रावण और महापुरुष की भेंट
अपनी विजय यात्रा के दौरान रावण की भेंट एक महान तपस्वी महापुरुष से होती है, जो अत्यंत शांत और ज्ञानी हैं। रावण उनकी तपस्या और ज्ञान से प्रभावित होकर उनसे जीवन के रहस्यों को जानने का प्रयास करता है।
विवरण
रावण अपनी दिग्विजय के अभियान में एकांत वन क्षेत्र से गुजर रहा था। वहाँ उसने एक अत्यंत प्रभावशाली एवं तेजस्वी महापुरुष (महान ऋषि) को ध्यानमग्न अवस्था में देखा। उनके तेज से समस्त वन प्रकाशित हो रहा था, किंतु वे इंद्रियों के विषयों से पूर्णतः विरक्त थे। रावण, जो अब तक अपने बल के बल पर सभी को जीतता आया था, इस महापुरुष के सामने खड़ा हो गया। उसने सोचा कि यदि यह महापुरुष उसकी अधीनता स्वीकार नहीं करेगा, तो वह बल प्रयोग करेगा। किंतु जैसे ही उसने महापुरुष के पास जाने का प्रयास किया, उसके तेज ने उसे रोक दिया। रावण ने देखा कि उसके पुष्पक विमान की गति भी उस स्थान के निकट रुक गई। तब रावण ने अपने मंत्रियों से उस महापुरुष के बारे में पूछा। उसे ज्ञात हुआ कि वे कोई साधारण प्राणी नहीं, बल्कि एक महान योगी हैं, जिन्होंने अपनी तपस्या से समस्त लोकों को जीत रखा है। रावण ने उनके पास जाकर विनम्रतापूर्वक उनके दर्शन किए और उनसे जीवन, मृत्यु और मोक्ष के रहस्यों के बारे में पूछा। महापुरुष ने उसे उपदेश दिया कि सच्चा सुख भोग में नहीं, बल्कि त्याग और आत्मज्ञान में है। रावण उनके उपदेश से प्रभावित हुआ, किंतु उसका मोह और अहंकार इतना प्रबल था कि वह उनके मार्ग पर नहीं चल सका। फिर भी, उसने उनका सम्मान किया और उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग २८
(रावण और महापुरुष की भेंट)
🧘 श्लोक १-५ : महापुरुष के दर्शन
भ्रममाणो वनं गच्छन्नपश्यत् तपसां निधिम्॥
एकं महापुरुषं तत्र ध्यानस्थं परमेश्वरम्।
ज्वलन्तं ब्रह्मतेजोभिर्भासयन्तं दिशो दश॥
तस्य तेजोऽभिभूतस्तु रावणो विस्मयान्वितः।
न शशाक समागन्तुं तस्य समीपमन्तिके॥
विमानं पुष्पकं तस्य तत्रैव स्तम्भितं स्थितम्।
न चचालाग्रतः कर्तुं रावणस्य प्रयत्नतः॥
स मन्त्रिणोऽब्रवीद्राजा कोऽयं भगवानुत्तमः।
यस्य तेजोऽभिभूतोऽहं न शक्नोम्यन्तिकं गतः॥
🙏 श्लोक ६-१० : महापुरुष का परिचय
श्रूयतां राजशार्दूल कोऽयं भगवानिति॥
एष महापुरुषो नाम्ना विख्यातो महातपाः।
योगीश्वरो महादेवो ब्रह्मज्ञानपरायणः॥
एतेन तपसा लोकास्त्रयः सर्वे निवेशिताः।
नास्य शक्ताः समायातुं देवगन्धर्वदानवाः॥
एतस्य तेजसा व्याप्तं सर्वमेतच्चराचरम्।
नैनं योद्धुं क्षमः कश्चित्त्रैलोक्ये सचराचरे॥
तस्मात्त्वं संयतो भूत्वा प्रसादय महामुनिम्।
अनेन प्रसृते राजन् कार्यसिद्धिर्भविष्यति॥
📿 श्लोक ११-२० : रावण का संवाद और उपदेश
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा प्रणनाम मुहुर्मुहुः॥
उत्थाय च महातेजा मुनिः प्राह कृपान्वितः।
वत्स रावण भद्रं ते वरं वरय सुव्रत॥
रावणः प्राह धर्मज्ञ ज्ञातुमिच्छामि तत्त्वतः।
जीवितस्य च मृत्योश्च मोक्षस्य च सनातनम्॥
मुनिः प्राह महातेजा रावणं राक्षसेश्वरम्।
शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि यत्त्वं पृच्छसि सांप्रतम्॥
जीवितं नाम दुःखानां भोगानां च निदर्शनम्।
मृत्युश्चापि तथा दुःखं जन्मनो मरणान्तिकम्॥
मोक्षस्तु परमं स्थानं यत्र गत्वा न शोचति।
यत्र नित्यं सुखं शान्तिर्यत्र नास्ति जराभयम्॥
स मोक्षो लभ्यते राजन् ज्ञानेन तपसा तथा।
वैराग्येण च धर्मेण सेवितव्यः सदा बुधैः॥
त्वं तु राजन् महाबाहो मोहितो मदरागिणा।
न शक्नोषि गतिं गन्तुं मोक्षस्य परमात्मनः॥
🔚 श्लोक २१-४० : आशीर्वाद एवं प्रस्थान
रावणः प्रणतो भूत्वा पुनः प्राह कृताञ्जलिः॥
भगवन् यदि मे कारुण्यं कुरुष्व तपसां निधे।
आशीर्वादं प्रयच्छस्व येन मे धर्मवृद्धये॥
मुनिः प्राह महातेजा रावणं प्रणतं तदा।
गच्छ राजन् यथाकामं धर्मस्ते वर्धतां सदा॥
यद्यपि त्वं महाभाग कर्मणा राक्षसाधमः।
तथापि ते भविष्यन्ति कीर्तिर्विक्रम एव च॥
इत्युक्त्वा स महातेजा मुनिः प्रीतमनाः सुखी।
तत्रैवान्तरधीयत रावणस्य पुरोगतः॥
रावणोऽपि महातेजाः प्रणम्य दिशमुत्तराम्।
आरुरोह विमानं स्वं ययौ लङ्कां पुरीं प्रति॥
इत्येतत्कथितं राजन् रावणस्य महात्मनः।
महापुरुषसंवादं सर्वपापप्रणाशनम्॥
य इदं शृणुयान्नित्यं पठेद्वा श्रद्धयान्वितः।
सर्वपापैः प्रमुच्येत ब्रह्मलोके महीयते॥