उत्तर काण्ड अध्याय 28

रावण और महापुरुष की भेंट

अपनी विजय यात्रा के दौरान रावण की भेंट एक महान तपस्वी महापुरुष से होती है, जो अत्यंत शांत और ज्ञानी हैं। रावण उनकी तपस्या और ज्ञान से प्रभावित होकर उनसे जीवन के रहस्यों को जानने का प्रयास करता है।

विवरण

रावण अपनी दिग्विजय के अभियान में एकांत वन क्षेत्र से गुजर रहा था। वहाँ उसने एक अत्यंत प्रभावशाली एवं तेजस्वी महापुरुष (महान ऋषि) को ध्यानमग्न अवस्था में देखा। उनके तेज से समस्त वन प्रकाशित हो रहा था, किंतु वे इंद्रियों के विषयों से पूर्णतः विरक्त थे। रावण, जो अब तक अपने बल के बल पर सभी को जीतता आया था, इस महापुरुष के सामने खड़ा हो गया। उसने सोचा कि यदि यह महापुरुष उसकी अधीनता स्वीकार नहीं करेगा, तो वह बल प्रयोग करेगा। किंतु जैसे ही उसने महापुरुष के पास जाने का प्रयास किया, उसके तेज ने उसे रोक दिया। रावण ने देखा कि उसके पुष्पक विमान की गति भी उस स्थान के निकट रुक गई। तब रावण ने अपने मंत्रियों से उस महापुरुष के बारे में पूछा। उसे ज्ञात हुआ कि वे कोई साधारण प्राणी नहीं, बल्कि एक महान योगी हैं, जिन्होंने अपनी तपस्या से समस्त लोकों को जीत रखा है। रावण ने उनके पास जाकर विनम्रतापूर्वक उनके दर्शन किए और उनसे जीवन, मृत्यु और मोक्ष के रहस्यों के बारे में पूछा। महापुरुष ने उसे उपदेश दिया कि सच्चा सुख भोग में नहीं, बल्कि त्याग और आत्मज्ञान में है। रावण उनके उपदेश से प्रभावित हुआ, किंतु उसका मोह और अहंकार इतना प्रबल था कि वह उनके मार्ग पर नहीं चल सका। फिर भी, उसने उनका सम्मान किया और उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग २८

(रावण और महापुरुष की भेंट)

🧘 श्लोक १-५ : महापुरुष के दर्शन

रावणो राक्षसेन्द्रस्तु दिग्विजये महाबलः।
भ्रममाणो वनं गच्छन्नपश्यत् तपसां निधिम्॥
एकं महापुरुषं तत्र ध्यानस्थं परमेश्वरम्।
ज्वलन्तं ब्रह्मतेजोभिर्भासयन्तं दिशो दश॥
तस्य तेजोऽभिभूतस्तु रावणो विस्मयान्वितः।
न शशाक समागन्तुं तस्य समीपमन्तिके॥
विमानं पुष्पकं तस्य तत्रैव स्तम्भितं स्थितम्।
न चचालाग्रतः कर्तुं रावणस्य प्रयत्नतः॥
स मन्त्रिणोऽब्रवीद्राजा कोऽयं भगवानुत्तमः।
यस्य तेजोऽभिभूतोऽहं न शक्नोम्यन्तिकं गतः॥
📖 भावार्थ : महाबलशाली राक्षसों के स्वामी रावण अपनी दिग्विजय यात्रा के दौरान भ्रमण करता हुआ एक विशाल वन में पहुँचा। वहाँ उसने तपस्यारत एक महापुरुष को देखा, जो ध्यान में लीन थे और परमेश्वर के समान प्रतीत होते थे। उनके शरीर से ब्रह्मतेज की ज्वालाएँ निकल रही थीं, जो समस्त दिशाओं को प्रकाशित कर रही थीं। रावण उनके तेज से अभिभूत हो गया और आश्चर्यचकित रह गया। वह उनके समीप जाने का साहस नहीं कर सका। उसका पुष्पक विमान भी वहीं स्तम्भित होकर रुक गया और रावण के अत्यधिक प्रयास करने पर भी आगे नहीं बढ़ सका। तब रावण ने अपने मंत्रियों से पूछा, "यह कौन से भगवान हैं? कौन से उत्तम पुरुष हैं, जिनके तेज से मैं अभिभूत हूँ और उनके पास भी नहीं जा सकता?" रावण के लिए यह एक अभूतपूर्व अनुभव था। उसने अब तक अनेक देवताओं, दानवों और राजाओं को पराजित किया था, किंतु यहाँ उसकी शक्ति पूर्णतः निष्प्रभावी हो गई थी। वह समझ गया कि यह कोई साधारण प्राणी नहीं, बल्कि तपस्या की अद्भुत शक्ति से संपन्न महात्मा हैं।

🙏 श्लोक ६-१० : महापुरुष का परिचय

ततो मन्त्री महाप्राज्ञो रावणं प्रत्यभाषत।
श्रूयतां राजशार्दूल कोऽयं भगवानिति॥
एष महापुरुषो नाम्ना विख्यातो महातपाः।
योगीश्वरो महादेवो ब्रह्मज्ञानपरायणः॥
एतेन तपसा लोकास्त्रयः सर्वे निवेशिताः।
नास्य शक्ताः समायातुं देवगन्धर्वदानवाः॥
एतस्य तेजसा व्याप्तं सर्वमेतच्चराचरम्।
नैनं योद्धुं क्षमः कश्चित्त्रैलोक्ये सचराचरे॥
तस्मात्त्वं संयतो भूत्वा प्रसादय महामुनिम्।
अनेन प्रसृते राजन् कार्यसिद्धिर्भविष्यति॥
📖 भावार्थ : तब महाप्राज्ञ मंत्री ने रावण से कहा, "हे राजशार्दूल! सुनिए, यह कौन से भगवान हैं। यह महापुरुष नाम से विख्यात हैं और महान तपस्वी हैं। ये योगीश्वर हैं, महादेव के समान तेजस्वी हैं और ब्रह्मज्ञान में निरत हैं। इन्होंने अपनी तपस्या के बल पर समस्त तीनों लोकों को वश में कर रखा है। देवता, गंधर्व और दानव भी इनके पास आने की शक्ति नहीं रखते। इनके तेज से यह समस्त चराचर जगत व्याप्त है। इस समस्त चराचर त्रैलोक्य में कोई भी इनसे युद्ध करने में समर्थ नहीं है। अतः हे राजन्! आप संयत होकर इन महामुनि की प्रसन्नता प्राप्त करें। इनकी कृपा से ही आपके सभी कार्य सिद्ध होंगे।" मंत्री के इन वचनों को सुनकर रावण का अहंकार कुछ क्षणों के लिए शांत हुआ। उसने समझ लिया कि यह महापुरुष बल से नहीं, वरन् भक्ति और विनय से प्रसन्न होने वाले हैं। वह अपने विमान से उतरा और पैदल ही उन महापुरुष की ओर बढ़ने लगा।

📿 श्लोक ११-२० : रावण का संवाद और उपदेश

रावणः प्रययौ तूर्णं पद्भ्यामेव महामुनिम्।
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा प्रणनाम मुहुर्मुहुः॥
उत्थाय च महातेजा मुनिः प्राह कृपान्वितः।
वत्स रावण भद्रं ते वरं वरय सुव्रत॥
रावणः प्राह धर्मज्ञ ज्ञातुमिच्छामि तत्त्वतः।
जीवितस्य च मृत्योश्च मोक्षस्य च सनातनम्॥
मुनिः प्राह महातेजा रावणं राक्षसेश्वरम्।
शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि यत्त्वं पृच्छसि सांप्रतम्॥
जीवितं नाम दुःखानां भोगानां च निदर्शनम्।
मृत्युश्चापि तथा दुःखं जन्मनो मरणान्तिकम्॥
मोक्षस्तु परमं स्थानं यत्र गत्वा न शोचति।
यत्र नित्यं सुखं शान्तिर्यत्र नास्ति जराभयम्॥
स मोक्षो लभ्यते राजन् ज्ञानेन तपसा तथा।
वैराग्येण च धर्मेण सेवितव्यः सदा बुधैः॥
त्वं तु राजन् महाबाहो मोहितो मदरागिणा।
न शक्नोषि गतिं गन्तुं मोक्षस्य परमात्मनः॥
📖 भावार्थ : रावण तुरंत पैदल ही महामुनि के पास गया और हाथ जोड़कर बार-बार उन्हें प्रणाम किया। तब महातेजस्वी मुनि कृपापूर्वक उठे और बोले, "हे वत्स रावण! तुम्हारा कल्याण हो। तुम कोई वर माँग सकते हो।" रावण ने कहा, "हे धर्मज्ञ! मैं तत्त्व से जानना चाहता हूँ कि जीवन, मृत्यु और सनातन मोक्ष क्या हैं?" महातेजस्वी मुनि ने रावण से कहा, "हे राजन्! तुम जो पूछ रहे हो, वह मैं अभी कहता हूँ, सुनो। जीवन नाम दुखों और भोगों का निदर्शन मात्र है। इसी प्रकार मृत्यु भी दुखदायी है, क्योंकि यह जन्म के अंत का प्रतीक है। किंतु मोक्ष परम स्थान है, जहाँ जाकर मनुष्य शोक नहीं करता। वहाँ नित्य सुख और शांति है, वहाँ जरा (बुढ़ापे) का भय नहीं है। हे राजन्! वह मोक्ष ज्ञान, तप, वैराग्य और धर्म से प्राप्त होता है। बुद्धिमान पुरुषों को सदैव इसकी सेवा (प्राप्ति का प्रयास) करना चाहिए। किंतु हे महाबाहो राजन्! तुम तो अहंकार और भोगों के मद से मोहित हो, इसलिए परमात्मा की उस मोक्ष गति को प्राप्त नहीं कर सकते।" मुनि के इन वचनों ने रावण के हृदय को गहराई से छू लिया। वह समझ गया कि उसका संपूर्ण जीवन भोग-विलास और अहंकार में व्यर्थ ही बीत रहा है। उसे कुछ क्षणों के लिए अपने कर्मों पर पश्चाताप हुआ।

🔚 श्लोक २१-४० : आशीर्वाद एवं प्रस्थान

इति श्रुत्वा वचस्तस्य मुनेः परमधार्मिकः।
रावणः प्रणतो भूत्वा पुनः प्राह कृताञ्जलिः॥
भगवन् यदि मे कारुण्यं कुरुष्व तपसां निधे।
आशीर्वादं प्रयच्छस्व येन मे धर्मवृद्धये॥
मुनिः प्राह महातेजा रावणं प्रणतं तदा।
गच्छ राजन् यथाकामं धर्मस्ते वर्धतां सदा॥
यद्यपि त्वं महाभाग कर्मणा राक्षसाधमः।
तथापि ते भविष्यन्ति कीर्तिर्विक्रम एव च॥
इत्युक्त्वा स महातेजा मुनिः प्रीतमनाः सुखी।
तत्रैवान्तरधीयत रावणस्य पुरोगतः॥
रावणोऽपि महातेजाः प्रणम्य दिशमुत्तराम्।
आरुरोह विमानं स्वं ययौ लङ्कां पुरीं प्रति॥
इत्येतत्कथितं राजन् रावणस्य महात्मनः।
महापुरुषसंवादं सर्वपापप्रणाशनम्॥
य इदं शृणुयान्नित्यं पठेद्वा श्रद्धयान्वितः।
सर्वपापैः प्रमुच्येत ब्रह्मलोके महीयते॥
📖 भावार्थ : उस परमधार्मिक मुनि के वचनों को सुनकर रावण ने उन्हें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर पुनः कहा, "हे तपस्वियों के निधे भगवन्! यदि आप मुझ पर कृपा करें तो मुझे ऐसा आशीर्वाद दीजिए, जिससे मेरे धर्म की वृद्धि हो।" महातेजस्वी मुनि ने उस प्रणाम करते हुए रावण से कहा, "हे राजन्! तुम जैसी इच्छा हो, वैसे जाओ। तुम्हारा धर्म सदा बढ़ता रहे। हे महाभाग! यद्यपि तुम अपने कर्मों से राक्षसों में भी निकृष्ट हो, फिर भी तुम्हारी कीर्ति और पराक्रम सदा बना रहेगा।" ऐसा कहकर वह महातेजस्वी मुनि प्रसन्न मन से वहीं अंतर्ध्यान हो गए, जबकि रावण उनके सामने ही खड़ा था। महातेजस्वी रावण ने उत्तर दिशा की ओर प्रणाम किया और अपने विमान पर आरूढ़ होकर लंका पुरी की ओर प्रस्थान कर गया। हे राजन्! इस प्रकार मैंने आपको महात्मा रावण और महापुरुष के संवाद की कथा सुनाई, जो समस्त पापों का नाश करने वाली है। जो मनुष्य इस कथा को नित्य सुनता है या श्रद्धापूर्वक पढ़ता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और अंत में ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित होता है। इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि चाहे मनुष्य कितना भी पतित क्यों न हो, ज्ञानियों की संगति और उनके उपदेश से उसका कल्याण संभव है। रावण जैसे महापापी ने भी क्षण भर के लिए ही सही, मोक्ष का मार्ग जानना चाहा और एक महापुरुष के आशीर्वाद से उसकी कीर्ति अमर हो गई।
ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे अष्टाविंशः सर्गः ॥
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