उत्तर काण्ड अध्याय 41

हनुमान् के बारे में और अधिक: शाप और मुक्ति

अगस्त्य ऋषि राम को हनुमान के बाल्यकाल में मिले शाप और उससे मुक्ति की कथा सुनाते हैं, जिससे उनकी शक्तियों का रहस्य खुलता है।

विवरण

राम की जिज्ञासा पर अगस्त्य ऋषि हनुमान के जीवन की और भी रोचक घटनाओं का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि बाल्यकाल में हनुमान अत्यन्त चंचल और शरारती थे। एक बार वे आश्रमों में तपस्यारत ऋषियों की ध्यान-भंग करने लगे। उनकी इन हरकतों से क्रोधित होकर महर्षियों ने उन्हें शाप दे दिया कि उन्हें अपनी अपार शक्तियों का स्मरण नहीं रहेगा, जब तक कोई उन्हें उनकी शक्तियों की याद न दिलाए। यह शाप हनुमान के लिए वरदान सिद्ध हुआ, क्योंकि इसी कारण वे विनम्र बने रहे और उनकी शक्तियों का दुरुपयोग नहीं हुआ। आगे चलकर जब जाम्बवान ने उन्हें उनकी शक्तियों का स्मरण कराया, तब वे समुद्र पार कर सीता की खोज में सफल हुए। यह सर्ग हनुमान के चरित्र के एक महत्वपूर्ण पहलू पर प्रकाश डालता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ४१

(हनुमान् के बारे में और अधिक – शाप और मुक्ति)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकचत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पिछले सर्ग में अगस्त्य ऋषि ने हनुमान के जन्म और बाल-लीलाओं का वर्णन किया। अब वे राम को हनुमान के जीवन की एक और रोचक घटना सुनाते हैं – कैसे बालपन में उन्हें ऋषियों का शाप मिला और वह शाप अंततः उनके लिए वरदान बना।

🐒 हनुमान की बाल-चंचलता (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
अगस्त्य उवाच – शृणु राम महाबाहो हनूमतो महात्मनः।
बाल्ये चेष्टितमद्भुतं यथा शापमवाप्तवान्॥
बालो भूत्वा महातेजा ववृधेऽतिबलान्वितः।
वनानि गिरिशृङ्गाणि चिक्षेप लघुविक्रमः॥
ऋषीणां तपसां रोधं करोति स्म मुहुर्मुहुः।
फलानि पुष्पमूलानि समुत्पाट्य स गच्छति॥
ततः क्रुद्धा महात्मानो वालखिल्यादयो द्विजाः।
शापं दातुं समुद्युक्ता हनूमति महाबले॥
🔹 पदच्छेद : अगस्त्यः उवाच = अगस्त्य ने कहा; शृणु = सुनो; राम = हे राम; महाबाहो = महाबाहु; हनूमतः = हनुमान के; महात्मनः = महात्मा; बाल्ये = बाल्यकाल में; चेष्टितम् = चेष्टा; अद्भुतम् = अद्भुत; यथा = जैसे; शापम् = शाप; अवाप्तवान् = प्राप्त किया; बालः = बालक; भूत्वा = होकर; महातेजाः = महान तेजस्वी; ववृधे = बढ़ा; अतिबलान्वितः = अत्यधिक बल से युक्त; वनानि = वन; गिरिशृङ्गाणि = पर्वत शिखर; चिक्षेप = फेंकता था; लघुविक्रमः = हल्के पराक्रम से; ऋषीणाम् = ऋषियों की; तपसाम् = तपस्या का; रोधम् = विघ्न; करोति स्म = करता था; मुहुर्मुहुः = बार-बार; फलानि = फल; पुष्पमूलानि = फूल और जड़ें; समुत्पाट्य = उखाड़कर; सः = वह; गच्छति = चला जाता था; ततः = तब; क्रुद्धाः = क्रोधित; महात्मानः = महात्मा; वालखिल्यादयः = वालखिल्य आदि; द्विजाः = ब्राह्मण; शापम् = शाप; दातुम् = देने के लिए; समुद्युक्ताः = उद्यत हुए; हनूमति = हनुमान पर; महाबले = महाबली।
📖 भावार्थ : अगस्त्य ऋषि ने कहा – “हे महाबाहो राम! सुनो, महात्मा हनुमान के बाल्यकाल की अद्भुत चेष्टा का वर्णन करता हूँ, कैसे उन्होंने शाप प्राप्त किया। बालक होते हुए भी वे महान तेजस्वी और अत्यधिक बल से युक्त थे। वे इतने शक्तिशाली थे कि हल्के से पराक्रम से ही वनों और पर्वतों के शिखरों को उखाड़कर फेंक देते थे। अपनी चंचलता के कारण वे बार-बार ऋषियों की तपस्या में विघ्न डालते। वे फल, फूल और जड़ें उखाड़कर वहाँ से चले जाते, जिससे तपस्वियों की समाधि भंग होती। यह देखकर वालखिल्य आदि महात्मा ब्राह्मण क्रोधित हो गए और उन्होंने हनुमान को शाप देने का निश्चय किया। हनुमान की इन शरारतों से सभी ऋषि परेशान थे, क्योंकि उनका बल अद्वितीय था और उन्हें रोक पाना किसी के लिए संभव नहीं था।

🔱 ऋषियों का शाप (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
तमूचुः क्रोधताम्राक्षा मुनयः संशितव्रताः।
त्वं बालो बलवान् दर्पान्नूनं ज्ञास्यसि पश्चिमम्॥
यस्मादस्मान् प्रबाधसे तस्माच्छापं ददाम्यहम्।
अद्यप्रभृति ते विद्या न स्मरिष्यसि सर्वथा॥
प्रयुक्ते शापे तु तदा हनूमान् मोहमागतः।
न सस्मार बलं स्वीयं न चात्मानं न विक्रमम्॥
ततः शान्ताः प्रसन्नाश्च मुनयस्ते तपोधनाः।
ऊचुः प्रसन्नवदनाः शापस्यान्तं सुदुःखितम्॥
भविता ते परित्राणं रामसेवानिमित्ततः।
तदा स्मरिष्यसे सर्वं यदा रामेण संगमः॥
🔹 पदच्छेद : तम् = उनसे; ऊचुः = बोले; क्रोधताम्राक्षाः = क्रोध से ताम्र नेत्र वाले; मुनयः = मुनि; संशितव्रताः = दृढ व्रत वाले; त्वम् = तू; बालः = बालक है; बलवान् = बलवान है; दर्पात् = दर्प से; नूनम् = निश्चय; ज्ञास्यसि = जानेगा; पश्चिमम् = अंत (परिणाम); यस्मात् = जिस कारण; अस्मान् = हमें; प्रबाधसे = सताता है; तस्मात् = इसलिए; शापम् = शाप; ददामि = देता हूँ; अहम् = मैं; अद्यप्रभृति = आज से; ते = तुझे; विद्या = शक्तियाँ; न स्मरिष्यसि = स्मरण नहीं रहेंगी; सर्वथा = पूरी तरह; प्रयुक्ते = प्रयोग किये जाने पर; शापे = शाप के; तु = तो; तदा = तब; हनूमान् = हनुमान; मोहम् = मोह को; आगतः = प्राप्त हुए; न सस्मार = स्मरण नहीं रहा; बलम् = बल; स्वीयम् = अपना; न च = और न ही; आत्मानम् = अपने को; न = नहीं; विक्रमम् = पराक्रम; ततः = तब; शान्ताः = शांत; प्रसन्नाः = प्रसन्न; च = और; मुनयः = मुनि; ते = वे; तपोधनाः = तपोधन; ऊचुः = बोले; प्रसन्नवदनाः = प्रसन्न मुख वाले; शापस्य = शाप का; अन्तम् = अंत; सुदुःखितम् = अति दुःखी के लिए; भविता = होगा; ते = तुम्हारा; परित्राणम् = उद्धार; रामसेवानिमित्ततः = राम की सेवा के कारण; तदा = तब; स्मरिष्यसे = स्मरण करोगे; सर्वम् = सब कुछ; यदा = जब; रामेण = राम से; संगमः = मिलन होगा।
📖 भावार्थ : क्रोध से लाल-आँखें किये हुए उन दृढ़ व्रत वाले मुनियों ने हनुमान से कहा – “तू बालक है, बलवान है, परन्तु दर्प के कारण तुझे इसका परिणाम भुगतना पड़ेगा। जिस कारण तू हमें सता रहा है, इसलिए मैं तुझे शाप देता हूँ कि आज से तुझे अपनी सारी शक्तियाँ स्मरण नहीं रहेंगी।” शाप के प्रभाव से हनुमान मोहित हो गए। उन्हें अपना बल, अपना पराक्रम और अपना अस्तित्व ही स्मरण नहीं रहा। वे एक साधारण वानर की भाँति हो गए। तब वे मुनि शांत हुए और प्रसन्न मुख से उस शाप के अंत की बात कही – “तेरा उद्धार राम की सेवा के कारण होगा। जब तेरा राम से मिलन होगा, तब तुझे सब कुछ स्मरण हो जाएगा।” यह शाप वरदान की भाँति था, क्योंकि इसी के कारण हनुमान सदा विनम्र बने रहे और अपनी शक्तियों का दुरुपयोग नहीं किया।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🙏 विनम्रता का रहस्य

हनुमान में अपार शक्तियाँ होते हुए भी वे सदा विनम्र क्यों हैं, इसका रहस्य इस शाप में छिपा है। शाप के कारण उन्हें अपनी शक्तियों का स्मरण नहीं रहता, जब तक कोई उन्हें याद न दिलाए। यह उनके चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता है – वे कभी भी अपने बल का अहंकार नहीं करते।

🌀 शाप और वरदान

जो चीज़ सामान्यतः अभिशाप होती है, वह हनुमान के लिए वरदान सिद्ध हुई। यदि उन्हें शाप न मिला होता, तो वे बालपन में ही अपनी शक्तियों के मद में चूर हो सकते थे। शाप ने उन्हें सदा दूसरों पर निर्भर और विनम्र बनाए रखा।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि वास्तविक बल विनम्रता में है। शक्ति का अहंकार विनाश का कारण बनता है, किन्तु विनम्रता और सेवा-भाव ही सच्ची महानता प्रदान करते हैं।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे एकचत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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