उत्तर काण्ड अध्याय 40

अगस्त्य ऋषि द्वारा राम को हनुमान् और उनके जीवन की कहानी बताना

अगस्त्य ऋषि राम को हनुमान के जन्म, बाल्यकाल की घटनाओं, शाप और वरदान तथा उनके अद्भुत कार्यों का विस्तार से वर्णन करते हैं।

विवरण

राम की उत्सुकता पर अगस्त्य ऋषि हनुमान के विषय में बताने लगे। उन्होंने कहा – हनुमान के पिता केसरी थे और माता अंजना। वे वायुदेव के पुत्र भी कहे जाते हैं, क्योंकि वायु ने उनके जन्म में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाल्यकाल में हनुमान ने सूर्य को फल समझकर उसे पकड़ने की इच्छा की और आकाश में छलाँग लगा दी। इन्द्र ने उन पर वज्र प्रहार किया, जिससे उनकी ठुड्डी (हनु) टेढ़ी हो गई। तब वायुदेव ने संकट में आकर सारी वायु रोक दी, जिससे सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगा। ब्रह्मा ने आकर हनुमान को अनेक वरदान दिए और वे अमर, अजेय, अत्यन्त बलशाली हुए। अगस्त्य ने आगे बताया कि हनुमान ने राम के कार्य में किस प्रकार सहायता की, यद्यपि वह कथा राम स्वयं जानते हैं। यह सर्ग हनुमान के चरित्र का गुणगान करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ४०

(अगस्त्य ऋषि द्वारा राम को हनुमान् की कथा सुनाना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम ने अगस्त्य ऋषि से हनुमान के विषय में जानने की इच्छा प्रकट की। तब अगस्त्य जी ने हनुमान के जन्म, बाल-लीलाओं और वरदानों का विस्तार से वर्णन किया।

👶 हनुमान का जन्म (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
अगस्त्य उवाच – शृणु राम महाबाहो हनूमतो महात्मनः।
जन्म कर्म च दिव्यं च यथा वृत्तं पुरातनम्॥
अंजनायाः सुतः श्रीमान्केसरीति च विश्रुतः।
पिता तस्य महातेजा वानरेन्द्रः प्रतापवान्॥
वायुना तेज आधाय गर्भः संक्रामितस्तदा।
ततः स जज्ञे हनुमान्वायुपुत्रो महाबलः॥
जातमात्रे च तेजस्वी ववृधे सूर्यवर्चसा।
दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यगन्धानुलेपनः॥
📖 भावार्थ : अगस्त्य ऋषि ने कहा – “हे महाबाहो राम! सुनो, महात्मा हनुमान के जन्म, कर्म और दिव्य चरित्र का वर्णन करता हूँ। अंजना नामक अप्सरा के गर्भ से उत्पन्न हुए हनुमान के पिता केसरी थे, जो एक प्रतापी वानरेन्द्र थे। कहा जाता है कि वायुदेव ने अपना तेज अंजना के गर्भ में स्थापित किया, जिससे हनुमान का जन्म हुआ और वे वायुपुत्र के नाम से प्रसिद्ध हुए। जन्म लेते ही वे अत्यन्त तेजस्वी थे और सूर्य के समान कान्ति से युक्त थे। उनके शरीर पर दिव्य माला, वस्त्र और चन्दन सुशोभित थे। वे बाल्यकाल से ही अलौकिक शक्तियों के धनी थे।”

☀️ सूर्य को पकड़ने का प्रयास (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
एकदा बालको भूत्वा फलार्थी गगनं ययौ।
सूर्यमुद्यन्तमालोक्य फलं मत्वा त्वरान्वितः॥
तस्यान्तिकं जिघृक्षुः स जवेन परमेण ह।
आरुरोह नभो वेगाद्वालखिल्यैरभिष्टुतः॥
तं दृष्ट्वा राहुणा सार्धं सूर्यश्चिन्तापरोऽभवत्।
राहुर्भयं समापन्नो निवेद्य सूर्यमाययौ॥
📖 भावार्थ : एक दिन बाल हनुमान फल खाने की इच्छा से आकाश की ओर दौड़े। उन्होंने उगते हुए सूर्य को देखा और समझा कि यह कोई पका हुआ फल है। वे उसे पकड़ने के लिए अत्यन्त वेग से आकाश में उड़ चले। उनके इस अद्भुत साहस को देखकर वालखिल्य ऋषियों ने उनकी स्तुति की। सूर्यदेव ने जब हनुमान को अपनी ओर आते देखा, तो वे चिन्तित हो गए। राहु, जो उस समय सूर्य पर ग्रहण लगाने आया था, वह भी हनुमान के वेग को देखकर भयभीत हो गया और सूर्य से बोला – “यह कोई बालक नहीं, अपितु महान तेजस्वी है, हमें यहाँ से हट जाना चाहिए।”

⚡ इन्द्र का वज्र प्रहार (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
इन्द्रस्तु समरं दृष्ट्वा क्रोधपर्याकुलेक्षणः।
वज्रं प्राहिणोद्बालं हनूमन्तं महाबलम्॥
स वज्रेण हनौ लग्नश्च्युतो भूमौ पपात ह।
हनुर्भग्ना तदा तस्य तेन हनुमान्स्मृतः॥
वायुः पुत्रवियोगेन चुकोप भृशदुःखितः।
निरुद्धवायुना लोकाः पीडिताः सकला अपि॥
📖 भावार्थ : इन्द्र ने यह सब देखा और समझा कि यह बालक अति उत्पाती है, अतः उसे रोकना चाहिए। उन्होंने क्रोध में आकर अपने वज्र का प्रहार हनुमान पर किया। वज्र हनुमान की ठुड्डी (हनु) पर लगा और वे पृथ्वी पर गिर पड़े। उनकी हनु टेढ़ी हो गई, इसी कारण उनका नाम ‘हनुमान’ पड़ा। जब वायुदेव को यह पता चला कि उनके पुत्र को वज्र मारा गया है, तो वे अत्यन्त क्रोधित हो गए। उन्होंने सारी वायु को रोक दिया, जिससे सम्पूर्ण लोकों में हाहाकार मच गया। प्राणियों का जीना दूभर हो गया, क्योंकि श्वास लेना भी कठिन हो गया।

🙏 ब्रह्मा का हस्तक्षेप और वरदान (श्लोक १६-२०)

॥ श्लोक १६-२० ॥
ततः सुराः सगन्धर्वा ब्रह्माणं शरणं ययुः।
वायुना पीडिता लोका रक्षस्वेति पुनः पुनः॥
ब्रह्मा प्राह तदा वायुं कोपं त्यज सुतप्रिय।
वरान्ददामि ते पुत्रे यान्कामयसि सुव्रत॥
वायुः प्राह यदि प्रीतो वरान्देहि पितामह।
अवध्यः सर्वभूतानां अजेयश्च भवेदिति॥
ब्रह्मा प्राह तथा लोकाः पालयिष्यन्ति ते सुतम्।
वरदानैरमेयात्मा हनूमान्वीर्यवान्भवेत्॥
📖 भावार्थ : तब सभी देवता, गन्धर्व, ऋषि-मुनि ब्रह्मा के पास गए और वायु के प्रकोप से रक्षा की प्रार्थना करने लगे। ब्रह्मा ने वायुदेव से कहा – “हे वायो! क्रोध त्यागो। मैं तुम्हारे पुत्र को मनचाहे वरदान देता हूँ।” वायु ने कहा – “यदि आप प्रसन्न हैं, तो मेरे पुत्र को सभी भूतों से अवध्य और अजेय बना दीजिए।” ब्रह्मा ने कहा – “ऐसा ही होगा। सभी देवता और लोक तुम्हारे पुत्र की रक्षा करेंगे।” तब इन्द्र ने भी वरदान दिया कि वज्र का प्रहार उनके लिए कल्याणकारी होगा और वे मृत्यु के पश्चात भी अमर रहेंगे। सूर्यदेव ने उन्हें अपने तेज का अंश दिया, यमराज ने रोगों से मुक्ति का वरदान दिया, वरुण ने जल में अजेयता का, और कुबेर ने धन-ऐश्वर्य का। इस प्रकार हनुमान को अनेक वरदान प्राप्त हुए।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🐵 हनुमान का दिव्य स्वरूप

हनुमान केवल एक वानर नहीं, बल्कि शिव के रुद्रावतार माने जाते हैं। उनका जन्म, बाल-लीलाएँ और वरदान उनके दिव्यत्व को सिद्ध करते हैं। वे बल, बुद्धि, विनय और भक्ति के प्रतिमूर्ति हैं।

🙌 भक्ति और सेवा का आदर्श

हनुमान ने अपने सारे वरदान और शक्तियाँ केवल राम की सेवा में लगा दीं। यह दर्शाता है कि सच्ची भक्ति में अहंकार नहीं होता। हनुमान ने कभी अपने बल का घमंड नहीं किया, बल्कि सदा राम के चरणों में समर्पित रहे।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें हनुमान के चरित्र से प्रेरणा लेनी चाहिए – निःस्वार्थ सेवा, विनम्रता, और ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम। हनुमान जैसी शक्ति पाने के लिए भक्ति और विनय आवश्यक हैं।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे चत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।