राम द्वारा अपने सहयोगियों से विदा लेना
राम अपने सभी सहयोगियों – सुग्रीव, विभीषण, अंगद, जाम्बवान, हनुमान आदि – को बुलाकर उनके योगदान के लिए धन्यवाद देते हैं और उनसे विदा लेते हैं।
विवरण
राम के राज्याभिषेक के बाद सभी वानर, राक्षस और भालू सेना अयोध्या में ही रुकी हुई थी। अब जब सब कार्य समाप्त हो गया, तो राम ने अपने सभी सहयोगियों को बुलाया और उनके अतुलनीय योगदान के लिए हृदय से धन्यवाद दिया। सुग्रीव, विभीषण, अंगद, जाम्बवान, हनुमान, नल, नील, मैन्द, द्विविद, और अन्य सभी वीर योद्धा उपस्थित थे। राम ने प्रत्येक का नाम लेकर उनकी वीरता और निष्ठा की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि आप सबके बिना यह विजय संभव नहीं थी। अब आप अपने-अपने राज्यों या निवास स्थानों को लौट सकते हैं। यह सुनकर सभी भावुक हो गए। उन्होंने राम से कहा कि वे उनके साथ ही रहना चाहते हैं, परन्तु राम ने उन्हें उनके कर्तव्यों का स्मरण दिलाया। अंततः सभी ने राम से विदा ली, किंतु हनुमान कुछ दिन और रुकने की आज्ञा माँगते हैं।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ४७
(राम द्वारा अपने सहयोगियों से विदा लेना)
🔆 प्रस्तावना : राम के राज्याभिषेक के पश्चात् सभी सहयोगी वानर, राक्षस और ऋक्ष अयोध्या में ही रहे। अब जब सब कार्य पूर्ण हो चुके, राम ने उन्हें विदा करने का निश्चय किया।
🦸 सहयोगियों का सम्मान (श्लोक १-१०)
प्रीतिपूर्वमिदं वाक्यमुवाच सुमहायशाः॥
भवद्भिरहमत्यर्थं साहाय्यं कृतमुत्तमम्।
रावणं सगणं हत्वा प्राप्तो राज्यमकण्टकम्॥
न शक्यं प्रतिकर्तुं वो दानमानादिभिर्नरैः।
प्राणैरपि प्रदातव्यैः किं पुनर्धनसंचयैः॥
तथापि स्वल्पकं मन्ये यद् ददामि स्वशक्तितः।
गृह्यतां प्रीतिपूर्वं तद् भवद्भिः सह राघवः॥
इत्युक्त्वा राघवो राजा ददौ तेभ्यो धनं बहु।
रत्नानि विविधान्यासां वस्त्राण्याभरणानि च॥
न धनेन प्रयोजनं न रत्नैर्न च कांचनैः॥
त्वयि राज्ञि स्थिते देवे सर्वेषां नः सुखं सदा।
यदि त्वं करुणां कृत्वा दातुमिच्छसि राघव॥
तदाज्ञापय नित्यं नः त्वत्समीपे निवासनम्।
वयं त्वां द्रष्टुमिच्छामो नित्यं भक्त्या समन्विताः॥
इति श्रुत्वा रामवाक्यं प्रत्यूचुः प्रणताः स्थिताः॥
🕊️ विदाई का मार्मिक प्रसंग (श्लोक ११-२५)
सुग्रीव त्वं महाबाहो किष्किन्धां गन्तुमर्हसि॥
विभीषण त्वया लङ्का पालनीया सुरक्षिता।
अंगदाद्याश्च यूथपाः स्वं स्वं देशं व्रजन्त्विति॥
एतच्छ्रुत्वा वचो रामात्सुग्रीवो विभीषणः।
अंगदो जाम्बवान्नीलो नलश्चैव महाबलः॥
पपातुः शोकसंतप्ताः रामपादौ प्रणम्य च।
कथं त्यजामहे रामं प्राणेभ्योऽपि प्रियं सदा॥
इति विलप्य बहुधा रामेण समयोजिताः।
प्रतस्थिरे स्वान्देशांस्ते भृशमश्रूणि मुञ्चतः॥
यावत्त्वं राजशार्दूल अयोध्यायां स्थितः प्रभो॥
तावदिच्छाम्यहं स्थातुं सेवायां तव राघव।
अनुजानीहि मां देव प्रसादं कर्तुमर्हसि॥
रामः प्रोवाच धर्मात्मा हनूमन् रामवत्सल।
तिष्ठ यावन्मनस्तुभ्यं ततो गन्तासि वानर॥
इत्युक्त्वा प्रददौ तस्मै शय्यासनपरिच्छदान्।
पूजयामास सततं हनूमन्तं महामतिः॥
रामचन्द्रप्रसादेन ते सर्वे सुखिनोऽभवन्॥
गतेषु तेषु रामस्तु सीतया सहितः सुखी।
रेमे राज्ये स्थितो धीमान्धर्मेण पालयन्प्रजाः॥
हनूमानपि धर्मात्मा रामस्य प्रियकाम्यया।
तस्थौ अयोध्यायां रम्यां सेवमानो दिने दिने॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🤝 कृतज्ञता का आदर्श
राम ने अपने सहयोगियों के प्रति गहरी कृतज्ञता प्रकट की और उनका यथोचित सम्मान किया। यह सर्ग सिखाता है कि मित्रों के उपकार को कभी नहीं भूलना चाहिए।
💞 भक्त और भगवान का संबंध
हनुमान का राम के साथ रहने का आग्रह भक्त और भगवान के अटूट प्रेम को दर्शाता है। हनुमान को राम ने अपने पास रखा, यह उनकी विशेष कृपा है।