रावण का नर्मदा नदी के तट पर जाना
रावण अपनी दिग्विजय यात्रा के दौरान नर्मदा नदी के रमणीय तट पर पहुँचता है। वहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य को देखकर वह मोहित हो जाता है और उसे सहस्रबाहु अर्जुन की राजधानी महिष्मती की झलक मिलती है।
विवरण
रावण ने समस्त देवताओं, दानवों और मनुष्यों को परास्त कर तीनों लोकों में अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया था। एक दिन वह अपने विमान पुष्पक में बैठकर भ्रमण करता हुआ नर्मदा नदी के तट पर उतरा। वहाँ के मनोरम दृश्य – स्वच्छ जल, बहुरंगे पुष्पों से लदे वृक्ष, कलरव करते पक्षी – ने उसे मुग्ध कर दिया। उसने वहीं अपनी सेना सहित डेरा डाला और विश्राम किया। सन्ध्या समय उसने दूर पर्वत श्रेणी पर एक दिव्य नगरी देखी – वह थी सहस्रबाहु अर्जुन की राजधानी महिष्मती। अर्जुन के यश और ऐश्वर्य की कथा वह पहले भी सुन चुका था। उसके मन में उस नगरी को देखने और वहाँ के राजा से भेंट करने की उत्सुकता जागी। यह सर्ग रावण के उसी आगमन और उसकी मानसिक उत्कंठा का वर्णन करता है, जो आगामी घटनाओं की भूमिका तैयार करता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ३६
(रावण का नर्मदा नदी के तट पर जाना)
🔆 प्रस्तावना : लंका के अधिपति रावण ने अपने बल से तीनों लोकों को जीत लिया था। एक बार वह अपने विमान से भ्रमण करता हुआ नर्मदा नदी के सुन्दर तट पर उतरा। यह सर्ग उस आगमन और वहाँ के सौन्दर्य का वर्णन करता है।
🏞️ नर्मदा तट पर आगमन (श्लोक १-५)
ददर्श रमणीयं देशं पुष्पितद्रुमसंकुलम्॥
नानाविहंगसंघुष्टं वानरैः करिभिर्वृतम्।
जलप्रपातबहुलं निर्मलाम्बुवहाश्रयम्॥
तस्य तीरे सुखं रात्रौ सह सेन्यो व्यवस्थितः।
प्रभाते सूर्यनाभासे दिशो दर्शयति स्फुटम्॥
ततो ददर्श दूरस्थां महिष्मतीं पुरीं शुभाम्॥
🏰 महिष्मती नगरी का दर्शन (श्लोक ६-१०)
पप्रच्छ सेन्यान्स्वान्सर्वान्कस्येयं नगरी शुभा॥
तेऽब्रुवन्नेष राजेन्द्र सहस्रबाहुरर्जुनः।
तस्येयं नगरी दिव्या महिष्मतीति विश्रुता॥
अनेन राज्ञा देवेन्द्राः सगन्धर्वा सचारणाः।
सर्व एव वशं नीता यस्य बाहुसहस्रकम्॥
श्रुत्वा रावणस्तद्वाक्यं चिन्तयामास राक्षसः।
कथमेनं समासाद्य वर्तेयं मन्त्रिभिः सह॥
गच्छध्वं त्वरिता दूताः सन्दिशध्वं नृपाय वै॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🌊 नर्मदा का महात्म्य
नर्मदा नदी का तट पवित्र और तपोभूमि माना गया है। रावण जैसे अहंकारी राक्षस का वहाँ आना और स्नान-पूजन करना दर्शाता है कि वह भी धार्मिक कर्मकाण्ड करता था, किन्तु उसके हृदय में अहंकार था। यह संकेत करता है कि केवल बाहरी आडम्बर से मुक्ति नहीं मिलती।
⚔️ अहंकार और विवेक
रावण का महिष्मती को देखकर पहले प्रशंसा करना और फिर उसे जीतने की लालसा करना उसके स्वभाव का परिचायक है। वह दूसरों के ऐश्वर्य को सहन नहीं कर पाता। किन्तु यहाँ उसने विवेक से काम लेते हुए पहले दूत भेजे, जो उसकी नीति-कुशलता को दर्शाता है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि किसी भी अज्ञात बलशाली का सामना करने से पूर्व उसकी पूरी जानकारी लेनी चाहिए और नीति-विवेक से काम लेना चाहिए। बिना सोचे-समझे आक्रमण करना विनाश का कारण बन सकता है।