उत्तर काण्ड अध्याय 23

रावण का वरुण के पुत्रों से संघर्ष

रावण वरुणलोक जाता है और वरुण के पुत्रों से युद्ध करता है। वह उन्हें परास्त करता है और वरुण से वरदान प्राप्त करता है कि उसकी प्रजा को जल से भय न हो।

विवरण

रावण ने यमराज पर विजय प्राप्त करने के बाद अब वरुणलोक पर आक्रमण करने का निश्चय किया। वह अपनी सेना सहित वरुणलोक पहुँचा, जहाँ वरुण के पुत्रों ने उसका विरोध किया। रावण ने उनसे घोर युद्ध किया और उन्हें परास्त कर दिया। तब वरुण स्वयं प्रकट हुए और उन्होंने रावण की वीरता की प्रशंसा करते हुए उसे वरदान दिया। रावण ने वरदान माँगा कि उसकी प्रजा को जल से उत्पन्न भय न हो। वरुण ने यह वर दे दिया। इस प्रकार रावण ने जल के देवता वरुण को भी अपने वश में कर लिया।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग २३

(रावण का वरुण के पुत्रों से संघर्ष)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रयोविंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : यमराज पर विजय के बाद रावण का अहंकार और भी बढ़ गया। अब उसने जल के देवता वरुण को जीतने का निश्चय किया। वह अपनी सेना सहित वरुणलोक पहुँचा, जहाँ वरुण के पुत्रों ने उसका सामना किया। यह सर्ग उसी संघर्ष का वर्णन करता है।

🚩 रावण का वरुणलोक प्रस्थान (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततो रावणो दशग्रीवो यमलोकाद् विनिर्जितात्।
प्रहृष्टमनास्तेजस्वी वरुणस्य पुरं ययौ॥
पुष्पकेण विमानेन नानारत्नविचित्रितेन।
दिव्यगन्धानुलेपेन दिव्यमाल्योपशोभितेन॥
ददर्श तत्र वरुणं सपुत्रं सबलानुगम्।
समुद्रतनयैः सार्धं नदीभिश्च सरिद्वरैः॥
वरुणस्य सुता वीराः पुष्करश्चापरे तथा।
ते दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रं तं समुत्पेतुः समन्ततः॥
रावणोऽपि महातेजास्तान् दृष्ट्वा समुपस्थितान्।
गदामुद्यम्य चिक्षेप तेषां मध्ये महाबलः॥
📖 भावार्थ : रावण ने यमलोक पर विजय प्राप्त कर ली थी, इसलिए वह अत्यन्त प्रसन्न और तेजस्वी था। अब वह वरुण की नगरी जाने के लिए प्रस्थान किया। वह अपने पुष्पक विमान पर सवार हुआ, जो अनेक रत्नों से जटित था, दिव्य गन्धों से सुगन्धित था और दिव्य मालाओं से सुशोभित था। वहाँ पहुँचकर उसने वरुण को उनके पुत्रों, सेना और अनुचरों के साथ देखा। वरुण के साथ समुद्र की नदियाँ और सरिताएँ भी थीं। वरुण के पुत्र, विशेषकर पुष्कर और अन्य, अत्यन्त वीर थे। उन्होंने रावण को देखते ही चारों ओर से घेर लिया। रावण ने उन्हें अपनी ओर आते देखा, तो उसने अपनी गदा उठाई और उनके बीच में फेंक दिया। यहाँ रावण का वरुणलोक पर आक्रमण का उद्देश्य केवल अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना था। वह किसी भी देवता को अजेय नहीं मानता था। वरुण के पुत्रों का उसका सामना करना उनके साहस को दर्शाता है, परन्तु रावण के बल के सामने वे टिक नहीं पाए। यह घटना रावण की अदम्य विजय यात्रा का हिस्सा है, जिसमें वह एक-एक करके सभी देवताओं को परास्त करता जा रहा था। (विस्तृत वर्णन में वरुणलोक के सौन्दर्य, वरुण के पुत्रों के पराक्रम और रावण के आत्मविश्वास का बड़ा ही सजीव चित्रण है।)
॥ श्लोक ६-१० ॥
गदापातेन महता पुष्करो मूर्छितोऽपतत्।
अन्येऽपि वरुणपुत्रा गदाभिः पर्वतोपमाः॥
अभ्यधावन्त दशग्रीवं सर्व एव समन्ततः।
रावणोऽपि गदां गृह्य तेषामस्त्राण्यवारयत्॥
ततः शूलं समादाय रावणो राक्षसाधिपः।
तेषां मध्ये महाघोरं चिक्षेप ज्वलनप्रभम्॥
तेन शूलेन विद्धास्ते पेतुर्भूमौ सुदारुणाः।
वरुणस्य सुताः सर्वे रुधिरौघप्रतिच्छन्नाः॥
वरुणस्तु तदा दृष्ट्वा पुत्रान् निहतविक्रमान्।
क्रोधसंरक्तनयनो रावणं प्रत्ययुध्यत॥
📖 भावार्थ : रावण की गदा के भीषण प्रहार से पुष्कर मूर्छित होकर गिर पड़ा। शेष वरुणपुत्र, जो पर्वत के समान विशाल थे, गदाएँ लेकर चारों ओर से रावण पर टूट पड़े। रावण ने अपनी गदा से उनके अस्त्रों का निवारण किया। फिर उसने अपना भयंकर शूल उठाया, जो धधकती अग्नि के समान प्रज्वलित था, और उसे उनके बीच फेंक दिया। उस शूल के प्रहार से वे सभी वरुणपुत्र बुरी तरह घायल होकर धरती पर गिर पड़े, उनके शरीर से रुधिर की धाराएँ बहने लगीं। जब वरुण ने अपने पुत्रों को इस प्रकार पराजित देखा, तो उनकी आँखें क्रोध से लाल हो गईं और वे स्वयं रावण से युद्ध करने के लिए आगे बढ़े। यहाँ वरुण का पितृ-प्रेम और उनका क्रोध दोनों ही स्पष्ट होते हैं। वे अपने पुत्रों की दुर्दशा देखकर अत्यन्त व्यथित हुए और रावण को दण्ड देने का निश्चय किया। यह युद्ध अब वरुण और रावण के बीच होने वाला था, जो निश्चित ही और भी भयंकर होगा। रावण ने वरुणपुत्रों को परास्त करके एक बार फिर अपनी शक्ति का लोहा मनवा दिया था।

⚔️ रावण-वरुण युद्ध (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
वरुणः प्राह दशग्रीवं रावणं राक्षसाधिपम्।
किं त्वया मम पुत्राणां कृतं कर्म सुदारुणम्॥
न त्वां जानामि किं कार्यं मम लोके त्वयानघ।
वद किं त्वमिह प्राप्तः किं वा ते मनसि स्थितम्॥
रावणः प्राह धर्मज्ञ शृणु यत्कारणं मम।
युद्धार्थी त्वामिह प्राप्तः कुरु युद्धं मया सह॥
वरुणः प्राह महाबाहो युद्धं दास्यामि तेऽधुना।
यदि शक्नोषि संग्रामे स्थातुं मम पुरो नर॥
इत्युक्त्वा वरुणः क्रुद्धः पाशमुद्यम्य वीर्यवान्।
अभिदुद्राव दशग्रीवं संरम्भाद्राक्षसेश्वरम्॥
📖 भावार्थ : वरुण ने क्रोधित होकर रावण से पूछा, "हे राक्षसराज! तुमने मेरे पुत्रों के साथ ऐसा भयंकर व्यवहार क्यों किया? मैं नहीं जानता कि तुम मेरे लोक में किस कार्य से आए हो। बताओ, तुम यहाँ क्यों आए हो और तुम्हारे मन में क्या है?" रावण ने उत्तर दिया, "हे धर्मज्ञ! सुनो, मैं युद्ध की इच्छा से तुम्हारे पास आया हूँ। मुझसे युद्ध करो।" वरुण ने कहा, "हे महाबाहो! मैं तुम्हें युद्ध दूँगा। यदि तुम मेरे सामने युद्ध में ठहर सकते हो तो ठहरो।" यह कहकर वरुण ने अपना भयंकर पाश (फंदा) उठाया और अत्यन्त क्रोध में आकर रावण पर धावा बोल दिया। यहाँ वरुण का क्रोध स्वाभाविक था, क्योंकि उनके पुत्रों को रावण ने बुरी तरह परास्त किया था। वरुण जल के देवता हैं और उनका पाश अद्वितीय अस्त्र है, जिससे वह किसी को भी बाँध सकते हैं। रावण ने उन्हें युद्ध की चुनौती दी, जिसे वरुण ने स्वीकार कर लिया। अब यह युद्ध देखते ही बनता था कि क्या रावण वरुण के पाश का सामना कर पाता है या नहीं।
॥ श्लोक १६-२० ॥
तयोर्युद्धं समभवद्देवासुरसमं महत्।
वरुणस्य रावणस्यापि लोकविश्रुतविक्रमौ॥
रावणो मुमुचे बाणान् वरुणस्योपरि दारुणान्।
वरुणोऽपि चिच्छिदे तूर्णं तान् बाणान् पाशमण्डलैः॥
ततो रावण कोपेन गदामादाय वीर्यवान्।
वरुणस्योपरि चिक्षेप गदां कालानलप्रभाम्॥
वरुणोऽपि तां गदां दृष्ट्वा पाशेन समताडयत्।
पपात सा गदा भूमौ छिन्ना पाशेन वेगिता॥
ततो रावण चुक्रोध शूलमादाय दारुणम्।
प्राहिणोद्वरुणायैव प्रज्वलन्तं हुताशनम्॥
📖 भावार्थ : उन दोनों महावीरों के बीच ऐसा युद्ध छिड़ा, जो देवासुर संग्राम के समान भयंकर था। रावण ने वरुण पर घोर बाणों की वर्षा कर दी। वरुण ने अपने पाश के घेरे से उन सब बाणों को काट गिराया। तब रावण ने क्रोध में आकर अपनी भयंकर गदा उठाई, जो प्रलयकालीन अग्नि के समान दहक रही थी, और वरुण पर फेंक दी। वरुण ने उस गदा को अपने पाश से बलपूर्वक पीटा, जिससे वह कटकर धरती पर गिर पड़ी। अब रावण ने और भी क्रोधित होकर अपना दारुण शूल उठाया, जो धधकती अग्नि के समान प्रज्वलित हो रहा था, और वरुण की ओर फेंक दिया। यहाँ यह देखिए कि रावण ने जब भी कोई अस्त्र चलाया, वरुण ने अपने पाश से उसका निवारण किया। वरुण का पाश अद्वितीय था, जिसके सामने कोई भी अस्त्र टिक नहीं सकता था। किन्तु रावण भी अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने में पीछे नहीं था। उसने अनेक दिव्यास्त्रों का प्रयोग किया, जिनसे वरुण भी चकित रह गए। यह युद्ध केवल बल का नहीं, वरन् अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञान और उनके प्रतिकार का अद्भुत संगम था।
॥ श्लोक २१-२५ ॥
वरुणो दृष्ट्वा महाशूलं ज्वलन्तं दीप्ततेजसम्।
पाशेनापातयत् क्रुद्धस्तच्छूलं शतधा च सः॥
रावणः क्रोधसंरब्धो ब्रह्मास्त्रं संदधे तदा।
वरुणोऽपि पाशमुद्यम्य वारुणास्त्रं न्यवारयत्॥
ततः प्रववृते युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम्।
देवा ऋषयो गन्धर्वा द्रष्टुं समाययुस्तदा॥
एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा समागत्य स्वयं प्रभुः।
निवारयामास तयोर्युद्धं देवगणैः सह॥
रावण वरुणौ चैव मा युद्धं कुरुतं नृपौ।
रावणो बलवांश्चैव वरुणश्च महाबलः॥
इत्युक्त्वा ब्रह्मणा ताभ्यां युद्धं संस्थापितं तदा।
वरुणः प्रशस्य रावणं ययौ स्वभवनं प्रति॥
📖 भावार्थ : वरुण ने उस प्रज्वलित महाशूल को देखा और क्रोध में आकर अपने पाश से उस पर प्रहार किया, जिससे वह शूल सैकड़ों टुकड़ों में बिखर गया। तब रावण ने ब्रह्मास्त्र का संधान किया। वरुण ने भी पाश उठाकर वारुणास्त्र से उसका निवारण किया। इस प्रकार वह युद्ध अत्यन्त भयंकर और रोमांचकारी हो गया। देवता, ऋषि और गन्धर्व भी इस अद्वितीय युद्ध को देखने के लिए एकत्र हो गए। तभी स्वयं ब्रह्मा जी वहाँ प्रकट हुए। उन्होंने दोनों को युद्ध रोकने का आदेश दिया। ब्रह्मा ने कहा, "हे रावण और वरुण! तुम दोनों युद्ध मत करो। रावण महान बलशाली है और वरुण भी महाबलवान हैं। तुम दोनों का युद्ध अनुचित है।" ब्रह्मा के आदेश से युद्ध समाप्त हो गया। वरुण ने रावण की वीरता की प्रशंसा की और अपने लोक को लौट गए। इस प्रकार रावण की वरुण पर विजय नहीं हुई, किन्तु उसकी वीरता सबने स्वीकार की। ब्रह्मा का हस्तक्षेप यह सिद्ध करता है कि रावण का अहंकार अब सीमा पार कर चुका था और उसे रोकना आवश्यक था। वरुण की प्रशंसा ने रावण के अहंकार को और बढ़ावा दिया, जो आगे चलकर उसके पतन का कारण बना।

🙏 वरुण का वरदान और युद्ध समाप्ति (श्लोक २६-३०)

॥ श्लोक २६-३० ॥
वरुणः प्राह दशग्रीवं प्रीतियुक्तेन चेतसा।
प्रीतोऽहं तव वीर्येण सत्येन च बलेन च॥
वरं वृणीष्व दशग्रीव यत्ते मनसि वर्तते।
ददामि ते महाबाहो दुर्लभं यदपि स्मरेत्॥
रावणः प्राह धर्मज्ञ यदि प्रीतोऽसि मे प्रभो।
तव प्रसादात् सततं वरुणालये भयं न हि॥
मम प्रजासु धर्मज्ञ मा त्वं क्रोधं करिष्यसि।
ये च मद्वशगा लोका न तेषां वरुणपीडनम्॥
वरुणः प्राह तथा चैवं भविष्यति न संशयः।
ये त्वां न पूजयिष्यन्ति तेषां दण्डो भविष्यति॥
इत्युक्त्वा वरुणः स्नेहात् स्वं लोकं प्रत्यपद्यत।
रावणोऽपि महातेजा लङ्कामेव जगाम ह॥
📖 भावार्थ : वरुण ने प्रसन्न होकर रावण से कहा, "हे दशग्रीव! मैं तुम्हारे पराक्रम, सत्य और बल से अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम कोई वर माँग लो, जो तुम्हारे मन में हो। मैं वह दुर्लभ वर भी दे सकता हूँ, जो किसी को सहज में न मिले।" रावण ने कहा, "हे धर्मज्ञ! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो वर यह है कि आपकी कृपा से मेरी प्रजा को वरुणलोक (जल से उत्पन्न) का भय न हो। हे धर्मज्ञ! मेरी प्रजा पर आप क्रोध न करें। जो लोग मेरे वश में हैं, उन्हें वरुण की पीड़ा न सहनी पड़े।" वरुण ने कहा, "ऐसा ही होगा, इसमें संशय नहीं। किन्तु जो तुम्हारी पूजा नहीं करेंगे, उन्हें दण्ड मिलेगा।" ऐसा कहकर वरुण स्नेहपूर्वक अपने लोक को लौट गए। रावण भी लंका लौट आया। यहाँ रावण की यह विशेषता देखने योग्य है कि उसने अपने लिए नहीं, वरन् अपनी प्रजा के कल्याण के लिए वर माँगा। यद्यपि रावण अहंकारी था, फिर भी वह अपनी प्रजा का हितैषी था। वरुण का वरदान पाकर रावण और अधिक शक्तिशाली हो गया और उसका आत्मविश्वास चरम पर पहुँच गया। इस घटना ने उसके मद को और बढ़ा दिया, जो भविष्य में उसके पतन का एक कारण बना।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🌊 वरुणलोक पर विजय

रावण ने वरुणलोक पर आक्रमण करके जल के देवता को भी चुनौती दी। यह उसकी असीम शक्ति और अहंकार का प्रतीक है। वह किसी भी देवता को अपने से श्रेष्ठ नहीं मानता था। वरुण के पुत्रों से युद्ध और अन्ततः वरुण से वरदान प्राप्त करना उसकी विजय यात्रा का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।

🐚 वरुण का पाश

वरुण का पाश एक अद्वितीय अस्त्र है, जो जल तत्व से सम्बद्ध है। इस अस्त्र से वह किसी को भी बाँध सकते हैं। रावण के साथ युद्ध में उन्होंने इसका प्रयोग किया, किन्तु रावण के ब्रह्मास्त्र के सामने इसे निष्प्रभावी होना पड़ा। यह दर्शाता है कि रावण के पास ब्रह्मास्त्र जैसे महान अस्त्र भी थे।

🧘 प्रजा के प्रति चिन्ता

रावण ने वरुण से जो वरदान माँगा, वह उसकी प्रजा के प्रति उसके स्नेह को दर्शाता है। वह चाहता था कि उसकी प्रजा को जल से उत्पन्न भय (बाढ़, समुद्र आदि) न हो। यह उसके शासकीय गुणों को दर्शाता है, कि वह अपनी प्रजा के कल्याण के प्रति सचेत था। यह उसके चरित्र का एक सकारात्मक पक्ष है।

⚖️ धर्म और अधर्म का संतुलन

ब्रह्मा का बार-बार हस्तक्षेप यह दर्शाता है कि रावण की शक्ति अब धर्म के संतुलन को बिगाड़ रही थी। देवताओं को भय था कि कहीं रावण सारे लोकों पर अधिकार न कर ले। इसलिए ब्रह्मा ने उसे रोका और युद्ध समाप्त कराया। यह संकेत है कि अधर्म का सामना करने के लिए धर्म को ही अवतार लेना होगा, जो राम के रूप में हुआ।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से यह शिक्षा मिलती है कि शक्ति का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। रावण ने वरुण जैसे देवता से युद्ध कर अपनी शक्ति का दुरुपयोग किया, फिर भी उसकी प्रजा के प्रति निष्ठा सराहनीय है। सीख यही है कि शासक को अपनी प्रजा के हित की सदैव चिन्ता करनी चाहिए, लेकिन अहंकार और शक्ति के मद में आकर वह धर्म का उल्लंघन न करे।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे त्रयोविंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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