उत्तर काण्ड अध्याय 35

गौतम ऋषि द्वारा शक्र (इंद्र) को श्राप

इन्द्र गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या के रूप पर मोहित हो जाते हैं और छल से उनके पास जाते हैं। गौतम ऋषि को यह पता चल जाता है और वे क्रोधित होकर इन्द्र को श्राप देते हैं कि उनके शरीर पर हजार योनियाँ (भग) हो जाएँ। बाद में देवताओं की प्रार्थना पर यह श्राप आँखों के रूप में परिवर्तित हो जाता है, जिससे इन्द्र सहस्राक्ष कहलाते हैं।

विवरण

यह सर्ग इन्द्र के एक अत्यन्त प्रसिद्ध श्राप की कथा का वर्णन करता है। एक बार इन्द्र गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या के अद्वितीय सौन्दर्य पर मोहित हो गए। गौतम ऋषि के आश्रम से बाहर जाने पर, इन्द्र ने उनका वेश धारण करके अहल्या के पास जाने का प्रयास किया। अहल्या ने उन्हें पहचान लिया, किन्तु इन्द्र के प्रलोभन में आ गईं। जब गौतम ऋषि वापस लौटे, तो उन्हें यह बात पता चल गई। उन्होंने क्रोधित होकर अहल्या को श्राप दिया कि वह हजारों वर्षों तक निर्जन स्थान पर वायु-आहारा रहकर तप करें। इन्द्र को उन्होंने श्राप दिया कि उनके शरीर पर हजार योनियाँ (भग) हो जाएँ। देवता इससे व्याकुल हो गए और उन्होंने गौतम से प्रार्थना की। गौतम ने श्राप को कुछ हद तक कम कर दिया और वे योनियाँ आँखों के रूप में परिवर्तित हो गईं। इसी कारण इन्द्र का एक नाम सहस्राक्ष (हजार आँखों वाला) पड़ा। अहल्या को भी बाद में राम के चरण-स्पर्श से श्राप-मुक्ति मिली।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ३५

(गौतम ऋषि द्वारा इन्द्र को श्राप)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चत्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : यह सर्ग इन्द्र से सम्बन्धित एक अत्यन्त प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण कथा का वर्णन करता है – गौतम ऋषि का इन्द्र को श्राप। इसी श्राप के कारण इन्द्र को सहस्राक्ष कहा जाता है और अहल्या को श्राप मिलता है, जिससे उनका उद्धार बाद में राम के चरण-स्पर्श से होता है।

💕 इन्द्र का अहल्या पर मोहित होना (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततो देवगणाः सर्वे ब्रह्माणं समुपागताः।
इन्द्रस्य चरितं घोरं शशंसुः शोककर्शिताः॥
गौतमस्याश्रमे ब्रह्मन् अहल्या नाम योषिता।
तस्यां सक्तो दुराचार इन्द्रः पापसमन्वितः॥
गौतमस्य वपुः कृत्वा सहसा समुपागतः।
अहल्या च न जानाति इन्द्रमिति सुरेश्वरम्॥
गौतमश्च महातेजा आश्रमाद् बहिरेव च।
गतः कार्येण केनापि न जानाति सुरेश्वरम्॥
एवं वृत्तं महाभाग यथावत् कथितं मया।
इन्द्रस्य दुष्कृतं घोरं त्राहि नः शरणैषिणः॥
📖 भावार्थ : तब सभी देवता ब्रह्मा के पास गए और शोक से कृश होकर इन्द्र के उस भयंकर आचरण का वर्णन किया। उन्होंने कहा, "हे ब्रह्मन्! गौतम ऋषि के आश्रम में अहल्या नाम की एक स्त्री हैं। उस पर आसक्त होकर दुराचारी और पापी इन्द्र उसके पास गए। उन्होंने गौतम का रूप धारण किया और सहसा वहाँ पहुँच गए। अहल्या यह नहीं जान पाई कि यह इन्द्र हैं। गौतम महातेजस्वी ऋषि किसी कार्यवश आश्रम से बाहर गए हुए थे, इसलिए वे भी नहीं जान सके। हे महाभाग! यह सब घटना मैंने यथावत् कह दी। इन्द्र के इस भयंकर दुष्कर्म से हमें बचाइए, हम आपकी शरण में हैं।" यहाँ देवता स्वयं अपने राजा इन्द्र के इस घिनौने कृत्य से लज्जित और भयभीत थे। उन्होंने ब्रह्मा को यह बताकर उनसे हस्तक्षेप की प्रार्थना की।
॥ श्लोक ६-१० ॥
ब्रह्मा प्रोवाच देवान् स मा भैष्ट त्रिदशेश्वराः।
गच्छाम्यहं स्वयं तत्र यत्र गौतम आस्थितः॥
इत्युक्त्वा ब्रह्मा सहसा गौतमाश्रममागतः।
ददर्श तत्र गौतमं क्रोधसंरक्तलोचनम्॥
गौतमः प्राह ब्रह्माणं भगवन् शृणु मे वचः।
इन्द्रेण दुष्टचरितं कृतं मम वधूषु च॥
शप्तुमिच्छामि तं दुष्टं येन पापेन गर्वितः।
ब्रह्मा प्राह महाभाग गौतम शृणु मे वचः॥
📖 भावार्थ : ब्रह्मा ने देवताओं से कहा, "हे देवताओ! डरो मत। मैं स्वयं वहाँ जाता हूँ जहाँ गौतम ऋषि हैं।" ऐसा कहकर ब्रह्मा तुरंत गौतम के आश्रम पहुँचे। वहाँ उन्होंने गौतम को देखा, जिनकी आँखें क्रोध से लाल थीं। गौतम ने ब्रह्मा से कहा, "हे भगवन्! मेरी बात सुनो। इन्द्र ने मेरी पत्नी के साथ दुष्ट आचरण किया है। मैं उस दुष्ट को श्राप देना चाहता हूँ, जो पाप से गर्वित है।" ब्रह्मा ने कहा, "हे महाभाग गौतम! मेरी बात सुनो।" यहाँ गौतम का क्रोध स्वाभाविक था। उनके साथ सबसे बड़ा अपमान हुआ था। वे इन्द्र को श्राप देने के लिए कृतसंकल्प थे। ब्रह्मा ने उन्हें शान्त करने का प्रयास किया।

⚡ गौतम का श्राप और उसका परिवर्तन (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
गौतमः प्राह ब्रह्माणं शप्स्ये तं दुष्टचारिणम्।
इन्द्रं पापसमाचारं येन दुष्टेन गर्वितः॥
ब्रह्मा प्राह महाबाहो यदि शप्सि सुरेश्वरम्।
तथापि ते करिष्यामि यथा भवति साम्प्रतम्॥
गौतमः प्राह चेन्द्रं तु यस्मात् त्वं दुष्टचारिणः।
गतो मम वधूं द्रष्टुं तस्माच्छापं शृणुष्व मे॥
त्वं सहस्रभगो राजन् भविष्यसि न संशयः।
इन्द्रस्तु श्रुत्वा तच्छापं प्रज्वलन् क्रोधमूर्च्छितः॥
📖 भावार्थ : गौतम ने ब्रह्मा से कहा, "मैं उस दुष्ट आचरण वाले इन्द्र को श्राप दूँगा, जो पाप से गर्वित है।" ब्रह्मा ने कहा, "हे महाबाहो! यदि तुम सुरेश्वर को श्राप देना ही चाहते हो, तो भी मैं कुछ ऐसा करूँगा जो अभी उचित हो।" गौतम ने इन्द्र से कहा, "तूने दुष्ट आचरण किया और मेरी पत्नी के पास गया। इसलिए मेरा श्राप सुन। हे राजन्! तू सहस्र भग (हजार योनियों) वाला हो जाएगा, इसमें संशय नहीं।" इन्द्र ने वह श्राप सुना तो वह क्रोध से जल उठा। यहाँ गौतम ने इन्द्र को भयंकर श्राप दिया। सहस्रभग का अर्थ था उनके शरीर पर हजारों योनियाँ (स्त्री-चिह्न) हो जाना, जो अत्यन्त अपमानजनक था। इन्द्र के लिए यह बहुत बड़ा दण्ड था।
॥ श्लोक १६-२० ॥
ब्रह्मा प्रोवाच गौतमं प्रसीद भगवन् मुने।
इन्द्रस्य दुष्कृतं घोरं दग्धुं शापेन तेऽनघ॥
तथापि देहि चैतस्य मोक्षं शापात् सुदारुणात्।
गौतमः प्राह ब्रह्माणं न शक्यं मे वचोऽन्यथा॥
यदि त्वं ब्रह्मन् प्रार्थयसे तथापि स्याद् यथा तथा।
भविष्यन्ति सहस्राक्षो भगास्तस्य तु ये मया॥
दत्तास्ते यान्तु वै नाशं नेत्राण्येव भवन्तु तु।
इत्युक्त्वा गौतमो राजन् जगाम तपसे वनम्॥
📖 भावार्थ : ब्रह्मा ने गौतम से कहा, "हे भगवन् मुने! प्रसन्न होइए। आपके श्राप से इन्द्र के इस भयंकर दुष्कर्म का नाश हो गया। फिर भी इस भयानक श्राप से इसे मुक्ति प्रदान करें।" गौतम ने ब्रह्मा से कहा, "हे ब्रह्मन्! मेरे वचन को अन्यथा करना सम्भव नहीं है। यदि आप प्रार्थना करते हैं, तो ऐसा हो सकता है। मेरे द्वारा दिए गए जो भग हैं, वे नष्ट हो जाएँ और उनके स्थान पर नेत्र (आँखें) हो जाएँ।" ऐसा कहकर गौतम तपस्या करने के लिए वन को चले गए। ब्रह्मा की प्रार्थना पर गौतम ने श्राप को कुछ हद तक कम कर दिया। अब इन्द्र के शरीर पर हजारों योनियों के स्थान पर हजारों आँखें हो गईं। इसी कारण इन्द्र का एक नाम सहस्राक्ष (हजार आँखों वाला) पड़ा।

👁️ इन्द्र का सहस्राक्ष नाम और अहल्या का श्राप (श्लोक २१-२५)

॥ श्लोक २१-२५ ॥
इन्द्रः सहस्रनेत्रस्तु बभूव किल भारत।
अहल्यां च शशापाथ गौतमः कोपमूर्च्छितः॥
त्वं चिरं तप आस्थाय वायुभक्षा निराश्रया।
गुहायां वस राजेन्द्र यावद् रामो महायशाः॥
समागत्य तु ते शापं मोक्षयिष्यति नान्यथा।
इत्युक्त्वा गौतमो राजन् जगाम तपसे वनम्॥
अहल्या च तथा चक्रे गौतमस्य वचो यथा।
रामेण समनुप्राप्ता मोक्षं शापात् सुदारुणात्॥
एतत्ते सर्वमाख्यातं यथा वृत्तं पुरातनम्।
इन्द्रस्य गौतमाच्छापं सहस्राक्षत्वमेव च॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार इन्द्र सहस्रनेत्र (हजार नेत्रों वाले) हो गए। हे भारत! फिर गौतम ने क्रोध से मूर्च्छित होकर अहल्या को भी श्राप दिया। उन्होंने कहा, "तू दीर्घकाल तक तपस्या कर, वायुभक्षा रह, निराश्रय होकर किसी गुफा में रह। हे राजेन्द्र! जब तक महायशस्वी राम न आएँ। वे आकर ही तेरे श्राप को मुक्त करेंगे, अन्यथा नहीं।" ऐसा कहकर गौतम तपस्या करने वन को चले गए। अहल्या ने गौतम के वचन का पालन किया और बाद में राम के चरण-स्पर्श से उन्हें उस भयंकर श्राप से मुक्ति मिली। हे राम! मैंने तुम्हें वह सब बता दिया, जैसा पूर्वकाल में हुआ था – इन्द्र को गौतम से मिला श्राप और उनका सहस्राक्षत्व। यह कथा बालकाण्ड से जुड़ी हुई है, जहाँ राम ने अहल्या का उद्धार किया था। यह सर्ग इन्द्र के चरित्र के एक दोषपूर्ण पक्ष को दर्शाता है और यह भी कि श्राप का प्रभाव कितना गहरा होता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👁️ इन्द्र का सहस्राक्ष नाम

इस सर्ग में इन्द्र के सहस्राक्ष नाम की उत्पत्ति की कथा है। गौतम के श्राप से उनके शरीर पर हजार योनियाँ हो गईं, जो ब्रह्मा की प्रार्थना पर हजार आँखों में बदल गईं। यह नाम उनके इसी श्राप का स्मारक है।

🧘 अहल्या का श्राप और उद्धार

अहल्या को मिला श्राप और राम द्वारा उनका उद्धार रामायण की एक महत्वपूर्ण घटना है। यह सर्ग उस घटना की पृष्ठभूमि तैयार करता है। अहल्या का उद्धार यह दर्शाता है कि राम में पापियों का भी उद्धार करने की शक्ति है।

⚡ श्राप की शक्ति

इस सर्ग में श्राप की शक्ति का प्रदर्शन हुआ है। गौतम ऋषि के श्राप से इन्द्र जैसा देवराज भी विकृत रूप धारण करने को विवश हो गया। यह दर्शाता है कि तपस्वियों का श्राप अत्यन्त प्रबल होता है।

💔 इन्द्र का पतन

यह सर्ग इन्द्र के पतन की कथा है। देवराज होते हुए भी वे कामवश अपने जैसे महान ऋषि की पत्नी पर बुरी दृष्टि डालते हैं और श्रापित होते हैं। यह दर्शाता है कि पद चाहे कितना भी ऊँचा हो, दुराचार का दण्ड अवश्य मिलता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से यह शिक्षा मिलती है कि पद और शक्ति के मद में आकर मनुष्य को दुराचार नहीं करना चाहिए। इन्द्र जैसे देवराज को भी अपने कर्मों का दण्ड भोगना पड़ा। साथ ही, यह भी सीख मिलती है कि सच्चे हृदय से पश्चाताप करने पर और राम जैसे महापुरुष की कृपा से मुक्ति सम्भव है, जैसा कि अहल्या के उद्धार में दिखाया गया है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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