उत्तर काण्ड अध्याय 46

ऋषियों द्वारा राम की स्तुति और प्रस्थान

राम के धर्मराज्य की स्थापना के बाद सभी ऋषि-मुनि उनकी स्तुति करते हैं और आशीर्वाद देकर अपने-अपने आश्रमों को लौट जाते हैं।

विवरण

राम के राज्याभिषेक के पश्चात् अयोध्या में धर्म की स्थापना हो चुकी थी। चारों ओर सुख-शांति थी। एक दिन सभी ऋषि-मुनि, जो राम के दरबार में उपस्थित थे, उनकी स्तुति करने लगे। उन्होंने राम के शौर्य, धर्मपरायणता और प्रजापालन की भूरि-भूरि प्रशंसा की। राम ने विनम्रतापूर्वक उनका अभिवादन किया और उनके चरणों में प्रणाम किया। ऋषियों ने राम को आशीर्वाद दिया कि उनका राज्य हमेशा सुखी रहे और उनकी कीर्ति तीनों लोकों में फैले। तत्पश्चात् ऋषियों ने राम से विदा ली और अपने-अपने आश्रमों को प्रस्थान किया। राम ने उन्हें यथोचित सम्मान के साथ विदा किया। यह सर्ग ऋषियों के प्रति राम की कृतज्ञता और उनके धर्मराज्य की स्थिरता को दर्शाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ४६

(ऋषियों द्वारा राम की स्तुति और प्रस्थान)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षट्चत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम के राज्याभिषेक के बाद सभी ऋषि-मुनि अयोध्या में ही रुके थे। अब वे राम से विदा लेकर अपने आश्रमों को लौटना चाहते थे। इस सर्ग में उनके द्वारा राम की स्तुति और प्रस्थान का वर्णन है।

🧘 ऋषियों द्वारा स्तुति (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः ऋषिगणाः सर्वे समेताः धर्मकोविदाः।
रामं प्रति महात्मानं वाक्यमूचुः प्रशस्य च॥
राम राजन्महाबाहो धर्मज्ञ सत्यविक्रम।
त्वया धर्मः प्रतिष्ठाप्तः पालिता च वसुंधरा॥
अहो तव प्रभावेन राक्षसाः क्षयमागताः।
सुराः सिद्धाश्च मुनयः त्वयि राज्ञि सुखान्विताः॥
न वै शोको न च व्याधिः न दुर्भिक्षं न चापदः।
त्वयि राज्ञि धर्मात्मन् प्रजाः सर्वाः सुखं श्रिताः॥
इत्युक्त्वा ते मुनिवराः प्रशशंसुः पुनः पुनः।
रामं परमधर्मज्ञं प्रीतिमन्तः सुविस्मिताः॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; ऋषिगणाः = ऋषियों के समूह; सर्वे = सभी; समेताः = एकत्र हुए; धर्मकोविदाः = धर्मज्ञ; रामम् = राम; प्रति = की ओर; महात्मानम् = महात्मा को; वाक्यम् = वचन; ऊचुः = बोले; प्रशस्य = प्रशंसा करके; च = और; राम = हे राम; राजन् = राजन्; महाबाहो = महाबाहो; धर्मज्ञ = धर्मज्ञ; सत्यविक्रम = सत्यपराक्रमी; त्वया = आपके द्वारा; धर्मः = धर्म; प्रतिष्ठाप्तः = स्थापित किया गया; पालिता = पालन किया गया; च = और; वसुंधरा = पृथ्वी; अहो = अहो; तव = आपका; प्रभावेन = प्रभाव से; राक्षसाः = राक्षस; क्षयम् = नाश; आगताः = प्राप्त हुए; सुराः = देवता; सिद्धाः = सिद्ध; च = और; मुनयः = मुनि; त्वयि = आपके; राज्ञि = राज्य में; सुखान्विताः = सुखी; न = नहीं; वै = निश्चय; शोकः = शोक; न = नहीं; च = और; व्याधिः = रोग; न = नहीं; दुर्भिक्षम् = अकाल; न = नहीं; च = और; आपदः = आपत्तियाँ; त्वयि = आपके; राज्ञि = राज्य में; धर्मात्मन् = धर्मात्मा; प्रजाः = प्रजा; सर्वाः = सब; सुखम् = सुख; श्रिताः = आश्रित; इति = इस प्रकार; उक्त्वा = कहकर; ते = वे; मुनिवराः = श्रेष्ठ मुनि; प्रशशंसुः = प्रशंसा की; पुनः पुनः = बारंबार; रामम् = राम की; परमधर्मज्ञम् = परम धर्मज्ञ; प्रीतिमन्तः = प्रसन्न; सुविस्मिताः = अत्यन्त विस्मित।
📖 भावार्थ : उसके बाद सभी धर्मज्ञ ऋषि-मुनि एकत्र हुए और महात्मा राम की प्रशंसा करते हुए बोले: "हे महाबाहो राम! हे धर्मज्ञ, सत्यविक्रम! आपने धर्म की स्थापना की और पृथ्वी का पालन किया। आपके प्रभाव से राक्षसों का नाश हुआ। देवता, सिद्ध और मुनि आपके राज्य में सुखी हैं। हे धर्मात्मन्! आपके राज्य में न शोक है, न रोग, न अकाल, न आपत्तियाँ। सभी प्रजाजन सुखपूर्वक रहते हैं।" इस प्रकार कहकर वे मुनिवर प्रसन्न और विस्मित होकर परमधर्मज्ञ राम की बारंबार प्रशंसा करने लगे।
॥ श्लोक ६-१० ॥
रामः प्रोवाच तान्सर्वान्मुनीन्प्रीतिपुरस्सरः।
भवतां दर्शनादेव पूतोऽहं मुनिपुंगवाः॥
यद्येषा मयि वः प्रीतिः सर्वदा धर्मवत्सलाः।
आशीर्वादान्प्रयच्छन्तु मम राज्यस्य चानघाः॥
इत्युक्तास्ते मुनिश्रेष्ठाः प्रीतिमन्तः कृताञ्जलिम्।
ऊचुः परमसन्तुष्टा रामं सत्यपराक्रमम्॥
ध्रुवं ते राज्यमव्यग्रं शाश्वतं धर्मपालितम्।
कीर्तिर्लोकेषु विख्याता यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥
इत्याशीर्भिः समाकीर्य रामं ते मुनिपुंगवाः।
विसर्जयांचक्रुस्ते तं प्रस्थिताः स्वान्निवेशनम्॥
📖 भावार्थ : राम ने प्रसन्नतापूर्वक उन सभी मुनियों से कहा: "हे मुनिपुंगवों! आपके दर्शन मात्र से मैं पवित्र हो गया। यदि आपकी मुझ पर यह कृपा है, तो हे धर्मवत्सलों! मुझे और मेरे राज्य को आशीर्वाद दीजिए।" इस प्रकार कहे जाने पर वे मुनिश्रेष्ठ अत्यन्त प्रसन्न हुए और हाथ जोड़े खड़े राम से बोले: "आपका राज्य ध्रुव, अविचल और शाश्वत रहे, धर्म से पालित हो। आपकी कीर्ति लोकों में तब तक विख्यात रहेगी जब तक चन्द्रमा और सूर्य हैं।" इस प्रकार आशीर्वाद देकर उन मुनियों ने राम से विदा ली और अपने-अपने आश्रमों को प्रस्थान किया।

🙏 राम का विनम्र व्यवहार और विदाई (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततः रामो महातेजाः प्रणम्य मुनिपुंगवान्।
अनुयात्रं चकारैषां भरतेन सहानघः॥
गच्छन्तः पृष्ठतः सर्वे मुनयो राममब्रुवन्।
निवर्तस्व महाबाहो कृतकार्याः स्म राघव॥
रामः प्राह निवर्तिष्ये युष्माकं वचनादहम्।
स्नेहात्तु हृदयं मेऽद्य न गच्छति निवर्तितुम्॥
एवं ब्रुवति काकुत्स्थे मुनयः प्रीतमानसाः।
आशीर्भिः सम्प्रयुज्यैनं जग्मुः स्वं स्वं निवेशनम्॥
ददर्श रामस्तान्यान्तान्यावद्दृष्टिः प्रवर्तते।
ततः प्रविविशे वेश्म सह भ्रातृभिरात्मवान्॥
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी राम ने मुनियों को प्रणाम किया और भरत के साथ उनके पीछे-पीछे विदा करने चले। पीछे आते हुए मुनियों ने राम से कहा: "हे महाबाहो राघव! अब लौट जाइए, हम कृतकार्य हो गए।" राम ने कहा: "आपके वचन से मैं लौटूँगा, परन्तु स्नेहवश मेरा हृदय लौटने को तैयार नहीं है।" ऐसा कहते हुए राम को देखकर मुनि प्रसन्न मन से आशीर्वाद देकर अपने-अपने आश्रमों को चले गए। राम ने जहाँ तक दृष्टि गई, उन्हें जाते देखा। तत्पश्चात् वे आत्मवान् राम अपने भाइयों के साथ महल में लौट आए।
॥ श्लोक १६-२० ॥
प्रविश्य भवनं रामः पूजयामास देवताः।
ब्राह्मणेभ्यो ददौ वित्तं गाः सुवर्णं महायशाः॥
एवं तस्य प्रजाः सर्वा धर्मेण पालिताः सुखम्।
नाधयो व्याधयश्चासन्न रामे शासति प्रजाः॥
ऋषयस्ते गताः सर्वे यथागतं यथासुखम्।
राम एव महातेजा बभूव प्रीतमानसः॥
इत्याख्यानं समाख्यातं मुनिस्तुतिपुरस्सरम्।
श्रृण्वन्ति ये नरा भक्त्या ते यान्ति परमां गतिम्॥
📖 भावार्थ : महल में प्रवेश करके राम ने देवताओं की पूजा की और ब्राह्मणों को धन, गायें और सुवर्ण दान में दिए। इस प्रकार उनके द्वारा धर्मपूर्वक पालित सभी प्रजा सुखपूर्वक रहने लगी। जब राम प्रजा का शासन करते थे, तब न कोई मानसिक व्यथा थी, न रोग। वे सभी ऋषि जैसे आए थे, वैसे ही सुखपूर्वक लौट गए। महातेजस्वी राम अत्यन्त प्रसन्नचित्त हुए। इस प्रकार मुनियों की स्तुति से युक्त यह आख्यान जो भी भक्तिपूर्वक सुनता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 राजा और ऋषि का आदर्श संबंध

इस सर्ग में राजा राम और ऋषियों के बीच परस्पर सम्मान और स्नेह का सुंदर चित्रण है। राजा ऋषियों को देवतुल्य मानता है और ऋषि राजा को धर्म का संरक्षक। यही आदर्श राज्य की नींव है।

📖 रामराज्य की विशेषताएँ

राम के राज्य में न शोक, न रोग, न अकाल – यह रामराज्य की पहचान है। यह सर्ग बताता है कि धर्म की स्थापना से समाज में सुख-शांति छा जाती है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे षट्चत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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