उत्तर काण्ड अध्याय 53

राम द्वारा अपने भाइयों को बुलाना

लोकापवाद के बारे में जानने के बाद राम अपने तीनों भाइयों – भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न – को बुलाते हैं और उनसे इस विषय पर विचार-विमर्श करते हैं।

विवरण

सीता के प्रति लोकापवाद की बात सुनने और मन्त्रियों से परामर्श करने के बाद राम ने अपने तीनों भाइयों – भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न – को तुरन्त बुलवाया। वे सभी भाई राम के प्रति अगाध श्रद्धा रखते थे। राम ने उन्हें सारी स्थिति से अवगत कराया और बताया कि प्रजा में सीता के चरित्र को लेकर संशय है। उन्होंने कहा कि राजा के रूप में उनका धर्म है कि वे प्रजा की भावनाओं का सम्मान करें, भले ही वे व्यक्तिगत रूप से सीता की पवित्रता में अटल विश्वास रखते हों। भाइयों ने राम की बात सुनी और उनके निर्णय का समर्थन किया, यद्यपि वे भी सीता के प्रति स्नेह रखते थे। यह सर्ग भाइयों के आपसी प्रेम और राम के प्रति उनकी निष्ठा को दर्शाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ५३

(राम द्वारा अपने भाइयों को बुलाना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रिपञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम ने लोकापवाद के बारे में जान लिया और मन्त्रियों से परामर्श कर लिया। अब वे अपने भाइयों को बुलाते हैं, क्योंकि वे उनके सबसे करीबी और विश्वासपात्र हैं। यह सर्ग भाइयों के संवाद और राम के निर्णय के प्रति उनकी प्रतिक्रिया का वर्णन करता है।

👥 भाइयों का आगमन (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततो रामो महातेजा भ्रातॄनाहूय सत्वरम्।
भरतं लक्ष्मणं चैव शत्रुघ्नं च महाबलम्॥
प्रोवाच प्रियवाक्यानि समागम्य कृताञ्जलिः।
हे भ्रातरो महाभागा मम दुःखं निबोधत॥
लोकापवादो घोरोऽयं सीतायां समुपस्थितः।
तदर्थं मन्त्रिभिः सार्धं विचार्य मतमुत्तमम्॥
भवन्तो हि मम प्राणाः सर्वे धर्मार्थकोविदाः।
तस्माद्यदत्र कर्तव्यं तद्ब्रूत मम सुव्रताः॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; रामः = राम; महातेजाः = महान तेजस्वी; भ्रातॄन् = भाइयों को; आहूय = बुलाकर; सत्वरम् = शीघ्र; भरतम् = भरत को; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण को; च = और; एव = ही; शत्रुघ्नम् = शत्रुघ्न को; च = और; महाबलम् = महान बलवान; प्रोवाच = बोले; प्रियवाक्यानि = प्रिय वचन; समागम्य = एकत्र होकर; कृताञ्जलिः = हाथ जोड़कर; हे = हे; भ्रातरः = भाइयों; महाभागाः = महान भाग्यशाली; मम = मेरा; दुःखम् = दुःख; निबोधत = समझो; लोकापवादः = लोकापवाद; घोरः = भयंकर; अयम् = यह; सीतायाम् = सीता के विषय में; समुपस्थितः = उत्पन्न हुआ है; तदर्थम् = उसके लिए; मन्त्रिभिः = मन्त्रियों के साथ; सार्धम् = सहित; विचार्य = विचार कर; मतम् = मत; उत्तमम् = उत्तम; भवन्तः = आप लोग; हि = निश्चय; मम = मेरे; प्राणाः = प्राण हैं; सर्वे = सभी; धर्मार्थकोविदाः = धर्म और अर्थ के ज्ञाता; तस्मात् = इसलिए; यत् = जो; अत्र = इस विषय में; कर्तव्यम् = करना चाहिए; तत् = वह; ब्रूत = कहो; मम = मुझे; सुव्रताः = सुन्दर व्रत वाले।
📖 भावार्थ : उसके बाद महातेजस्वी राम ने अपने भाइयों भरत, लक्ष्मण और महाबली शत्रुघ्न को शीघ्र बुलवाया। सबके एकत्र होने पर राम ने हाथ जोड़कर प्रिय वचन कहे: "हे महाभाग भाइयों! मेरे दुःख को समझो। सीता के विषय में यह भयंकर लोकापवाद उत्पन्न हुआ है। इसके लिए मैंने मन्त्रियों के साथ विचार कर उत्तम मत ग्रहण किया है। तुम लोग मेरे प्राणों के समान हो और धर्म-अर्थ के ज्ञाता हो। इसलिए हे सुव्रतो! इस विषय में जो कर्तव्य हो, वह मुझे बताओ।" यहाँ राम अपने भाइयों के प्रति अगाध स्नेह और सम्मान प्रकट करते हैं। वे उन्हें "प्राणों के समान" कहते हैं, जो उनके घनिष्ठ सम्बन्ध को दर्शाता है। साथ ही, वे उनसे धर्म-अर्थ के विशेषज्ञ के रूप में सलाह माँगते हैं, यद्यपि वे स्वयं धर्मज्ञ हैं। यह उनकी विनम्रता और भाइयों के प्रति आदर को दर्शाता है। राम ने पहले ही मन्त्रियों से परामर्श कर लिया है, फिर भी वे भाइयों की राय जानना चाहते हैं, क्योंकि वे उनके सबसे विश्वसनीय सहयोगी हैं।
॥ श्लोक ६-८ ॥
तच्छ्रुत्वा भरतः श्रीमानुवाच प्राञ्जलिर्वचः।
राम त्वं नो गुरुः साक्षाद्धर्मज्ञः सत्यविक्रमः॥
यथा मनसि ते राजंस्तथा कर्तुं त्वमर्हसि।
वयं तवानुगाः सर्वे यदाज्ञापयसि प्रभो॥
🔹 पदच्छेद : तत् = वह; श्रुत्वा = सुनकर; भरतः = भरत; श्रीमान् = श्रीमान्; उवाच = बोले; प्राञ्जलिः = हाथ जोड़कर; वचः = वचन; राम = हे राम; त्वम् = आप; नः = हमारे; गुरुः = गुरु; साक्षात् = साक्षात्; धर्मज्ञः = धर्मज्ञ; सत्यविक्रमः = सत्य पराक्रमी; यथा = जैसा; मनसि = मन में; ते = आपके; राजन् = राजन्; तथा = वैसे; कर्तुम् = करने के लिए; त्वम् = आप; अर्हसि = योग्य हैं; वयम् = हम; तव = आपके; अनुगाः = अनुयायी; सर्वे = सब; यत् = जो; आज्ञापयसि = आज्ञा देते हो; प्रभो = प्रभो।
📖 भावार्थ : उनकी बात सुनकर श्रीमान् भरत ने हाथ जोड़कर कहा: "हे राम! आप ही हमारे साक्षात् गुरु हैं, धर्मज्ञ हैं, सत्यविक्रम हैं। हे राजन्! आपके मन में जैसा भी हो, वैसा करने के लिए आप ही योग्य हैं। हम सब आपके अनुयायी हैं, हे प्रभो! आप जैसी आज्ञा करें, वैसा ही करेंगे।" भरत का यह उत्तर अत्यन्त महत्वपूर्ण है। वे राम को गुरु मानते हैं, न कि केवल ज्येष्ठ भ्राता। वे कहते हैं कि आपके मन में जो भी निश्चय हो, वही उचित है, और हम उसका पालन करेंगे। यह भरत की राम के प्रति अनन्य भक्ति और आज्ञाकारिता को दर्शाता है। वे किसी भी प्रकार की स्वतन्त्र सलाह नहीं देते, बल्कि राम के निर्णय को ही अन्तिम मानते हैं। यह उनके चरित्र की महानता है – वे स्वयं राज्य छोड़ चुके हैं और राम के प्रति समर्पित हैं।

🗣️ लक्ष्मण और शत्रुघ्न का कथन (श्लोक ९-१८)

॥ श्लोक ९-१३ ॥
लक्ष्मणोऽपि महातेजा रामं प्राञ्जलिरब्रवीत्।
यथा भरतवाक्यं हि तथैव मम राघव॥
त्वमेव हि गतिर्नित्यं त्वमेव प्रभुरीश्वरः।
यथा शासिसि धर्मज्ञ तथा कर्तुं त्वमर्हसि॥
शत्रुघ्नोऽप्यब्रवीद्वाक्यं रामं प्रियहिते रतः।
भ्रातृवाक्यानुसारेण ममाप्येष मतो रघो॥
सर्वे वयं तवाधीना धर्मज्ञ सत्यविक्रम।
यथा निर्दिशसे राजंस्तत्करिष्यामहे वयम्॥
🔹 पदच्छेद : लक्ष्मणः = लक्ष्मण; अपि = भी; महातेजाः = महान तेजस्वी; रामम् = राम से; प्राञ्जलिः = हाथ जोड़कर; अब्रवीत् = बोले; यथा = जैसे; भरतवाक्यम् = भरत का वचन; हि = निश्चय; तथैव = वैसे ही; मम = मेरा; राघव = हे राघव; त्वम् = आप; एव = ही; गतिः = आश्रय; नित्यम् = सदा; त्वम् = आप; एव = ही; प्रभुः = प्रभु; ईश्वरः = ईश्वर; यथा = जैसे; शासिसि = आज्ञा देते हो; धर्मज्ञ = हे धर्मज्ञ; तथा = वैसे; कर्तुम् = करने के लिए; त्वम् = आप; अर्हसि = योग्य हैं; शत्रुघ्नः = शत्रुघ्न; अपि = भी; अब्रवीत् = बोले; वाक्यम् = वचन; रामम् = राम से; प्रियहिते रतः = प्रिय और हित में तत्पर; भ्रातृवाक्यानुसारेण = भाइयों के वचनों के अनुसार; मम = मेरा; अपि = भी; एषः = यह; मतः = मत है; रघो = हे रघुश्रेष्ठ; सर्वे = सब; वयम् = हम; तव = आपके; अधीनाः = अधीन; धर्मज्ञ = हे धर्मज्ञ; सत्यविक्रम = सत्य पराक्रमी; यथा = जैसे; निर्दिशसे = आदेश देते हो; राजन् = राजन्; तत् = वह; करिष्यामहे = करेंगे; वयम् = हम।
📖 भावार्थ : महातेजस्वी लक्ष्मण ने भी हाथ जोड़कर राम से कहा: "हे राघव! भरत का जैसा वचन है, वैसा ही मेरा भी है। आप ही हमारे सदा आश्रय हैं, आप ही प्रभु और ईश्वर हैं। हे धर्मज्ञ! आप जैसी आज्ञा दें, वैसा करने के लिए आप ही योग्य हैं।" फिर प्रिय और हित में तत्पर शत्रुघ्न ने भी राम से कहा: "हे रघुश्रेष्ठ! भाइयों के वचनों के अनुसार ही मेरा भी यही मत है। हे धर्मज्ञ सत्यविक्रम! हम सब आपके अधीन हैं। हे राजन्! आप जैसा आदेश देंगे, वैसा ही हम करेंगे।" यहाँ लक्ष्मण और शत्रुघ्न भी भरत के समान ही राम के प्रति समर्पण व्यक्त करते हैं। लक्ष्मण राम को "गति, प्रभु, ईश्वर" कहकर उनके प्रति अपनी पूर्ण निष्ठा प्रदर्शित करते हैं। शत्रुघ्न भी स्पष्ट करते हैं कि वे भाइयों के मत का अनुसरण करते हैं, अर्थात् सभी एकमत हैं। यह दर्शाता है कि चारों भाइयों के बीच कोई मतभेद नहीं है। वे सब राम के निर्णय को सिर झुकाकर स्वीकार करते हैं, चाहे वह कितना भी कठोर क्यों न हो। यह उनके अद्वितीय पारिवारिक सामंजस्य और राम के प्रति उनके अगाध प्रेम एवं आदर का प्रमाण है।

🤲 राम का निर्णय और भाइयों को आदेश (श्लोक १९-३०)

॥ श्लोक १९-२५ ॥
ततः प्रोवाच रामस्तान्भ्रातॄन्परमदुःखितः।
यदि वो मयि स्नेहोऽस्ति धर्मबुद्धिश्च पुष्कला॥
तदिदं क्रियतां वाक्यं लोकापवादशान्तये।
सीता मया परित्याज्या वने वाल्मीकिसन्निधौ॥
न तु दोषेण संयुक्ता नापि पापेन कर्मणा।
किन्तु लोकापवादेन राज्ञां धर्मो विधीयते॥
तस्मादद्यैव लक्ष्मण त्वं सीतां रथमास्थितः।
नीत्वा वाल्मीकिमाश्रमं त्यजैनां मदनुज्ञया॥
भरतः शत्रुघ्नश्च मम शासनमास्थितौ।
राज्यं पालयतां धर्म्यं यथाहं प्रतिपादितः॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; प्रोवाच = बोले; रामः = राम; तान् = उन; भ्रातॄन् = भाइयों से; परमदुःखितः = अत्यन्त दुःखी; यदि = यदि; वः = तुम्हारा; मयि = मुझमें; स्नेहः = प्रेम; अस्ति = है; धर्मबुद्धिः = धर्मबुद्धि; च = और; पुष्कला = अत्यधिक; तत् = तो; इदम् = यह; क्रियताम् = किया जाए; वाक्यम् = वचन; लोकापवादशान्तये = लोकापवाद की शान्ति के लिए; सीता = सीता; मया = मेरे द्वारा; परित्याज्या = त्यागी जाए; वने = वन में; वाल्मीकिसन्निधौ = वाल्मीकि के समीप; न तु = परन्तु नहीं; दोषेण = दोष से; संयुक्ता = युक्त; न = नहीं; अपि = भी; पापेन = पाप से; कर्मणा = कर्म से; किन्तु = परन्तु; लोकापवादेन = लोकापवाद से; राज्ञाम् = राजाओं का; धर्मः = धर्म; विधीयते = निर्धारित होता है; तस्मात् = इसलिए; अद्यैव = आज ही; लक्ष्मण = हे लक्ष्मण; त्वम् = तुम; सीताम् = सीता को; रथमास्थितः = रथ पर बिठाकर; नीत्वा = ले जाकर; वाल्मीकिम् = वाल्मीकि के; आश्रमम् = आश्रम में; त्यज = छोड़ दो; एनाम् = इसे; मदनुज्ञया = मेरी आज्ञा से; भरतः = भरत; शत्रुघ्नः = शत्रुघ्न; च = और; मम = मेरे; शासनम् = शासन में; आस्थितौ = स्थित होकर; राज्यम् = राज्य; पालयताम् = पालन करें; धर्म्यम् = धर्मयुक्त; यथा = जैसे; अहम् = मैं; प्रतिपादितः = प्रतिपादित हूँ।
📖 भावार्थ : तब अत्यन्त दुःखी राम ने उन भाइयों से कहा: "यदि तुम्हारा मुझमें स्नेह है और अत्यधिक धर्मबुद्धि है, तो लोकापवाद की शान्ति के लिए मेरी इस बात को मानो। सीता को मेरे द्वारा वन में वाल्मीकि के समीप त्याग दिया जाए। वह किसी दोष से युक्त नहीं है, न किसी पाप कर्म से। परन्तु राजाओं का धर्म लोकापवाद के कारण निर्धारित होता है। इसलिए हे लक्ष्मण! आज ही तुम सीता को रथ पर बिठाकर वाल्मीकि आश्रम ले जाओ और मेरी आज्ञा से उसे वहाँ छोड़ दो। भरत और शत्रुघ्न मेरे शासन में स्थित होकर धर्मयुक्त राज्य का पालन करें, जैसा मैंने किया है।" यहाँ राम स्पष्ट रूप से सीता की निर्दोषता घोषित करते हैं – "न दोषेण संयुक्ता" – फिर भी उनका त्याग करते हैं। यह उनके धर्मसंकट की गहराई को दर्शाता है। वे स्वयं जानते हैं कि सीता पवित्र हैं, लेकिन राजधर्म के कारण उन्हें त्यागना पड़ रहा है। वे लक्ष्मण को सीता को वाल्मीकि आश्रम छोड़ने का आदेश देते हैं, और भरत-शत्रुघ्न को राज्य संभालने का निर्देश देते हैं। यह राम के अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पण और भाइयों में विश्वास को दर्शाता है।
॥ श्लोक २६-३० ॥
इत्युक्त्वा राघवो राजा बाष्पव्याकुललोचनः।
विरराम महातेजाः स्नेहविह्वलमानसः॥
तथेत्युक्त्वा तु लक्ष्मणः सीतया सह राघवः।
प्रययौ रथमास्थाय वाल्मीकेराश्रमं प्रति॥
भरतः शत्रुघ्नश्चापि रामाज्ञां शिरसा वहन्।
राज्यं पालयतां धर्म्यं रामस्य प्रियकाम्यया॥
एवं ते भ्रातरः सर्वे रामे धर्मपरायणे।
वर्तन्ते स्म महात्मानो रामस्यानुग्रहात्सदा॥
🔹 पदच्छेद : इति = इस प्रकार; उक्त्वा = कहकर; राघवः = राघव; राजा = राजा; बाष्पव्याकुललोचनः = अश्रुओं से व्याकुल नेत्रों वाले; विरराम = रुक गए; महातेजाः = महान तेजस्वी; स्नेहविह्वलमानसः = स्नेह से विह्वल मन वाले; तथा = वैसे ही; इति = ऐसा; उक्त्वा = कहकर; तु = तो; लक्ष्मणः = लक्ष्मण; सीतया सह = सीता के साथ; राघवः = राघव (लक्ष्मण); प्रययौ = गए; रथमास्थाय = रथ पर सवार होकर; वाल्मीकेः = वाल्मीकि के; आश्रमम् = आश्रम; प्रति = की ओर; भरतः = भरत; शत्रुघ्नः = शत्रुघ्न; च = और; अपि = भी; रामाज्ञाम् = राम की आज्ञा को; शिरसा = सिर पर; वहन् = धारण करते हुए; राज्यम् = राज्य; पालयताम् = पालन करते थे; धर्म्यम् = धर्मयुक्त; रामस्य = राम के; प्रियकाम्यया = प्रिय की इच्छा से; एवम् = इस प्रकार; ते = वे; भ्रातरः = भाई; सर्वे = सब; रामे = राम के; धर्मपरायणे = धर्मपरायण होने पर; वर्तन्ते स्म = रहते थे; महात्मानः = महात्मा; रामस्यानुग्रहात् = राम की कृपा से; सदा = सदा।
📖 भावार्थ : इस प्रकार कहकर राजा राघव अश्रुओं से व्याकुल नेत्रों वाले हो गए। महातेजस्वी राम स्नेह से विह्वल मन से चुप हो गए। फिर लक्ष्मण ने "तथास्तु" कहकर सीता के साथ रथ पर सवार होकर वाल्मीकि आश्रम की ओर प्रस्थान किया। भरत और शत्रुघ्न भी राम की आज्ञा को सिर पर धारण करके, राम के प्रिय की इच्छा से धर्मयुक्त राज्य का पालन करने लगे। इस प्रकार वे सभी महात्मा भाई धर्मपरायण राम की कृपा से सदा उनके अनुगत रहते थे। अन्तिम श्लोकों में राम की अश्रुपूर्ण आँखें उनकी मानवीय वेदना को दर्शाती हैं। वे स्नेहविह्वल हैं, फिर भी अपने निर्णय पर अडिग हैं। लक्ष्मण मौन होकर आज्ञा का पालन करते हैं – उनके मन में भी वेदना होगी, परन्तु वे राम की आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकते। भरत और शत्रुघ्न राज्य संभालते हैं, यह दिखाते हुए कि राम के बिना भी वे उनके प्रति समर्पित हैं। यह सर्ग भाइयों की एकता और राम के प्रति उनकी अटूट निष्ठा का सुन्दर चित्रण करता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👬 भ्रातृप्रेम की पराकाष्ठा

इस सर्ग में भाइयों का राम के प्रति अगाध प्रेम और समर्पण देखने को मिलता है। वे राम के हर निर्णय को बिना किसी प्रश्न के स्वीकार करते हैं, चाहे वह कितना भी कठोर क्यों न हो। यह भ्रातृप्रेम का आदर्श उदाहरण है।

⚖️ राजधर्म का पालन

राम राजधर्म के प्रति इतने समर्पित हैं कि वे अपनी प्रिय पत्नी का भी त्याग कर देते हैं। वे भाइयों से भी यही आशा करते हैं कि वे राजधर्म का पालन करें। यह राजा के कर्तव्य की गम्भीरता को दर्शाता है।

😢 राम की वेदना

राम की अश्रुपूर्ण आँखें और स्नेहविह्वल मन उनकी मानवीयता को प्रकट करते हैं। वे कोई असंवेदनशील देवता नहीं, बल्कि एक संवेदनशील मानव हैं, जो अपने निर्णय से स्वयं दुःखी हैं।

🕊️ सीता की निर्दोषता

राम स्वयं घोषित करते हैं कि सीता निर्दोष है – "न दोषेण संयुक्ता"। फिर भी त्याग करना पड़ रहा है। यह समाज के दबाव और राजधर्म की विडम्बना को दर्शाता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि परिवार में एकता और आपसी विश्वास अत्यन्त महत्वपूर्ण है। भाइयों का राम के प्रति समर्पण दर्शाता है कि जहाँ प्रेम और सम्मान हो, वहाँ कोई भी निर्णय कठिन नहीं होता। साथ ही, राजधर्म के आगे व्यक्तिगत सुखों का बलिदान करना पड़ता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे त्रिपञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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