रावण का अनरण्य से युद्ध
अनरण्य नामक इक्ष्वाकुवंशी राजा ने रावण का सामना किया और पराजित होकर भी उसे शाप दिया कि तू मेरे वंशज राम के हाथों मरेगा।
विवरण
इस सर्ग में अगस्त्य मुनि राम को अनरण्य राजा की कथा सुनाते हैं। अनरण्य इक्ष्वाकु वंश के प्रतापी राजा थे और राम के पूर्वज थे। एक बार रावण ने समस्त राजाओं को युद्ध के लिए ललकारा। सभी राजा भय के मारे छिप गए, परन्तु अनरण्य ने डटकर सामना किया। युद्ध में रावण ने उन्हें पराजित कर दिया और मृत्यु के समीप अनरण्य ने रावण को शाप दिया कि मेरे वंश में जन्मा कोई राजा तेरा वध करेगा। वह राजा राम ही थे। इस कथा से राम को अपने पूर्वज की वीरता और रावण के प्रति शाप का ज्ञान होता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १९
(रावण का अनरण्य से युद्ध)
👑 अनरण्य का परिचय और रावण की चुनौती (श्लोक १-१२)
अनरण्यो महाराज इक्ष्वाकूणां महारथः॥
स कदाचिन्महातेजा रावणेन दुरात्मना।
आहूतः सङ्गरे राजन् सर्वसैन्यसमन्वितः॥
तदा रावणमायान्तं दृष्ट्वा राजा महाबलः।
न विव्यथे महातेजाः सिंहः क्षुद्रमृगं यथा॥
उवाच रावणं राजा शृणु राक्षस दुर्मते।
इक्ष्वाकूणां कुले जातो नाहं युद्धात्पराङ्मुखः॥
तिष्ठ तिष्ठ क्षणं तावद्युद्धं देहि सुदुर्जय।
पश्य मे विक्रमं युद्धे येन ख्यातो महीतले॥
अनरण्यस्य राजर्षे रावणस्य च दुर्मतेः॥
अनरण्यः शरान् घोरान् मुमोच रावणोपरि।
तान् रावणो मुहुः क्रुद्धश्चिच्छेद निशितैः शरैः॥
ततः क्रुद्धो महाराजो रथात् सिंह इवाबभौ।
गदां गृहीत्वा तरसा रावणं समुपाद्रवत्॥
गदाप्रहारैर्बहुभी रावणं समताडयत्।
तथापि रावणो नागो न चचाल रणाजिरात्॥
💥 अनरण्य की पराजय और शाप (श्लोक १३-२५)
अनरण्यस्य राजर्षेः शिरस्येनामताडयत्॥
गदाप्रहाराभिहतो राजा सोऽथ महारथः।
पपात स रथात् भूमौ रक्तसिक्ततनूरुहः॥
तं निपतितमालोक्य रावणो वाक्यमब्रवीत्।
क्व ते गर्वो गतः राजन् येन मां त्वमवासृजः॥
अनरण्यस्ततः क्रुद्धो रावणं प्रति राघव।
उवाच परमक्रुद्धो रुधिरेण समुक्षितः॥
किं तु मे वंशजः कश्चित् त्वां हनिष्यति राक्षस॥
इक्ष्वाकूणां कुले रामो नाम्ना ख्यातो भविष्यति।
स त्वां समरमध्ये वै हनिष्यति न संशयः॥
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य राजर्षे रावणस्तदा।
जहास च मुमोद च निर्विशङ्को निराकुलः॥
मृते च तस्मिन् राजर्षौ रावणो लङ्कामाययौ।
रामोऽपि जन्म सम्प्राप्य रावणं समसूदयत्॥
एतत्ते कथितं राम पूर्वजस्य महात्मनः।
अनरण्यस्य चरितं यथा शप्तो दशाननः॥
🙇 फलश्रुति एवं राम की प्रतिक्रिया (श्लोक २६-३६)
प्रीतोऽभूत् परमप्रीतः पूर्वजस्यानुकीर्तनात्॥
उवाच चैनं धर्मात्मा धन्योऽस्म्यनुगृहीतः।
यन्मे पूर्वजचरितं श्रुतं पापप्रणाशनम्॥
अहो महर्षे दिव्यं ते वचनं सत्यवादिनः।
यथा मे पूर्वजः शप्त्वा रावणं दिवमागतः॥
तमहं स्मरामि शिरसा प्रणम्य च मुहुर्मुहुः।
यस्य शापेन दुष्टात्मा रावणो मे वशीकृतः॥
अनरण्यस्य संवादं रावणस्य च राघव॥
सर्वपापविनिर्मुक्तो रामभक्तिं स गच्छति।
अन्ते रामपुरं याति पूज्यते त्रिदशैरपि॥
इति वाल्मीकिना प्रोक्तं रामायेदं महात्मने।
उत्तरकाण्डमाहात्म्यं पूर्वजानुकीर्तनम्॥
॥ इति श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे एकोनविंशः सर्गः ॥
शिक्षा : यह सर्ग हमें बताता है कि वीर पुरुष पराजित होकर भी धर्म और अपने कुल की मर्यादा नहीं छोड़ते। अनरण्य ने मरते समय भी रावण को शाप देकर अपने वंश की विजय सुनिश्चित की। राम के रूप में वह शाप सत्य हुआ।