उत्तर काण्ड अध्याय 27

रावण का चन्द्रलोक भ्रमण

रावण अपने विमान पुष्पक से चन्द्रलोक की यात्रा करता है। वहाँ वह चन्द्रदेव की सभा में जाता है और उनके दिव्य वैभव को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाता है, किंतु चन्द्रदेव के शीतल और सौम्य व्यवहार के आगे उसका कोई बल नहीं चलता।

विवरण

अपनी दिग्विजय यात्रा के एक भाग के रूप में रावण अपने पुष्पक विमान से आकाश मार्ग से भ्रमण करता हुआ चन्द्रलोक पहुँचता है। वहाँ का दिव्य दृश्य देखकर वह अत्यंत आश्चर्यचकित हो जाता है। चन्द्रलोक बर्फ के समान श्वेत, स्वच्छ एवं कांतिमय है। वहाँ के निवासी, विद्याधर, किन्नर एवं अप्सराएँ अत्यंत सुंदर और सुखी हैं। रावण सीधे चन्द्रदेव के सभा भवन में प्रवेश कर जाता है, जहाँ चन्द्रदेव अपनी पत्नी रोहिणी सहित विराजमान हैं। रावण अपने बल के घमंड में चन्द्रदेव को युद्ध के लिए ललकारता है, किंतु चन्द्रदेव अत्यंत शांत एवं सौम्य स्वभाव के हैं। वे रावण के क्रोध पर मुस्कुराते हुए उसे अपने पास बैठने का आसन देते हैं और अमृतमयी चाँदनी से उसका स्वागत करते हैं। चन्द्रदेव की शीतलता एवं सौम्यता के आगे रावण का क्रोध शांत हो जाता है। वह चन्द्रदेव की महिमा को समझता है और उनका सम्मान करते हुए वहाँ से प्रस्थान करता है। यह घटना रावण के जीवन की एक अनूठी घटना है, जहाँ उसे बिना युद्ध किए ही शांति प्राप्त होती है और वह किसी देवता के प्रति सम्मान भाव रखता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग २७

(रावण का चन्द्रलोक भ्रमण)

🌙 श्लोक १-५ : चन्द्रलोक की यात्रा

ततो रावणो दशग्रीवो जित्वा नरपतीन् बली।
आरुह्य पुष्पकं दिव्यं चन्द्रलोकं ययौ तदा॥
ददर्श रम्यां शुभ्रां च चन्द्रलोकस्य संपदम्।
हिमसंघातसंकाशां मुक्ताजालविभूषिताम्॥
तत्रापश्यत्सभां दिव्यां चन्द्रस्यामृतवर्चसः।
रोहिण्या सहितं देवं प्रभया भुवनं युतम्॥
स गत्वा सहसा तत्र प्रविवेश सभां प्रभुः।
न चास्य कश्चिद्बाधेत प्रभावान्मन्दिरे सति॥
चन्द्रदेवस्तु तं दृष्ट्वा रावणं राक्षसेश्वरम्।
उत्थाय सहसा प्राह स्वागतं ते निशाचर॥
📖 भावार्थ : उसके बाद पराक्रमी दशग्रीव रावण ने समस्त नरपतियों को जीतकर अपने दिव्य पुष्पक विमान पर आरूढ़ होकर चन्द्रलोक की यात्रा की। वहाँ पहुँचकर उसने चन्द्रलोक की अत्यंत रमणीय और श्वेत-श्याम संपदा को देखा। वह समस्त लोक बर्फ के समूह के समान श्वेत और मोतियों के जाल से विभूषित प्रतीत हो रहा था। वहाँ उसने अमृत के समान तेजस्वी चन्द्रदेव की दिव्य सभा देखी, जहाँ चन्द्रदेव अपनी पत्नी रोहिणी के साथ विराजमान थे और उनकी प्रभा से समस्त भुवन प्रकाशित हो रहा था। रावण ने सहसा उस सभा में प्रवेश कर लिया। उसके प्रभाव के कारण वहाँ उपस्थित किसी भी देवता या गण ने उसे रोकने का साहस नहीं किया। चन्द्रदेव ने उसे देखते ही तुरंत अपने आसन से उठकर कहा, "हे निशाचर! तुम्हारा स्वागत है।" चन्द्रदेव का यह व्यवहार देखकर रावण कुछ देर के लिए स्तब्ध रह गया। उसने सोचा था कि चन्द्रदेव भी अन्य देवताओं की भाँति उससे युद्ध करने का प्रयास करेंगे, किंतु चन्द्रदेव के इस सौम्य व्यवहार ने उसके मन में एक अलग ही भाव उत्पन्न कर दिया।

🪐 श्लोक ६-१० : चन्द्रलोक का दिव्य वैभव

चन्द्रदेवस्ततो राम रावणाय महात्मने।
दर्शयामास तत्सर्वं यद्यत्किंचिन्मनोरमम्॥
चन्द्रलोके महार्हाणि रत्नानि विविधानि च।
विमानानि च दिव्यानि नानाकार्याणि भागशः॥
अप्सरसां गणान् रम्यान् गन्धर्वाणां च गायताम्।
किन्नराणां च ये तत्र नृत्यन्ति मुदिताः सदा॥
विद्याधराश्च बहवः सिद्धाश्च परमर्षयः।
चन्द्रलोके वसन्त्येते ये चान्ये तापसाः प्रिये॥
एतत्सर्वं महाबाहो रावणाय निवेदितम्।
चन्द्रदेवेन धर्मज्ञ सभायां समुपस्थितम्॥
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् चन्द्रदेव ने महात्मा रावण को चन्द्रलोक की समस्त मनोरम वस्तुओं का दर्शन कराया। उन्होंने उसे चन्द्रलोक में स्थित अत्यंत मूल्यवान एवं विविध प्रकार के रत्नों को दिखाया। वहाँ नाना प्रकार के दिव्य विमान थे, जो भिन्न-भिन्न कार्यों के लिए सजे हुए थे। चन्द्रदेव ने रावण को वहाँ निवास करने वाली अप्सराओं के रमणीक समूह दिखाए, जो अत्यंत सुंदर थीं। साथ ही गंधर्वों को गाते हुए और किन्नरों को आनंदपूर्वक नृत्य करते हुए दिखाया। रावण ने वहाँ अनेक विद्याधरों, सिद्धों और परमर्षियों को भी देखा, जो चन्द्रलोक में निवास करते थे। चन्द्रदेव ने उसे बताया कि यहाँ अनेक तापस भी निवास करते हैं, जो अपनी तपस्या के बल पर इस दिव्य लोक में आए हैं। रावण इस दिव्य वैभव को देखकर अत्यंत आश्चर्यचकित हो गया। उसने सोचा कि इतना सुंदर और शांत लोक उसने पहले कभी नहीं देखा। यहाँ का वातावरण इतना शीतल और आनंददायक था कि उसके मन में युद्ध का कोई भाव नहीं रहा। उसने समझ लिया कि यह लोक केवल भोग-विलास के लिए नहीं, बल्कि तपस्या और शांति के लिए भी अत्यंत उपयुक्त है।

❄️ श्लोक ११-२० : चन्द्रदेव की शीतलता और रावण का सम्मान

रावणस्तु महातेजा दृष्ट्वा तदमृतोपमम्।
प्रीतिमानभवद्राजन् चन्द्रलोकस्य वैभवम्॥
चन्द्रदेवं ततः प्राह रावणो राक्षसेश्वरः।
भवान् धन्यो महाभाग यस्येदृक् स्थानमुत्तमम्॥
न मे युद्धेन प्रयोजनं त्वया सार्धं निशाकर।
प्रसन्नोऽस्मि वरं ब्रूहि ददामि तव सुव्रत॥
चन्द्रदेवस्तु तच्छ्रुत्वा रावणस्य वचोऽमृतम्।
प्रहस्य मन्दं मधुरं वाक्यमेतदुवाच ह॥
न मे वरेण प्रयोजनं रावण त्वयि सुव्रते।
यदि तुष्टोऽसि राजेन्द्र सख्यं मे सह वर्तताम्॥
रावणः प्राह सन्तुष्टश्चन्द्रदेवं निशाकरम्।
एवमस्तु महाभाग सख्यं मे त्वां न संशयः॥
ततश्चन्द्रोऽपि राजेन्द्र रावणाय महात्मने।
ददौ दिव्यानि वस्त्राणि रत्नानि विविधानि च॥
रावणोऽपि महातेजाश्चन्द्रदेवं नमस्य च।
आरुरोह विमानं स्वं ययौ लङ्कां पुरीं प्रति॥
📖 भावार्थ : महातेजस्वी रावण ने चन्द्रलोक के उस अमृत के समान अद्भुत वैभव को देखा तो वह अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसने चन्द्रदेव से कहा, "हे महाभाग! आप अत्यंत धन्य हैं, जिन्हें इस प्रकार का उत्तम स्थान प्राप्त है। हे निशाकर! अब मुझे आपसे युद्ध करने की कोई आवश्यकता नहीं है। मैं आपसे अत्यंत प्रसन्न हूँ। आप मुझसे कोई वर माँग सकते हैं, मैं उसे अवश्य दूँगा।" चन्द्रदेव ने रावण के इन अमृतमय वचनों को सुनकर धीरे से मधुर हँसी हँसते हुए कहा, "हे रावण! मुझे किसी वर की आवश्यकता नहीं है। यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो मैं आपसे मित्रता करना चाहता हूँ।" रावण ने अत्यंत संतुष्ट होकर चन्द्रदेव से कहा, "हे महाभाग! ऐसा ही हो। आपसे मेरी मित्रता है, इसमें कोई संदेह नहीं है।" तत्पश्चात् चन्द्रदेव ने महात्मा रावण को दिव्य वस्त्र और विविध प्रकार के रत्न भेंट किए। महातेजस्वी रावण ने भी चन्द्रदेव को प्रणाम किया और अपने विमान पर आरूढ़ होकर लंका नगरी की ओर प्रस्थान कर गया। इस प्रकार रावण ने चन्द्रलोक में एक अद्वितीय अनुभव प्राप्त किया। उसने जाना कि केवल बल और पराक्रम ही सब कुछ नहीं है, बल्कि शीतलता, सौम्यता और शांति भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। चन्द्रदेव के व्यवहार ने उसे यह सिखाया कि सच्चा बल अपने स्वभाव में स्थिर रहने में है, न कि दूसरों को पराजित करने में।

🕊️ श्लोक २१-३५ : मित्रता और विदाई

ततः प्रभृति रावण्यश्चन्द्रदेवस्य धीमतः।
मैत्री समभवद्राजन् यथा चन्द्रस्य रोहिणी॥
चन्द्रदेवोऽपि राम तु रावणं समुवाच ह।
यदा त्वं संशयं प्राप्तो रणे वा काननेऽपि वा॥
स्मरणं मे कुरुष्व त्वं तदा यास्यसि संशयात्।
इत्युक्त्वा चन्द्रदेवोऽपि तत्रैवान्तरधीयत॥
रावणोऽपि महातेजा लङ्कां प्राप्य पुरीं शुभाम्।
मन्त्रिभिः सहितो राजन् चकार सुखमेव च॥
इत्येतत्कथितं राजन् चन्द्रलोकस्य दर्शनम्।
रावणस्य च संवादं चन्द्रदेवेन धीमता॥
य इदं शृणुयान्नित्यं पठेद्वा श्रद्धयान्वितः।
सर्वपापैः प्रमुच्येत चन्द्रलोके महीयते॥
न तस्य शत्रवो राजन् न च व्याधिभयं क्वचित्।
सुखी पुत्रसमायुक्तो जीवेद्वर्षशतं नरः॥
📖 भावार्थ : उस दिन से धीमान् चन्द्रदेव और रावण के बीच वैसी ही मैत्री हो गई, जैसी चन्द्रदेव और रोहिणी की होती है। चन्द्रदेव ने रावण से कहा, "हे रावण! जब कभी तुम युद्ध में या जंगल में किसी संकट में पड़ो, तो मेरा स्मरण करना। मैं तुम्हें उस संकट से मुक्त कर दूँगा।" ऐसा कहकर चन्द्रदेव वहीं अंतर्ध्यान हो गए। महातेजस्वी रावण शुभ लंका पुरी में लौट आया और वहाँ अपने मंत्रियों के साथ मिलकर सुखपूर्वक रहने लगा। इस प्रकार हे राजन! मैंने आपको चन्द्रलोक के दर्शन और धीमान् चन्द्रदेव के साथ रावण के संवाद का वर्णन किया है। जो मनुष्य इस कथा को नित्य सुनता है या श्रद्धापूर्वक पढ़ता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और अंत में चन्द्रलोक में प्रतिष्ठित होता है। उस मनुष्य के न तो कभी शत्रु होते हैं और न ही उसे कहीं रोग का भय सताता है। वह सुखी रहता है, पुत्रों से युक्त होता है और सौ वर्षों तक जीवित रहता है। यह कथा हमें यह संदेश देती है कि शांति और सौम्रता से भी बड़े-बड़े अहंकारियों को जीता जा सकता है। रावण जैसे क्रोधी और बलशाली राक्षस ने भी चन्द्रदेव के शीतल व्यवहार के आगे अपना शस्त्र त्याग दिया और उनसे मित्रता कर ली।
ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे सप्तविंशः सर्गः ॥
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