उत्तर काण्ड अध्याय 18

रावण के भय से देवताओं का विभिन्न रूप धारण करना

रावण के आतंक से त्रस्त होकर देवताओं ने भिन्न-भिन्न रूप धारण किए – अग्नि कबूतर बने, इन्द्र मोर, यम कौआ आदि।

विवरण

इस सर्ग में वर्णन है कि कैसे रावण के बढ़ते हुए आतंक और अत्याचारों से पीड़ित होकर देवताओं ने अपने-अपने तेज को गुप्त रखने के लिए विभिन्न पशु-पक्षियों के रूप धारण कर लिए। अग्नि कबूतर बने, इन्द्र मोर, यम कौआ, वरुण हंस, कुबेर गिरगिट, और इसी प्रकार अन्य देवता भी नाना योनियों में प्रविष्ट हो गए। वे रावण के भय से पृथ्वी पर विचरण करने लगे। बाद में जब राम ने रावण का वध किया, तब इन देवताओं ने अपने मूल रूप में लौटकर राम की स्तुति की। यह सर्ग रावण की भीषणता और देवताओं की असहायता को दर्शाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १८

(रावण के भय से देवताओं का विभिन्न रूप धारण करना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ अष्टादशः सर्गः ॥

😱 रावण के अत्याचार और देवताओं की विचारणा (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-६ ॥
ततः प्रभृति दुष्टात्मा रावणो राक्षसाधिपः।
बाधते स्म त्रिलोकेशान् देवान् ब्रह्मर्षींस्तथा॥
ते सर्वे त्रिदशाः क्रुद्धाः समेत्य ब्रह्मणोऽन्तिकम्।
न्यवेदयन्त दुःखार्ता रावणस्य दुरात्मनः॥
ब्रह्मा प्रोवाच तान् देवान् मा भयं प्राप्नुत प्रियाः।
अवश्यं रावणो हन्ता विष्णुना प्रभविष्णुना॥
ततः कालेन महता यावद्विष्णुः समागतः।
तावद्देवाः समस्ता वै योनिमन्यां प्रपेदिरे॥
भयाद्रावणराजस्य त्रस्ताः सर्वे दिवौकसः।
त्यक्त्वा स्वरूपं देवत्वं ययुस्तिर्यक्त्वमेव च॥
📖 भावार्थ : उसके बाद दुष्टात्मा रावण ने तीनों लोकों के देवताओं और ब्रह्मर्षियों को सताना शुरू कर दिया। तब वे सब दुःखी देवता एकत्र होकर ब्रह्मा के पास गए और रावण की शिकायत की। ब्रह्मा ने कहा, "हे प्रिय देवो! भय मत करो। प्रभावशाली विष्णु के द्वारा रावण का वध अवश्य होगा।" तब बहुत समय बीतने पर, जब तक विष्णु प्रकट हुए, तब तक सभी देवता रावण के भय से दूसरी योनियों में चले गए। उन्होंने अपने देवत्व को त्यागकर पशु-पक्षियों के रूप धारण कर लिए।
॥ श्लोक ७-१२ ॥
अग्निर्बभूव कपोतो वै यमः काको द्विजोत्तमाः।
वरुणो हंसरूपेण कुबेरः कृकलासकः॥
इन्द्रो मयूरो धर्मात्मा यमः काकस्तथैव च।
सूर्यः कुक्कुटरूपेण चन्द्रः पापिहिकाऽभवत्॥
वायुश्च शलभो जातः समुद्रश्च महामतिः।
वसवोऽष्टौ वृकाः सर्वे मरुतो गृध्रयोनयः॥
एवं ते त्रिदशाः सर्वे त्यक्त्वा दिव्यं स्वरूपकम्।
चेरुर्विविधरूपेण रावणत्रासिता भुवि॥
न तेषां रूपमादातुं शक्तः कश्चन राक्षसः।
गूढात्मानो विचेरुस्ते रावणस्य भयात्तदा॥
📖 भावार्थ : अग्नि कबूतर बन गए, यम कौआ, वरुण हंस के रूप में, कुबेर गिरगिट बन गए। धर्मात्मा इन्द्र मोर बने, यम भी कौआ बने, सूर्य मुर्गे के रूप में, चन्द्रमा पापिहा (पपीहा) बने। वायु पतंगा बन गए और महामति समुद्र ने भी रूप धारण किया। आठों वसु वृक (भेड़िये) हो गए और मरुत गिद्ध की योनि में चले गए। इस प्रकार सभी देवता रावण से त्रस्त होकर दिव्य स्वरूप छोड़कर पृथ्वी पर विविध रूपों में विचरने लगे। उनका रूप कोई राक्षस ग्रहण नहीं कर सकता था, क्योंकि वे गुप्त रूप से रह रहे थे।

🦚 विभिन्न देवताओं के पशु-पक्षी रूप (श्लोक १३-२८)

॥ श्लोक १३-१७ ॥
दितेः पुत्रा महावीर्या दानवाः शत्रुसूदनाः।
तेऽपि रावणभीतास्तु विविशुः सागरं प्रति॥
नागाः सर्पास्तथा यक्षा गन्धर्वाः सह किंनरैः।
रावणत्रासिताः सर्वे भयाद्विविधयोनयः॥
गुह्यकाश्च विशेषेण धनदस्यानुयायिनः।
बिलेशयास्तदा जाताः सिंहव्याघ्राश्च दंष्ट्रिणः॥
एवं संत्रस्तलोकस्तु रावणेन दुरात्मना।
न किंचिदपि तेजोऽभूद्येन तिष्ठेत सुस्थिरम्॥
ततः कालेन महता रामो दशरथात्मजः।
जातो विष्ण्वंशसम्भूतो राक्षसान्तकरः प्रभुः॥
📖 भावार्थ : दिति के पुत्र महावीर्य दानव, जो शत्रुओं का नाश करने वाले थे, वे भी रावण से डरकर समुद्र में प्रवेश कर गए। नाग, सर्प, यक्ष, गन्धर्व और किन्नर सभी रावण से त्रस्त होकर भय के कारण विविध योनियों में चले गए। विशेष रूप से कुबेर के अनुयायी गुह्यक बिल में रहने वाले सिंह-व्याघ्र आदि दंष्ट्रिधारी जीव हो गए। इस प्रकार रावण के आतंक से सारे लोक त्रस्त थे, कोई तेज नहीं बचा था जिसके सहारे स्थिर रहा जा सके। तब बहुत समय बीतने पर दशरथ के पुत्र राम का जन्म हुआ, जो विष्णु के अंश से उत्पन्न हुए और राक्षसों के अन्तकर्ता प्रभु थे।
॥ श्लोक १८-२२ ॥
रामेण निहते तस्मिन् रावणे पापनाशने।
देवाः स्वं रूपमास्थाय रामं स्तोतुं समागताः॥
अग्निरुवाच राजेन्द्र त्वत्प्रसादादहं विभो।
कपोतयोनिं संत्यज्य स्वं रूपं प्रतिपेदिवान्॥
इन्द्रः प्रोवाच भद्रं ते राम राजीवलोचन।
मयूरयोनिं संत्यज्य स्वं रूपं लब्धवानहम्॥
एवं सर्वे सुराः प्राप्ताः स्वां योनिं रामतेजसा।
प्रशशंसुर्महात्मानं रामं राजीवलोचनम्॥
📖 भावार्थ : जब राम ने उस पापी रावण का वध कर दिया, तब सभी देवता अपने स्वरूप में लौट आए और राम की स्तुति करने के लिए आए। अग्नि ने कहा, "हे राजेन्द्र! आपकी कृपा से मैंने कबूतर की योनि छोड़कर अपना स्वरूप पा लिया।" इन्द्र ने कहा, "हे राजीवलोचन राम! आपका कल्याण हो। आपके प्रभाव से मैंने मोर की योनि त्यागकर अपना रूप पाया।" इस प्रकार सभी देवता राम के तेज से अपनी-अपनी योनि में लौट आए और उन महात्मा राम की प्रशंसा करने लगे।
॥ श्लोक २३-२८ ॥
ततो रामः प्रसन्नात्मा देवानां कुरुनन्दन।
वरान् प्रदाय ते सर्वे ययुः स्वं धाम सुप्रभम्॥
य इदं शृणुयान्नित्यं देवानां योनिकारणम्।
रावणत्राससंजातं सर्वपापैः प्रमुच्यते॥
न तस्य रोगः शोको वा दारिद्र्यं न च जायते।
रामभक्तो भवेत्सोऽपि देवैः स्तूयेत सर्वदा॥
इति वाल्मीकिना प्रोक्तं रामायेदं महात्मने।
उत्तरकाण्डमाहात्म्यं सुराणां योनिकारणम्॥
📖 भावार्थ : तब राम ने प्रसन्न होकर सभी देवताओं को वरदान दिए और वे सब अपने सुप्रभ धाम को चले गए। जो इस देवताओं के योनि धारण करने के कारण की कथा नित्य सुनता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है। उसे रोग, शोक या दरिद्रता नहीं होती। वह रामभक्त हो जाता है और देवता सदा उसकी स्तुति करते हैं। महात्मा राम से वाल्मीकि ने इस प्रकार उत्तरकाण्ड की महिमा और सुरों के योनिधारण का कारण कहा।

📜 फलश्रुति एवं सर्गोपसंहार (श्लोक २९-४२)

॥ श्लोक २९-३५ ॥
एतत्ते कथितं राम देवानां योनिकारणम्।
रावणत्राससंभूतं यथावदिह विस्तरात्॥
सर्वे ते त्रिदशा राम त्वया संप्राप्तवैभवाः।
त्वमेव भगवान् विष्णुः सर्वलोकनमस्कृतः॥
अहो बलमहो वीर्यमहो तेजश्च राघव।
येन रावणमुख्यानां राक्षसानां क्षयः कृतः॥
धन्योऽसि कृतकृत्योऽसि यश्च त्वं रघुनन्दन।
पितॄणां कीर्तिवर्धनः सर्वेषां सुखदो भव॥
एवं स्तुत्वा सुराः सर्वे रामं प्राञ्जलयः स्थिताः।
रामोऽपि ताननुज्ञाप्य प्रविवेश पुरीं ततः॥
📖 भावार्थ : हे राम! इस प्रकार मैंने तुमसे रावण के भय से उत्पन्न देवताओं की योनि धारण करने का विस्तृत वृत्तान्त कहा। हे राम! वे सब देवता तुम्हारे द्वारा पुनः वैभवशाली हुए। तुम स्वयं भगवान विष्णु हो, सब लोकों द्वारा नमस्कृत हो। हे राघव! तुम्हारा बल, वीर्य और तेज अद्भुत है, जिससे रावण प्रमुख राक्षसों का नाश हुआ। तुम धन्य हो, कृतकृत्य हो, रघुनन्दन! तुम पितरों की कीर्ति बढ़ाने वाले और सबको सुख देने वाले हो। इस प्रकार सभी देवताओं ने हाथ जोड़कर राम की स्तुति की। राम ने उन्हें आज्ञा देकर पुरी में प्रवेश किया।
॥ श्लोक ३६-४२ ॥
अगस्त्य उवाच – एष ते कथितो राम देवानां योनिसंग्रहः।
रावणत्रासजः सर्वः शृणु चैवोत्तरं मम॥
अनरण्यस्य संवादं रावणस्य च राघव।
यथा स शप्तवान् राजा रावणं युद्धदुर्मदम्॥
तच्छृणुष्व महाबाहो सर्वपापप्रणाशनम्।
उत्तरं कथयिष्यामि सर्गं चानन्तरं मया॥
इति श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे अष्टादशः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : अगस्त्य ने कहा – हे राम! यह तुमसे रावण के भय से देवताओं के योनिग्रहण का वर्णन किया गया। अब मेरा आगे का कथन सुनो। हे राघव! अनरण्य का रावण के साथ संवाद, कैसे उस राजा ने युद्धदुर्मद रावण को शाप दिया। हे महाबाहो! उसे सुनो, जो सब पापों का नाश करने वाला है। अब मैं अगला सर्ग कहूँगा।

शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अत्याचार का प्रतिकार करने के लिए भगवान अवतार लेते हैं। देवता भी जब असहाय हो जाते हैं, तब वे भगवान की शरण लेते हैं। राम ने राक्षसों का नाश करके देवताओं को उनके मूल स्वरूप में लौटाया।

इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।