उत्तर काण्ड अध्याय 24

रावण की बालि से भेंट

रावण अपनी दिग्विजय यात्रा के दौरान किष्किन्धा जाता है और वानरराज बालि से भेंट करता है। दोनों में मैत्री होती है और बालि रावण की शक्ति को स्वीकार करता है।

विवरण

रावण ने अनेक लोकों पर विजय प्राप्त कर ली थी, किन्तु वानरराज बालि से अभी तक उसकी भेंट नहीं हुई थी। वह किष्किन्धा गया और वहाँ बालि से मिला। बालि ने उसका स्वागत किया। रावण ने बालि की शक्ति को परखना चाहा, किन्तु बालि ने अपनी विनम्रता और शक्ति का परिचय दिया। दोनों में मैत्री हुई। बालि ने रावण की शक्ति की प्रशंसा की और रावण ने बालि के पराक्रम को सराहा। यह मुलाकात बिना किसी युद्ध के समाप्त हुई। बालि ने रावण को अपना मित्र मान लिया। इस घटना से यह स्पष्ट होता है कि बालि इतना शक्तिशाली था कि रावण ने उससे युद्ध करना उचित नहीं समझा, या फिर दोनों ने परस्पर सम्मान के कारण मित्रता का मार्ग चुना।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग २४

(रावण की बालि से भेंट)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुर्विंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण ने देवताओं, दानवों और मनुष्यों सहित समस्त लोकों पर विजय प्राप्त कर ली थी। केवल वानरराज बालि ऐसे थे, जिनसे उसकी भेंट नहीं हुई थी। वह उनसे मिलने किष्किन्धा गया। यह सर्ग उस मुलाकात का वर्णन करता है, जो मित्रता में परिणत हुई।

🚩 रावण का किष्किन्धा आगमन (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततो रावणो दशग्रीवो वरुणालयाद् विनिर्जितात्।
प्रहृष्टमनास्तेजस्वी किष्किन्धां प्रति जग्मिवान्॥
पुष्पकेण विमानेन नानारत्नविचित्रितेन।
दिव्यगन्धानुलेपेन दिव्यमाल्योपशोभितेन॥
ददर्श तत्र वानरेन्द्रं बालिनं बलिनां वरम्।
महाबलं महावीर्यं सुग्रीवसहितं तदा॥
बालिश्च रावणं दृष्ट्वा विमानस्थं महाबलम्।
स्वागतं ते महाबाहो इत्युक्त्वा समुपस्थितः॥
रावणोऽपि महातेजा बालिना पूजितः सताम्।
अवतीर्य विमानात्तु बालिनं समुपागमत्॥
📖 भावार्थ : रावण ने वरुणलोक पर विजय प्राप्त कर ली थी, इसलिए वह अत्यन्त प्रसन्न और तेजस्वी था। अब वह किष्किन्धा की ओर प्रस्थित हुआ। वह अपने पुष्पक विमान पर सवार हुआ, जो अनेक रत्नों से जटित था, दिव्य गन्धों से सुगन्धित था और दिव्य मालाओं से सुशोभित था। वहाँ पहुँचकर उसने वानरराज बालि को देखा, जो बलवानों में श्रेष्ठ थे, महाबलशाली और महावीर्य थे, और उस समय सुग्रीव के साथ थे। बालि ने रावण को विमान में देखा, तो वे तुरंत उनके पास आए और बोले, "हे महाबाहो! आपका स्वागत है।" रावण भी बालि द्वारा पूजित होकर विमान से उतरा और बालि के पास गया। यहाँ यह देखना महत्वपूर्ण है कि रावण ने किसी भी अन्य लोक की तरह किष्किन्धा पर आक्रमण नहीं किया, बल्कि वह बालि से मिलने गया। यह संकेत करता है कि रावण बालि की शक्ति से परिचित था और उनका सम्मान करता था। बालि ने भी रावण का स्वागत किया, जो दोनों के परस्पर सम्मान को दर्शाता है।
॥ श्लोक ६-१० ॥
बालिना सत्कृतो रामस्तत्र तस्थौ महाबलः।
उपविष्टः सुखं तत्र बालिना सह राक्षसः॥
बालिः प्रोवाच दशग्रीवं रावणं राक्षसाधिपम्।
किं कार्यं तव दशग्रीव किमर्थमिह आगतः॥
रावणः प्राह धर्मज्ञ शृणु यत्कारणं मम।
भवन्तं द्रष्टुकामोऽहमागतो नात्र संशयः॥
श्रुतं ते बलमव्यग्रं विक्रमश्च महाबल।
तस्माद्दिदृक्षुस्ते वीर्यमागतोऽहं नृपोत्तम॥
बालिः प्राह महाबाहो धन्योऽस्मि यदिहागतः।
त्वया सार्धं मम सख्यं भवतु राक्षसाधिप॥
📖 भावार्थ : बालि ने रावण का यथोचित सत्कार किया और वहाँ वह महाबलशाली राक्षस सुखपूर्वक बैठा। बालि ने रावण से पूछा, "हे दशग्रीव! तुम्हारा यहाँ आने का क्या प्रयोजन है? तुम किस कार्य से आए हो?" रावण ने कहा, "हे धर्मज्ञ! सुनो, मैं तुम्हें देखने की इच्छा से आया हूँ, इसमें संशय नहीं। मैंने तुम्हारे अद्भुत बल और पराक्रम की बहुत चर्चा सुनी है। इसलिए हे नृपोत्तम! मैं तुम्हारे वीर्य को देखने के लिए आया हूँ।" बालि ने कहा, "हे महाबाहो! मैं धन्य हूँ कि तुम यहाँ आए। हे राक्षसराज! मुझसे तुम्हारी मैत्री हो।" यहाँ बालि ने रावण की प्रशंसा सुनकर तुरंत मित्रता का प्रस्ताव रख दिया। यह बालि के उदार स्वभाव को दर्शाता है। वह रावण की शक्ति से परिचित थे और उनसे मित्रता करना चाहते थे। रावण भी बालि के सम्मान में विनम्र था, जो उसके चरित्र का एक दुर्लभ पक्ष है।

🤝 बालि और रावण की मैत्री (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततः प्रीतो दशग्रीवो बालिना सह संगतः।
प्रशशंस महात्मानं बालिनं वाक्यमब्रवीत्॥
बाले तव बलं दृष्ट्वा प्रीतिर्मे परमा भवेत्।
यदि त्वं दर्शयेर्वीर्यं क्रीडमानो मया सह॥
बालिः प्राह महाबाहो यदि त्वं योद्धुमिच्छसि।
तथापि ते करिष्यामि युद्धं प्रीतिकरं महत्॥
इत्युक्त्वा बालिना सार्धं रावणो योद्धुमुद्यतः।
बालिश्चापि महातेजा रावणेन सहाचलत्॥
तयोर्युद्धं समभवद्देवासुरसमं महत्।
बाले रावणयो राजन् लोकविश्रुतविक्रमौ॥
📖 भावार्थ : रावण बालि से मिलकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ। उसने उस महात्मा बालि की प्रशंसा की और कहा, "हे बालि! मैं तुम्हारा बल देखना चाहता हूँ। यदि तुम मेरे साथ क्रीड़ा करते हुए अपना वीर्य दिखाओ, तो मुझे परम प्रीति होगी।" बालि ने कहा, "हे महाबाहो! यदि तुम युद्ध करना चाहते हो, तो मैं तुम्हें प्रीतिकर महान युद्ध दूँगा।" ऐसा कहकर बालि के साथ रावण युद्ध के लिए तैयार हो गया। बालि भी महातेजस्वी थे, वे रावण के साथ युद्ध करने को आगे बढ़े। उन दोनों के बीच ऐसा युद्ध छिड़ा, जो देवासुर संग्राम के समान भयंकर था। बालि और रावण दोनों ही लोकविश्रुत विक्रमशाली वीर थे। यहाँ यह ध्यातव्य है कि यह युद्ध केवल मैत्रीपूर्ण था, घातक नहीं। दोनों एक-दूसरे की शक्ति को परखना चाहते थे।
॥ श्लोक १६-२० ॥
बालिरावणयोर्युद्धं त्रैलोक्यं समकम्पयत्।
देवा ऋषयो गन्धर्वा द्रष्टुं समाययुस्तदा॥
रावणो मुमुचे बाणान् बालेरुपरि दारुणान्।
बालिस्तान् मुष्टिना सर्वान् न्यवारयदमर्षणः॥
ततो रावण चुक्रोध गदामादाय वीर्यवान्।
बालेरुपरि चिक्षेप गदां कालानलप्रभाम्॥
बालिस्तां गदां दृष्ट्वा मुष्टिना समताडयत्।
पपात सा गदा भूमौ छिन्ना मुष्टिप्रहारतः॥
रावणः क्रोधसंरब्धो ब्रह्मास्त्रं संदधे तदा।
बालिरपि महातेजा वज्रास्त्रं समयोजयत्॥
📖 भावार्थ : बालि और रावण के उस युद्ध से सम्पूर्ण तीनों लोक काँप उठे। देवता, ऋषि और गन्धर्व उस युद्ध को देखने के लिए एकत्रित हो गए। रावण ने बालि पर घोर बाणों की वर्षा कर दी। बालि ने अपनी मुट्ठी से उन सभी बाणों का निवारण कर दिया। तब रावण ने क्रोध में आकर अपनी भयंकर गदा उठाई, जो प्रलयकालीन अग्नि के समान दहक रही थी, और बालि पर फेंक दी। बालि ने उस गदा को देखा और अपनी मुट्ठी से उस पर प्रहार किया, जिससे वह गदा कटकर धरती पर गिर पड़ी। अब रावण ने क्रोधित होकर ब्रह्मास्त्र का संधान किया। बालि ने भी महातेजस्वी होकर वज्रास्त्र का प्रयोग किया। यहाँ बालि की शक्ति का अद्भुत प्रदर्शन हुआ। उन्होंने बिना किसी अस्त्र के, केवल अपनी मुट्ठी से रावण के अस्त्रों का निवारण किया। यह बालि के असाधारण बल का प्रमाण था। रावण ने ब्रह्मास्त्र तक का प्रयोग किया, जिसका उत्तर बालि ने वज्रास्त्र से दिया। यह युद्ध अब और अधिक भयंकर हो गया था।

🕊️ युद्ध समाप्ति और मैत्री (श्लोक २१-२५)

॥ श्लोक २१-२५ ॥
ब्रह्मास्त्रं वज्रास्त्रं च समेतं तुमुलं महत्।
दृष्ट्वा देवाः सवित्रस्ता ब्रह्माणं शरणं ययुः॥
ब्रह्मा समागत्य तदा रावणं बालिनं तथा।
निवारयामास तयोर्युद्धं देवगणैः सह॥
रावण बालिनौ चैव मा युद्धं कुरुतं नृपौ।
युवां बलविनौ वीरौ वरदानेन दर्पितौ॥
इत्युक्त्वा ब्रह्मणा ताभ्यां युद्धं संस्थापितं तदा।
बालिः प्रशस्य रावणं रावणोऽपि च बालिनम्॥
ततः प्रीतौ सुखासीनौ चक्रतुः सख्यमुत्तमम्।
बालिः प्रादाद्वरं तस्मै रावणाय महात्मने॥
📖 भावार्थ : ब्रह्मास्त्र और वज्रास्त्र के टकराव से उत्पन्न भयंकर युद्ध को देखकर सभी देवता भयभीत हो गए और वे ब्रह्मा की शरण में गए। ब्रह्मा जी तुरंत वहाँ आए और देवताओं के साथ मिलकर उन दोनों का युद्ध रोक दिया। उन्होंने कहा, "हे रावण और बालि! तुम दोनों युद्ध मत करो। तुम दोनों बलवान और वीर हो, और वरदानों के मद में चूर हो। तुम्हारा युद्ध अनुचित है।" ब्रह्मा के आदेश से युद्ध समाप्त हो गया। बालि ने रावण की प्रशंसा की और रावण ने बालि की प्रशंसा की। तब दोनों प्रसन्न होकर सुखपूर्वक बैठे और उन्होंने परस्पर उत्तम मैत्री की। बालि ने उस महात्मा रावण को वरदान दिया। यहाँ ब्रह्मा का पुनः हस्तक्षेप यह दर्शाता है कि रावण के युद्ध अब देवताओं के लिए चिन्ता का विषय बन गए थे। बालि और रावण दोनों ही अद्वितीय योद्धा थे और उनका युद्ध सृष्टि के लिए संकट उत्पन्न कर सकता था। अतः ब्रह्मा ने उसे रोका। दोनों ने एक-दूसरे की वीरता की प्रशंसा की और मैत्री स्थापित की। यह मैत्री आगे चलकर रामायण की कथा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, क्योंकि बालि का भाई सुग्रीव राम का मित्र बनता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🐒 बालि का पराक्रम

इस सर्ग में बालि के असाधारण पराक्रम का वर्णन है। उन्होंने बिना किसी अस्त्र के, केवल अपनी मुट्ठी से रावण के अस्त्रों का निवारण किया। यह बालि की अद्वितीय शक्ति को दर्शाता है, जिसके कारण रावण ने उनसे युद्ध करने का साहस नहीं किया और मित्रता का मार्ग चुना।

🤝 रावण की कूटनीति

रावण ने बालि से युद्ध न करके मित्रता का मार्ग चुना। यह उसकी कूटनीतिक बुद्धि को दर्शाता है। वह जानता था कि बालि से युद्ध करना उचित नहीं है, इसलिए उसने उनसे मैत्री कर ली। यह उसके चरित्र का एक व्यावहारिक पक्ष है।

🧘 ब्रह्मा का हस्तक्षेप

ब्रह्मा का बार-बार हस्तक्षेप यह संकेत करता है कि रावण की शक्ति अब सृष्टि के संतुलन के लिए खतरा बन चुकी थी। उन्होंने बालि और रावण के युद्ध को भी रोका, क्योंकि यह और अधिक विनाशकारी हो सकता था। यह दर्शाता है कि देवता रावण से भयभीत थे।

🔄 परस्पर सम्मान

रावण और बालि ने एक-दूसरे की वीरता की प्रशंसा की। यह दर्शाता है कि यद्यपि रावण अहंकारी था, फिर भी वह योग्य प्रतिद्वंद्वी का सम्मान करता था। बालि ने भी रावण की शक्ति को स्वीकार किया। यह आदर्श योद्धा के गुण हैं।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से यह शिक्षा मिलती है कि बल के साथ-साथ बुद्धि का प्रयोग भी आवश्यक है। रावण ने बालि से युद्ध न करके मित्रता का मार्ग चुना, जो उसकी बुद्धिमत्ता को दर्शाता है। साथ ही, योग्य प्रतिद्वंद्वी का सम्मान करना भी एक महान गुण है। परन्तु यह भी स्मरण रखना चाहिए कि मित्रता भी धर्म के अनुरूप होनी चाहिए; रावण की मित्रता अधर्म पर आधारित थी, जिसका परिणाम अंततः बुरा ही हुआ।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे चतुर्विंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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