उत्तर काण्ड अध्याय 49

राम द्वारा भालुओं, वानरों और राक्षसों से विदा लेना

राम भालुओं, वानरों और राक्षसों के सेनानायकों को बुलाकर उनके अद्वितीय योगदान के लिए धन्यवाद देते हैं और उन्हें विदा करते हैं।

विवरण

सुग्रीव, विभीषण और हनुमान के अतिरिक्त भी अनेक वानर, ऋक्ष (भालू) और राक्षस सेनानायक थे जिन्होंने युद्ध में वीरता दिखाई थी। राम ने उन सबको अलग-अलग बुलाया और उनके पराक्रम की सराहना की। जाम्बवान (भालुओं के राजा), नल, नील, गवय, गवाक्ष, शरभ, ऋषभ, गन्धमादन, मैन्द, द्विविद, पनस, सम्पाति, प्रजंघ, प्रहस्त (राक्षस) आदि सभी उपस्थित थे। राम ने प्रत्येक का नाम लेकर उनकी वीरता का गुणगान किया और उन्हें उपहार देकर विदा किया। सभी ने राम के चरणों में प्रणाम किया और अपने-अपने स्थानों को प्रस्थान किया। यह सर्ग राम के व्यक्तित्व की विशालता को दर्शाता है, जो हर एक योद्धा के योगदान को मान्यता देते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ४९

(राम द्वारा भालुओं, वानरों और राक्षसों से विदा लेना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकोनपञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : सुग्रीव, विभीषण और हनुमान के अतिरिक्त भी असंख्य वीर वानर, ऋक्ष (भालू) और राक्षस सेनानायक थे। राम ने उन सबको बुलाकर सम्मानपूर्वक विदा किया।

🐻 भालुओं का सम्मान (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-६ ॥
ततो जाम्बवन्तं प्राह रामः सत्यपराक्रमः।
ऋक्षराज महाप्राज्ञ शृणु मे वचनं प्रियम्॥
त्वया युद्धे महत्कर्म कृतं रिपुनिबर्हणम्।
हनूमत्प्रमुखैः सार्धं सुग्रीवस्य हितैषिभिः॥
तव बुद्ध्या च धैर्येण जिता लङ्का दुरासदा।
प्रतिगृहाण भद्रं ते हारं रत्नमयं शुभम्॥
जाम्बवान्प्रतिजग्राह हारं परमशोभनम्।
प्रणनाम च रामाय प्रीत्या परमया युतः॥
ततः शरभमृक्षेशं गवयं गवाक्षकम्।
पूजयामास रामस्तु रत्नैर्वस्त्रैरलंकृतैः॥
ऋक्षाः सर्वे प्रसन्नाश्च रामं प्राञ्जलयोऽब्रुवन्।
आशीर्वादान्प्रयच्छन्तो जय राम नमोऽस्तु ते॥
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् सत्यपराक्रमी राम ने जाम्बवान से कहा: "हे ऋक्षराज! हे महाप्राज्ञ! मेरे प्रिय वचन सुनो। युद्ध में तुमने हनुमान आदि सुग्रीव के हितैषियों के साथ मिलकर महान कार्य किया। तुम्हारी बुद्धि और धैर्य से ही दुर्धर्ष लंका जीती गई। हे कल्याणमय! यह रत्नमय शुभ हार ग्रहण करो।" जाम्बवान ने वह परम सुन्दर हार ग्रहण किया और परम प्रीति से युक्त होकर राम को प्रणाम किया। तब राम ने शरभ, गवय, गवाक्ष आदि ऋक्षश्रेष्ठों को रत्न और सुन्दर वस्त्रों से पूजित किया। सभी ऋक्ष प्रसन्न हुए और हाथ जोड़कर आशीर्वाद देते हुए बोले: "राम की जय हो, तुम्हें नमस्कार है।"
॥ श्लोक ७-१२ ॥
ततो वानरमुख्यांश्च रामः प्रीतिपुरस्सरः।
पूजयामास धर्मात्मा यथार्हं प्रियवादिनः॥
नलं नीलं महेन्द्रं च द्विविदं मैन्दमेव च।
गन्धमादनमत्युग्रं पनसं सम्पातिं तथा॥
प्रजंघं च महाबाहुं शतबलिं च वीर्यवान्।
एतानन्यांश्च बहुशो रामः परमवीर्यवान्॥
रत्नैर्वस्त्रैश्च भूषैश्च पूजयित्वा महायशाः।
विसर्जयामास तदा स्वान्देशान्प्रति हर्षितान्॥
ते सर्वे राममामन्त्र्य प्रणम्य च पुनः पुनः।
ययुरुत्फुल्लहृदयाः स्वं स्वं देशं महाबलाः॥
📖 भावार्थ : तब धर्मात्मा राम ने प्रीतिपूर्वक वानरश्रेष्ठों को भी यथायोग्य पूजित किया, जो प्रिय वचन बोलने वाले थे। नल, नील, महेन्द्र, द्विविद, मैन्द, अत्यन्त उग्र गन्धमादन, पनस, सम्पाति, महाबाहु प्रजंघ और वीर्यवान् शतबलि – इन सबको तथा अन्य बहुत से वानरों को महायशस्वी परमवीर्यवान् राम ने रत्न, वस्त्र और आभूषणों से पूजित करके हर्षित होकर अपने-अपने देशों को विदा किया। वे सब महाबली वानर राम से आज्ञा लेकर, बारंबार प्रणाम करके, उत्फुल्ल हृदय से अपने-अपने देशों को चले गए।

👹 राक्षस सेनानायकों की विदाई (श्लोक १३-२५)

॥ श्लोक १३-१८ ॥
ततः प्रहस्तमुख्यांश्च राक्षसान्क्रूरकारिणः।
आहूय रामः प्रोवाच शृणुध्वं रजनीचराः॥
युष्माकं साह्यमक्लीबं विभीषणहितैषिणाम्।
मया प्राप्तं महद्राज्यं हत्वा रावणमाहवे॥
तस्माद्गृह्णीत रत्नानि वासांसि विविधानि च।
विभीषणेन सहिताः सुखं लङ्कां प्रशासत॥
इत्युक्तास्ते प्रहृष्टाश्च रामं प्राञ्जलयोऽब्रुवन्।
अनुज्ञाताः प्रयास्यामो लङ्कां धर्मभृतां वर॥
रामस्तेभ्यो धनं दत्त्वा वस्त्राण्याभरणानि च।
विसर्जयामास तदा विभीषणपुरस्सरान्॥
📖 भावार्थ : तदनन्तर राम ने प्रहस्त आदि क्रूरकर्मा राक्षसों को बुलाकर कहा: "हे रजनीचरों! सुनो। विभीषण के हितैषी तुम लोगों के अकातर साहाय्य से मैंने रावण को युद्ध में मारकर यह महान राज्य प्राप्त किया है। अतः तुम रत्न और विविध वस्त्र ग्रहण करो और विभीषण के साथ मिलकर सुखपूर्वक लंका का शासन करो।" ऐसा कहने पर वे अत्यन्त प्रसन्न हुए और हाथ जोड़कर बोले: "हे धर्मवर! अनुमति पाकर हम लंका जाएँगे।" राम ने उन्हें धन, वस्त्र और आभूषण देकर विभीषण के साथ विदा किया।
॥ श्लोक १९-२५ ॥
गतेषु तेषु रामस्तु सुग्रीवं प्रियमब्रवीत्।
गच्छ त्वं वानरश्रेष्ठ किष्किन्धां परिपालय॥
विभीषण महाबाहो लङ्कां गच्छ सुरक्षिताम्।
हनूमंश्च मया सार्धं तिष्ठत्वत्र यदृच्छया॥
इत्युक्ताः प्रययुः सर्वे यथाक्रममरिंदमाः।
रामोऽपि सीतया सार्धं रेमे राज्ये स्थितः सुखी॥
हनूमान्सततं रामं सेवते स्म दिने दिने।
रामोऽपि तं महाप्राज्ञं पूजयामास भक्तितः॥
📖 भावार्थ : उनके जाने के बाद राम ने सुग्रीव से कहा: "हे वानरश्रेष्ठ! तुम किष्किन्धा जाकर उसका पालन करो। हे महाबाहो विभीषण! तुम सुरक्षित लंका को जाओ। हनुमान मेरे साथ इच्छानुसार यहाँ रहेंगे।" इस प्रकार आज्ञा पाकर वे सभी अरिंदम यथाक्रम चले गए। राम भी सीता के साथ राज्य में स्थित होकर सुखपूर्वक रमण करने लगे। हनुमान नित्य राम की सेवा करते थे और राम भी उन महाप्राज्ञ का भक्तिपूर्वक सत्कार करते थे।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🐒 सबके प्रति सम्मान

राम ने भालुओं, वानरों और राक्षसों – सभी को समान भाव से सम्मानित किया। यह उनके वैश्विक दृष्टिकोण को दर्शाता है कि वे किसी भी जाति या प्रजाति में भेद नहीं करते।

🕊️ कृतज्ञता का भाव

राम ने हर उस योद्धा का आभार व्यक्त किया, चाहे उसका योगदान छोटा या बड़ा हो। यह एक आदर्श नेता का गुण है – वह अपने साथियों के योगदान को कभी नहीं भूलता।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे एकोनपञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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