रावण द्वारा अनेक स्त्रियों का हरण
अपने बल और पराक्रम के मद में चूर रावण विभिन्न राज्यों से राजाओं की पत्नियों और कन्याओं का बलपूर्वक हरण कर लंका लाता है और उन्हें अपने अन्तःपुर में रखता है, जो उसके पतन का एक प्रमुख कारण बनता है।
विवरण
रावण की दिग्विजय यात्रा का यह एक अत्यंत कलंकित प्रसंग है। अपने बल और पराक्रम के मद में चूर रावण ने धर्म और नीति की सीमाओं का उल्लंघन करना आरंभ कर दिया था। वह जिस भी राज्य में जाता, वहाँ के राजा की पत्नी या पुत्री यदि रूपवती होती, तो वह उसका बलपूर्वक हरण कर लंका ले आता। उसने अनेक राजाओं, ऋषियों और देवताओं की स्त्रियों का अपहरण किया। इनमें से कुछ तो भय के कारण उसकी दासी बनकर रह गईं, तो कुछ ने अपने प्राण त्याग दिए। रावण के इस अत्याचारी स्वभाव के कारण समस्त लोकों में हाहाकार मच गया। राजा, ऋषि और देवता सभी उससे भयभीत रहने लगे। किसी में उसका सामना करने का साहस नहीं था। रावण के इसी दुष्कर्म ने उसे अंततः विनाश के मार्ग पर अग्रसर किया। उसके द्वारा हरण की गई स्त्रियों के पति, पिता और भाई उससे द्वेष रखने लगे और उसके विनाश की कामना करने लगे। यह सर्ग रावण के अत्याचारों की पराकाष्ठा को दर्शाता है, जिसके कारण उसे ब्रह्मा के वरदान के बावजूद अंततः राम के हाथों मृत्यु का सामना करना पड़ा। विशेष रूप से, वेदवती की घटना, जिसने रावण के अत्याचार से तंग आकर अग्नि में प्रवेश कर अपने प्राण त्याग दिए और यह वरदान माँगा कि वह अगले जन्म में रावण के विनाश का कारण बने, इस सर्ग की प्रमुख घटना है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग २९
(रावण द्वारा अनेक स्त्रियों का हरण)
🚫 श्लोक १-५ : रावण का अत्याचारी स्वभाव
चकार दुष्कृतं कर्म स्त्रीहरणं नराधिप॥
यत्र यत्र स पश्येत स्त्रियं रूपगुणान्विताम्।
तां तां हृत्वा नयेद्लङ्कां बलात्कारेण राक्षसः॥
राज्ञां पत्नीश्च कन्याश्च ऋषिपत्नीस्तथैव च।
देवकन्या अपि हरन्नासीत्पापसमन्वितः॥
तस्यान्तःपुरमासीद्वै स्त्रीसहस्रैः समन्वितम्।
नानादेश्योद्भवाभिश्च हृताभिर्बलिमन्दिरे॥
ताभ्यो न कश्चिद्दुःखार्तो रक्षेद्राजर्षिदानवः।
बिभ्यति स्म सदा लोका रावणस्य दुरात्मनः॥
🔥 श्लोक ६-१० : वेदवती का आत्मदाह
ददर्श तापसीं कन्यां वेदवतीं यशस्विनीम्॥
रूपेणाप्रतिमां लोके तपस्यन्तीं सुमध्यमाम्।
तां दृष्ट्वा कामयामास रावणो राक्षसेश्वरः॥
उपेत्य प्राह दुष्टात्मा का त्वं रम्भोरु शोभने।
मयि भावं कुरुष्व त्वं वरार्हे राक्षसेश्वरे॥
साब्रवीत्तापसी वाक्यं रावणं प्रति कोपना।
वेदवतीति विख्याता विष्णुपत्नी भवाम्यहम्॥
नार्हसि त्वं मया स्प्रष्टुं दुष्टात्मन्राक्षसाधम।
इत्युक्त्वा सा तदा कोपादग्निं प्रविवशे सती॥
तत्रैव च वरं दिव्यं ददौ सा राक्षसान्तकम्।
जन्मान्तरे हनिष्यामि रावणं पापकारिणम्॥
😢 श्लोक ११-२० : स्त्रियों की दुर्दशा और विलाप
बभूव पापसंकल्पा येन दुःखमवाप सः॥
लङ्कायां राक्षसेन्द्रस्य भवने राक्षसेश्वर।
स्त्रियो रुदन्ति दुःखार्ताः स्वस्वदेशविवासिताः॥
काश्चित्पतिवियोगेन पुत्रशोकेन चापराः।
पितृभ्रातृवियोगेन सर्वाः शोकसमन्विताः॥
न तासां सुखदः कालो रात्रिर्वा दिवसमेव वा।
रावणस्य वशे तिष्ठन्सर्वाः शोकपरिप्लुताः॥
रावणोऽपि महातेजा न बुबोध सुदुर्मतिः।
यदेताः क्रोशते नार्यो न च धर्ममबुद्ध्यत॥
तासां रुदितशब्देन लङ्का सा परिपूरिता।
वायुना प्रेरिता यद्वत्पूर्यते भीषणेन वै॥
💀 श्लोक २१-४५ : रावण के पापों का फल
न बुबोधात्मनो दोषान्मृत्युपाशवशंगतः॥
यदा यदा हरेन्नारीं तदा तदा तपस्विनः।
शपन्ति रावणं राजन् ये ते शापाः प्रजज्वलुः॥
तेषां शापाग्निना दग्धः स रावणो महासुरः।
न शर्म लेभे दुष्टात्मा यावद्रामेण संयुगे॥
एतत्ते कथितं राजन् रावणस्य दुरात्मनः।
स्त्रीहरणसमायुक्तं पापं येन विनाशितः॥
य इदं शृणुयान्नित्यं न स्त्रियं हर्तुमिच्छति।
सर्वपापैः प्रमुच्येत शिवलोके महीयते॥
न हन्तव्या न च हर्या न च दूष्या कथंचन।
परस्त्री रक्षणीया स्यादिति शास्त्रस्य निश्चयः॥