उत्तर काण्ड अध्याय 19

रावण का अनरण्य से युद्ध

अनरण्य नामक इक्ष्वाकुवंशी राजा ने रावण का सामना किया और पराजित होकर भी उसे शाप दिया कि तू मेरे वंशज राम के हाथों मरेगा।

विवरण

इस सर्ग में अगस्त्य मुनि राम को अनरण्य राजा की कथा सुनाते हैं। अनरण्य इक्ष्वाकु वंश के प्रतापी राजा थे और राम के पूर्वज थे। एक बार रावण ने समस्त राजाओं को युद्ध के लिए ललकारा। सभी राजा भय के मारे छिप गए, परन्तु अनरण्य ने डटकर सामना किया। युद्ध में रावण ने उन्हें पराजित कर दिया और मृत्यु के समीप अनरण्य ने रावण को शाप दिया कि मेरे वंश में जन्मा कोई राजा तेरा वध करेगा। वह राजा राम ही थे। इस कथा से राम को अपने पूर्वज की वीरता और रावण के प्रति शाप का ज्ञान होता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १९

(रावण का अनरण्य से युद्ध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकोनविंशः सर्गः ॥

👑 अनरण्य का परिचय और रावण की चुनौती (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-६ ॥
अगस्त्य उवाच – शृणु राम महाबाहो कथामेतां पुरातनीम्।
अनरण्यो महाराज इक्ष्वाकूणां महारथः॥
स कदाचिन्महातेजा रावणेन दुरात्मना।
आहूतः सङ्गरे राजन् सर्वसैन्यसमन्वितः॥
तदा रावणमायान्तं दृष्ट्वा राजा महाबलः।
न विव्यथे महातेजाः सिंहः क्षुद्रमृगं यथा॥
उवाच रावणं राजा शृणु राक्षस दुर्मते।
इक्ष्वाकूणां कुले जातो नाहं युद्धात्पराङ्मुखः॥
तिष्ठ तिष्ठ क्षणं तावद्युद्धं देहि सुदुर्जय।
पश्य मे विक्रमं युद्धे येन ख्यातो महीतले॥
📖 भावार्थ : अगस्त्य ने कहा – हे महाबाहो राम! यह पुरातन कथा सुनो। अनरण्य नामक महाराजा इक्ष्वाकु वंश के महारथी थे। एक समय उन महातेजस्वी राजा को दुरात्मा रावण ने अपनी सम्पूर्ण सेना सहित युद्ध के लिए ललकारा। उस समय रावण को आते देखकर महाबली राजा बिल्कुल नहीं घबराए, जैसे सिंह छोटे मृग से नहीं डरता। राजा ने रावण से कहा, "हे दुर्मते राक्षस! सुन, इक्ष्वाकु कुल में उत्पन्न होकर मैं युद्ध से मुँह नहीं मोड़ता। खड़ा रह, ठहर, युद्ध दे। हे सुदुर्जय! मेरा विक्रम देख, जिससे मैं पृथ्वी पर प्रसिद्ध हूँ।"
॥ श्लोक ७-१२ ॥
ततः प्रवृत्तः सङ्ग्रामस्तुमुलो रोमहर्षणः।
अनरण्यस्य राजर्षे रावणस्य च दुर्मतेः॥
अनरण्यः शरान् घोरान् मुमोच रावणोपरि।
तान् रावणो मुहुः क्रुद्धश्चिच्छेद निशितैः शरैः॥
ततः क्रुद्धो महाराजो रथात् सिंह इवाबभौ।
गदां गृहीत्वा तरसा रावणं समुपाद्रवत्॥
गदाप्रहारैर्बहुभी रावणं समताडयत्।
तथापि रावणो नागो न चचाल रणाजिरात्॥
📖 भावार्थ : तब राजर्षि अनरण्य और दुर्मति रावण के बीच भयंकर रोमांचकारी युद्ध छिड़ गया। अनरण्य ने रावण पर घोर बाणों की वर्षा की, परन्तु क्रोध में रावण ने उन्हें अपने तीखे बाणों से काट दिया। तब महाराज क्रोधित होकर रथ से सिंह के समान प्रकट हुए और गदा लेकर वेग से रावण पर दौड़े। उन्होंने बहुत से गदा प्रहारों से रावण को आहत किया, फिर भी वह नाग के समान युद्धभूमि से न हटा।

💥 अनरण्य की पराजय और शाप (श्लोक १३-२५)

॥ श्लोक १३-१८ ॥
ततो रावण कोपेन गदामादाय राक्षसः।
अनरण्यस्य राजर्षेः शिरस्येनामताडयत्॥
गदाप्रहाराभिहतो राजा सोऽथ महारथः।
पपात स रथात् भूमौ रक्तसिक्ततनूरुहः॥
तं निपतितमालोक्य रावणो वाक्यमब्रवीत्।
क्व ते गर्वो गतः राजन् येन मां त्वमवासृजः॥
अनरण्यस्ततः क्रुद्धो रावणं प्रति राघव।
उवाच परमक्रुद्धो रुधिरेण समुक्षितः॥
📖 भावार्थ : तब रावण ने क्रोध में आकर गदा उठाई और राजर्षि अनरण्य के सिर पर प्रहार किया। गदा के आघात से वे महारथी राजा रथ से नीचे गिर पड़े, उनका शरीर रक्त से भीग गया। उन्हें गिरा देखकर रावण ने कहा, "हे राजन्! कहाँ गया तुम्हारा वह गर्व, जिसके कारण तुमने मुझे ललकारा था?" तब रक्त से लथपथ अनरण्य ने अत्यन्त क्रोधित होकर रावण से कहा।
॥ श्लोक १९-२५ ॥
रावण त्वं मया राज्ञां न कश्चिदपि दुर्जयः।
किं तु मे वंशजः कश्चित् त्वां हनिष्यति राक्षस॥
इक्ष्वाकूणां कुले रामो नाम्ना ख्यातो भविष्यति।
स त्वां समरमध्ये वै हनिष्यति न संशयः॥
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य राजर्षे रावणस्तदा।
जहास च मुमोद च निर्विशङ्को निराकुलः॥
मृते च तस्मिन् राजर्षौ रावणो लङ्कामाययौ।
रामोऽपि जन्म सम्प्राप्य रावणं समसूदयत्॥
एतत्ते कथितं राम पूर्वजस्य महात्मनः।
अनरण्यस्य चरितं यथा शप्तो दशाननः॥
📖 भावार्थ : "रावण! तुमने मुझे हरा दिया, परन्तु राजाओं में कोई तुम्हें दुर्जय नहीं है। मेरे वंश में कोई जन्म लेगा, जो तुम्हें मारेगा। इक्ष्वाकु कुल में राम नाम से प्रसिद्ध राजा होगा, वह युद्ध के मध्य में तुम्हें निःसन्देह मार डालेगा।" राजर्षि के इस वचन को सुनकर रावण हँसा और प्रसन्न हुआ, निःशंक और निराकुल होकर चला गया। उस राजर्षि के मरने पर रावण लंका लौट गया। और राम ने जन्म लेकर रावण का संहार किया। हे राम! यह तुम्हारे पूर्वज महात्मा अनरण्य का चरित्र कहा गया, जैसे उन्होंने दशानन को शाप दिया।

🙇 फलश्रुति एवं राम की प्रतिक्रिया (श्लोक २६-३६)

॥ श्लोक २६-३० ॥
श्रुत्वा रामो वचस्तस्य मुनेर्धर्मभृतां वरः।
प्रीतोऽभूत् परमप्रीतः पूर्वजस्यानुकीर्तनात्॥
उवाच चैनं धर्मात्मा धन्योऽस्म्यनुगृहीतः।
यन्मे पूर्वजचरितं श्रुतं पापप्रणाशनम्॥
अहो महर्षे दिव्यं ते वचनं सत्यवादिनः।
यथा मे पूर्वजः शप्त्वा रावणं दिवमागतः॥
तमहं स्मरामि शिरसा प्रणम्य च मुहुर्मुहुः।
यस्य शापेन दुष्टात्मा रावणो मे वशीकृतः॥
📖 भावार्थ : मुनि के इन वचनों को सुनकर धर्मज्ञों में श्रेष्ठ राम अत्यन्त प्रसन्न हुए, अपने पूर्वज के कीर्तन से। वे बोले, "मैं धन्य हूँ, कृतार्थ हूँ कि मैंने पूर्वज के पापनाशक चरित्र को सुना। हे महर्षे! आपका यह वचन अत्यन्त दिव्य और सत्य है कि मेरे पूर्वज ने रावण को शाप देकर स्वर्ग प्राप्त किया। मैं उन्हें सिर झुकाकर बारंबार नमन करता हूँ, जिनके शाप से दुष्टात्मा रावण मेरे वश में हुआ।"
॥ श्लोक ३१-३६ ॥
य इदं शृणुयान्नित्यं राजर्षेश्चरितं शुभम्।
अनरण्यस्य संवादं रावणस्य च राघव॥
सर्वपापविनिर्मुक्तो रामभक्तिं स गच्छति।
अन्ते रामपुरं याति पूज्यते त्रिदशैरपि॥
इति वाल्मीकिना प्रोक्तं रामायेदं महात्मने।
उत्तरकाण्डमाहात्म्यं पूर्वजानुकीर्तनम्॥
॥ इति श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे एकोनविंशः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : जो इस राजर्षि अनरण्य के शुभ चरित्र और रावण के साथ संवाद को नित्य सुनता है, वह सब पापों से मुक्त होकर रामभक्ति को प्राप्त होता है। अन्त में वह राम के धाम को जाता है और देवताओं द्वारा भी पूजित होता है। महात्मा राम से वाल्मीकि ने इस प्रकार उत्तरकाण्ड की महिमा और पूर्वज के कीर्तन का वर्णन किया।

शिक्षा : यह सर्ग हमें बताता है कि वीर पुरुष पराजित होकर भी धर्म और अपने कुल की मर्यादा नहीं छोड़ते। अनरण्य ने मरते समय भी रावण को शाप देकर अपने वंश की विजय सुनिश्चित की। राम के रूप में वह शाप सत्य हुआ।

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