उत्तर काण्ड अध्याय 47

राम द्वारा अपने सहयोगियों से विदा लेना

राम अपने सभी सहयोगियों – सुग्रीव, विभीषण, अंगद, जाम्बवान, हनुमान आदि – को बुलाकर उनके योगदान के लिए धन्यवाद देते हैं और उनसे विदा लेते हैं।

विवरण

राम के राज्याभिषेक के बाद सभी वानर, राक्षस और भालू सेना अयोध्या में ही रुकी हुई थी। अब जब सब कार्य समाप्त हो गया, तो राम ने अपने सभी सहयोगियों को बुलाया और उनके अतुलनीय योगदान के लिए हृदय से धन्यवाद दिया। सुग्रीव, विभीषण, अंगद, जाम्बवान, हनुमान, नल, नील, मैन्द, द्विविद, और अन्य सभी वीर योद्धा उपस्थित थे। राम ने प्रत्येक का नाम लेकर उनकी वीरता और निष्ठा की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि आप सबके बिना यह विजय संभव नहीं थी। अब आप अपने-अपने राज्यों या निवास स्थानों को लौट सकते हैं। यह सुनकर सभी भावुक हो गए। उन्होंने राम से कहा कि वे उनके साथ ही रहना चाहते हैं, परन्तु राम ने उन्हें उनके कर्तव्यों का स्मरण दिलाया। अंततः सभी ने राम से विदा ली, किंतु हनुमान कुछ दिन और रुकने की आज्ञा माँगते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ४७

(राम द्वारा अपने सहयोगियों से विदा लेना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तचत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम के राज्याभिषेक के पश्चात् सभी सहयोगी वानर, राक्षस और ऋक्ष अयोध्या में ही रहे। अब जब सब कार्य पूर्ण हो चुके, राम ने उन्हें विदा करने का निश्चय किया।

🦸 सहयोगियों का सम्मान (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
रामः समाहूय सुहृदः सर्वान्वानरराक्षसान्।
प्रीतिपूर्वमिदं वाक्यमुवाच सुमहायशाः॥
भवद्भिरहमत्यर्थं साहाय्यं कृतमुत्तमम्।
रावणं सगणं हत्वा प्राप्तो राज्यमकण्टकम्॥
न शक्यं प्रतिकर्तुं वो दानमानादिभिर्नरैः।
प्राणैरपि प्रदातव्यैः किं पुनर्धनसंचयैः॥
तथापि स्वल्पकं मन्ये यद् ददामि स्वशक्तितः।
गृह्यतां प्रीतिपूर्वं तद् भवद्भिः सह राघवः॥
इत्युक्त्वा राघवो राजा ददौ तेभ्यो धनं बहु।
रत्नानि विविधान्यासां वस्त्राण्याभरणानि च॥
🔹 पदच्छेद : रामः = राम; समाहूय = बुलाकर; सुहृदः = मित्रों को; सर्वान् = सभी; वानरराक्षसान् = वानरों और राक्षसों को; प्रीतिपूर्वम् = प्रेमपूर्वक; इदम् = यह; वाक्यम् = वचन; उवाच = बोले; सुमहायशाः = महान यशस्वी; भवद्भिः = आप लोगों ने; अहम् = मुझे; अत्यर्थम् = अत्यधिक; साहाय्यम् = सहायता; कृतम् = की; उत्तमम् = उत्तम; रावणम् = रावण को; सगणम् = उसके गणों सहित; हत्वा = मारकर; प्राप्तः = प्राप्त किया; राज्यम् = राज्य; अकण्टकम् = काँटारहित; न = नहीं; शक्यम् = सम्भव; प्रतिकर्तुम् = बदला चुकाना; वः = आप लोगों का; दानमानादिभिः = दान और मान आदि से; नरैः = मनुष्यों द्वारा; प्राणैः = प्राणों से; अपि = भी; प्रदातव्यैः = देने योग्य; किम् = क्या; पुनः = फिर; धनसंचयैः = धन के संचय से; तथापि = फिर भी; स्वल्पकम् = थोड़ा सा; मन्ये = मानता हूँ; यत् = जो; ददामि = दे रहा हूँ; स्वशक्तितः = अपनी शक्ति के अनुसार; गृह्यताम् = ग्रहण करें; प्रीतिपूर्वम् = प्रेमपूर्वक; तत् = वह; भवद्भिः = आप लोगों द्वारा; सह = सहित; राघवः = राघव; इति = इस प्रकार; उक्त्वा = कहकर; राघवः = राघव; राजा = राजा; ददौ = दिया; तेभ्यः = उन्हें; धनम् = धन; बहु = बहुत; रत्नानि = रत्न; विविधानि = विविध; आसाम् = उनके लिए; वस्त्राणि = वस्त्र; आभरणानि = आभूषण; च = और।
📖 भावार्थ : महायशस्वी राम ने सभी वानर और राक्षस मित्रों को बुलाकर प्रेमपूर्वक यह वचन कहा: "आप लोगों ने मेरी अत्यधिक सहायता की है। आपके सहयोग से ही रावण और उसके गणों को मारकर मैंने यह निष्कण्टक राज्य प्राप्त किया है। मनुष्य दान और मान आदि से आप लोगों का उपकार नहीं चुका सकते, चाहे वह प्राण ही क्यों न देने पड़ें। फिर भी मैं अपनी शक्ति के अनुसार जो कुछ दे रहा हूँ, उसे प्रेमपूर्वक ग्रहण करें।" ऐसा कहकर राजा राघव ने उन्हें बहुत धन, विविध रत्न, वस्त्र और आभूषण दिए।
॥ श्लोक ६-१० ॥
ते प्रीताः प्रतिगृह्यार्थं रामं वचनमब्रुवन्।
न धनेन प्रयोजनं न रत्नैर्न च कांचनैः॥
त्वयि राज्ञि स्थिते देवे सर्वेषां नः सुखं सदा।
यदि त्वं करुणां कृत्वा दातुमिच्छसि राघव॥
तदाज्ञापय नित्यं नः त्वत्समीपे निवासनम्।
वयं त्वां द्रष्टुमिच्छामो नित्यं भक्त्या समन्विताः॥
इति श्रुत्वा रामवाक्यं प्रत्यूचुः प्रणताः स्थिताः॥
📖 भावार्थ : वे सब धन-रत्न ग्रहण करके प्रसन्न हुए और राम से बोले: "हमें धन, रत्न या सुवर्ण की कोई आवश्यकता नहीं है। हे देव! आप राजा के रूप में स्थित हैं, तभी हम सब सदा सुखी हैं। यदि आप कृपा करके कुछ देना ही चाहते हैं, तो हमें यह आज्ञा दें कि हम सदा आपके समीप निवास करें। हम आपके दर्शन नित्य भक्तिपूर्वक करना चाहते हैं।" इस प्रकार कहकर वे प्रणत होकर खड़े रहे।

🕊️ विदाई का मार्मिक प्रसंग (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
रामः प्रोवाच वचनं स्नेहगद्गदया गिरा।
सुग्रीव त्वं महाबाहो किष्किन्धां गन्तुमर्हसि॥
विभीषण त्वया लङ्का पालनीया सुरक्षिता।
अंगदाद्याश्च यूथपाः स्वं स्वं देशं व्रजन्त्विति॥
एतच्छ्रुत्वा वचो रामात्सुग्रीवो विभीषणः।
अंगदो जाम्बवान्नीलो नलश्चैव महाबलः॥
पपातुः शोकसंतप्ताः रामपादौ प्रणम्य च।
कथं त्यजामहे रामं प्राणेभ्योऽपि प्रियं सदा॥
इति विलप्य बहुधा रामेण समयोजिताः।
प्रतस्थिरे स्वान्देशांस्ते भृशमश्रूणि मुञ्चतः॥
📖 भावार्थ : राम ने स्नेहगद्गद वाणी में कहा: "हे महाबाहो सुग्रीव! आप किष्किन्धा लौट जाइए। हे विभीषण! आपको लंका का पालन और संरक्षण करना चाहिए। अंगद और अन्य यूथपति अपने-अपने देशों को प्रस्थान करें।" राम का यह वचन सुनकर सुग्रीव, विभीषण, अंगद, जाम्बवान, नील और महाबली नल शोक से संतप्त होकर राम के चरणों में गिर पड़े। वे विलाप करने लगे: "हम प्राणों से भी अधिक प्रिय राम को कैसे त्याग दें?" इस प्रकार बहुत विलाप करके राम द्वारा समझाए गए, वे आँसू बहाते हुए अपने-अपने देशों को चल पड़े।
॥ श्लोक १६-२० ॥
हनूमांस्तु महाप्राज्ञो रामं प्राञ्जलिरब्रवीत्।
यावत्त्वं राजशार्दूल अयोध्यायां स्थितः प्रभो॥
तावदिच्छाम्यहं स्थातुं सेवायां तव राघव।
अनुजानीहि मां देव प्रसादं कर्तुमर्हसि॥
रामः प्रोवाच धर्मात्मा हनूमन् रामवत्सल।
तिष्ठ यावन्मनस्तुभ्यं ततो गन्तासि वानर॥
इत्युक्त्वा प्रददौ तस्मै शय्यासनपरिच्छदान्।
पूजयामास सततं हनूमन्तं महामतिः॥
📖 भावार्थ : महाप्राज्ञ हनुमान ने हाथ जोड़कर राम से कहा: "हे राजशार्दूल प्रभो! जब तक आप अयोध्या में स्थित हैं, तब तक मैं आपकी सेवा में रहना चाहता हूँ। हे देव! मुझे अनुमति दीजिए, आप मुझ पर प्रसाद कीजिए।" धर्मात्मा राम ने कहा: "हे रामवत्सल हनुमन! जब तक तुम्हारा मन है, तब तक रहो। फिर तुम वानर! अपने देश जाना।" ऐसा कहकर महामति राम ने उन्हें शय्या, आसन और परिच्छद दिए और नित्य उनका सत्कार करते रहे।
॥ श्लोक २१-२५ ॥
इतरे तु गता ये ये स्वान्देशान्प्रययुर्मुदा।
रामचन्द्रप्रसादेन ते सर्वे सुखिनोऽभवन्॥
गतेषु तेषु रामस्तु सीतया सहितः सुखी।
रेमे राज्ये स्थितो धीमान्धर्मेण पालयन्प्रजाः॥
हनूमानपि धर्मात्मा रामस्य प्रियकाम्यया।
तस्थौ अयोध्यायां रम्यां सेवमानो दिने दिने॥
📖 भावार्थ : शेष सभी सहयोगी अपने-अपने देशों को प्रसन्नतापूर्वक चले गए। रामचन्द्र की कृपा से वे सब सुखी हुए। उनके जाने के बाद राम सीता के साथ सुखपूर्वक राज्य में स्थित हुए और धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करते हुए आनन्दित रहे। धर्मात्मा हनुमान राम की प्रीति के लिए अयोध्या में रुके रहे और प्रतिदिन उनकी सेवा करते रहे।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🤝 कृतज्ञता का आदर्श

राम ने अपने सहयोगियों के प्रति गहरी कृतज्ञता प्रकट की और उनका यथोचित सम्मान किया। यह सर्ग सिखाता है कि मित्रों के उपकार को कभी नहीं भूलना चाहिए।

💞 भक्त और भगवान का संबंध

हनुमान का राम के साथ रहने का आग्रह भक्त और भगवान के अटूट प्रेम को दर्शाता है। हनुमान को राम ने अपने पास रखा, यह उनकी विशेष कृपा है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे सप्तचत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।