रावण का राजा मान्धाता से सामना
रावण अपनी विजय यात्रा के दौरान राजा मान्धाता के राज्य में पहुँचता है। दोनों पराक्रमी राजाओं के बीच घमासान युद्ध होता है, जिसमें अंततः रावण को पराजय का सामना करना पड़ता है और वह मान्धाता की अधीनता स्वीकार करता है।
विवरण
अपनी दिग्विजय यात्रा के दौरान रावण अपनी अपार सेना के साथ अयोध्या की सीमा पर पहुँचता है। उस समय अयोध्या पर सूर्यवंशी राजा मान्धाता का शासन था, जो अत्यंत प्रतापी और धर्मात्मा राजा थे। रावण का सेनापति मान्धाता की राजधानी में प्रवेश करने की अनुमति माँगता है, किंतु मान्धाता के मंत्री उसे रोक देते हैं। इस बात की सूचना जब रावण को मिलती है तो वह क्रोधित होकर युद्ध की तैयारी करता है। मान्धाता भी अपनी सेना लेकर युद्ध के लिए तैयार हो जाते हैं। दोनों में घोर संग्राम होता है। मान्धाता के पराक्रम से रावण की सेना छिन्न-भिन्न हो जाती है। मान्धाता स्वयं रावण से युद्ध करते हैं और उसे बुरी तरह परास्त कर देते हैं। पराजित होने पर रावण को अपनी गलती का एहसास होता है और वह मान्धाता की शरण में जाता है। मान्धाता अपनी धर्मपरायणता के कारण उसे क्षमा कर देते हैं और उसे सम्मानपूर्वक विदा करते हैं। यह घटना रावण के जीवन की पहली बड़ी पराजय मानी जाती है, जिससे उसे सीख मिलती है कि केवल बल के घमंड से कोई भी महान राजा पर विजय प्राप्त नहीं कर सकता।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग २६
(रावण का राजा मान्धाता से सामना)
⚔️ श्लोक १-५ : रावण का अयोध्या की ओर प्रस्थान
अयोध्यां प्रययौ वीरो यत्र राजा मन्धाता॥
स ददर्श पुरीं रम्यां सूर्यवंशविभूषिताम्।
प्राकारैः परिखाभिश्च गजाश्वरथसंकुलाम्॥
ततः सेनापतिं प्राह रावणो राक्षसाधिपः।
गच्छ शीघ्रमिमां राज्ञे निवेदय ममागमम्॥
स गत्वा प्राह राजानं मन्धातारं यशस्विनम्।
रावणो राक्षसेन्द्रस्ते द्रष्टुमिच्छति मानद॥
मन्धाता प्राह राजर्षिः किमनेन दुरात्मना।
नार्हति प्रविशेत्सद्म ममेति वचनं ददौ॥
💥 श्लोक ६-१० : युद्ध की तैयारी
रावणः प्राह सेनां स्वां युद्धाय समुपस्थिताम्॥
भग्नशैलप्रतीकाशा राक्षसाः क्रोधमूर्च्छिताः।
अयोध्यां परिवव्रुः सर्वतः शस्त्रपाणयः॥
मन्धाता अपि राजर्षिः श्रुत्वा कोलाहलं महत्।
निर्ययौ सहसा वीरो धनुरादाय वीर्यवान्॥
तस्य सेना महती चासीच्चतुरङ्गसमन्विता।
रथनागाश्वकलिला पत्तिसंकुलसङ्कुला॥
उभे सेने समागम्य युद्धाय समुपस्थिते।
देवासुरसमं युद्धं बभूव रोमहर्षणम्॥
🏹 श्लोक ११-२० : घोर संग्राम
शरवर्षैः महोल्काभिर्गदाभिर्मुसलैरपि॥
रावणः स्वयमागत्य मन्धातारं समभ्ययात्।
ववर्ष शरवर्षाणि मेघो वृष्टिमिवाचलम्॥
मन्धाता च महातेजा रावणं प्रति राक्षसम्।
व्यसृजच्छरवर्षाणि सूर्यपुत्रः प्रतापवान्॥
तयोर्युद्धं समभवद्देवदानवयोरिव।
त्रैलोक्यं च चचालाथ सर्वे लोका भयातुराः॥
रावणस्य ततो भग्नं धनुः सज्यं महारथः।
मन्धाता त्वरितो भूत्वा बाणं संधाय वीर्यवान्॥
ततो विरथमालोक्य रावणं राक्षसेश्वरम्।
ननन्दुर्देवताः सर्वा ऋषयश्च तपोधनाः॥
रावणो विरथो भूत्वा क्रोधसंरक्तलोचनः।
धरां प्रहर्तुमिच्छन् वै मन्धातारं महाबलम्॥
ततः स मुष्टिमादाय सम्प्रधावत रावणः।
मन्धाता चापि तं दृष्ट्वा हसन् वाक्यमथाब्रवीत्॥
अरे मूढ न जानीषे मद्बलं राक्षसाधम।
इत्युक्त्वा ताडयामास तलेन हृदि रावणम्॥
🕉️ श्लोक २१-३२ : रावण की पराजय और क्षमा याचना
पपात सहसा भूमौ मूर्च्छितो विगतज्वरः॥
ततः प्राप्तसमाधानो रावणः प्राह वै नृपम्।
प्रसीद राजशार्दूल क्षान्तमद्य त्वया मम॥
न जानामि बलं तुभ्यं मन्धातः सूर्यनन्दन।
प्रसादं कुरु मे राजन् दासोऽहं तव सुव्रत॥
मन्धाता प्राह धर्मात्मा रावणं प्रणतं तदा।
उत्तिष्ठ राक्षसश्रेष्ठ न भयं विद्यते तव॥
धर्मो जयती नाधर्मो सत्यं जयति नानृतम्।
गच्छ त्वं स्वपुरं वीर मा कृथा दुष्कृतं पुनः॥
रावणः प्राह राजानं प्रसन्नेनान्तरात्मना।
प्रतिजानामि ते राजन्न करिष्ये पुनः क्वचित्॥
तव राज्ये प्रवेक्ष्यामि न चैवान्यत्र दुर्मतेः।
इत्युक्त्वा रावणो राज्ञः प्रदक्षिणमथाकरोत्॥
मन्धाता च वरं प्रादात् सख्यं च समरोचयत्।
गतश्च रावणो लङ्कां प्रणम्य शिरसा नृपम्॥
इत्येषा रावणस्यापि पराजयकथा शुभा।
मन्धातुश्चरितं पुण्यं श्रवणात्पापनाशनम्॥