उत्तर काण्ड अध्याय 36

रावण का नर्मदा नदी के तट पर जाना

रावण अपनी दिग्विजय यात्रा के दौरान नर्मदा नदी के रमणीय तट पर पहुँचता है। वहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य को देखकर वह मोहित हो जाता है और उसे सहस्रबाहु अर्जुन की राजधानी महिष्मती की झलक मिलती है।

विवरण

रावण ने समस्त देवताओं, दानवों और मनुष्यों को परास्त कर तीनों लोकों में अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया था। एक दिन वह अपने विमान पुष्पक में बैठकर भ्रमण करता हुआ नर्मदा नदी के तट पर उतरा। वहाँ के मनोरम दृश्य – स्वच्छ जल, बहुरंगे पुष्पों से लदे वृक्ष, कलरव करते पक्षी – ने उसे मुग्ध कर दिया। उसने वहीं अपनी सेना सहित डेरा डाला और विश्राम किया। सन्ध्या समय उसने दूर पर्वत श्रेणी पर एक दिव्य नगरी देखी – वह थी सहस्रबाहु अर्जुन की राजधानी महिष्मती। अर्जुन के यश और ऐश्वर्य की कथा वह पहले भी सुन चुका था। उसके मन में उस नगरी को देखने और वहाँ के राजा से भेंट करने की उत्सुकता जागी। यह सर्ग रावण के उसी आगमन और उसकी मानसिक उत्कंठा का वर्णन करता है, जो आगामी घटनाओं की भूमिका तैयार करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ३६

(रावण का नर्मदा नदी के तट पर जाना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षट्त्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : लंका के अधिपति रावण ने अपने बल से तीनों लोकों को जीत लिया था। एक बार वह अपने विमान से भ्रमण करता हुआ नर्मदा नदी के सुन्दर तट पर उतरा। यह सर्ग उस आगमन और वहाँ के सौन्दर्य का वर्णन करता है।

🏞️ नर्मदा तट पर आगमन (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततो रावणो दशग्रीवो नर्मदातीरमागतः।
ददर्श रमणीयं देशं पुष्पितद्रुमसंकुलम्॥
नानाविहंगसंघुष्टं वानरैः करिभिर्वृतम्।
जलप्रपातबहुलं निर्मलाम्बुवहाश्रयम्॥
तस्य तीरे सुखं रात्रौ सह सेन्यो व्यवस्थितः।
प्रभाते सूर्यनाभासे दिशो दर्शयति स्फुटम्॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; रावणः = रावण; दशग्रीवः = दशग्रीव; नर्मदातीरम् = नर्मदा के तट पर; आगतः = आया; ददर्श = देखा; रमणीयम् = मनोहर; देशम् = स्थान; पुष्पितद्रुमसंकुलम् = पुष्पों से युक्त वृक्षों से भरा; नानाविहंगसंघुष्टम् = अनेक पक्षियों से शोभित; वानरैः = बन्दरों से; करिभिः = हाथियों से; वृतम् = घिरा; जलप्रपातबहुलम् = जलप्रपातों से युक्त; निर्मलाम्बुवहाश्रयम् = निर्मल जल की धाराओं का आश्रय; तस्य = उसके; तीरे = तट पर; सुखम् = सुखपूर्वक; रात्रौ = रात में; सह सेन्यः = सेना सहित; व्यवस्थितः = ठहरा; प्रभाते = प्रभात में; सूर्यनाभासे = सूर्य के समान प्रकाशमान; दिशः = दिशाएँ; दर्शयति = दिखाई दीं; स्फुटम् = स्पष्ट।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात दशग्रीव रावण नर्मदा के तट पर पहुँचा। वहाँ उसने अत्यन्त रमणीय प्रदेश देखा, जो खिले हुए वृक्षों से भरा था। वह स्थान अनेक प्रकार के पक्षियों के कलरव से गुंजित था तथा बन्दरों और हाथियों के झुण्ड से युक्त था। अनेक जलप्रपात वहाँ शोभा बढ़ा रहे थे और निर्मल जल की धाराएँ बह रही थीं। उस तट पर रावण ने अपनी सेना के साथ सुखपूर्वक रात बिताई। प्रभात काल में जब सूर्य का प्रकाश फैला, तब चारों दिशाएँ स्पष्ट दिखाई देने लगीं। रावण ने उस मनोहर प्रदेश में भ्रमण करने का निश्चय किया। वह नर्मदा के पवित्र जल में स्नान करके देवताओं का पूजन करना चाहता था, किन्तु उसके मन में अपने बल का अहंकार भी था।
॥ श्लोक ५ ॥
स्नात्वा नद्यां विधानेन देवताभ्यर्चनं व्यधात्।
ततो ददर्श दूरस्थां महिष्मतीं पुरीं शुभाम्॥
🔹 पदच्छेद : स्नात्वा = स्नान करके; नद्याम् = नदी में; विधानेन = विधिपूर्वक; देवताभ्यर्चनम् = देवताओं का पूजन; व्यधात् = किया; ततः = तब; ददर्श = देखा; दूरस्थाम् = दूर स्थित; महिष्मतीम् = महिष्मती; पुरीम् = नगरी; शुभाम् = शुभ।
📖 भावार्थ : रावण ने नर्मदा में विधिपूर्वक स्नान किया और देवताओं का अर्चन किया। तब उसने दूर पर्वत श्रेणी पर स्थित शुभ महिष्मती नगरी देखी। वह नगरी अपने ऊँचे प्रासादों, स्वर्ण कलशों और फहराते ध्वजों के कारण अत्यन्त आकर्षक लग रही थी। रावण ने उसे देखकर जानना चाहा कि यह किस राजा की नगरी है। उसके मन में उस नगरी में जाने और वहाँ के राजा से मिलने की उत्सुकता उत्पन्न हुई। यह उत्सुकता ही आगे चलकर रावण और सहस्रबाहु अर्जुन के मध्य भीषण संघर्ष का कारण बनी। रावण के मन में अहंकार था कि उसने सभी दिशाओं पर विजय प्राप्त कर ली है, अतः उसे किसी भी राजा से कोई भय नहीं था। वह उस नगरी के ऐश्वर्य को देखकर उस पर अधिकार करने की लालसा भी करने लगा।

🏰 महिष्मती नगरी का दर्शन (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-९ ॥
तामालोक्य पुरीं रम्यां रावणो राक्षसाधिपः।
पप्रच्छ सेन्यान्स्वान्सर्वान्कस्येयं नगरी शुभा॥
तेऽब्रुवन्नेष राजेन्द्र सहस्रबाहुरर्जुनः।
तस्येयं नगरी दिव्या महिष्मतीति विश्रुता॥
अनेन राज्ञा देवेन्द्राः सगन्धर्वा सचारणाः।
सर्व एव वशं नीता यस्य बाहुसहस्रकम्॥
श्रुत्वा रावणस्तद्वाक्यं चिन्तयामास राक्षसः।
कथमेनं समासाद्य वर्तेयं मन्त्रिभिः सह॥
🔹 पदच्छेद : ताम् = उस; आलोक्य = देखकर; पुरीम् = नगरी; रम्याम् = रम्य; रावणः = रावण; राक्षसाधिपः = राक्षसों का स्वामी; पप्रच्छ = पूछा; सेन्यान् = सेनिकों से; स्वान् = अपने; सर्वान् = सबसे; कस्य = किसकी; इयम् = यह; नगरी = नगरी; शुभा = शुभ; ते = उन्होंने; अब्रुवन् = कहा; एषः = यह; राजेन्द्र = हे राजेन्द्र; सहस्रबाहुः = सहस्रबाहु; अर्जुनः = अर्जुन; तस्य = उसकी; इयम् = यह; नगरी = नगरी; दिव्या = दिव्य; महिष्मतीति = महिष्मती के नाम से; विश्रुता = विख्यात; अनेन = इस; राज्ञा = राजा द्वारा; देवेन्द्राः = इन्द्र आदि देवता; सगन्धर्वाः = गन्धर्वों सहित; सचारणाः = चारणों सहित; सर्वे = सभी; एव = ही; वशम् = वश में; नीताः = किये गए; यस्य = जिसके; बाहुसहस्रकम् = हजार भुजाएँ हैं; श्रुत्वा = सुनकर; रावणः = रावण; तत् = उनका; वाक्यम् = वचन; चिन्तयामास = चिन्ता करने लगा; राक्षसः = राक्षस; कथम् = कैसे; एनम् = इससे; समासाद्य = सामना करके; वर्तेय = व्यवहार करूँ; मन्त्रिभिः = मन्त्रियों के साथ।
📖 भावार्थ : उस रमणीय नगरी को देखकर राक्षसराज रावण ने अपने सेनानायकों से पूछा – “यह सुन्दर नगरी किसकी है?” तब उन्होंने बताया – “हे राजेन्द्र! यह सहस्रबाहु अर्जुन की नगरी है, जो महिष्मती नाम से विख्यात है। इस राजा ने अपनी हजार भुजाओं के बल से देवेन्द्र, गन्धर्व, चारण – सबको अपने वश में कर रखा है। उसके सामने कोई भी देवता या दानव नहीं ठहर सकता।” रावण ने यह सुनकर अपने मन में विचार किया कि उस अद्भुत बलशाली राजा से किस प्रकार मिला जाए। उसे अपने बल पर अत्यधिक गर्व था, फिर भी वह सहस्रबाहु के पराक्रम की कथा सुनकर कुछ सशंकित हो गया। उसने अपने मंत्रियों के साथ मंत्रणा करने का निश्चय किया कि क्या उस नगरी पर आक्रमण करना उचित होगा या फिर मित्रता का हाथ बढ़ाना चाहिए। इस प्रकार रावण के मन में दुविधा उत्पन्न हुई।
॥ श्लोक १० ॥
ततो मन्त्रिभिरामन्त्र्य युक्तियुक्तमुवाच ह।
गच्छध्वं त्वरिता दूताः सन्दिशध्वं नृपाय वै॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; मन्त्रिभिः = मन्त्रियों से; आमन्त्र्य = विचार-विमर्श कर; युक्तियुक्तम् = उचित तरीके से; उवाच = बोला; ह = भी; गच्छध्वम् = जाओ; त्वरिताः = शीघ्र; दूताः = दूत; सन्दिशध्वम् = सन्देश दो; नृपाय = राजा को; वै = ही।
📖 भावार्थ : रावण ने मन्त्रियों से विचार-विमर्श करके यह निर्णय किया कि पहले दूतों के माध्यम से अर्जुन से भेंट का प्रस्ताव भेजा जाए। उसने सोचा कि यदि अर्जुन ने उचित सम्मान नहीं किया तो फिर युद्ध का मार्ग अपनाया जा सकता है। उसने तुरन्त अपने दूतों को अर्जुन के पास भेजा, जो महिष्मती नगरी में प्रविष्ट हुए और राजा को रावण के आगमन की सूचना दी। इस प्रकार इस सर्ग में रावण की उत्सुकता, उसके विचार और दूत-प्रेषण का वर्णन है, जो आगामी सर्गों में रावण और अर्जुन के मध्य संघर्ष की भूमिका तैयार करता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🌊 नर्मदा का महात्म्य

नर्मदा नदी का तट पवित्र और तपोभूमि माना गया है। रावण जैसे अहंकारी राक्षस का वहाँ आना और स्नान-पूजन करना दर्शाता है कि वह भी धार्मिक कर्मकाण्ड करता था, किन्तु उसके हृदय में अहंकार था। यह संकेत करता है कि केवल बाहरी आडम्बर से मुक्ति नहीं मिलती।

⚔️ अहंकार और विवेक

रावण का महिष्मती को देखकर पहले प्रशंसा करना और फिर उसे जीतने की लालसा करना उसके स्वभाव का परिचायक है। वह दूसरों के ऐश्वर्य को सहन नहीं कर पाता। किन्तु यहाँ उसने विवेक से काम लेते हुए पहले दूत भेजे, जो उसकी नीति-कुशलता को दर्शाता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि किसी भी अज्ञात बलशाली का सामना करने से पूर्व उसकी पूरी जानकारी लेनी चाहिए और नीति-विवेक से काम लेना चाहिए। बिना सोचे-समझे आक्रमण करना विनाश का कारण बन सकता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे षट्त्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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