उत्तर काण्ड अध्याय 37

अर्जुन (सहस्रबाहु) द्वारा रावण को बंदी बनाना

रावण के अहंकारपूर्ण व्यवहार से कुपित होकर सहस्रबाहु अर्जुन उसे युद्ध में परास्त करता है और बन्दी बना लेता है।

विवरण

रावण ने महिष्मती पहुँचकर सहस्रबाहु अर्जुन से मिलने की इच्छा प्रकट की। किन्तु अर्जुन अपनी रानियों के साथ नर्मदा के तट पर जल-क्रीड़ा में व्यस्त था। रावण ने उसका अपमान समझा और क्रोध में आकर उसकी सेना पर आक्रमण कर दिया। जब यह समाचार अर्जुन को मिला, तो वह क्रोधित होकर युद्ध-भूमि में आया। उसने अपनी हजार भुजाओं से अनेक अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग कर रावण को चारों ओर से घेर लिया। रावण ने बड़ी वीरता से युद्ध किया, किन्तु अर्जुन के बल के आगे वह टिक न सका। अर्जुन ने उसे बन्दी बनाकर अपनी राजधानी महिष्मती में कारागार में डाल दिया। यह घटना रावण के लिए अत्यन्त लज्जास्पद थी।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ३७

(अर्जुन द्वारा रावण को बन्दी बनाना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तत्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण के अहंकार और अर्जुन के अपमान ने युद्ध की भूमिका तैयार कर दी। अब देखते हैं कि कैसे हजार भुजाओं वाले वीर अर्जुन ने रावण को धूल चटाई।

⚡ रावण का अपमान और आक्रमण (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
रावणो दूतमुख्येन संदिश्यार्जुनमब्रवीत्।
राजा मिलितुमिच्छति सहस्रबाहुना सह॥
स तु क्रीडारतो दूतं प्रत्युवाच नृपोत्तमः।
गच्छ रावणमाख्याहि व्यग्रोऽहं नागमे पुनः॥
दूतः श्रुत्वा वचस्तस्य रावणाय न्यवेदयत्।
तच्छ्रुत्वा रावणः क्रुद्धो राक्षसान्समचोदयत्॥
हन्यतां दूष्यतां सर्वमर्जुनस्य बलं महत्।
इत्युक्त्वा राक्षसैः सार्धं नर्मदातीरमाययौ॥
🔹 पदच्छेद : रावणः = रावण; दूतमुख्येन = मुख्य दूत के द्वारा; संदिश्य = सन्देश भेजकर; अर्जुनम् = अर्जुन से; अब्रवीत् = कहा; राजा = राजा (रावण); मिलितुम् = मिलना; इच्छति = चाहता है; सहस्रबाहुना = सहस्रबाहु से; सह = साथ; सः = वह; तु = तो; क्रीडारतः = क्रीड़ा में लीन; दूतम् = दूत से; प्रत्युवाच = उत्तर दिया; नृपोत्तमः = राजश्रेष्ठ अर्जुन; गच्छ = जाओ; रावणम् = रावण से; आख्याहि = कहो; व्यग्रः = व्यस्त; अहम् = मैं; न = नहीं; आगमे = आ सकता; पुनः = अब; दूतः = दूत; श्रुत्वा = सुनकर; वचः = वचन; तस्य = उसका; रावणाय = रावण को; न्यवेदयत् = सुनाया; तत् = वह; श्रुत्वा = सुनकर; रावणः = रावण; क्रुद्धः = क्रोधित; राक्षसान् = राक्षसों को; समचोदयत् = उकसाया; हन्यताम् = मारो; दूष्यताम् = नष्ट करो; सर्वम् = सब; अर्जुनस्य = अर्जुन का; बलम् = बल; महत् = महान; इति = इस प्रकार; उक्त्वा = कहकर; राक्षसैः = राक्षसों के; सार्धम् = साथ; नर्मदातीरम् = नर्मदा तट पर; आययौ = आया।
📖 भावार्थ : रावण ने अपने प्रधान दूत को अर्जुन के पास भेजा और कहा कि वह सहस्रबाहु अर्जुन से मिलना चाहता है। उस समय अर्जुन अपनी रानियों के साथ नर्मदा नदी में जल-क्रीड़ा कर रहा था। उसने दूत को उत्तर दिया – “जाओ, रावण से कहो कि मैं इस समय व्यस्त हूँ, बाद में मिलूँगा।” दूत ने लौटकर रावण को यह बात बताई। रावण ने यह सुनकर उसे अपना अपमान समझा और क्रोध में भरकर राक्षसों को आदेश दिया – “अर्जुन की विशाल सेना का सर्वनाश कर दो।” यह कहकर वह स्वयं राक्षसों के साथ नर्मदा तट पर आक्रमण करने पहुँच गया। रावण के आक्रमण से वहाँ भयानक हाहाकार मच गया।

🗡️ युद्ध का आरम्भ (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
राक्षसैरर्जुनस्यैव सेना विद्राविता भृशम्।
हाहाकारो महानासीत्सैन्येषु समराजिरे॥
श्रुत्वा तदर्जुनः क्रोधात्स्वयमायान्महारणे।
ददर्श राक्षसान्सर्वान्हन्यमानान्स्वसैनिकान्॥
ततो धनुः समादाय सहस्रं बाहुभिर्विभुः।
अस्त्राणि विविधान्येव मुमोच राक्षसोपरि॥
विस्फुलिङ्गा विनिष्पेतुः शराणां समरे तदा।
राक्षसा भयसंविग्ना दुद्रुवुः सर्वतो दिशम्॥
📖 भावार्थ : रावण के राक्षसों ने अर्जुन की सेना पर जोरदार आक्रमण कर दिया। अर्जुन के सैनिक तितर-बितर हो गए और वहाँ हाहाकार मच गया। यह समाचार सुनते ही अर्जुन क्रोध में भरकर युद्ध-भूमि की ओर दौड़ा। उसने देखा कि उसके सैनिक राक्षसों द्वारा मारे जा रहे हैं। तब उसने अपनी हजार भुजाओं से धनुष उठाया और अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र राक्षसों पर बरसा दिए। उसके बाणों से निकली चिन्गारियाँ चारों ओर फैल गईं। राक्षस भयभीत होकर सभी दिशाओं में भागने लगे। रावण ने जब यह देखा, तो वह स्वयं युद्ध के लिए आगे बढ़ा। अर्जुन और रावण के बीच घमासान युद्ध छिड़ गया।

⚔️ रावण-अर्जुन युद्ध (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
रावणोऽपि महातेजा रथमास्थाय दानवः।
अर्जुनं प्रति चिक्षेप शक्तिं कनकभूषिताम्॥
तामापतन्तीं सहसा चिच्छेदार्जुन एव हि।
सहस्रबाहुभिर्बाणैः शतधा समकल्पयत्॥
ततः क्रुद्धो दशग्रीवो मायामास्थाय राक्षसीम्।
मुमोच विविधान्बाणान्वज्राशनिसमप्रभान्॥
न चार्जुनं विव्यथे ते शराः पुष्पमिवापतन्।
तस्य बाहुसहस्रेण प्रतिहन्यन्त सर्वशः॥
📖 भावार्थ : महातेजस्वी रावण ने रथ पर सवार होकर अर्जुन पर स्वर्ण-विभूषित शक्ति (एक शक्तिशाली अस्त्र) का प्रयोग किया। उसे आती देख अर्जुन ने अपनी सहस्र भुजाओं से अनगिनत बाण चलाकर उस शक्ति के सैकड़ों टुकड़े कर दिए। तब दशग्रीव रावण ने क्रोध में आकर राक्षसी माया का सहारा लिया और वज्र एवं अशनि के समान प्रभावशाली अनेक बाण चलाए। किन्तु अर्जुन के हजार भुजाओं द्वारा प्रतिहत होने के कारण वे बाण पुष्पों के समान उस पर बेअसर होकर गिरने लगे। रावण ने जब अपने सभी अस्त्र विफल होते देखे, तो वह बहुत निराश हुआ। अर्जुन का बल अद्वितीय था – उसकी हजार भुजाएँ एक साथ अनेक कार्य कर सकती थीं, जिससे रावण के लिए उसका मुकाबला करना असंभव हो गया।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🤲 अहंकार का पतन

रावण का अहंकार ही उसके पतन का कारण बना। उसने अर्जुन के व्यस्त होने को अपना अपमान समझा और बिना सोचे-समझे आक्रमण कर दिया। परिणामस्वरूप उसे बन्दी बनना पड़ा। यह घटना हमें सिखाती है कि क्रोध में लेकर किया गया कोई भी निर्णय हानिकारक हो सकता है।

💪 सहस्रबाहु का बल

अर्जुन के पास हजार भुजाएँ होने का अर्थ केवल शारीरिक बल नहीं, बल्कि अनेक कार्यों को एक साथ करने की क्षमता भी है। यह बताता है कि ईश्वर ने जिसे जैसी शक्ति दी है, उसका उपयोग धर्म के लिए करना चाहिए। अर्जुन ने अपने बल का दुरुपयोग नहीं किया, बल्कि रावण जैसे आततायी को परास्त कर न्याय किया।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि बल का घमंड करने वाला अंततः पराजित होता है। जो व्यक्ति धर्म और विनय के मार्ग पर चलता है, उसे विजय अवश्य मिलती है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे सप्तत्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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