रावण का यमराज से युद्ध के लिए पाताल लोक जाना
रावण अपनी अदम्य शक्ति के मद में चूर होकर पाताल लोक में यमराज को युद्ध के लिए ललकारता है। वहाँ पहुँचकर वह यम के दूतों और सेना का संहार करता है और अन्ततः यमराज से घोर संग्राम करता है।
विवरण
रावण ने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली थी, किन्तु यमराज अभी भी अजेय थे। अपने बल के अहंकार में चूर रावण ने पाताल लोक जाकर यमराज को युद्ध के लिए ललकारने का निश्चय किया। वह अपनी विशाल सेना के साथ पाताल पहुँचा, जहाँ यम के भयानक दूतों ने उसे रोकना चाहा। रावण ने क्रोधित होकर उन सबका संहार कर दिया। यमराज ने स्वयं युद्धभूमि में प्रवेश किया और दोनों में घमासान युद्ध छिड़ गया। यह युद्ध अद्वितीय था, जिसमें दोनों ने अनेक दिव्य अस्त्रों का प्रयोग किया। अन्त में ब्रह्मा के आदेश पर यमराज ने युद्ध रोक दिया और रावण की वीरता की प्रशंसा की।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग २१
(रावण का यमराज से युद्ध के लिए पाताल लोक जाना)
🔆 प्रस्तावना : तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने के बाद भी रावण को यमराज की अजेयता का घमण्ड था। वह अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए पाताल लोक जा पहुँचा। यह सर्ग उसी अद्भुत युद्ध और उसके परिणाम का वर्णन करता है।
🚩 रावण का पाताल लोक प्रस्थान (श्लोक १-१०)
यमलोकं जिगीषुः स पातालं प्रविवेश ह॥
रथेनादित्यवर्णेन खरयुक्तेन राक्षसः।
नानारत्नविचित्रेण ध्वजिना हेममालिना॥
ददर्श तत्र दुर्धर्षो यमदूतान् भयानकान्।
तिष्ठतो द्वारि दुर्धर्षान् विकृतान् घोरदर्शनान्॥
तेऽपि दृष्ट्वा दशग्रीवं क्रोधसंरक्तलोचनाः।
निवारयामासुस्तूर्णं प्रवेशं तस्य रक्षसः॥
रावणः क्रोधताम्राक्षस्तान् दृष्ट्वा यमकिङ्करान्।
जघान समरे क्रुद्धो वज्रेणेन्द्रो यथा गिरीन्॥
रुधिरौघप्रतिच्छन्ना गतासव इवाचलाः॥
ततो यमस्य सैन्यानि नानाप्रहरणानि च।
अभ्यधावन्त दशग्रीवं क्रोधसंरक्तलोचनाः॥
रावणः प्रहसन् क्रूरस्तान् सर्वान्निजघान ह।
गदया परिघैः शूलैः प्रासैश्च विविधैरपि॥
ततो हाहाकृतं सर्वं पातालं तेन रक्षसा।
यमस्य सैन्ये निहते दुद्रुवुश्च दिशो दश॥
एतस्मिन्नन्तरे वीरो यमः स्वयमुपागतः।
दृष्ट्वा सैन्यं हतं सर्वं क्रोधाद् रक्तान्तलोचनः॥
⚔️ रावण-यमराज घोर युद्ध (श्लोक ११-२५)
किं त्वया मे हतं सैन्यं किं चिकीर्षसि राक्षस॥
न त्वां जानामि किं कार्यं मम लोके त्वयानघ।
वद किं त्वमिह प्राप्तः किं वा ते मनसि स्थितम्॥
रावणः प्राह धर्मज्ञ शृणु यत्कारणं मम।
युद्धार्थी त्वामिह प्राप्तः कुरु युद्धं मया सह॥
यमः प्राह महाबाहो युद्धं दास्यामि तेऽधुना।
यदि शक्नोषि संग्रामे स्थातुं मम पुरो नर॥
इत्युक्त्वा यमराट् क्रुद्धो दण्डमुद्यम्य वीर्यवान्।
अभिदुद्राव दशग्रीवं संरम्भाद्राक्षसेश्वरम्॥
यमस्य रावणस्यापि लोकविश्रुतविक्रमौ॥
रावणो मुमुचे बाणान् यमस्योपरि दारुणान्।
यमोऽपि चिच्छिदे तूर्णं तान् बाणान् दण्डमण्डलैः॥
ततो रावण कोपेन गदामादाय वीर्यवान्।
यमस्योपरि चिक्षेप गदां कालानलप्रभाम्॥
यमोऽपि तां गदां दृष्ट्वा दण्डेन समताडयत्।
पपात सा गदा भूमौ छिन्ना दण्डेन वेगिता॥
ततो रावण चुक्रोध शूलमादाय दारुणम्।
प्राहिणोद्यमराजाय प्रज्वलन्तं हुताशनम्॥
दण्डेनापातयत् क्रुद्धस्तच्छूलं शतधा च सः॥
रावणः क्रोधसंरब्धो ब्रह्मास्त्रं संदधे तदा।
यमोऽपि दण्डमुद्यम्य वारुणास्त्रं न्यवारयत्॥
ततः प्रववृते युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम्।
देवा ऋषयो गन्धर्वा द्रष्टुं समाययुस्तदा॥
एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा समागत्य स्वयं प्रभुः।
निवारयामास तयोर्युद्धं देवगणैः सह॥
रावण यमराजौ च मा युद्धं कुरुतं नृपौ।
रावणो बलवांश्चैव यमराट् धर्मराट् प्रभुः॥
इत्युक्त्वा ब्रह्मणा ताभ्यां युद्धं संस्थापितं तदा।
यमः प्रशस्य रावणं ययौ स्वभवनं प्रति॥
🕊️ युद्ध समाप्ति एवं यमराज का प्रस्थान (श्लोक २६-३२)
प्रीतोऽहं तव वीर्येण सत्येन च बलेन च॥
वरं वृणीष्व दशग्रीव यत्ते मनसि वर्तते।
ददामि ते महाबाहो दुर्लभं यदपि स्मरेत्॥
रावणः प्राह धर्मज्ञ यदि प्रीतोऽसि मे प्रभो।
तव प्रसादात् सततं यमलोके भयं न हि॥
मम प्रजासु धर्मज्ञ मा त्वं क्रोधं करिष्यसि।
ये च मद्वशगा लोका न तेषां यमपीडनम्॥
यमः प्राह तथा चैवं भविष्यति न संशयः।
ये त्वां न पूजयिष्यन्ति तेषां दण्डो भविष्यति॥
इत्युक्त्वा यमराट् तूर्णं जगाम यमसादनम्।
रावणोऽपि महातेजा लङ्कामेव जगाम ह॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
⚡ रावण का अहंकार और उसकी सीमा
इस सर्ग में रावण का अहंकार चरम पर है। वह यमराज को ललकारता है, जो धर्म और मृत्यु के देवता हैं। यह दर्शाता है कि रावण स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मानने लगा था, और उसे अपनी शक्ति पर अत्यधिक घमण्ड था। ब्रह्मा का हस्तक्षेप इस अहंकार की सीमा को रेखांकित करता है।
🛡️ यमराज की महिमा
यमराज धर्मराज हैं। वे कभी अधर्म नहीं करते। रावण के साथ युद्ध में भी उन्होंने धर्म का पालन किया और अन्त में ब्रह्मा के आदेश से युद्ध समाप्त कर दिया। उनकी उदारता और रावण की वीरता की प्रशंसा उनके धर्मपरायण स्वभाव को दर्शाती है।
🎁 रावण की प्रजावात्सल्यता
रावण ने यमराज से अपने लिए नहीं, बल्कि अपनी प्रजा के लिए वर माँगा। यह उसके शासकीय गुणों को दर्शाता है, कि वह अपनी प्रजा के कल्याण के प्रति सचेत था। यह उसके चरित्र का एक सकारात्मक पक्ष है।
🌍 लोक विजय की कथा
यह सर्ग रावण की दिग्विजय यात्रा का एक भाग है। यह दर्शाता है कि किस प्रकार रावण ने एक-एक करके सभी लोकों पर आक्रमण किया और अपनी शक्ति का विस्तार किया। यह कथा रामायण की मुख्य कथा की पृष्ठभूमि तैयार करती है, जिसमें अंततः राम उसका वध करते हैं।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से यह शिक्षा मिलती है कि अहंकार मनुष्य को सही-गलत का विवेक खो देता है। रावण ने यमराज जैसे देवता से युद्ध कर अपने अहंकार का परिचय दिया। फिर भी, उसकी प्रजा के प्रति निष्ठा सराहनीय है। सीख यही है कि शक्ति का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए और अपनी प्रजा का हित सदैव ध्यान में रखना चाहिए।