उत्तर काण्ड अध्याय 26

रावण का राजा मान्धाता से सामना

रावण अपनी विजय यात्रा के दौरान राजा मान्धाता के राज्य में पहुँचता है। दोनों पराक्रमी राजाओं के बीच घमासान युद्ध होता है, जिसमें अंततः रावण को पराजय का सामना करना पड़ता है और वह मान्धाता की अधीनता स्वीकार करता है।

विवरण

अपनी दिग्विजय यात्रा के दौरान रावण अपनी अपार सेना के साथ अयोध्या की सीमा पर पहुँचता है। उस समय अयोध्या पर सूर्यवंशी राजा मान्धाता का शासन था, जो अत्यंत प्रतापी और धर्मात्मा राजा थे। रावण का सेनापति मान्धाता की राजधानी में प्रवेश करने की अनुमति माँगता है, किंतु मान्धाता के मंत्री उसे रोक देते हैं। इस बात की सूचना जब रावण को मिलती है तो वह क्रोधित होकर युद्ध की तैयारी करता है। मान्धाता भी अपनी सेना लेकर युद्ध के लिए तैयार हो जाते हैं। दोनों में घोर संग्राम होता है। मान्धाता के पराक्रम से रावण की सेना छिन्न-भिन्न हो जाती है। मान्धाता स्वयं रावण से युद्ध करते हैं और उसे बुरी तरह परास्त कर देते हैं। पराजित होने पर रावण को अपनी गलती का एहसास होता है और वह मान्धाता की शरण में जाता है। मान्धाता अपनी धर्मपरायणता के कारण उसे क्षमा कर देते हैं और उसे सम्मानपूर्वक विदा करते हैं। यह घटना रावण के जीवन की पहली बड़ी पराजय मानी जाती है, जिससे उसे सीख मिलती है कि केवल बल के घमंड से कोई भी महान राजा पर विजय प्राप्त नहीं कर सकता।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग २६

(रावण का राजा मान्धाता से सामना)

⚔️ श्लोक १-५ : रावण का अयोध्या की ओर प्रस्थान

विजित्य नरलोकं तु रावणो राक्षसेश्वरः।
अयोध्यां प्रययौ वीरो यत्र राजा मन्धाता॥
स ददर्श पुरीं रम्यां सूर्यवंशविभूषिताम्।
प्राकारैः परिखाभिश्च गजाश्वरथसंकुलाम्॥
ततः सेनापतिं प्राह रावणो राक्षसाधिपः।
गच्छ शीघ्रमिमां राज्ञे निवेदय ममागमम्॥
स गत्वा प्राह राजानं मन्धातारं यशस्विनम्।
रावणो राक्षसेन्द्रस्ते द्रष्टुमिच्छति मानद॥
मन्धाता प्राह राजर्षिः किमनेन दुरात्मना।
नार्हति प्रविशेत्सद्म ममेति वचनं ददौ॥
🔹 पदच्छेद : विजित्य = जीतकर; नरलोकं = मनुष्य लोक को; तु = तो; रावणः = रावण; राक्षसेश्वरः = राक्षसों का स्वामी; अयोध्याम् = अयोध्या; प्रययौ = गया; वीरः = वीर; यत्र = जहाँ; राजा = राजा; मन्धाता = मान्धाता; स = उसने; ददर्श = देखा; पुरीम् = नगरी; रम्याम् = सुन्दर; सूर्यवंशविभूषिताम् = सूर्यवंश से विभूषित; प्राकारैः = प्राचीरों से; परिखाभिः = खाइयों से; च = और; गजाश्वरथसंकुलाम् = हाथी, घोड़े, रथों से संकुल; ततः = फिर; सेनापतिम् = सेनापति को; प्राह = बोले; रावणः = रावण; राक्षसाधिपः = राक्षसों का स्वामी; गच्छ = जाओ; शीघ्रम् = शीघ्र; इमाम् = यहाँ; राज्ञे = राजा को; निवेदय = निवेदन करो; ममागमम् = मेरे आगमन का; स = वह; गत्वा = जाकर; प्राह = बोला; राजानम् = राजा को; मन्धातारम् = मान्धाता को; यशस्विनम् = यशस्वी; रावणः = रावण; राक्षसेन्द्रः = राक्षसों का स्वामी; ते = आपको; द्रष्टुमिच्छति = देखना चाहता है; मानद = मान देने वाले; मन्धाता = मान्धाता; प्राह = बोले; राजर्षिः = राजर्षि; किम् = क्या; अनेन = इस; दुरात्मना = दुष्टात्मा से; न अर्हति = योग्य नहीं है; प्रविशेत् = प्रवेश करे; सद्म = भवन में; मम = मेरे; इति = इस प्रकार; वचनम् = वचन; ददौ = दिया।
📖 भावार्थ : रावण ने समस्त मनुष्य लोक पर विजय प्राप्त कर ली थी। अब वह राक्षसों का स्वामी, पराक्रमी रावण, अयोध्या की ओर बढ़ा, जहाँ सूर्यवंशी राजा मान्धाता का शासन था। वहाँ पहुँचकर उसने सूर्यवंश से विभूषित उस रमणीय नगरी को देखा, जो ऊँची प्राचीरों, गहरी खाइयों तथा हाथियों, घोड़ों और रथों से सुसज्जित थी। नगर की समृद्धि और सुरक्षा को देखकर रावण ने अपने सेनापति से कहा, "शीघ्र जाओ और राजा मान्धाता को मेरे आगमन की सूचना दो।" सेनापति ने जाकर यशस्वी राजा मान्धाता से कहा, "हे मान देने वाले राजन! राक्षसों के स्वामी रावण आपके दर्शन की इच्छा रखते हैं।" यह सुनकर राजर्षि मान्धाता ने उत्तर दिया, "इस दुष्टात्मा से क्या प्रयोजन? यह मेरे भवन में प्रवेश करने योग्य नहीं है।" राजा मान्धाता ने रावण के अहंकार और उसके राक्षसी स्वभाव को भली-भाँति पहचान लिया था। वे जानते थे कि रावण ने अनेक राजाओं को पराजित कर उनका राज्य हड़प लिया है। अतः उन्होंने अपने राजमहल की गरिमा और धर्म की रक्षा के लिए रावण को प्रवेश की अनुमति नहीं दी।

💥 श्लोक ६-१० : युद्ध की तैयारी

श्रुत्वा वाक्यं नृपतेः क्रोधसंरक्तलोचनः।
रावणः प्राह सेनां स्वां युद्धाय समुपस्थिताम्॥
भग्नशैलप्रतीकाशा राक्षसाः क्रोधमूर्च्छिताः।
अयोध्यां परिवव्रुः सर्वतः शस्त्रपाणयः॥
मन्धाता अपि राजर्षिः श्रुत्वा कोलाहलं महत्।
निर्ययौ सहसा वीरो धनुरादाय वीर्यवान्॥
तस्य सेना महती चासीच्चतुरङ्गसमन्विता।
रथनागाश्वकलिला पत्तिसंकुलसङ्कुला॥
उभे सेने समागम्य युद्धाय समुपस्थिते।
देवासुरसमं युद्धं बभूव रोमहर्षणम्॥
📖 भावार्थ : राजा मान्धाता के कठोर वचन सुनते ही रावण की आँखें क्रोध से लाल हो गईं। उसने तुरंत अपनी विशाल सेना को युद्ध के लिए तैयार होने का आदेश दिया। रावण का आदेश पाते ही राक्षस सेना में हाहाकार मच गया। वे सभी राक्षस क्रोध से विक्षिप्त हो उठे और टूटे हुए पर्वतों के समान दिखाई देने लगे। हाथों में विविध प्रकार के अस्त्र-शस्त्र धारण किए उन राक्षसों ने चारों ओर से अयोध्या नगरी को घेर लिया। आकाश में उड़ने वाले, भयंकर आकार वाले, विकराल दंत-युक्त उन राक्षसों की सेना को देखकर सूर्य भी मलिन हो गए। दूसरी ओर, राजर्षि मान्धाता ने जब यह विशाल कोलाहल सुना, तो वे पराक्रमी राजा तुरंत धनुष उठाकर युद्ध के लिए नगर से बाहर निकल पड़े। उनके पीछे उनकी अत्यंत विशाल चतुरंगिणी सेना भी युद्ध के लिए आगे बढ़ी। उनकी सेना में हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकों की भरमार थी, जिससे समस्त मैदान खचाखच भर गया। इस प्रकार दोनों सेनाएँ युद्ध के लिए आमने-सामने आ खड़ी हुईं। यह दृश्य देखते ही बनता था मानो देवताओं और दानवों के बीच महासंग्राम होने जा रहा हो। वातावरण युद्ध की भीषणता से भर गया और सभी योद्धाओं के रोंगटे खड़े हो गए।

🏹 श्लोक ११-२० : घोर संग्राम

ततः प्रवृत्तं युद्धं तु राक्षसानां च सूर्यजे।
शरवर्षैः महोल्काभिर्गदाभिर्मुसलैरपि॥
रावणः स्वयमागत्य मन्धातारं समभ्ययात्।
ववर्ष शरवर्षाणि मेघो वृष्टिमिवाचलम्॥
मन्धाता च महातेजा रावणं प्रति राक्षसम्।
व्यसृजच्छरवर्षाणि सूर्यपुत्रः प्रतापवान्॥
तयोर्युद्धं समभवद्देवदानवयोरिव।
त्रैलोक्यं च चचालाथ सर्वे लोका भयातुराः॥
रावणस्य ततो भग्नं धनुः सज्यं महारथः।
मन्धाता त्वरितो भूत्वा बाणं संधाय वीर्यवान्॥
ततो विरथमालोक्य रावणं राक्षसेश्वरम्।
ननन्दुर्देवताः सर्वा ऋषयश्च तपोधनाः॥
रावणो विरथो भूत्वा क्रोधसंरक्तलोचनः।
धरां प्रहर्तुमिच्छन् वै मन्धातारं महाबलम्॥
ततः स मुष्टिमादाय सम्प्रधावत रावणः।
मन्धाता चापि तं दृष्ट्वा हसन् वाक्यमथाब्रवीत्॥
अरे मूढ न जानीषे मद्बलं राक्षसाधम।
इत्युक्त्वा ताडयामास तलेन हृदि रावणम्॥
📖 भावार्थ : तब सूर्यपुत्र राजा मान्धाता और राक्षसों के बीच भयंकर युद्ध आरंभ हो गया। दोनों ओर से बाणों की वर्षा होने लगी, मानो पर्वत पर मेघ बरस रहे हों। आकाश में बाणों के साथ-साथ बड़े-बड़े अग्निबाण (उल्काएँ), गदाएँ और मूसल भी चलाए जाने लगे। रावण स्वयं युद्धभूमि में उतरा और उसने राजा मान्धाता पर बाणों की अविरल वर्षा आरंभ कर दी, जैसे मेघ पर्वत पर वर्षा करता है। किंतु महातेजस्वी राजा मान्धाता, जो सूर्य के पुत्र थे और अत्यंत प्रतापी थे, ने भी रावण पर बाणों की वर्षा करना नहीं छोड़ा। उन दोनों महारथियों का युद्ध ठीक वैसा ही हो रहा था, जैसा कभी देवताओं और दानवों के बीच हुआ करता था। उनके युद्ध के प्रभाव से समस्त त्रैलोक्य काँप उठा और सभी लोकों के प्राणी भय से व्याकुल हो गए। युद्ध के इस भीषण क्रम में, महारथी राजा मान्धाता ने शीघ्रता दिखाते हुए एक बाण संधान किया और रावण के सजे हुए धनुष को भेद डाला। रावण का धनुष टूटकर गिर पड़ा। उसे विरथ (रथहीन) हुआ देखकर सभी देवता और तपस्वी ऋषि-मुनि आनंद से भर गए। रथहीन हो जाने पर रावण की आँखें क्रोध से और भी लाल हो गईं। वह पराक्रमी राजा मान्धाता को ही धराशायी करने के लिए अपनी मुठ्ठी ताने हुए उनकी ओर दौड़ा। यह देखकर मान्धाता ने हँसते हुए कहा, "अरे मूर्ख! हे राक्षसाधम! तू मेरे बल को नहीं जानता।" ऐसा कहकर उन्होंने अपने हाथ के तलवे से रावण के हृदय पर प्रहार कर दिया। मान्धाता का यह प्रहार इतना शक्तिशाली था कि रावण वहीं पर मूर्छित होकर गिर पड़ा। राक्षसों की सेना में हाहाकार मच गया और वे भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगे।

🕉️ श्लोक २१-३२ : रावण की पराजय और क्षमा याचना

स मुष्ट्या ताडितो राम हृदये राक्षसेश्वरः।
पपात सहसा भूमौ मूर्च्छितो विगतज्वरः॥
ततः प्राप्तसमाधानो रावणः प्राह वै नृपम्।
प्रसीद राजशार्दूल क्षान्तमद्य त्वया मम॥
न जानामि बलं तुभ्यं मन्धातः सूर्यनन्दन।
प्रसादं कुरु मे राजन् दासोऽहं तव सुव्रत॥
मन्धाता प्राह धर्मात्मा रावणं प्रणतं तदा।
उत्तिष्ठ राक्षसश्रेष्ठ न भयं विद्यते तव॥
धर्मो जयती नाधर्मो सत्यं जयति नानृतम्।
गच्छ त्वं स्वपुरं वीर मा कृथा दुष्कृतं पुनः॥
रावणः प्राह राजानं प्रसन्नेनान्तरात्मना।
प्रतिजानामि ते राजन्न करिष्ये पुनः क्वचित्॥
तव राज्ये प्रवेक्ष्यामि न चैवान्यत्र दुर्मतेः।
इत्युक्त्वा रावणो राज्ञः प्रदक्षिणमथाकरोत्॥
मन्धाता च वरं प्रादात् सख्यं च समरोचयत्।
गतश्च रावणो लङ्कां प्रणम्य शिरसा नृपम्॥
इत्येषा रावणस्यापि पराजयकथा शुभा।
मन्धातुश्चरितं पुण्यं श्रवणात्पापनाशनम्॥
📖 भावार्थ : राजा मान्धाता के मुष्टिप्रहार से हृदय पर आघात पाकर रावण तत्क्षण मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा। कुछ क्षणों के बाद जब उसे होश आया, तो वह राजा मान्धाता के पास जाकर विनम्रतापूर्वक बोला, "हे राजशार्दूल! मुझ पर प्रसन्न होइए। आज आपने मेरा अहंकार चूर-चूर कर दिया। हे सूर्यनंदन मान्धाता! मैं आपके बल को नहीं जानता था। कृपया मुझ पर कृपा कीजिए। मैं आपका दास हूँ।" धर्मात्मा राजा मान्धाता ने उसे इस प्रकार प्रणाम करते देखा तो उनका हृदय द्रवित हो गया। वे बोले, "हे राक्षसश्रेष्ठ! उठो। तुम्हें किसी प्रकार का भय नहीं है। सदैव स्मरण रखना कि धर्म की ही सदा जीत होती है, अधर्म की नहीं। सत्य की ही जीत होती है, असत्य की नहीं। हे वीर! तुम अब अपनी नगरी लौट जाओ और भविष्य में कभी भी दुष्कर्म मत करना।" रावण ने प्रसन्न अंत:करण से राजा से प्रतिज्ञा की, "हे राजन! मैं आपसे वचन देता हूँ कि न तो कभी आपके राज्य में प्रवेश करूँगा और न ही किसी धार्मिक राजा के राज्य में अनुचित प्रवेश करूँगा।" ऐसा कहकर रावण ने राजा की परिक्रमा की और उन्हें प्रणाम किया। राजा मान्धाता ने प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया और उससे मित्रता भी की। तत्पश्चात रावण राजा को प्रणाम करके लंका की ओर प्रस्थान कर गया। यह रावण की पराजय की पवित्र कथा है, जिसके श्रवण मात्र से समस्त पापों का नाश होता है। इस घटना ने रावण को यह सिखाया कि सच्चा बल केवल शारीरिक बल नहीं, बल्कि धर्म और सत्य की शक्ति है।
ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे षड्विंशः सर्गः ॥
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