उत्तर काण्ड अध्याय 42

रावण द्वारा विष्णु से युद्ध की खोज

रावण को ज्ञात होता है कि विष्णु ने मनुष्य रूप में अवतार लिया है, तो वह उनसे युद्ध करने की इच्छा से उन्हें खोजने निकलता है।

विवरण

अगस्त्य ऋषि राम को रावण के जीवन की एक और घटना सुनाते हैं। रावण ने समस्त लोकों पर विजय प्राप्त कर ली थी, किन्तु उसका अहंकार अभी शांत नहीं हुआ था। उसने सुना कि भगवान विष्णु ने मनुष्य रूप में अवतार लिया है। उसे यह जानकर अत्यन्त उत्सुकता हुई कि वह उनसे युद्ध करके अपनी शक्ति का प्रदर्शन करे। उसने अपने मंत्रियों से पूछा कि वह विष्णु को कहाँ ढूँढ सकता है। मंत्रियों ने बताया कि विष्णु वर्तमान में क्षीरसागर में शेषनाग पर शयन कर रहे हैं। रावण ने वहाँ जाने का निश्चय किया। यह सर्ग रावण के उसी अभियान की भूमिका तैयार करता है, जहाँ वह विष्णु से युद्ध की खोज में निकलता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ४२

(रावण द्वारा विष्णु से युद्ध की खोज)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ द्विचत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण ने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली, किन्तु उसका अहंकार अभी शान्त नहीं हुआ। अब वह स्वयं भगवान विष्णु को युद्ध के लिए खोजने निकलता है।

👑 रावण का अहंकार (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
अगस्त्य उवाच – रावणो लोकपालानां जित्वा सर्वान् महाबलः।
मेन एकं न विद्येत यो मां युध्येत संयुगे॥
स कदाचिद्विचिन्त्यैवं मन्त्रिभिः सह राक्षसः।
पप्रच्छ विष्णुरद्यापि कुत्रास्ते केन वा हतः॥
मन्त्रिणः प्राहुरव्यग्रा देवदेवो जनार्दनः।
क्षीरोदे शेषपर्यङ्के शेते नित्यमकल्मषः॥
तत्र गत्वा हि तेन त्वं युद्ध कृत्वा जयिष्यसि।
इत्युक्तः प्रययौ लङ्कां गन्तुं क्षीराब्धिमीश्वरः॥
📖 भावार्थ : अगस्त्य ऋषि ने कहा – “रावण ने सभी लोकपालों को जीत लिया था। वह अत्यन्त बलवान था और उसने सोचा कि मेरे समान कोई योद्धा नहीं है, जो मुझसे युद्ध कर सके। एक दिन उसने अपने मंत्रियों के साथ विचार किया और पूछा – ‘विष्णु अब कहाँ हैं? क्या उन्हें किसी ने हराया है?’ मंत्रियों ने कहा – ‘देवदेव जनार्दन क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर सदा शयन करते हैं, वे निष्पाप हैं। आप वहाँ जाकर उनसे युद्ध करके विजय प्राप्त कर सकते हैं।’ यह सुनकर रावण क्षीरसागर जाने के लिए लंका से प्रस्थित हुआ।” रावण के अहंकार ने उसे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि वह स्वयं भगवान विष्णु को युद्ध में हरा सकता है। उसे अपने बल पर इतना घमंड था कि वह किसी को भी अपने समक्ष टिकने में असमर्थ समझता था।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🌀 अहंकार की पराकाष्ठा

रावण का विष्णु को युद्ध के लिए खोजना उसके अहंकार की चरम सीमा है। वह स्वयं को इतना शक्तिशाली मानता है कि उसे लगता है कि वह परमात्मा को भी हरा सकता है। यह उसके पतन की नींव है।

🙏 भक्ति और शक्ति

यह सर्ग बताता है कि केवल शक्ति ही सब कुछ नहीं है। रावण के पास अपार शक्ति थी, किन्तु भक्ति और विनम्रता के अभाव में वह परमात्मा के समक्ष कुछ नहीं कर सका।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से शिक्षा मिलती है कि अहंकार मनुष्य को पतन के गर्त में ले जाता है। चाहे कितनी भी शक्ति क्यों न हो, ईश्वर के समक्ष विनम्र होना ही कल्याण का मार्ग है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः ॥
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