उत्तर काण्ड अध्याय 50

राम द्वारा पुष्पक विमान को विदा करना

जब सभी सहयोगी चले गए, तब राम ने पुष्पक विमान को उसके स्वामी कुबेर के पास लौटने की आज्ञा दी और उसे विदा किया।

विवरण

सभी सहयोगियों के जाने के बाद राम के पास पुष्पक विमान शेष रह गया था, जिसे वे लंका से अयोध्या लाए थे। यह विमान मूल रूप से कुबेर का था, जिसे रावण ने छीन लिया था। राम ने विमान से कहा कि अब तुम अपने स्वामी कुबेर के पास लौट जाओ। पुष्पक विमान ने राम से प्रार्थना की कि वह उनके साथ रहना चाहता है, परन्तु राम ने कहा कि उसे कुबेर को लौटा देना ही उचित है। विमान ने राम की आज्ञा स्वीकार की और उनकी परिक्रमा करके आकाश में उड़ गया। राम ने हाथ जोड़कर विमान को प्रणाम किया और उसे विदा किया। यह सर्ग राम की नीतिपरायणता को दर्शाता है कि वे दूसरे की वस्तु को अपने पास नहीं रखना चाहते।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ५०

(राम द्वारा पुष्पक विमान को विदा करना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : सभी सहयोगियों के जाने के बाद, पुष्पक विमान अयोध्या में ही खड़ा था। यह विमान कुबेर का था, जिसे रावण ने बलपूर्वक छीन लिया था। अब राम ने उसे उसके वास्तविक स्वामी को लौटाने का निश्चय किया।

✈️ पुष्पक विमान को संबोधन (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः पुष्पकमाहूय रामो वचनमब्रवीत्।
हे विमान महाभाग कुबेरस्य महात्मनः॥
त्वया लङ्का समानीता हत्वा रावणमाहवे।
कृतं त्वया महत्कार्यं सुग्रीवाद्यैश्च वानरैः॥
इदानीं गन्तुमिच्छामि यत्र ते वसतिः प्रिया।
कुबेरभवनं दिव्यं तत्र गच्छ सुखं विभो॥
इत्युक्तं रामवचनं श्रुत्वा पुष्पकमब्रवीत्।
प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा रामं सत्यपराक्रमम्॥
राम त्वयि महाभाग स्नेहो मे परमो धृतः।
इच्छामि त्वत्समीपेऽहं नित्यं वस्तुं सुखं प्रभो॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; पुष्पकम् = पुष्पक विमान को; आहूय = बुलाकर; रामः = राम; वचनम् = वचन; अब्रवीत् = बोले; हे = हे; विमान = विमान; महाभाग = महाभाग; कुबेरस्य = कुबेर के; महात्मनः = महात्मा; त्वया = तुम्हारे द्वारा; लङ्का = लंका से; समानीता = लाए गए; हत्वा = मारकर; रावणम् = रावण को; आहवे = युद्ध में; कृतम् = किया गया; त्वया = तुमने; महत्कार्यम् = बड़ा कार्य; सुग्रीवाद्यैः = सुग्रीव आदि के; च = और; वानरैः = वानरों के साथ; इदानीम् = अब; गन्तुम् = जाना; इच्छामि = चाहता हूँ; यत्र = जहाँ; ते = तुम्हारी; वसतिः = निवास; प्रिया = प्रिय; कुबेरभवनम् = कुबेर के भवन; दिव्यम् = दिव्य; तत्र = वहाँ; गच्छ = जाओ; सुखम् = सुखपूर्वक; विभो = हे विभो; इति = इस प्रकार; उक्तम् = कहा; रामवचनम् = राम का वचन; श्रुत्वा = सुनकर; पुष्पकम् = पुष्पक ने; अब्रवीत् = कहा; प्राञ्जलिः = हाथ जोड़कर; प्रणतः = झुककर; भूत्वा = होकर; रामम् = राम से; सत्यपराक्रमम् = सत्यपराक्रमी; राम = हे राम; त्वयि = आपमें; महाभाग = महाभाग; स्नेहः = स्नेह; मे = मेरा; परमः = परम; धृतः = धारण किया गया; इच्छामि = चाहता हूँ; त्वत्समीपे = आपके पास; अहम् = मैं; नित्यम् = नित्य; वस्तुम् = रहना; सुखम् = सुखपूर्वक; प्रभो = हे प्रभो।
📖 भावार्थ : उसके बाद राम ने पुष्पक विमान को बुलाकर कहा: "हे महाभाग विमान! हे महात्मा कुबेर के प्रिय! तुमने रावण को युद्ध में मारने के बाद हमें लंका से यहाँ पहुँचाया। तुमने सुग्रीव आदि वानरों के साथ मिलकर बड़ा कार्य किया है। अब मैं जाना चाहता हूँ कि तुम्हारा प्रिय निवास कहाँ है? हे विभो! तुम दिव्य कुबेर भवन में सुखपूर्वक जाओ।" राम का यह वचन सुनकर पुष्पक ने हाथ जोड़कर, प्रणत होकर सत्यपराक्रमी राम से कहा: "हे महाभाग राम! मैंने आपमें परम स्नेह धारण किया है। हे प्रभो! मैं आपके समीप ही नित्य सुखपूर्वक रहना चाहता हूँ।"
॥ श्लोक ६-१० ॥
रामः प्रोवाच धर्मात्मा शृणु पुष्पक सुव्रत।
न्यायेन ग्रहणं दानं सतां मार्गः सनातनः॥
कुबेरस्य त्वमत्यर्थं प्रियो भ्राता महात्मनः।
तेन त्यक्तो न जाने त्वं कथं तिष्ठसि मत्समीपतः॥
गच्छ त्वं वै महाभाग मत्प्रियं कर्तुमर्हसि।
कुबेरं प्राप्य भद्रं ते मामपि स्मर सर्वदा॥
इत्युक्त्वा राघवो राजा पुष्पकं प्रददौ तदा।
रत्नानि विविधान्यस्य वासांसि विविधानि च॥
पुष्पकं प्रतिगृह्यार्थं रामं प्रदक्षिणीकृतम्।
प्रणनाम च रामाय प्रीत्या परमया युतः॥
📖 भावार्थ : धर्मात्मा राम ने कहा: "हे सुव्रत पुष्पक! सुनो। न्यायपूर्वक ग्रहण और दान करना सज्जनों का सनातन मार्ग है। तुम महात्मा कुबेर के अत्यन्त प्रिय भाई हो। उनके द्वारा तुम्हें कैसे त्याग दिया गया, मैं नहीं जानता, पर तुम मेरे पास कैसे रह सकते हो? हे महाभाग! तुम जाओ। मेरा प्रिय करो। कुबेर के पास जाकर तुम्हारा कल्याण हो। मुझे भी सदा स्मरण करते रहना।" ऐसा कहकर राजा राघव ने पुष्पक को विविध रत्न और वस्त्र भेंट किए। पुष्पक ने वे वस्तुएँ ग्रहण कीं, राम की प्रदक्षिणा की, और परम प्रीति से युक्त होकर राम को प्रणाम किया।

🙌 विमान का प्रस्थान (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततः पुष्पकमाकाशमुत्पपात महास्वनम्।
रामेण समनुज्ञातं कुबेरभवनं प्रति॥
गच्छन्तं तं नरव्याघ्रो रामः प्राञ्जलिरब्रवीत्।
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि कुबेरसदनं प्रति॥
इत्युक्त्वा राघवो राजा प्रेक्षते स्म दिवाकरम्।
पुष्पकं चापि यान्तं तं यावद्दृष्टिः प्रवर्तते॥
ततः प्रविविशे वेश्म सीतया सहितः प्रभुः।
हनूमता च धर्मात्मा सेव्यमानः सुखं स्थितः॥
एवं पुष्पकमामन्त्र्य रामो राजीवलोचनः।
रेमे राज्ये स्थितो धीमान्धर्मेण पालयन्प्रजाः॥
📖 भावार्थ : तब राम द्वारा अनुज्ञात पुष्पक विमान महान् शब्द करते हुए आकाश में उड़ गया, कुबेर भवन की ओर। उसे जाते देख नरव्याघ्र राम ने हाथ जोड़कर कहा: "तुम्हारा कल्याण हो। तुम कुबेर के सदन को जा रहे हो।" ऐसा कहकर राजा राघव उसे जाते हुए देखते रहे, जहाँ तक दृष्टि गई। तत्पश्चात् वे प्रभु सीता के साथ महल में प्रविष्ट हुए और धर्मात्मा हनुमान द्वारा सेवित होकर सुखपूर्वक रहने लगे। इस प्रकार राजीवलोचन राम ने पुष्पक को विदा किया और धीमान् होकर राज्य में स्थित हुए, धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करते हुए आनन्दित रहे।
॥ श्लोक १६-२० ॥
अहो रामस्य धर्मज्ञ नीतिरेषा सनातनी।
परवस्तु न गृह्णाति यद्यपि स्यात्प्रियं सदा॥
एतदाख्यानमाख्यातं पुष्पकस्य विसर्जनम्।
यः पठेत्प्रयतो नित्यं स याति परमां गतिम्॥
इति वाल्मीकिना प्रोक्तं रामायणमनुत्तमम्।
श्रृण्वन्ति ये नरा भक्त्या ते यान्ति परमां गतिम्॥
📖 भावार्थ : अहो! धर्मज्ञ राम की यह सनातन नीति है कि वे पराई वस्तु को कभी ग्रहण नहीं करते, चाहे वह कितनी ही प्रिय क्यों न हो। यह आख्यान पुष्पक विमान के विसर्जन का कहा गया है। जो नित्य प्रयत्नपूर्वक इसका पाठ करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है। इस प्रकार वाल्मीकि द्वारा प्रोक्त यह अनुत्तम रामायण है। जो नर भक्तिपूर्वक सुनते हैं, वे परम गति को प्राप्त होते हैं।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

⚖️ नीति और धर्म का पालन

राम ने पुष्पक विमान, जो उनके अधिकार में था, को उसके वास्तविक स्वामी कुबेर को लौटा दिया। यह उनके धर्मपरायणता और नीतिपरायणता का उत्कृष्ट उदाहरण है।

💎 आसक्ति से मुक्ति

राम किसी भी वस्तु में आसक्त नहीं थे। उन्होंने स्नेह के बावजूद विमान को विदा किया। यह वैराग्य का आदर्श है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे पञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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