राम द्वारा सहयोगियों को उपहार देना
राम अपने सभी सहयोगियों को बहुमूल्य उपहार, रत्न, वस्त्र और आभूषण प्रदान करते हैं और उनका सम्मान करते हैं।
विवरण
विदाई के समय राम ने अपने सभी सहयोगियों को बहुमूल्य उपहार देकर उनके योगदान का सम्मान किया। उन्होंने सुग्रीव को अनमोल रत्नों से जड़ित आभूषण, विभीषण को दिव्य वस्त्र और मुकुट, अंगद को बहुमूल्य कंगन, जाम्बवान को सुवर्णमय हार, और हनुमान को अपनी अंगूठी एवं मोतियों की माला भेंट की। अन्य वीरों को भी यथोचित उपहार दिए। राम ने कहा कि यह उपहार आपके स्नेह और साहस की निशानी हैं। सभी सहयोगी राम की उदारता से अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्हें आशीर्वाद दिया। इस सर्ग में राम की उदारता और उनके हृदय की विशालता का वर्णन है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ४८
(राम द्वारा सहयोगियों को उपहार देना)
🔆 प्रस्तावना : राम ने अपने सहयोगियों को विदा करने से पहले उनके अतुलनीय योगदान के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए उन्हें बहुमूल्य उपहार देने का निश्चय किया।
🎁 सुग्रीव और विभीषण को उपहार (श्लोक १-१२)
आनयध्वं महार्हाणि रत्नानि विविधानि च॥
वस्त्राणि दिव्यरूपाणि भूषणानि महान्ति च।
यानानि विविधाकाराण्यासनानि वराणि च॥
आनीतानि च रत्नानि दृष्ट्वा रामो महामतिः।
सुग्रीवं प्रथमं प्राह इदं ते वानरेश्वर॥
रत्नमाला महार्हा च वस्त्रयुग्मं च भूषणम्।
प्रतिगृह्णीष्व भद्रं ते मत्स्नेहस्मृतिचिह्नितम्॥
सुग्रीवः प्रतिजग्राह हर्षेण महता युतः।
प्रणनाम च रामाय साश्रुनेत्रः कृताञ्जलिः॥
ततो विभीषणं प्राह रामो धर्मभृतां वरः।
गृहाणेदं महाबाहो चिह्नं मत्प्रीतिसूचकम्॥
दिव्यं वर्म च शस्त्रं च मुकुटं रत्नभूषितम्।
लङ्कायां राज्यमास्थाय धर्मेण पालय प्रजाः॥
प्रणम्य राघवं प्राह कृतार्थोऽस्मि तव प्रभो॥
ततोऽङ्गदं समाहूय रामः प्रीतिपुरस्सरः।
ददौ कङ्कणके दिव्ये केयूरे च महाधने॥
जाम्बवन्तं च धर्मज्ञं पूजयामास राघवः।
हारेण महता राजन्स्फाटिकेन सुशोभिना॥
नीलं नलं च मैन्दं च द्विविदं च महाबलम्।
प्रत्येकं प्रददौ रामो रत्नानि विविधानि च॥
🙏 हनुमान और अन्य वीरों का सम्मान (श्लोक १३-२५)
किं ददामि महाभाग तुभ्यं वै हरिसत्तम॥
त्वत्समो नास्ति मे भक्तः प्रियश्च हरिपुंगव।
वरं वृणीष्व भद्रं ते यत्ते मनसि वर्तते॥
हनूमान्प्राह रामं तु प्राञ्जलिर्विनयान्वितः।
यदि तुष्टोऽसि मे राजन्यदि देयो वरश्च मे॥
तदिच्छामि सदा त्वां तु पश्येयं प्रियमव्ययम्।
नान्यः कश्चन मे कामो रामचन्द्र त्वया विना॥
इत्युक्त्वा प्रणतो भूत्वा तस्थौ हनुमान्मुनिः।
रामः प्रोवाच धर्मात्मा हनूमन् रामवत्सल।
यावल्लोकेषु कीर्तिस्ते स्थास्यतीयं मम प्रिया।
त्वयि भक्तिर्मयि स्नेहः स्थिरो भवतु सर्वदा॥
मुक्ताहारं च दिव्यं च यश्चासीत्प्रियदर्शनः॥
एवं सर्वान्समुद्दिश्य रामः प्रीतिपुरस्सरः।
ददौ रत्नानि मुख्यानि वस्त्राण्याभरणानि च॥
ते सर्वे प्रतिगृह्याथ रामं परमविस्मिताः।
ऊचुः प्राञ्जलयो भूत्वा धन्याः स्मो रघुनन्दन॥
यन्नो भवान्प्रियः शश्वत्स्नेहेन परवान्सदा।
एवं संपूजिताः सर्वे रामेण विदितात्मना॥
ययुः स्वान्स्वान्देशान्हृष्टा राममेवानुचिन्तयन्॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🎁 दान और उदारता का आदर्श
राम ने बिना किसी भेदभाव के सभी सहयोगियों को उनके योगदान के अनुरूप उपहार दिए। यह एक आदर्श राजा के कर्तव्य को दर्शाता है – मित्रों और सहयोगियों का सम्मान करना।
🕉️ भक्त का वैराग्य
हनुमान ने किसी सांसारिक वस्तु की इच्छा नहीं की, केवल राम के सान्निध्य की कामना की। यह परम भक्ति का लक्षण है।