राम द्वारा भालुओं, वानरों और राक्षसों से विदा लेना
राम भालुओं, वानरों और राक्षसों के सेनानायकों को बुलाकर उनके अद्वितीय योगदान के लिए धन्यवाद देते हैं और उन्हें विदा करते हैं।
विवरण
सुग्रीव, विभीषण और हनुमान के अतिरिक्त भी अनेक वानर, ऋक्ष (भालू) और राक्षस सेनानायक थे जिन्होंने युद्ध में वीरता दिखाई थी। राम ने उन सबको अलग-अलग बुलाया और उनके पराक्रम की सराहना की। जाम्बवान (भालुओं के राजा), नल, नील, गवय, गवाक्ष, शरभ, ऋषभ, गन्धमादन, मैन्द, द्विविद, पनस, सम्पाति, प्रजंघ, प्रहस्त (राक्षस) आदि सभी उपस्थित थे। राम ने प्रत्येक का नाम लेकर उनकी वीरता का गुणगान किया और उन्हें उपहार देकर विदा किया। सभी ने राम के चरणों में प्रणाम किया और अपने-अपने स्थानों को प्रस्थान किया। यह सर्ग राम के व्यक्तित्व की विशालता को दर्शाता है, जो हर एक योद्धा के योगदान को मान्यता देते हैं।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ४९
(राम द्वारा भालुओं, वानरों और राक्षसों से विदा लेना)
🔆 प्रस्तावना : सुग्रीव, विभीषण और हनुमान के अतिरिक्त भी असंख्य वीर वानर, ऋक्ष (भालू) और राक्षस सेनानायक थे। राम ने उन सबको बुलाकर सम्मानपूर्वक विदा किया।
🐻 भालुओं का सम्मान (श्लोक १-१२)
ऋक्षराज महाप्राज्ञ शृणु मे वचनं प्रियम्॥
त्वया युद्धे महत्कर्म कृतं रिपुनिबर्हणम्।
हनूमत्प्रमुखैः सार्धं सुग्रीवस्य हितैषिभिः॥
तव बुद्ध्या च धैर्येण जिता लङ्का दुरासदा।
प्रतिगृहाण भद्रं ते हारं रत्नमयं शुभम्॥
जाम्बवान्प्रतिजग्राह हारं परमशोभनम्।
प्रणनाम च रामाय प्रीत्या परमया युतः॥
ततः शरभमृक्षेशं गवयं गवाक्षकम्।
पूजयामास रामस्तु रत्नैर्वस्त्रैरलंकृतैः॥
ऋक्षाः सर्वे प्रसन्नाश्च रामं प्राञ्जलयोऽब्रुवन्।
आशीर्वादान्प्रयच्छन्तो जय राम नमोऽस्तु ते॥
पूजयामास धर्मात्मा यथार्हं प्रियवादिनः॥
नलं नीलं महेन्द्रं च द्विविदं मैन्दमेव च।
गन्धमादनमत्युग्रं पनसं सम्पातिं तथा॥
प्रजंघं च महाबाहुं शतबलिं च वीर्यवान्।
एतानन्यांश्च बहुशो रामः परमवीर्यवान्॥
रत्नैर्वस्त्रैश्च भूषैश्च पूजयित्वा महायशाः।
विसर्जयामास तदा स्वान्देशान्प्रति हर्षितान्॥
ते सर्वे राममामन्त्र्य प्रणम्य च पुनः पुनः।
ययुरुत्फुल्लहृदयाः स्वं स्वं देशं महाबलाः॥
👹 राक्षस सेनानायकों की विदाई (श्लोक १३-२५)
आहूय रामः प्रोवाच शृणुध्वं रजनीचराः॥
युष्माकं साह्यमक्लीबं विभीषणहितैषिणाम्।
मया प्राप्तं महद्राज्यं हत्वा रावणमाहवे॥
तस्माद्गृह्णीत रत्नानि वासांसि विविधानि च।
विभीषणेन सहिताः सुखं लङ्कां प्रशासत॥
इत्युक्तास्ते प्रहृष्टाश्च रामं प्राञ्जलयोऽब्रुवन्।
अनुज्ञाताः प्रयास्यामो लङ्कां धर्मभृतां वर॥
रामस्तेभ्यो धनं दत्त्वा वस्त्राण्याभरणानि च।
विसर्जयामास तदा विभीषणपुरस्सरान्॥
गच्छ त्वं वानरश्रेष्ठ किष्किन्धां परिपालय॥
विभीषण महाबाहो लङ्कां गच्छ सुरक्षिताम्।
हनूमंश्च मया सार्धं तिष्ठत्वत्र यदृच्छया॥
इत्युक्ताः प्रययुः सर्वे यथाक्रममरिंदमाः।
रामोऽपि सीतया सार्धं रेमे राज्ये स्थितः सुखी॥
हनूमान्सततं रामं सेवते स्म दिने दिने।
रामोऽपि तं महाप्राज्ञं पूजयामास भक्तितः॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🐒 सबके प्रति सम्मान
राम ने भालुओं, वानरों और राक्षसों – सभी को समान भाव से सम्मानित किया। यह उनके वैश्विक दृष्टिकोण को दर्शाता है कि वे किसी भी जाति या प्रजाति में भेद नहीं करते।
🕊️ कृतज्ञता का भाव
राम ने हर उस योद्धा का आभार व्यक्त किया, चाहे उसका योगदान छोटा या बड़ा हो। यह एक आदर्श नेता का गुण है – वह अपने साथियों के योगदान को कभी नहीं भूलता।