अर्जुन द्वारा रावण को मुक्त करना
रावण के बन्दी बनाए जाने के पश्चात महर्षि पुलस्त्य के अनुरोध पर अर्जुन उसे मुक्त करता है। रावण को अपनी गलती का अहसास होता है।
विवरण
रावण को बन्दी बनाकर अर्जुन ने उसे अपने महल के कारागार में डाल दिया। जब यह समाचार ब्रह्मा के पुत्र और रावण के पितामह महर्षि पुलस्त्य को मिला, तो वे चिन्तित हुए। पुलस्त्य ऋषि ने सोचा कि यदि रावण अधिक समय तक बन्दी रहा, तो उसका बल और प्रताप नष्ट हो जाएगा, जो ब्रह्मा के वरदान के प्रभाव को कम कर सकता है। अतः वे स्वयं महिष्मती गए और अर्जुन से रावण को छोड़ने का अनुरोध किया। अर्जुन ने ऋषि का सम्मान करते हुए तुरंत रावण को मुक्त कर दिया। रावण ने अर्जुन की वीरता की प्रशंसा की और उससे मित्रता का प्रस्ताव रखा। अर्जुन ने उसे उचित सलाह दी कि अहंकार न करे। इस प्रकार यह सर्ग रावण के बन्धन और मुक्ति का वर्णन करता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ३८
(अर्जुन द्वारा रावण को मुक्त करना)
🔆 प्रस्तावना : रावण को बन्दी बनाए जाने के बाद उसके पितामह पुलस्त्य ऋषि ने अर्जुन से उसे छोड़ने का आग्रह किया। आइए देखें कैसे रावण को मुक्ति मिली।
🔗 रावण का कारावास (श्लोक १-५)
निदधुः कारागारे तं बद्ध्वा रज्जुभिरायतैः॥
तत्र स्थितो दशग्रीवश्चिन्तयामास दुःखितः।
कथं मुक्तिर्भवेन्मह्यं को मामत्र विमोक्ष्यति॥
अर्जुनस्य प्रभावं च स्मृत्वा विस्मयमागतः।
नूनं सुरा न मर्त्याश्च न दानवगणा अपि॥
प्रभवन्ति रणे तस्य सहस्रबाहुना सह।
इति चिन्तापरो दीनस्तस्थौ कारागृहे तदा॥
🧘 पुलस्त्य का आगमन (श्लोक ६-१०)
श्रुत्वा रावणबन्धं तु महिष्मतीं समाययौ॥
ददर्श नगरीं दिव्यामर्जुनस्य महात्मनः।
प्रविश्यान्तःपुरं श्रीमानर्जुनं समुपस्थितः॥
अर्जुनश्चासनं दत्त्वा पूजयामास धर्मवित्।
पप्रच्छ कुशलं सर्वं पुलस्त्यं मुनिपुङ्गवम्॥
पुलस्त्यः प्राह राजेन्द्र कुशलं तव धीमतः।
बन्धनान्मोक्ष्यतां शीघ्रं रावणो दीनवत्सल॥
🕊️ अर्जुन द्वारा मुक्ति (श्लोक ११-१५)
करोमि तत्प्रसीद त्वं मुच्यते राक्षसेश्वरः॥
इत्युक्त्वा त्वरितो राजा रावणं कारगृहात्।
आनाय्य सन्मुखे तस्थौ प्रणम्य मुनिपुङ्गवम्॥
रावणोऽपि प्रणम्यैनं कृताञ्जलिरभाषत।
धन्योऽस्म्यनुगृहीतश्च यत्पुलस्त्योऽत्र मे गुरुः॥
अर्जुनं च प्रशंसन्सन्नमयामास मूर्धना।
अर्जुनस्त्वेनमालिङ्गय सान्त्वयामास राक्षसम्॥
गच्छ वत्स न ते कोपः सखा मे भव राक्षस।
इत्युक्त्वा प्रददौ मह्यं बहुरत्नं च रावणः॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🙏 गुरुजनों का सम्मान
अर्जुन ने पुलस्त्य ऋषि के एक वचन मात्र से रावण को मुक्त कर दिया। यह दर्शाता है कि वह गुरुजनों और ऋषियों का कितना आदर करता था। धर्मात्मा राजा के लिए ऋषियों की वाणी ही सर्वोच्च आदेश होती है।
🤝 शत्रु भी मित्र बन सकता है
रावण और अर्जुन के बीच घोर युद्ध हुआ, फिर भी अर्जुन ने उसे मुक्त कर मित्रता का हाथ बढ़ाया। यह सिखाता है कि उचित अवसर पर वैर त्यागकर मैत्री स्थापित करना भी श्रेयस्कर होता है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि बल का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए और गुरुजनों के आदेश का पालन करना चाहिए। साथ ही, क्षमा और उदारता से शत्रु भी मित्र बन सकता है।