उत्तर काण्ड अध्याय 20

रावण की नारद ऋषि से भेंट

एक बार रावण ने नारद जी से पूछा कि तुम सदा किसका गुणगान करते हो? नारद ने विष्णु की महिमा बताई और रावण को उनकी उपेक्षा न करने का सुझाव दिया, परन्तु रावण ने अहंकार में नहीं माना।

विवरण

इस सर्ग में नारद मुनि और रावण के बीच संवाद का वर्णन है। एक बार नारद जी रावण के दरबार में पधारे। रावण ने उनसे पूछा, "हे मुनिवर! आप सदा किसका गुणगान करते हुए तीनों लोकों में भ्रमण करते हैं?" नारद जी ने उत्तर दिया, "मैं सदा भगवान विष्णु की स्तुति करता हूँ, जो समस्त लोकों के स्वामी और पालक हैं।" रावण ने यह सुनकर विष्णु की उपेक्षा करते हुए कहा, "विष्णु कौन है? मैं स्वयं सबसे बलवान हूँ।" तब नारद ने उसे समझाया कि विष्णु के अवतार राम के द्वारा तेरा अन्त होगा, परन्तु रावण ने उनकी बात नहीं मानी। यह सर्ग रावण के अहंकार और उसके पतन के कारण को स्पष्ट करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग २०

(रावण की नारद ऋषि से भेंट)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ विंशः सर्गः ॥

🎤 नारद का आगमन और रावण का प्रश्न (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-६ ॥
अगस्त्य उवाच – एकदा रावणो राजन् लङ्कायां समवस्थितः।
ददर्श देवर्षिं प्राप्तं नारदं तपसान्वितम्॥
तमुवाच दशग्रीवः प्रहृष्टेनान्तरात्मना।
स्वागतं ते महाभाग कुत आगमनं मुने॥
नारदः प्राह राजेन्द्र भ्रमामि भुवनत्रयम्।
स्तुवन्नारायणं देवं सर्वलोकनमस्कृतम्॥
तच्छ्रुत्वा रावणः प्राह कोऽयं नारायणस्त्विति।
यस्य त्वं कीर्तयंस्तिष्ठन् भ्रमस्यखिललोकेषु॥
नारदः प्राह वै रामं विष्णुं देवं सनातनम्।
यस्य नाभ्यब्जसम्भूतो ब्रह्मा लोकपितामहः॥
📖 भावार्थ : अगस्त्य ने कहा – हे राजन्! एक समय रावण लंका में बैठा था, तब उसने तपस्वी देवर्षि नारद को आते देखा। दशग्रीव ने प्रसन्न होकर उनसे कहा, "हे महाभाग! आपका स्वागत है। हे मुने! कहाँ से आना हुआ?" नारद ने कहा, "हे राजेन्द्र! मैं तीनों लोकों में भ्रमण करता हूँ, सर्वलोक नमस्कृत भगवान नारायण की स्तुति करता हुआ।" यह सुनकर रावण बोला, "यह नारायण कौन है, जिसका कीर्तन करते हुए तुम सब लोकों में घूमते हो?" नारद ने कहा, "विष्णु, सनातन देव, जिनकी नाभि से उत्पन्न कमल से ब्रह्मा, लोकपितामह, प्रकट हुए।"
॥ श्लोक ७-१२ ॥
रावणः प्राह संक्रुद्धः किं तेन परमेष्ठिना।
यो ममाग्रे समाख्यातो युद्धे तिष्ठेत कः क्षणम्॥
नारदः प्राह मा राजन् गर्वं कार्षीः कथंचन।
विष्णोः सकाशात् सर्वेऽपि देवा ब्रह्मादयोऽपि च॥
स एव रामो भविता दशरथस्य गृहे नृप।
तवान्तकृत् संशयो न तत्र कार्यो महामते॥
ततः प्रहस्य रावणो नारदं प्रत्युवाच ह।
स मे हन्ता भवेद्रामो यदि मे दृश्यतां गतः॥
📖 भावार्थ : रावण ने क्रोधित होकर कहा, "उस परमेष्ठी से क्या प्रयोजन, जो मेरे सामने आकर क्षण भर युद्ध में टिक सके?" नारद ने समझाया, "हे राजन्! गर्व मत करो। विष्णु के ही प्रभाव से ब्रह्मा आदि सभी देवता हैं। वही राम के रूप में दशरथ के घर जन्म लेंगे और तुम्हारा अन्त करेंगे, इसमें संशय नहीं।" तब रावण हँसा और बोला, "वह राम मेरा हन्ता होगा यदि वह मेरे सामने आए।"

💢 रावण का अहंकार और नारद का अन्तर्धान (श्लोक १३-२५)

॥ श्लोक १३-१८ ॥
नारदः प्राह भो राजन् शृणु मे परमं वचः।
अवश्यमेव ते वध्यो रामो दशरथात्मजः॥
न चिराद्राम आयाति सीतया सह राघवः।
हनिष्यति त्वां सङ्ग्रामे सर्वलोकनमस्कृतः॥
एतच्छ्रुत्वा दशग्रीवः क्रोधसंरक्तलोचनः।
उत्थाय सिंहासनतो नारदं समुपाद्रवत्॥
नारदस्त्वन्तरिक्षस्थो हसन् वचनमब्रवीत्।
मूढ ते नाशकालोऽयं वर्तते रावणाधम॥
इत्युक्त्वा देवर्षिस्तत्रैवान्तरधीयत।
रावणोऽपि महाक्रुद्धो लङ्कामेव विवेश ह॥
📖 भावार्थ : नारद ने कहा, "हे राजन्! मेरा परम वचन सुनो, राम दशरथ के पुत्र तुम्हारे द्वारा अवश्य ही मारे जाएँगे? नहीं, वास्तव में तुम्हारा वध राम के द्वारा होना निश्चित है। देर नहीं, राम सीता सहित आएँगे और सर्वलोक नमस्कृत होकर तुम्हें युद्ध में मारेंगे।" यह सुनकर दशग्रीव के नेत्र क्रोध से लाल हो गए, वह सिंहासन से उठा और नारद की ओर दौड़ा। परन्तु नारद आकाश में स्थित होकर हँसे और बोले, "मूढ़! तेरा नाशकाल आ गया है।" ऐसा कहकर देवर्षि वहीं अन्तर्धान हो गए। रावण भी अत्यन्त क्रोधित होकर लंका में प्रवेश कर गया।
॥ श्लोक १९-२५ ॥
ततः प्रभृति रावणो विष्णुं चिन्तयति स्म ह।
क्रोधाच्च विस्मयाच्चैव निद्रां न लभते क्वचित्॥
कदा स राम आयाति कदा युद्धं भविष्यति।
इति चिन्तापरो नित्यं रावणो राक्षसाधिपः॥
एतत्ते कथितं राम नारदस्य च रावणे।
संवादं पापहरणं सर्वकल्मषनाशनम्॥
य इदं शृणुयान्नित्यं संवादं विस्मयावहम्।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते॥
इति वाल्मीकिना प्रोक्तं रामायेदं महात्मने।
उत्तरकाण्डमाहात्म्यं नारदीयं च कीर्तनम्॥
📖 भावार्थ : उस दिन से रावण विष्णु का ही चिन्तन करने लगा, क्रोध और विस्मय के कारण उसे नींद नहीं आती थी। वह सोचता, "कब राम आएगा? कब युद्ध होगा?" इस चिन्ता में वह डूबा रहता। हे राम! यह तुमसे नारद और रावण का पापहरण करने वाला संवाद कहा गया। जो इस आश्चर्यजनक संवाद को नित्य सुनता है, वह सब पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है। महात्मा राम से वाल्मीकि ने इस प्रकार उत्तरकाण्ड की महिमा और नारद के कीर्तन का वर्णन किया।

📖 फलश्रुति एवं सर्गोपसंहार (श्लोक २६-३८)

॥ श्लोक २६-३२ ॥
श्रुत्वा रामोऽपि धर्मात्मा नारदस्य च कीर्तनम्।
प्रीतोऽभूत् परमप्रीतो विस्मयं परमं गतः॥
उवाच चैनं धर्मज्ञ धन्योऽस्म्यनुगृहीतः।
यन्मे नारदसंवादं श्रुतं पापप्रणाशनम्॥
अहो महर्षे दिव्यं ते वचनं सत्यवादिनः।
यथा रावणदर्पस्य हन्ता रामः सनातनः॥
ततः प्रीतेन मनसा रामो मुनिमपूजयत्।
ददौ रत्नानि वस्त्राणि गाश्च धेनूः सहस्रशः॥
ततः स मुनिशार्दूलो राममामन्त्र्य राघवम्।
जगाम स्वाश्रमं प्रीतो नारदस्य कथां स्मरन्॥
इति श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे विंशः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : धर्मात्मा राम ने नारद के कीर्तन को सुनकर अत्यन्त प्रसन्नता और विस्मय प्राप्त किया। वे बोले, "मैं धन्य हूँ, कृतार्थ हूँ कि मैंने नारद का पापनाशक संवाद सुना। हे महर्षे! आपका यह वचन अत्यन्त दिव्य और सत्य है कि राम रावण के दर्प का हन्ता है।" तब राम ने प्रसन्न मन से मुनि की पूजा की और हजारों गौएँ, रत्न एवं वस्त्र दान दिए। फिर वे मुनि राम से आज्ञा लेकर नारद की कथा का स्मरण करते हुए प्रसन्नतापूर्वक अपने आश्रम को चले गए।
॥ श्लोक ३३-३८ ॥
एष ते कथितो राम नारदीयो महामुनेः।
संवादः पापहरणः सर्वकल्मषनाशनः॥
य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान्।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते॥
न तस्य दुर्लभं किंचित् इह लोके परत्र च।
रामभक्तिं लभेत् सोऽपि राम एव सनातनः॥
इति वाल्मीकिना प्रोक्तं रामायेदं महात्मने।
उत्तरकाण्डमाहात्म्यं सर्गो विंशः समापितः॥
📖 भावार्थ : हे राम! यह तुमसे नारद के महामुनि के साथ संवाद कहा गया, जो पापों का हरण करने वाला है। जो इसको नित्य सुनता है या द्विजोत्तमों को सुनाता है, वह सब पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक में पूजित होता है। उसके लिए इस लोक और परलोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं है। वह रामभक्ति को प्राप्त करता है, जो सनातन राम ही हैं। महात्मा राम से वाल्मीकि ने इस प्रकार उत्तरकाण्ड की महिमा कही। इस प्रकार विंश सर्ग पूर्ण हुआ।

शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अहंकार और दर्प का अन्त अवश्य होता है। रावण ने नारद की चेतावनी को अनसुना किया और अन्ततः राम के हाथों मारा गया। भगवान के भक्त और उनके दूत सदा सत्य बोलते हैं।

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