उत्तर काण्ड अध्याय 25

रावण द्वारा सूर्य देव को चुनौती

रावण के अहंकार की पराकाष्ठा तब होती है जब वह सूर्य देव को युद्ध के लिए ललकारता है। वह सूर्य के रथ पर चढ़ने का प्रयास करता है, लेकिन सूर्य की शक्ति के सामने उसे पीछे हटना पड़ता है। अन्ततः ब्रह्मा हस्तक्षेप करते हैं और रावण को समझाते हैं।

विवरण

रावण ने अब तक लगभग सभी देवताओं को परास्त कर दिया था या उनसे वरदान प्राप्त कर लिए थे। केवल सूर्य देव शेष थे, जिन्होंने कभी उसकी अधीनता स्वीकार नहीं की थी। रावण ने अपने अहंकार में सूर्य को युद्ध के लिए ललकारा। वह आकाश में सूर्य के रथ के पास पहुँचा और उन्हें रोकने का प्रयास किया। सूर्य ने उसे समझाने की कोशिश की कि वह केवल अपने नियत मार्ग पर चलते हैं और किसी से युद्ध नहीं करते। किन्तु रावण नहीं माना। उसने सूर्य के रथ पर चढ़ने का प्रयास किया, लेकिन सूर्य के तेज से वह जलने लगा। तब ब्रह्मा ने आकर रावण को समझाया कि सूर्य से युद्ध करना असम्भव है और उसे अपने अहंकार को त्यागना चाहिए। रावण ने ब्रह्मा की बात मानी और सूर्य से क्षमा माँगी। सूर्य ने उसे आशीर्वाद दिया।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग २५

(रावण द्वारा सूर्य देव को चुनौती)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चविंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण ने अब तक लगभग सभी देवताओं को परास्त कर दिया था या उनसे वरदान प्राप्त कर लिए थे। केवल सूर्य देव ऐसे थे, जिन्होंने कभी उसकी अधीनता स्वीकार नहीं की। रावण के अहंकार ने उसे सूर्य को भी चुनौती देने पर मजबूर कर दिया। यह सर्ग उसी घटना का वर्णन करता है।

☀️ रावण का सूर्य को चुनौती देना (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततो रावणो दशग्रीवो बालिना सख्यमाप्य च।
प्रहृष्टमनास्तेजस्वी सूर्यलोकं जगाम ह॥
पुष्पकेण विमानेन नानारत्नविचित्रितेन।
दिव्यगन्धानुलेपेन दिव्यमाल्योपशोभितेन॥
ददर्श तत्र सूर्यं तु रथस्थं दीप्ततेजसम्।
सप्ताश्वं सारथियुक्तं लोकचक्षुः प्रभाकरम्॥
रावणः प्राह सूर्यं तु युद्धं देहि मया सह।
न त्वां जानामि किं कार्यं मम लोके त्वयानघ॥
सूर्यः प्राह महाबाहो नाहं युद्धाय निश्चितः।
नियतं वर्तते मार्गं न मे युद्धं कदाचन॥
📖 भावार्थ : रावण ने बालि से मैत्री कर ली थी, अतः वह अत्यन्त प्रसन्न और तेजस्वी था। अब वह सूर्यलोक जाने के लिए प्रस्थित हुआ। वह अपने पुष्पक विमान पर सवार हुआ, जो अनेक रत्नों से जटित था, दिव्य गन्धों से सुगन्धित था और दिव्य मालाओं से सुशोभित था। वहाँ पहुँचकर उसने सूर्यदेव को देखा, जो अपने रथ पर आसीन थे, अत्यन्त दीप्त तेज वाले थे, सात अश्वों से युक्त थे, सारथी सहित थे, और सम्पूर्ण लोकों के चक्षु थे। रावण ने सूर्य से कहा, "हे सूर्य! मुझसे युद्ध करो। मैं नहीं जानता कि तुम मेरे लोक में किस कार्य से आए हो।" सूर्य ने कहा, "हे महाबाहो! मैं युद्ध के लिए निश्चित नहीं हूँ। मैं अपने नियत मार्ग पर चलता हूँ, मुझे कभी युद्ध नहीं करना पड़ता।" यहाँ सूर्य की विनम्रता और अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठा दर्शाई गई है। वे जानते थे कि रावण अहंकार में है, इसलिए उन्होंने उसे समझाने का प्रयास किया। किन्तु रावण अपने अहंकार के कारण कुछ सुनने को तैयार नहीं था।
॥ श्लोक ६-१० ॥
रावणः प्राह सूर्यं तु न चेद्युद्धं प्रदास्यसि।
तव रथमहं स्थास्ये यत्र त्वं वर्तसे सदा॥
इत्युक्त्वा रावणः क्रुद्धो रथमारोढुमुद्यतः।
सूर्यस्य तेजसा दग्धो निपपात महीतले॥
सूर्यः प्राह महाबाहो मा कृथा विक्रमं वृथा।
न शक्यो मम रथोऽऽरोढुं त्वया राक्षसपुङ्गव॥
रावणः क्रोधसंरब्धः पुनरुत्पत्य वीर्यवान्।
रथमारोढुमारब्धः सूर्यस्य दीप्ततेजसः॥
📖 भावार्थ : रावण ने सूर्य से कहा, "यदि तुम मुझे युद्ध नहीं दोगे, तो मैं तुम्हारे रथ पर बैठूँगा, जहाँ तुम सदा रहते हो।" ऐसा कहकर रावण क्रोधित होकर सूर्य के रथ पर चढ़ने का प्रयास करने लगा। किन्तु सूर्य के तेज से वह जलने लगा और धरती पर गिर पड़ा। सूर्य ने कहा, "हे महाबाहो! व्यर्थ ही पराक्रम मत करो। हे राक्षसश्रेष्ठ! मेरे रथ पर चढ़ना तुम्हारे लिए सम्भव नहीं है।" रावण क्रोधित होकर पुनः उठा और सूर्य के रथ पर चढ़ने का प्रयास करने लगा। यहाँ रावण की हठधर्मिता और अहंकार स्पष्ट दिखाई देता है। वह सूर्य के तेज से जलने के बाद भी नहीं माना और पुनः प्रयास किया। यह उसकी मूर्खता का परिचायक है। सूर्य का तेज असह्य था, और रावण जैसा राक्षस भी उसका सामना नहीं कर सकता था।

🧘 ब्रह्मा का हस्तक्षेप (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
तदा ब्रह्मा समागत्य रावणं प्रत्यभाषत।
रावण मा कृथा यत्नं सूर्यस्य रथमारुहे॥
असम्भवोऽयं दशग्रीव सूर्यस्य रथमासदः।
न शक्यो मानुषैः स्प्रष्टुं किं पुनस्त्वं हि राक्षसः॥
रावणः प्राह ब्रह्माणं किं करोमि महामुने।
न मे तृप्तिर्भवेद्युद्धे सूर्येण सह धीमता॥
ब्रह्मा प्राह महाबाहो सूर्येण सह विग्रहः।
न ते युक्तो दशग्रीव तेजसा हि सुदुःसहः॥
त्वं हि ब्रह्मवरात्प्राप्तो बलवान् राक्षसाधिप।
तथापि सूर्यतेजो हि दुर्धर्षं सर्वदेहिनाम्॥
📖 भावार्थ : तब ब्रह्मा जी वहाँ आए और रावण से बोले, "हे रावण! सूर्य के रथ पर चढ़ने का प्रयास मत करो। हे दशग्रीव! सूर्य के रथ तक पहुँचना असम्भव है। मनुष्य तो दूर, तुम राक्षस हो, उसे छू भी नहीं सकते।" रावण ने ब्रह्मा से कहा, "हे महामुने! मैं क्या करूँ? उस बुद्धिमान सूर्य के साथ युद्ध करने की मेरी इच्छा शान्त नहीं होती।" ब्रह्मा ने कहा, "हे महाबाहो! सूर्य के साथ युद्ध तुम्हारे लिए उचित नहीं है, क्योंकि उनका तेज असह्य है। हे राक्षसराज! तुम ब्रह्मा के वरदान से बलवान हो, फिर भी सूर्य का तेज सभी प्राणियों के लिए दुर्धर्ष है।" यहाँ ब्रह्मा ने रावण को समझाने का प्रयास किया कि सूर्य से युद्ध करना व्यर्थ और असम्भव है। उन्होंने रावण के अहंकार को कम करने की कोशिश की, लेकिन रावण की जिद देखते ही बनती थी।
॥ श्लोक १६-२० ॥
रावणः प्राह ब्रह्माणं यदि युद्धं न दास्यति।
सूर्यो मे तपसोग्रेण दहामि सकलं जगत्॥
ब्रह्मा प्राह महाबाहो मा कृथा तपसा वृथा।
सूर्य एव जगत् सर्वं तेजसा धारयत्युत॥
सूर्यमन्तरेण लोको नष्टः स्यात् सचराचरः।
तस्मात् सूर्येण ते सख्यं कुरु राक्षसपुङ्गव॥
रावणः प्राह ब्रह्माणं यदि प्रीतोऽसि मे प्रभो।
तव प्रसादात् सूर्येण सख्यं मे अस्तु न संशयः॥
ब्रह्मा प्राह तथा चैवं भविष्यति न संशयः।
सूर्यस्ते प्रीतिमान् राजन् दास्यति वरमुत्तमम्॥
📖 भावार्थ : रावण ने ब्रह्मा से कहा, "यदि सूर्य मुझसे युद्ध नहीं करेंगे, तो मैं अपने उग्र तप से सम्पूर्ण जगत को जला दूँगा।" ब्रह्मा ने कहा, "हे महाबाहो! व्यर्थ तप मत करो। सूर्य ही अपने तेज से सम्पूर्ण जगत को धारण किए हुए हैं। सूर्य के बिना यह सारा चराचर जगत नष्ट हो जाएगा। इसलिए हे राक्षसश्रेष्ठ! तुम सूर्य से मित्रता करो।" रावण ने ब्रह्मा से कहा, "हे प्रभो! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो आपकी कृपा से सूर्य से मेरी मित्रता हो, इसमें संशय नहीं।" ब्रह्मा ने कहा, "ऐसा ही होगा, इसमें संशय नहीं। हे राजन्! सूर्य तुमसे प्रसन्न होंगे और तुम्हें उत्तम वरदान देंगे।" इस प्रकार ब्रह्मा ने रावण को समझा दिया कि सूर्य से युद्ध करना उचित नहीं है, बल्कि उनसे मित्रता करना ही हितकर होगा। रावण ने भी अन्ततः ब्रह्मा की बात मान ली। यह रावण के चरित्र का एक पक्ष है कि वह ब्रह्मा का आदर करता था और उनकी बात मान लेता था।

🙏 रावण की क्षमा याचना और सूर्य का आशीर्वाद (श्लोक २१-२५)

॥ श्लोक २१-२५ ॥
रावणः प्राञ्जलिर्भूत्वा सूर्यं प्रोवाच राक्षसः।
क्षमस्व मम दौरात्म्यं यन्मया त्वं समाह्वतः॥
सूर्यः प्राह महाबाहो न मे क्रोधस्त्वयि प्रभो।
प्रीतोऽस्मि तव वीर्येण सत्येन च बलेन च॥
वरं वृणीष्व दशग्रीव यत्ते मनसि वर्तते।
ददामि ते महाबाहो दुर्लभं यदपि स्मरेत्॥
रावणः प्राह धर्मज्ञ यदि प्रीतोऽसि मे प्रभो।
तव प्रसादात् सततं सूर्यलोके भयं न हि॥
मम प्रजासु धर्मज्ञ मा त्वं क्रोधं करिष्यसि।
ये च मद्वशगा लोका न तेषां सूर्यपीडनम्॥
सूर्यः प्राह तथा चैवं भविष्यति न संशयः।
ये त्वां न पूजयिष्यन्ति तेषां दण्डो भविष्यति॥
इत्युक्त्वा सूर्यराट् तूर्णं जगाम स्वं रथं प्रति।
रावणोऽपि महातेजा लङ्कामेव जगाम ह॥
📖 भावार्थ : रावण ने हाथ जोड़कर सूर्य से कहा, "हे सूर्यदेव! मैंने आपको युद्ध के लिए बुलाया, उस मेरे दुरात्म्य को क्षमा करें।" सूर्य ने कहा, "हे महाबाहो! मुझे तुमसे कोई क्रोध नहीं है। मैं तुम्हारे वीर्य, सत्य और बल से प्रसन्न हूँ। हे दशग्रीव! तुम कोई वर माँग लो, जो तुम्हारे मन में हो। मैं वह दुर्लभ वर भी दे सकता हूँ, जो किसी को सहज में न मिले।" रावण ने कहा, "हे धर्मज्ञ! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो वर यह है कि आपकी कृपा से मेरी प्रजा को सूर्यलोक (सूर्य के ताप) का भय न हो। हे धर्मज्ञ! मेरी प्रजा पर आप क्रोध न करें। जो लोग मेरे वश में हैं, उन्हें सूर्य की पीड़ा न सहनी पड़े।" सूर्य ने कहा, "ऐसा ही होगा, इसमें संशय नहीं। किन्तु जो तुम्हारी पूजा नहीं करेंगे, उन्हें दण्ड मिलेगा।" ऐसा कहकर सूर्य अपने रथ पर चढ़कर चले गए। रावण भी लंका लौट आया। इस प्रकार रावण ने सूर्य से भी वरदान प्राप्त कर लिया, जिससे उसका गौरव और भी बढ़ गया। उसने फिर से अपनी प्रजा के कल्याण के लिए वर माँगा, जो उसके शासकीय गुणों को दर्शाता है। यह घटना रावण के अहंकार और उसकी प्रजा के प्रति चिन्ता के द्वंद्व को उजागर करती है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

☀️ सूर्य का तेज

सूर्य का तेज अद्वितीय है। रावण जैसा बलशाली राक्षस भी उसके सामने टिक नहीं सका। यह दर्शाता है कि सूर्य सभी प्राणियों के जीवन का आधार हैं और उनकी शक्ति के सामने कोई नहीं ठहर सकता। रावण का जलना इसी तेज का प्रतीक है।

🧠 रावण की मूर्खता

रावण ने सूर्य को चुनौती देकर अपनी मूर्खता का परिचय दिया। वह यह नहीं समझ पाया कि सूर्य का तेज असह्य है और उनसे युद्ध करना असम्भव है। यह उसके अहंकार का परिणाम था, जिसने उसे अंधा बना दिया था।

🧘 ब्रह्मा की भूमिका

ब्रह्मा ने पुनः हस्तक्षेप करके रावण को समझाया। उन्होंने रावण को बताया कि सूर्य के बिना जगत का अस्तित्व नहीं है। यह दर्शाता है कि ब्रह्मा सृष्टि के संतुलन के प्रति सचेत थे और वे रावण को इस संतुलन को बिगाड़ने से रोकना चाहते थे।

👑 प्रजा के प्रति चिन्ता

रावण ने पुनः अपनी प्रजा के कल्याण के लिए वर माँगा। उसने सूर्य से वरदान माँगा कि उसकी प्रजा को अत्यधिक गर्मी या सूर्य के ताप से पीड़ा न हो। यह उसके शासकीय गुणों को दर्शाता है, कि वह अपनी प्रजा के सुख-दुःख का ध्यान रखता था।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से यह शिक्षा मिलती है कि अहंकार मनुष्य को अंधा बना देता है। रावण ने सूर्य को चुनौती देकर अपनी सीमाओं को पार कर दिया। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने क्षमा माँगी, जो सराहनीय है। फिर भी, उसका अहंकार शीघ्र ही पुनः प्रबल हो गया। सीख यही है कि हमें अपनी सीमाओं का ज्ञान होना चाहिए और अहंकार से दूर रहना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे पञ्चविंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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