उत्तर काण्ड अध्याय 43

रावण द्वारा विष्णु को पहचानने का उपाय सीखना

रावण क्षीरसागर पहुँचता है, किन्तु विष्णु को पहचान नहीं पाता। तब उसे नारद जी के माध्यम से विष्णु की पहचान का उपाय ज्ञात होता है।

विवरण

रावण अपने पुष्पक विमान से क्षीरसागर पहुँचा। वहाँ उसने अपार जलराशि और उसके मध्य शेषनाग पर शयन करते हुए एक दिव्य पुरुष को देखा, किन्तु वह पहचान नहीं पाया कि यही विष्णु हैं। उसने माया से उन्हें जगाने का प्रयास किया, किन्तु विष्णु अपनी योगनिद्रा में लीन रहे। तब वहाँ देवर्षि नारद आए और उन्होंने रावण को बताया कि यही भगवान विष्णु हैं, जो योगनिद्रा में हैं। उन्होंने रावण को यह भी समझाया कि जब तक विष्णु स्वयं न चाहें, उन्हें कोई जगा नहीं सकता। रावण ने नारद से विष्णु की पहचान के अन्य लक्षण भी जाने। यह सर्ग रावण के ज्ञान और अज्ञान के मिश्रण को दर्शाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ४३

(रावण द्वारा विष्णु को पहचानने का उपाय सीखना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रिचत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण क्षीरसागर पहुँच तो गया, किन्तु भगवान विष्णु को पहचान नहीं पाया। तब वहाँ देवर्षि नारद पधारे और उन्होंने रावण का मार्गदर्शन किया।

🌊 क्षीरसागर का दृश्य (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
अगस्त्य उवाच – ततः क्षीराब्धिमासाद्य रावणो राक्षसाधिपः।
ददर्श परमं तेजो दिव्यं शेषासनस्थितम्॥
नीलाम्बुदसमं श्यामं पीतवाससमच्युतम्।
शान्तं शान्तैर्गणैर्जुष्टं स्तूयमानं च वन्दिभिः॥
स तु नारायणं देवं नाज्ञासीद्राक्षसाधिपः।
मायया तस्य देवस्य मोहितः क्रोधनो युवा॥
चुकोप च महातेजा विमानस्थो दशाननः।
गर्जयामास वेगेन मेघवज्रसमस्वनः॥
📖 भावार्थ : अगस्त्य ऋषि ने कहा – “तब राक्षसराज रावण क्षीरसागर में पहुँचा। वहाँ उसने परम तेज से युक्त, शेषनाग की शैया पर स्थित एक दिव्य पुरुष को देखा। वे काले मेघ के समान श्याम वर्ण के थे, पीताम्बर धारण किये हुए थे, अच्युत थे, शान्त थे और शान्त गणों से सेवित थे तथा वंदिगण उनकी स्तुति कर रहे थे। किन्तु राक्षसराज उस देव को न पहचान सका, क्योंकि वह देव की माया से मोहित था। तब दशानन ने क्रोधित होकर, विमान पर खड़े होकर, मेघ और वज्र के समान गर्जना की।”

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👁️ माया का प्रभाव

रावण जैसा विद्वान और बलशाली भी भगवान की माया से मोहित हो गया। वह साक्षात विष्णु के समक्ष खड़ा था, फिर भी उन्हें पहचान नहीं पाया। यह माया की महिमा है कि वह ज्ञानियों को भी मोहित कर सकती है।

🧘 योगनिद्रा का रहस्य

विष्णु की योगनिद्रा साधारण निद्रा नहीं है। यह एक योगिक अवस्था है, जिसमें वे सृष्टि के कल्याण के लिए लीन रहते हैं। रावण का उन्हें जगाने का प्रयास उसकी अज्ञानता का परिचायक है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि केवल बाहरी ज्ञान और बल से परमात्मा को नहीं पहचाना जा सकता। उनकी पहचान के लिए विनम्रता, भक्ति और गुरु के मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे त्रिचत्वारिंशः सर्गः ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।