विश्रवा का कुबेर (धन के रक्षक) के पिता बनना

विश्रवा ऋषि की तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा उन्हें वरदान देते हैं कि उनके पुत्र कुबेर का जन्म होगा। कुबेर आगे चलकर धन के अधिपति और लंका के स्वामी बनते हैं।

विवरण

इस सर्ग में अगस्त्य ऋषि विश्रवा के पुत्र कुबेर के जन्म की कथा सुनाते हैं। विश्रवा ने पुलस्त्य के आशीर्वाद और अपनी तपस्या से ब्रह्मा को प्रसन्न किया। ब्रह्मा ने प्रकट होकर उन्हें वरदान दिया कि उनके घर एक अद्वितीय पुत्र जन्म लेगा। उस पुत्र का नाम कुबेर रखा गया। कुबेर ने भी बाल्यकाल से ही कठोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उन्हें धन का अधिपति, यक्षराज और लंका का स्वामी बना दिया। कुबेर को पुष्पक विमान भी प्राप्त हुआ। इस सर्ग में कुबेर की महिमा और उनके ऐश्वर्य का विस्तार से वर्णन है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ३

(विश्रवा का कुबेर के पिता बनना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ तृतीयः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पिछले सर्ग में विश्रवा के जन्म और तपस्या का वर्णन था। अब अगस्त्य ऋषि राम को बताते हैं कि कैसे विश्रवा को ब्रह्मा से वरदान मिला और उनके पुत्र कुबेर का जन्म हुआ, जो आगे चलकर धन के देवता बने।

📜 श्लोक १-५ : ब्रह्मा का विश्रवा को वरदान

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः स विश्रवा राजन् तपस्तेपे सुदारुणम्।
दिव्यं वर्षसहस्रं तु स्थाणुभूतो जितेन्द्रियः॥
तस्य तुष्टोऽभवद्ब्रह्मा लोककर्ता स्वयम्भुवः।
उवाच च महातेजा वरदोऽस्मीति तं मुनिम्॥
विश्रवाः प्राञ्जलिर्भूत्वा प्रणिपत्य पितामहम्।
वव्रे पुत्रं महाभागं सर्वलोकनमस्कृतम्॥
ब्रह्मा प्राह ततो वत्स भविष्यति तवात्मजः।
कुबेर इति विख्यातो धनाध्यक्षो महायशाः॥
यक्षराजो महातेजाः पुष्पकेण चरिष्यति।
एवं वरं प्रदायैव ब्रह्मा लोकपितामहः॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; सः = वह; विश्रवा = विश्रवा; राजन् = हे राजन् (राम); तपः = तपस्या; तेपे = की; सुदारुणम् = अत्यन्त दारुण; दिव्यम् = दिव्य; वर्षसहस्रम् = हजारों वर्षों तक; तु = तो; स्थाणुभूतः = स्थिर; जितेन्द्रियः = जितेन्द्रिय; तस्य = उनसे; तुष्टः = प्रसन्न; अभवत् = हुए; ब्रह्मा = ब्रह्मा; लोककर्ता = लोकों के कर्ता; स्वयम्भुवः = स्वयम्भू; उवाच = बोले; च = और; महातेजाः = महातेजस्वी; वरदः = वरदाता; अस्मि = हूँ; इति = ऐसा; तम् = उस; मुनिम् = मुनि से; विश्रवाः = विश्रवा; प्राञ्जलिः = हाथ जोड़कर; भूत्वा = होकर; प्रणिपत्य = प्रणाम करके; पितामहम् = पितामह ब्रह्मा को; वव्रे = माँगा; पुत्रम् = पुत्र; महाभागम् = महान भाग्यशाली; सर्वलोकनमस्कृतम् = सभी लोकों द्वारा नमस्कृत; ब्रह्मा = ब्रह्मा; प्राह = बोले; ततः = तब; वत्स = हे वत्स; भविष्यति = होगा; तव = तुम्हारा; आत्मजः = पुत्र; कुबेरः = कुबेर; इति = इस प्रकार; विख्यातः = विख्यात; धनाध्यक्षः = धन के अधिपति; महायशाः = महान यशस्वी; यक्षराजः = यक्षों का राजा; महातेजाः = महान तेजस्वी; पुष्पकेण = पुष्पक विमान से; चरिष्यति = विचरण करेगा; एवम् = इस प्रकार; वरम् = वरदान; प्रदाय = देकर; एव = ही; ब्रह्मा = ब्रह्मा; लोकपितामहः = लोकपितामह।
📖 भावार्थ : अगस्त्य ऋषि राम से कहते हैं – हे राजन्, उसके बाद विश्रवा ने और भी घोर तपस्या की। वे हजारों वर्षों तक स्थिर खड़े रहे और इन्द्रियों को वश में रखा। उनकी इस तपस्या से लोकों के कर्ता स्वयम्भू ब्रह्मा अत्यन्त प्रसन्न हुए। वे प्रकट होकर बोले – 'मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, वरदान माँगो।' तब विश्रवा ने हाथ जोड़कर पितामह ब्रह्मा को प्रणाम किया और पुत्र रूप में ऐसे पुत्र की याचना की जो समस्त लोकों में पूजित हो। ब्रह्मा ने कहा – 'हे वत्स, तुम्हारे यहाँ कुबेर नामक पुत्र उत्पन्न होगा। वह धन का अधिपति, यक्षों का राजा और महान यशस्वी होगा। वह पुष्पक विमान पर विचरण करेगा।' इस प्रकार ब्रह्मा ने विश्रवा को यह अनुपम वरदान दिया। यह वरदान इस बात का सूचक है कि तपस्या के बल पर व्यक्ति न केवल अपना कल्याण कर सकता है, बल्कि संतान को भी दिव्य ऐश्वर्य प्रदान कर सकता है।

📜 श्लोक ६-१० : कुबेर का जन्म और बाल्यकाल

॥ श्लोक ६-१० ॥
ततः कालेन महता विश्रवसो महात्मनः।
पत्न्यां पुत्रो महाभागः कुबेरः समजायत॥
स बाल एव धर्मज्ञः पितृभक्तः शुचिस्मितः।
वेदाभ्यासरतो नित्यं ब्रह्मचर्यपरायणः॥
पितुः शुश्रूषणे युक्तो मातरि प्रियवादिनि।
सर्वभूतहिते युक्तो दानधर्मरतः सदा॥
तस्य वृत्तेन सन्तुष्टो विश्रवा मुनिसत्तमः।
आशीर्वादान् ददौ प्रीतः पुत्रस्नेहसमन्वितः॥
त्वं पुत्र धनदो लोके भविष्यसि न संशयः।
यक्षाधिपत्यमैश्वर्यं प्राप्स्यसे चाक्षयं ध्रुवम्॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; कालेन = काल से; महता = बहुत; विश्रवसः = विश्रवा के; महात्मनः = महात्मा; पत्न्याम् = पत्नी में; पुत्रः = पुत्र; महाभागः = महाभाग; कुबेरः = कुबेर; समजायत = उत्पन्न हुआ; सः = वह; बालः = बालक; एव = ही; धर्मज्ञः = धर्मज्ञ; पितृभक्तः = पिता का भक्त; शुचिस्मितः = पवित्र मुस्कान वाला; वेदाभ्यासरतः = वेद के अध्ययन में रत; नित्यम् = नित्य; ब्रह्मचर्यपरायणः = ब्रह्मचर्य में तत्पर; पितुः = पिता की; शुश्रूषणे = सेवा में; युक्तः = लगा हुआ; मातरि = माता के प्रति; प्रियवादिनि = प्रिय बोलने वाला; सर्वभूतहिते = सभी प्राणियों के हित में; युक्तः = लगा हुआ; दानधर्मरतः = दान और धर्म में रत; सदा = सदा; तस्य = उसके; वृत्तेन = आचरण से; सन्तुष्टः = सन्तुष्ट; विश्रवा = विश्रवा; मुनिसत्तमः = मुनिश्रेष्ठ; आशीर्वादान् = आशीर्वाद; ददौ = दिए; प्रीतः = प्रसन्न होकर; पुत्रस्नेहसमन्वितः = पुत्र-स्नेह से युक्त; त्वम् = तुम; पुत्र = हे पुत्र; धनदः = धन देने वाला; लोके = लोक में; भविष्यसि = होओगे; न संशयः = कोई संशय नहीं; यक्षाधिपत्यम् = यक्षों के अधिपति का पद; ऐश्वर्यम् = ऐश्वर्य; प्राप्स्यसे = प्राप्त करोगे; च = और; अक्षयम् = अक्षय; ध्रुवम् = निश्चित।
📖 भावार्थ : ब्रह्मा के वरदान के अनुसार, बहुत समय बाद महात्मा विश्रवा की पत्नी के गर्भ से महाभाग पुत्र कुबेर का जन्म हुआ। बाल्यकाल से ही कुबेर धर्मज्ञ, पिता का भक्त, पवित्र मुस्कान वाला, वेदाध्ययन में रत और ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला था। वह पिता की सेवा में तत्पर रहता, माता से प्रिय बोलता, सभी प्राणियों के हित में लगा रहता और दान-धर्म में सदा रत रहता। उसके इस आचरण से विश्रवा ऋषि अत्यन्त प्रसन्न हुए। पुत्र-स्नेह से प्रेरित होकर उन्होंने कुबेर को आशीर्वाद दिया – 'हे पुत्र! तुम इस लोक में धनद (धन देने वाले) कहलाओगे। तुम्हें यक्षों के अधिपति का पद और अक्षय ऐश्वर्य निश्चित रूप से प्राप्त होगा।' यह आशीर्वाद आगे चलकर सत्य हुआ। कुबेर ने अपने बाल्यकाल के इन गुणों के कारण ही ब्रह्मा सहित सभी देवताओं की कृपा प्राप्त की। यह भाग दर्शाता है कि बचपन से ही संस्कार और धर्मपरायणता व्यक्ति के भविष्य को उज्ज्वल बनाते हैं।

📜 श्लोक ११-१५ : कुबेर की तपस्या और ऐश्वर्य प्राप्ति

॥ श्लोक ११-१५ ॥
स कदाचिद्वनं गत्वा तपस्तेपे सुदारुणम्।
वर्षाणामयुतं साग्रं स्थाणुभूतो जितेन्द्रियः॥
तस्य तुष्टोऽभवद्ब्रह्मा वरदो वै स्वयम्भुवः।
उवाच च महातेजा वरं वरय पुत्रक॥
कुबेरः प्राञ्जलिर्भूत्वा वव्रे धनाधिपत्यताम्।
यक्षराज्यमनुपमं लोकपालपदं तथा॥
ब्रह्मा प्राह ततो राजन् भविष्यति तवेप्सितम्।
धनाध्यक्षो भवान् लोके यक्षराजश्च पुष्पकः॥
लङ्का चेयं पुरी रम्या निवासार्थं प्रदीयते।
एवं वरं समासाद्य कुबेरः प्रत्यपद्यत॥
🔹 पदच्छेद : सः = वह; कदाचित् = किसी समय; वनम् = वन को; गत्वा = जाकर; तपः = तपस्या; तेपे = की; सुदारुणम् = अत्यन्त दारुण; वर्षाणाम् = वर्षों तक; अयुतम् = अयुत (दस हजार); साग्रम् = कुछ अधिक; स्थाणुभूतः = स्थिर खड़े होकर; जितेन्द्रियः = जितेन्द्रिय; तस्य = उससे; तुष्टः = प्रसन्न; अभवत् = हुए; ब्रह्मा = ब्रह्मा; वरदः = वरदाता; वै = निश्चय; स्वयम्भुवः = स्वयम्भू; उवाच = बोले; च = और; महातेजाः = महातेजस्वी; वरम् = वरदान; वरय = माँगो; पुत्रक = हे पुत्र; कुबेरः = कुबेर; प्राञ्जलिः = हाथ जोड़कर; भूत्वा = होकर; वव्रे = माँगा; धनाधिपत्यताम् = धनाधिपत्य; यक्षराज्यम् = यक्षराज्य; अनुपमम् = अनुपम; लोकपालपदम् = लोकपाल का पद; तथा = तथा; ब्रह्मा = ब्रह्मा; प्राह = बोले; ततः = तब; राजन् = हे राजन्; भविष्यति = होगा; तव = तुम्हारा; ईप्सितम् = इच्छित; धनाध्यक्षः = धन के अध्यक्ष; भवान् = आप; लोके = लोक में; यक्षराजः = यक्षराज; च = और; पुष्पकः = पुष्पक विमान; लङ्का = लंका; च = और; इयम् = यह; पुरी = पुरी; रम्या = रमणीय; निवासार्थम् = निवास के लिए; प्रदीयते = दी जाती है; एवम् = इस प्रकार; वरम् = वरदान; समासाद्य = पाकर; कुबेरः = कुबेर; प्रत्यपद्यत = प्राप्त किया।
📖 भावार्थ : कुबेर ने भी पिता के समान ही कठोर तपस्या करने का निश्चय किया। वे वन में गए और दस हजार वर्षों से भी अधिक समय तक स्थिर खड़े होकर, इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करते हुए, भयंकर तपस्या की। उनकी इस तपस्या से पुनः ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए और प्रकट होकर बोले – 'हे पुत्र, वरदान माँगो।' तब कुबेर ने हाथ जोड़कर धन के अधिपति पद, यक्षों के राज्य और लोकपालों में से एक पद पाने की इच्छा व्यक्त की। ब्रह्मा ने कहा – 'हे राजन्, तुम्हारी यह इच्छा पूर्ण होगी। तुम इस लोक में धनाध्यक्ष और यक्षराज कहलाओगे। तुम्हें पुष्पक विमान भी प्राप्त होगा। यह रमणीय लंका नगरी तुम्हें निवास के लिए दी जाती है।' इस प्रकार ब्रह्मा के वरदान से कुबेर को अपार ऐश्वर्य, लंका और पुष्पक विमान प्राप्त हुआ। आगे चलकर कुबेर ने लंका पर शासन किया और वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे। यह कथा दर्शाती है कि तपस्या और धर्म का पालन करने वाले व्यक्ति को देवताओं से विशेष वरदान प्राप्त होते हैं।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

💰 धन के देवता कुबेर

इस सर्ग में कुबेर के धनाधिपति बनने की कथा है। कुबेर को ब्रह्मा से वरदान मिला कि वे धन के अधिपति होंगे। यह दर्शाता है कि सच्ची तपस्या और धर्मपरायणता से ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

🏰 लंका का प्रथम शासक

कुबेर को लंका नगरी निवास के लिए मिली। बाद में रावण ने उनसे लंका छीन ली थी। यहाँ लंका के प्रथम अधिपति के रूप में कुबेर का उल्लेख महत्वपूर्ण है।

🕉️ पितृभक्ति और तपस्या

कुबेर ने बाल्यकाल में पिता की सेवा और ब्रह्मचर्य का पालन किया, फिर कठोर तपस्या करके वरदान प्राप्त किए। यह संदेश देता है कि संस्कार और तपस्या का फल अवश्य मिलता है।

✈️ पुष्पक विमान

पुष्पक विमान का उल्लेख पहली बार कुबेर के संदर्भ में आया। यह विमान आगे चलकर रावण के पास गया और फिर राम को प्राप्त हुआ।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि तपस्या, पितृभक्ति और धर्म के पालन से व्यक्ति देवताओं से भी वरदान प्राप्त कर सकता है। कुबेर की तरह हमें भी अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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