द्व

लक्ष्मण राम के आदेश और अपने मन के बीच फँसे हैं। वे राम के प्रति निष्ठावान हैं, परन्तु सीता के प्रति भी अगाध सम्मान रखते हैं। उनका हृदय फट रहा है, फिर भी वे आज्ञा का पालन करते हैं। यह उनके चरित्र की गहराई है।

🙏 सीता की निष्कलंकता

राम बार-बार सीता की निर्दोषता घोषित करते हैं। फिर भी त्याग करना पड़ रहा है। यह समाज के दबाव और राजधर्म की विडम्बना को उजागर करता है। सीता स्वयं इसे राम की इच्छा समझकर प्रसन्न हैं, जो उनके पतिव्रत धर्म का चरम उदाहरण है।

🏞️ वाल्मीकि आश्रम का महत्व

वाल्मीकि आश्रम सीता के लिए आश्रय स्थल बनता है। यहीं वे अपने पुत्रों लव-कुश को जन्म देंगी। वाल्मीकि का वचन कि वे राम की प्रिया की रक्षा करेंगे, आगे की कथा का आधार है।

⚖️ राजधर्म की कठोरता

राम राजधर्म के प्रति इतने समर्पित हैं कि वे अपनी प्रियतमा का भी त्याग कर देते हैं। यह राजा के कर्तव्य की गम्भीरता और उसकी कठोरता को दर्शाता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कभी-कभी धर्म के पालन के लिए व्यक्तिगत सुखों का बलिदान देना पड़ता है। लक्ष्मण की निष्ठा और सीता की पतिव्रता अद्वितीय हैं। साथ ही, यह भी सीख मिलती है कि समाज के दबाव में लिए गए निर्णय कितने पीड़ादायक हो सकते हैं।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे चतुःपञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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