रावण का चन्द्रलोक भ्रमण
रावण अपने विमान पुष्पक से चन्द्रलोक की यात्रा करता है। वहाँ वह चन्द्रदेव की सभा में जाता है और उनके दिव्य वैभव को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाता है, किंतु चन्द्रदेव के शीतल और सौम्य व्यवहार के आगे उसका कोई बल नहीं चलता।
विवरण
अपनी दिग्विजय यात्रा के एक भाग के रूप में रावण अपने पुष्पक विमान से आकाश मार्ग से भ्रमण करता हुआ चन्द्रलोक पहुँचता है। वहाँ का दिव्य दृश्य देखकर वह अत्यंत आश्चर्यचकित हो जाता है। चन्द्रलोक बर्फ के समान श्वेत, स्वच्छ एवं कांतिमय है। वहाँ के निवासी, विद्याधर, किन्नर एवं अप्सराएँ अत्यंत सुंदर और सुखी हैं। रावण सीधे चन्द्रदेव के सभा भवन में प्रवेश कर जाता है, जहाँ चन्द्रदेव अपनी पत्नी रोहिणी सहित विराजमान हैं। रावण अपने बल के घमंड में चन्द्रदेव को युद्ध के लिए ललकारता है, किंतु चन्द्रदेव अत्यंत शांत एवं सौम्य स्वभाव के हैं। वे रावण के क्रोध पर मुस्कुराते हुए उसे अपने पास बैठने का आसन देते हैं और अमृतमयी चाँदनी से उसका स्वागत करते हैं। चन्द्रदेव की शीतलता एवं सौम्यता के आगे रावण का क्रोध शांत हो जाता है। वह चन्द्रदेव की महिमा को समझता है और उनका सम्मान करते हुए वहाँ से प्रस्थान करता है। यह घटना रावण के जीवन की एक अनूठी घटना है, जहाँ उसे बिना युद्ध किए ही शांति प्राप्त होती है और वह किसी देवता के प्रति सम्मान भाव रखता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग २७
(रावण का चन्द्रलोक भ्रमण)
🌙 श्लोक १-५ : चन्द्रलोक की यात्रा
आरुह्य पुष्पकं दिव्यं चन्द्रलोकं ययौ तदा॥
ददर्श रम्यां शुभ्रां च चन्द्रलोकस्य संपदम्।
हिमसंघातसंकाशां मुक्ताजालविभूषिताम्॥
तत्रापश्यत्सभां दिव्यां चन्द्रस्यामृतवर्चसः।
रोहिण्या सहितं देवं प्रभया भुवनं युतम्॥
स गत्वा सहसा तत्र प्रविवेश सभां प्रभुः।
न चास्य कश्चिद्बाधेत प्रभावान्मन्दिरे सति॥
चन्द्रदेवस्तु तं दृष्ट्वा रावणं राक्षसेश्वरम्।
उत्थाय सहसा प्राह स्वागतं ते निशाचर॥
🪐 श्लोक ६-१० : चन्द्रलोक का दिव्य वैभव
दर्शयामास तत्सर्वं यद्यत्किंचिन्मनोरमम्॥
चन्द्रलोके महार्हाणि रत्नानि विविधानि च।
विमानानि च दिव्यानि नानाकार्याणि भागशः॥
अप्सरसां गणान् रम्यान् गन्धर्वाणां च गायताम्।
किन्नराणां च ये तत्र नृत्यन्ति मुदिताः सदा॥
विद्याधराश्च बहवः सिद्धाश्च परमर्षयः।
चन्द्रलोके वसन्त्येते ये चान्ये तापसाः प्रिये॥
एतत्सर्वं महाबाहो रावणाय निवेदितम्।
चन्द्रदेवेन धर्मज्ञ सभायां समुपस्थितम्॥
❄️ श्लोक ११-२० : चन्द्रदेव की शीतलता और रावण का सम्मान
प्रीतिमानभवद्राजन् चन्द्रलोकस्य वैभवम्॥
चन्द्रदेवं ततः प्राह रावणो राक्षसेश्वरः।
भवान् धन्यो महाभाग यस्येदृक् स्थानमुत्तमम्॥
न मे युद्धेन प्रयोजनं त्वया सार्धं निशाकर।
प्रसन्नोऽस्मि वरं ब्रूहि ददामि तव सुव्रत॥
चन्द्रदेवस्तु तच्छ्रुत्वा रावणस्य वचोऽमृतम्।
प्रहस्य मन्दं मधुरं वाक्यमेतदुवाच ह॥
न मे वरेण प्रयोजनं रावण त्वयि सुव्रते।
यदि तुष्टोऽसि राजेन्द्र सख्यं मे सह वर्तताम्॥
रावणः प्राह सन्तुष्टश्चन्द्रदेवं निशाकरम्।
एवमस्तु महाभाग सख्यं मे त्वां न संशयः॥
ततश्चन्द्रोऽपि राजेन्द्र रावणाय महात्मने।
ददौ दिव्यानि वस्त्राणि रत्नानि विविधानि च॥
रावणोऽपि महातेजाश्चन्द्रदेवं नमस्य च।
आरुरोह विमानं स्वं ययौ लङ्कां पुरीं प्रति॥
🕊️ श्लोक २१-३५ : मित्रता और विदाई
मैत्री समभवद्राजन् यथा चन्द्रस्य रोहिणी॥
चन्द्रदेवोऽपि राम तु रावणं समुवाच ह।
यदा त्वं संशयं प्राप्तो रणे वा काननेऽपि वा॥
स्मरणं मे कुरुष्व त्वं तदा यास्यसि संशयात्।
इत्युक्त्वा चन्द्रदेवोऽपि तत्रैवान्तरधीयत॥
रावणोऽपि महातेजा लङ्कां प्राप्य पुरीं शुभाम्।
मन्त्रिभिः सहितो राजन् चकार सुखमेव च॥
इत्येतत्कथितं राजन् चन्द्रलोकस्य दर्शनम्।
रावणस्य च संवादं चन्द्रदेवेन धीमता॥
य इदं शृणुयान्नित्यं पठेद्वा श्रद्धयान्वितः।
सर्वपापैः प्रमुच्येत चन्द्रलोके महीयते॥
न तस्य शत्रवो राजन् न च व्याधिभयं क्वचित्।
सुखी पुत्रसमायुक्तो जीवेद्वर्षशतं नरः॥