🕉️ उत्तर काण्ड · सर्ग 17

वेदवती की कहानी

वेदवती, जो सीता का पूर्व जन्म थीं, रावण द्वारा उत्पीड़ित होकर अग्नि में समा गईं और उसने रावण के वध का प्रण लिया।

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17 सर्ग संख्या
32 मिनट पठन अवधि
मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा

सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग

प्रसंग सार संक्षेप

वेदवती, जो सीता का पूर्व जन्म थीं, रावण द्वारा उत्पीड़ित होकर अग्नि में समा गईं और उसने रावण के वध का प्रण लिया।

सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि

यह सर्ग वेदवती की कथा प्रस्तुत करता है, जो पूर्व जन्म में सीता थीं। वेदवती ब्रह्मर्षि कुशध्वज की पुत्री थीं और विष्णु को पति के रूप में पाने के लिए घोर तपस्या कर रही थीं। एक दिन रावण उस आश्रम में आया और उसकी सुन्दरता पर मोहित होकर उससे दुर्व्यवहार करने लगा। वेदवती ने उसे धिक्कारा और कहा कि वह केवल विष्णु को पति मानती है। क्रोध में रावण ने उसके केश पकड़ लिए, तब वेदवती ने अपने हाथ काटकर अग्नि में प्रवेश कर दिया और प्रतिज्ञा की कि वह अगले जन्म में रावण के वध का कारण बनेगी। वहीं वह पुनः जन्मी सीता के रूप में। यह कथा सीता के दिव्यत्व और रावण-वध के पूर्व नियत कारण को स्पष्ट करती है।

आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १७

(वेदवती की कहानी)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तदशः सर्गः ॥

🌸 वेदवती का जन्म एवं तप (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
पुलस्त्यवंशजः कश्चिद्ब्रह्मर्षिः कुशध्वजः।
तस्य कन्या वेदवती साध्वी धर्मपरायणा॥
सा चचार तपो घोरं विष्णुं प्राप्तुं पतिं प्रति।
निराहारा जितश्वासा देवानामपि दुर्लभा॥
तां दृष्ट्वा रावणो दुष्टः कामबाणप्रपीडितः।
उपागम्याब्रवीद्वाक्यं स्मरन्मदनविह्वलः॥
का त्वं कमलपत्राक्षि कस्य पुत्री वरानने।
किमर्थं तप्यते तीव्रं वद सत्यं शुचिस्मिते॥
एवमुक्ता वेदवती रावणेन दुरात्मना।
उवाच परमक्रुद्धा विष्णुध्यानपरायणा॥
🔹 पदच्छेद : पुलस्त्यवंशजः = पुलस्त्य के वंश में उत्पन्न; कश्चित् = कोई; ब्रह्मर्षिः = ब्रह्मर्षि; कुशध्वजः = कुशध्वज; तस्य = उनकी; कन्या = पुत्री; वेदवती = वेदवती; साध्वी = साध्वी; धर्मपरायणा = धर्मपरायण; सा = वह; चचार = करने लगी; तपः = तप; घोरम् = घोर; विष्णुम् = विष्णु को; प्राप्तुम् = पाने के लिए; पतिम् = पति; प्रति = रूप में; निराहारा = निराहार; जितश्वासा = श्वास पर जय पाने वाली; देवानाम् = देवताओं के लिए; अपि = भी; दुर्लभा = दुर्लभ; ताम् = उसे; दृष्ट्वा = देखकर; रावणः = रावण; दुष्टः = दुष्ट; कामबाणप्रपीडितः = काम के बाण से पीड़ित; उपागम्य = पास आकर; अब्रवीत् = बोला; वाक्यम् = वचन; स्मरन् = स्मरण करता हुआ; मदनविह्वलः = मदन से विह्वल; का = कौन; त्वम् = तुम; कमलपत्राक्षि = कमलदल नयनी; कस्य = किसकी; पुत्री = पुत्री; वरानने = सुन्दर मुख वाली; किमर्थम् = किसलिए; तप्यते = तप करती हो; तीव्रम् = तीव्र; वद = कहो; सत्यम् = सत्य; शुचिस्मिते = पवित्र मुस्कान वाली; एवम् = इस प्रकार; उक्ता = कही गई; वेदवती = वेदवती; रावणेन = रावण द्वारा; दुरात्मना = दुरात्मा; उवाच = बोली; परमक्रुद्धा = अत्यन्त क्रुद्ध; विष्णुध्यानपरायणा = विष्णु के ध्यान में लीन।
📖 भावार्थ : पुलस्त्य के वंश में एक ब्रह्मर्षि हुए, जिनका नाम कुशध्वज था। उनकी पुत्री वेदवती अत्यन्त साध्वी और धर्मपरायणा थी। उसने भगवान विष्णु को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तप किया। वह निराहार रहकर श्वास पर विजय पाने वाली थी, ऐसा तप जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ था। उसे देखकर दुष्ट रावण काम के बाण से पीड़ित हो गया। वह उसके पास गया और मदन-विह्वल होकर बोला, "हे कमलनयनी! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? इस तीव्र तप का क्या कारण है? हे पवित्र मुस्कान वाली! सत्य बताओ।" रावण के ऐसा कहने पर वेदवती ने, जो विष्णु के ध्यान में लीन थी, अत्यन्त क्रोधित होकर उत्तर दिया।
॥ श्लोक ६-१० ॥
शृणु राक्षस दुष्प्रज्ञ वेदवती वदामि ते।
कुशध्वजसुताहं वै नाम्ना वेदवती स्मृता॥
विष्णुं पतित्वे वरदं प्राप्तुमिच्छामि सुव्रता।
न मां कामयितुं युक्तं त्वया पापसमन्वित॥
इत्युक्तः स तया राजन् क्रोधमाहारयत्परम्।
जग्राह केशपक्षे तां वामेनाप्रतिमद्युतिः॥
सा तेन गृह्यमाणा तु वेदवती शुचिस्मिता।
चकार नियमं घोरं रावणस्य वधं प्रति॥
यदि मे तपसा किंचित्सत्येन च समीहितम्।
रावणोऽयं दुराचारो मया वध्यो भवेदिति॥
📖 भावार्थ : वेदवती ने कहा, "हे दुष्टबुद्धि राक्षस! सुन, मैं वेदवती कहलाती हूँ, कुशध्वज की पुत्री हूँ। मैं व्रतधारिणी होकर वरदाता विष्णु को पति के रूप में पाना चाहती हूँ। हे पापी! तुम्हारे लिए मेरी कामना करना उचित नहीं है।" हे राजन्! इस प्रकार कहे जाने पर रावण ने अत्यधिक क्रोध किया और उसने वाम हाथ से उसके केश पकड़ लिए। जब वेदवती को उसने पकड़ लिया, तब उस पवित्र मुस्कान वाली ने रावण के वध के लिए घोर नियम धारण किया। उसने प्रतिज्ञा की, "यदि मेरे तप और सत्य का कुछ भी प्रभाव है, तो यह दुराचारी रावण मेरे द्वारा मारा जाए।"

🔥 वेदवती का अग्नि प्रवेश और शाप (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततः स्वकेशान् कर्तित्वा वेदवती शुभानना।
अग्निं प्रवेष्टुमिच्छन्ती ददर्श ज्वलनं तदा॥
तामब्रवीदग्निदेवो मा चिन्तां कर्तुमर्हसि।
अवश्यं रावणो हन्ता विष्णुना प्रभविष्णुना॥
तस्याः शापेन दुष्टात्मा रावणो विनशिष्यति।
त्वं च सीता भविष्यसि जनकस्य गृहे शुभे॥
इत्युक्त्वा हव्यवाहस्तु तत्रैवान्तरधीयत।
वेदवती च सुश्रोणी प्रविवेश हुताशनम्॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः पुष्पवर्षं प्रचक्रिरे।
प्रशशंसुश्च वैधात्रीं वेदवतीं पतिव्रताम्॥
📖 भावार्थ : तब सुन्दर मुख वाली वेदवती ने अपने केशों को काटकर अग्नि में प्रवेश करने की इच्छा की। उस समय ज्वलनशील अग्नि ने उसे देखा। अग्निदेव ने उससे कहा, "तुम चिन्ता मत करो। प्रभावशाली विष्णु के द्वारा रावण का वध अवश्य होगा। तुम्हारे शाप से वह दुष्टात्मा नष्ट होगा। और तुम जनक के घर में सीता के रूप में जन्म लोगी।" ऐसा कहकर अग्निदेव वहीं अन्तर्धान हो गए। और वेदवती अग्नि में प्रविष्ट हो गई। तब देवताओं और गन्धर्वों ने पुष्पवर्षा की और उस पतिव्रता वेदवती की प्रशंसा की।
॥ श्लोक १६-२० ॥
ततः कालेन महता जनकस्य महात्मनः।
सीता समुद्भविष्यति क्षेत्रजाता यशस्विनी॥
रामस्य महिषी देवी लक्ष्मीरिव जनार्दनम्।
रावणस्य वधार्थाय प्रार्थिता विश्वकर्मणा॥
एतत्ते कथितं राम वेदवत्याः समुद्भवम्।
यथा साभूत्पुरा सीता रावणस्य वधार्थिनी॥
न हि सीता रघुश्रेष्ठ मानुषी लोकसम्भवा।
माया हि वैष्णवी दिव्या त्वया सार्धमिहागता॥
इत्युक्त्वा मुनिशार्दूलो विरराम महातपाः।
📖 भावार्थ : उसके बाद बहुत समय बीतने पर महात्मा जनक के यहाँ वह यशस्विनी सीता के रूप में क्षेत्र से प्रकट हुई। वह राम की महिषी बनी, जैसे लक्ष्मी जनार्दन की होती हैं। रावण के वध के लिए ही विश्वकर्मा ने उसे प्रार्थित किया था। हे राम! यह तुमसे वेदवती का वृत्तान्त कहा गया, कि कैसे वह पूर्वजन्म में रावण के वध के लिए सीता हुई। हे रघुश्रेष्ठ! सीता मनुष्य नहीं हैं, वैष्णवी दिव्य माया है, जो तुम्हारे साथ यहाँ आई है। ऐसा कहकर महातपस्वी मुनि रुक गए।
॥ श्लोक २१-२५ ॥
श्रुत्वा रामो वचस्तस्य मुनेर्धर्मभृतां वरः।
विस्मयं परमं गत्वा सीतां दृष्ट्वा मुदं ययौ॥
उवाच चैनं धर्मात्मा धन्योऽहमनुगृहीतः।
यन्मे सीता महाभागा पूर्वजन्मनि संस्थिता॥
अहो महर्षे दिव्यं ते वचनं सत्यवादिनः।
यथा सीता न मर्त्येयं किन्तु देवी सनातनी॥
एवं संपूज्य तं मुनिं रामः प्रीतमनाः सुखी।
विसर्जयामास तदा मुनिं सत्यव्रतं वरम्॥
📖 भावार्थ : मुनि के इन वचनों को सुनकर धर्मज्ञों में श्रेष्ठ राम अत्यन्त विस्मित हुए और सीता की ओर देखकर बहुत प्रसन्न हुए। वे बोले, "धन्य हूँ, कृतार्थ हूँ कि महाभागा सीता मेरे पूर्वजन्म में भी मेरे साथ हैं। हे महर्षे! आपका यह वचन अत्यन्त दिव्य और सत्य है कि सीता मर्त्य न होकर सनातनी देवी हैं।" इस प्रकार राम ने प्रसन्न होकर उस सत्यव्रत मुनि की पूजा की और उन्हें विदा किया।

🙏 राम की प्रतिक्रिया एवं फलश्रुति (श्लोक २६-४०)

॥ श्लोक २६-३० ॥
ततः प्रभृति रामोऽपि सीतां परमया मुदा।
ददर्श देवीं लोकेषु विष्णुमायामयीं शुभाम्॥
अथ राजा दशग्रीवं स्मृत्वा रामः प्रतापवान्।
चिन्तयामास कर्माणि रावणस्य दुरात्मनः॥
कथं स राक्षसो दुष्टो वेदवतीं तपस्विनीम्।
अवमन्य यथाकामं चचार पृथिवीतले॥
तस्य तच्चिन्तितं ज्ञात्वा मुनिरगस्त्यः प्रतापवान्।
उवाच रामं धर्मज्ञं शृणु राजन् वचो मम॥
📖 भावार्थ : तब से राम अत्यन्त प्रसन्नता से सीता को, जो विष्णुमयी देवी थीं, देखने लगे। फिर राजा राम ने दशग्रीव रावण का स्मरण करके उस दुरात्मा के कर्मों का चिन्तन किया – कैसे वह दुष्ट राक्षस तपस्विनी वेदवती का अपमान करके पृथ्वी पर विचरता रहा। उनके चिन्तन को जानकर प्रतापी मुनि अगस्त्य ने राम से कहा, "हे राजन्! मेरा वचन सुनो।"
॥ श्लोक ३१-३५ ॥
य इदं शृणुयान्नित्यं वेदवत्याः समुद्भवम्।
सीतायाश्चरितं दिव्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते॥
न दुःखमाप्नुयात्किंचित्सम्पत्सुखसमन्वितः।
अन्ते विष्णुपुरं याति वेदवतीप्रसादतः॥
सीता च पतिव्रता या सा पूज्या सर्वदा नरैः।
तस्या निन्दां न कुर्वीत कदाचिदपि मानवः॥
इति वाल्मीकिना प्रोक्तं रामाय सुमहात्मने।
उत्तरकाण्डमाहात्म्यं वेदवत्याश्च कीर्तनम्॥
📖 भावार्थ : जो इस वेदवती के उद्भव और सीता के दिव्य चरित्र को नित्य सुनता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है। उसे कभी दुःख नहीं होता और वह सम्पत्ति एवं सुख से युक्त रहता है। अन्त में वेदवती की कृपा से वह विष्णुलोक को जाता है। जो सीता पतिव्रता हैं, वह सदा सब मनुष्यों द्वारा पूजनीय हैं। मनुष्य को कभी भी उसकी निन्दा नहीं करनी चाहिए। महात्मा राम से वाल्मीकि ने इस प्रकार उत्तरकाण्ड की महिमा और वेदवती का कीर्तन किया।
॥ श्लोक ३६-४० ॥
एतत्ते कथितं राम सर्वं वै पूर्वजन्मनः।
वेदवती च या देवी सीता त्वं च न संशयः॥
धर्मेण पालयेमां वै महीं सागरमेखलाम्।
मा च सीतां परित्याज्यं कदाचिदपि राघव॥
इत्युक्त्वा स मुनिर्गन्तुं प्रचक्रमे यथागतम्।
रामोऽपि सीतया सार्धं रेमे राज्येऽकुतोभयः॥
इति श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे सप्तदशः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : हे राम! यह तुमसे सब कुछ पूर्वजन्म का कहा गया – वेदवती ही देवी सीता हैं, इसमें संशय नहीं। तुम धर्मपूर्वक इस सागर-मेखला पृथ्वी का पालन करो और हे राघव! कभी भी सीता का त्याग मत करना। ऐसा कहकर मुनि जैसे आए थे, वैसे ही जाने लगे। राम भी सीता के साथ निर्भय होकर राज्य का आनन्द लेने लगे।

शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह ज्ञान होता है कि सती-साध्वी स्त्रियों का तप और शाप कभी व्यर्थ नहीं जाता। वेदवती ने रावण के अत्याचार से अग्नि में प्रवेश किया, परन्तु उसकी प्रतिज्ञा ने रावण के वध का मार्ग प्रशस्त किया। सीता केवल एक नारी नहीं, स्वयं लक्ष्मी हैं, और राम विष्णु के अवतार हैं।

सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)

नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।

इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।

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