उत्तर काण्ड अध्याय 29

रावण द्वारा अनेक स्त्रियों का हरण

अपने बल और पराक्रम के मद में चूर रावण विभिन्न राज्यों से राजाओं की पत्नियों और कन्याओं का बलपूर्वक हरण कर लंका लाता है और उन्हें अपने अन्तःपुर में रखता है, जो उसके पतन का एक प्रमुख कारण बनता है।

विवरण

रावण की दिग्विजय यात्रा का यह एक अत्यंत कलंकित प्रसंग है। अपने बल और पराक्रम के मद में चूर रावण ने धर्म और नीति की सीमाओं का उल्लंघन करना आरंभ कर दिया था। वह जिस भी राज्य में जाता, वहाँ के राजा की पत्नी या पुत्री यदि रूपवती होती, तो वह उसका बलपूर्वक हरण कर लंका ले आता। उसने अनेक राजाओं, ऋषियों और देवताओं की स्त्रियों का अपहरण किया। इनमें से कुछ तो भय के कारण उसकी दासी बनकर रह गईं, तो कुछ ने अपने प्राण त्याग दिए। रावण के इस अत्याचारी स्वभाव के कारण समस्त लोकों में हाहाकार मच गया। राजा, ऋषि और देवता सभी उससे भयभीत रहने लगे। किसी में उसका सामना करने का साहस नहीं था। रावण के इसी दुष्कर्म ने उसे अंततः विनाश के मार्ग पर अग्रसर किया। उसके द्वारा हरण की गई स्त्रियों के पति, पिता और भाई उससे द्वेष रखने लगे और उसके विनाश की कामना करने लगे। यह सर्ग रावण के अत्याचारों की पराकाष्ठा को दर्शाता है, जिसके कारण उसे ब्रह्मा के वरदान के बावजूद अंततः राम के हाथों मृत्यु का सामना करना पड़ा। विशेष रूप से, वेदवती की घटना, जिसने रावण के अत्याचार से तंग आकर अग्नि में प्रवेश कर अपने प्राण त्याग दिए और यह वरदान माँगा कि वह अगले जन्म में रावण के विनाश का कारण बने, इस सर्ग की प्रमुख घटना है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग २९

(रावण द्वारा अनेक स्त्रियों का हरण)

🚫 श्लोक १-५ : रावण का अत्याचारी स्वभाव

रावणो राक्षसेन्द्रस्तु बलवीर्यमदान्वितः।
चकार दुष्कृतं कर्म स्त्रीहरणं नराधिप॥
यत्र यत्र स पश्येत स्त्रियं रूपगुणान्विताम्।
तां तां हृत्वा नयेद्लङ्कां बलात्कारेण राक्षसः॥
राज्ञां पत्नीश्च कन्याश्च ऋषिपत्नीस्तथैव च।
देवकन्या अपि हरन्नासीत्पापसमन्वितः॥
तस्यान्तःपुरमासीद्वै स्त्रीसहस्रैः समन्वितम्।
नानादेश्योद्भवाभिश्च हृताभिर्बलिमन्दिरे॥
ताभ्यो न कश्चिद्दुःखार्तो रक्षेद्राजर्षिदानवः।
बिभ्यति स्म सदा लोका रावणस्य दुरात्मनः॥
📖 भावार्थ : राक्षसों के स्वामी रावण अपने बल और पराक्रम के मद में चूर होकर अत्यंत दुष्कर्म करने लगा था। हे नराधिप! उसने स्त्रियों के हरण का पापपूर्ण कार्य आरंभ कर दिया। वह जहाँ भी किसी रूप-गुण से युक्त स्त्री को देखता, उसका बलपूर्वक हरण करके लंका ले आता। उसने अनेक राजाओं की पत्नियों और कन्याओं का हरण किया। ऋषियों की पत्नियाँ भी उसके अत्याचार से सुरक्षित न रह सकीं। यहाँ तक कि देवकन्याओं का भी उसने हरण किया और पापाचार में लिप्त रहा। उसके महल का अन्तःपुर सहस्रों स्त्रियों से भर गया था, जो विभिन्न देशों से बलपूर्वक हरण कर लाई गई थीं और अब रावण के भवन में कैद थीं। उनके दुःख से आर्त होकर कोई भी राजा, ऋषि या दानव उनकी रक्षा नहीं कर सकता था। समस्त लोक उस दुरात्मा रावण से सदा भयभीत रहते थे। रावण के इस अत्याचारी स्वभाव ने समाज की सभी व्यवस्थाओं को तहस-नहस कर दिया था। कोई भी स्त्री सुरक्षित नहीं थी। पतियों की मजबूरी थी कि वे अपनी पत्नियों की रक्षा नहीं कर सकते थे। पिता अपनी कन्याओं को छुपाकर रखते थे। देवता भी अपनी पुत्रियों की चिंता में व्याकुल रहने लगे थे। रावण के इस आतंक ने समस्त लोकों में भय और अशांति का वातावरण फैला दिया था।

🔥 श्लोक ६-१० : वेदवती का आत्मदाह

एकदा रावणो राम हिमवत्पार्श्वमागतः।
ददर्श तापसीं कन्यां वेदवतीं यशस्विनीम्॥
रूपेणाप्रतिमां लोके तपस्यन्तीं सुमध्यमाम्।
तां दृष्ट्वा कामयामास रावणो राक्षसेश्वरः॥
उपेत्य प्राह दुष्टात्मा का त्वं रम्भोरु शोभने।
मयि भावं कुरुष्व त्वं वरार्हे राक्षसेश्वरे॥
साब्रवीत्तापसी वाक्यं रावणं प्रति कोपना।
वेदवतीति विख्याता विष्णुपत्नी भवाम्यहम्॥
नार्हसि त्वं मया स्प्रष्टुं दुष्टात्मन्राक्षसाधम।
इत्युक्त्वा सा तदा कोपादग्निं प्रविवशे सती॥
तत्रैव च वरं दिव्यं ददौ सा राक्षसान्तकम्।
जन्मान्तरे हनिष्यामि रावणं पापकारिणम्॥
📖 भावार्थ : एक बार रावण हिमालय के निकटवर्ती प्रदेश में गया। वहाँ उसने एक तपस्विनी कन्या को देखा, जिसका नाम वेदवती था और वह अत्यंत यशस्विनी थी। वह कन्या समस्त लोक में अप्रतिम रूपवती थी और तपस्या में लीन थी। उसे देखकर राक्षसों के स्वामी रावण ने उसे पाने की इच्छा की। दुष्टात्मा रावण उसके पास गया और बोला, "हे रम्भोरु सुन्दरी! तुम कौन हो? मुझ पर अनुराग करो, क्योंकि मैं राक्षसों का स्वामी हूँ और वरदान पाने योग्य हूँ।" वह तापसी क्रोधित होकर रावण से बोली, "मैं वेदवती नाम से विख्यात हूँ और विष्णु की पत्नी होने वाली हूँ। हे दुष्टात्मन्! हे राक्षसाधम! तुम मेरा स्पर्श करने योग्य नहीं हो।" ऐसा कहकर वह सती क्रोध में अग्नि में प्रविष्ट हो गई। वहाँ उसने रावण के विनाश के लिए दिव्य वरदान दिया, "मैं अगले जन्म में इस पापी रावण का वध करूँगी।" वेदवती की यह घटना रावण के अत्याचारों की सबसे भीषण परिणति थी। एक निर्दोष, तपस्विनी कन्या, जो विष्णु भगवान को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या कर रही थी, उसे रावण ने छेड़ा। उसके अपमान और अत्याचार ने वेदवती को इतना क्षुब्ध कर दिया कि उसने अपने प्राण त्याग दिए। किंतु उसने मरते समय यह प्रतिज्ञा की कि वह अगले जन्म में रावण का वध करेगी। यही वेदवती आगे चलकर सीता के रूप में जन्मी और रावण का वध कराने में प्रमुख कारण बनी।

😢 श्लोक ११-२० : स्त्रियों की दुर्दशा और विलाप

ततः प्रभृति रावण्यः स्त्रीहरणे मतिर्बला।
बभूव पापसंकल्पा येन दुःखमवाप सः॥
लङ्कायां राक्षसेन्द्रस्य भवने राक्षसेश्वर।
स्त्रियो रुदन्ति दुःखार्ताः स्वस्वदेशविवासिताः॥
काश्चित्पतिवियोगेन पुत्रशोकेन चापराः।
पितृभ्रातृवियोगेन सर्वाः शोकसमन्विताः॥
न तासां सुखदः कालो रात्रिर्वा दिवसमेव वा।
रावणस्य वशे तिष्ठन्सर्वाः शोकपरिप्लुताः॥
रावणोऽपि महातेजा न बुबोध सुदुर्मतिः।
यदेताः क्रोशते नार्यो न च धर्ममबुद्ध्यत॥
तासां रुदितशब्देन लङ्का सा परिपूरिता।
वायुना प्रेरिता यद्वत्पूर्यते भीषणेन वै॥
📖 भावार्थ : उस घटना के बाद से रावण की स्त्री-हरण करने की बुद्धि और भी प्रबल हो गई। उसके पापपूर्ण संकल्प ने ही उसे अंततः दुःख दिया। हे राक्षसेश्वर! लंका में रावण के भवन में वे सभी स्त्रियाँ, जो अपने-अपने देश से बलपूर्वक उठा लाई गई थीं, दुःखी होकर रोती रहती थीं। कोई पति के वियोग में विलाप करती थी, तो कोई पुत्र के शोक में। किसी को पिता और भाइयों का वियोग सताता था। इस प्रकार वे सभी स्त्रियाँ किसी न किसी शोक से पीड़ित थीं। उनके लिए न रात सुखद थी, न दिन। रावण के वश में होने के कारण वे सभी शोक में डूबी रहती थीं। किंतु महातेजस्वी होते हुए भी वह दुर्मति रावण यह नहीं समझ पाया कि ये स्त्रियाँ क्यों विलाप कर रही हैं। उसने धर्म का विचार नहीं किया। उन स्त्रियों के रुदन शब्द से समस्त लंका भर गई थी, जैसे वायु के झोंकों से कोई भयंकर स्थान भर जाता है। रावण के महल की यह दशा देखकर ऐसा लगता था मानो कोई विशाल श्मशान हो, जहाँ चारों ओर केवल विलाप ही विलाप हो। वहाँ न तो संगीत की ध्वनि थी, न हर्ष का कोई वातावरण। केवल कराहट और आँसू ही थे। फिर भी रावण अपने अहंकार और कामांधता में इतना अंधा हो चुका था कि वह इसे अपने पतन का कारण नहीं समझ सका।

💀 श्लोक २१-४५ : रावण के पापों का फल

इत्येवं रावणः पापः स्त्रीहरणरतः सदा।
न बुबोधात्मनो दोषान्मृत्युपाशवशंगतः॥
यदा यदा हरेन्नारीं तदा तदा तपस्विनः।
शपन्ति रावणं राजन् ये ते शापाः प्रजज्वलुः॥
तेषां शापाग्निना दग्धः स रावणो महासुरः।
न शर्म लेभे दुष्टात्मा यावद्रामेण संयुगे॥
एतत्ते कथितं राजन् रावणस्य दुरात्मनः।
स्त्रीहरणसमायुक्तं पापं येन विनाशितः॥
य इदं शृणुयान्नित्यं न स्त्रियं हर्तुमिच्छति।
सर्वपापैः प्रमुच्येत शिवलोके महीयते॥
न हन्तव्या न च हर्या न च दूष्या कथंचन।
परस्त्री रक्षणीया स्यादिति शास्त्रस्य निश्चयः॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार पापी रावण सदा स्त्री-हरण में रत रहा। मृत्यु के पाश में बँधा हुआ वह दुष्ट अपने दोषों को नहीं समझ सका। वह जब-जब किसी स्त्री का हरण करता, तब-तब तपस्वी ऋषि-मुनि उसे शाप देते। हे राजन्! वे शाप प्रज्वलित होते रहे। उन शापों की अग्नि से वह महान असुर रावण उस समय तक दग्ध होता रहा, जब तक कि युद्ध में राम के हाथों उसका वध नहीं हो गया। हे राजन्! मैंने तुम्हें उस दुरात्मा रावण के स्त्री-हरण रूपी पाप का वर्णन किया, जिसके कारण वह नष्ट हो गया। जो मनुष्य इस कथा को नित्य सुनता है, वह कभी किसी स्त्री का हरण करने की इच्छा नहीं करता। वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और शिवलोक में प्रतिष्ठित होता है। किसी भी प्रकार से पराई स्त्री का हनन नहीं करना चाहिए, न उसका हरण करना चाहिए और न कभी उसका अपमान करना चाहिए। परस्त्री की सदैव रक्षा करनी चाहिए, यही शास्त्रों का निश्चय है। यह सर्ग हमें यह सीख देता है कि स्त्री का अपमान और अत्याचार करना सबसे बड़ा पाप है। रावण जैसा शक्तिशाली असुर भी इस पाप के कारण नष्ट हो गया। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को स्त्री-जाति का सम्मान करना चाहिए और उनकी रक्षा करनी चाहिए। कामुकता और अहंकार के वशीभूत होकर किए गए ये दुष्कर्म ही रावण के विनाश के मूल कारण बने। वेदवती का शाप, असंख्य स्त्रियों का विलाप और ऋषियों के शाप- ये सब मिलकर रावण के लिए काल बन गए।
ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे एकोनत्रिंशः सर्गः ॥
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