उत्तर काण्ड अध्याय 16

रावण के नाम की उत्पत्ति

रावण ने घोर तपस्या करके ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया। फिर कैलाश पर्वत उखाड़ने के प्रयास में शिव जी द्वारा दबा लिए जाने पर उनकी स्तुति की और रावण नाम पाया।

विवरण

यह सर्ग रावण के नाम की प्रसिद्ध कथा का वर्णन करता है। दशग्रीव (रावण) ने घोर तपस्या करके ब्रह्मा से अमरता का वरदान तो नहीं, परन्तु देवताओं, दानवों, यक्षों आदि से अवध्य होने का वरदान प्राप्त किया। इसके बाद उसने लंका पर अधिकार किया और कुबेर को निकाल दिया। एक बार अहंकारवश उसने कैलाश पर्वत को उखाड़ने का प्रयास किया। भगवान शिव ने अपने अंगूठे से पर्वत को दबा दिया, जिससे रावण की भुजाएँ दब गईं और वह चीत्कार करने लगा। तब उसने हजारों वर्षों तक शिव की स्तुति की, और प्रसन्न होकर शिव ने उसे 'रावण' (जो रावण अर्थात् चीत्कार करने वाला) नाम दिया और चन्द्रहास खड्ग प्रदान किया। इस प्रकार रावण का नामकरण हुआ।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १६

(रावण के नाम की उत्पत्ति)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षोडशः सर्गः ॥

🕉️ रावण की तपस्या और ब्रह्मा का वरदान (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः कालेन महता दशग्रीवो महाबलः।
गत्वा गन्धमादनं शैलं तपस्तेपे सुदारुणम्॥
दश वर्षसहस्राणि मासमेकं स्थितोऽभवत्।
उर्ध्वबाहुः पादाङ्गुष्ठे स्थित्वा सूर्यं समीक्षयन्॥
तस्य तुष्टो महादेवः स्वयम्भूरमितद्युतिः।
उपागम्य वरं प्रादाद्ब्रह्मा लोकपितामहः॥
वरं वरय भद्रं ते यथेष्टं प्रतिगृह्यताम्।
इति ब्रह्मवचः श्रुत्वा दशग्रीवोऽब्रवीद्वचः॥
देवदानवगन्धर्वाः पिशाचाः पनगाः खगाः।
न मां हिंस्युर्महाभाग तव प्रसादतः प्रभो॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; कालेन = समय से; महता = बड़े; दशग्रीवः = दशग्रीव; महाबलः = महाबली; गत्वा = जाकर; गन्धमादनम् = गन्धमादन; शैलम् = पर्वत पर; तपः = तपस्या; तेपे = की; सुदारुणम् = अत्यन्त कठोर; दश = दस; वर्षसहस्राणि = हजार वर्ष; मासमेकम् = एक मास; स्थितः = स्थित हुआ; अभवत् = था; ऊर्ध्वबाहुः = ऊपर बाँह किए; पादाङ्गुष्ठे = पैर के अंगूठे पर; स्थित्वा = खड़ा होकर; सूर्यम् = सूर्य को; समीक्षयन् = देखता हुआ; तस्य = उस पर; तुष्टः = प्रसन्न हुए; महादेवः = महादेव; स्वयम्भूः = स्वयम्भू; अमितद्युतिः = अपरिमित तेजस्वी; उपागम्य = समीप आकर; वरम् = वरदान; प्रादात् = दिया; ब्रह्मा = ब्रह्मा; लोकपितामहः = लोकपितामह; वरम् = वर; वरय = माँगो; भद्रम् = कल्याण; ते = तुम्हारा; यथेष्टम् = इच्छानुसार; प्रतिगृह्यताम् = ग्रहण करो; इति = इस प्रकार; ब्रह्मवचः = ब्रह्मा के वचन; श्रुत्वा = सुनकर; दशग्रीवः = दशग्रीव; अब्रवीत् = बोला; वचः = वचन; देवदानवगन्धर्वाः = देव, दानव, गन्धर्व; पिशाचाः = पिशाच; पनगाः = सर्प; खगाः = पक्षी; न = न; माम् = मुझे; हिंस्युः = मारें; महाभाग = महाभाग; तव = आपके; प्रसादतः = प्रसाद से; प्रभो = प्रभो।
📖 भावार्थ : उसके बाद महाबली दशग्रीव बहुत समय बीतने पर गन्धमादन पर्वत पर गया और अत्यन्त कठोर तपस्या की। दस हजार वर्षों तक वह एक मास तक पैर के अंगूठे पर खड़ा रहा, ऊर्ध्वबाहु होकर सूर्य को देखता रहा। उस पर प्रसन्न होकर अपरिमित तेजस्वी ब्रह्मा जी, जो स्वयम्भू और लोकपितामह हैं, उसके समीप आए और वरदान देने लगे। उन्होंने कहा, "वर माँगो, तुम्हारा कल्याण हो, इच्छानुसार ग्रहण करो।" ब्रह्मा के इस वचन को सुनकर दशग्रीव ने कहा, "हे महाभाग! हे प्रभो! आपके प्रसाद से देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, सर्प और पक्षी मुझे न मार सकें।" यह सुनकर ब्रह्मा ने तथास्तु कहा और उसे अभय कर दिया। इस प्रकार रावण ने दुर्लभ वरदान प्राप्त किया और अहंकारी हो गया।
॥ श्लोक ६-१० ॥
तथेति ब्रह्मणा प्रोक्ते दशग्रीवः प्रतापवान्।
जग्राह वरदानं तत्प्रहृष्टेनान्तरात्मना॥
ततो लङ्कां समासाद्य कुबेरं समवासृजत्।
विमानं पुष्पकं चापि जहार बलवान् बली॥
ततः कैलासशैलं तु दिदृक्षुः स महाबलः।
जगाम त्रिदशैः सार्धं यत्र देवो महेश्वरः॥
दृष्ट्वा च पर्वतं दिव्यं शिवेनाधिष्ठितं शुभम्।
जिघृक्षुः स दुराधर्षो रावणो राक्षसाधिपः॥
प्रचकर्ष बलाच्छैलं धरणीं कम्पयन्निव।
ततः शूलधरः क्रुद्धो रुद्रस्तं समलोकयत्॥
📖 भावार्थ : ब्रह्मा के "तथास्तु" कहने पर प्रतापी दशग्रीव ने हर्षित अन्त:करण से उस वरदान को ग्रहण किया। फिर वह लंका पर जाकर कुबेर को वहाँ से हटाकर पुष्पक विमान भी बलपूर्वक ले लिया। उसके बाद वह महाबली कैलाश पर्वत को देखने के लिए गया, जहाँ भगवान महेश्वर विराजमान थे। दिव्य और शिव से अधिष्ठित उस सुन्दर पर्वत को देखकर दुराधर्ष राक्षसराज रावण उसे उखाड़ने की इच्छा से बलपूर्वक पर्वत को हिलाने लगा, मानो पृथ्वी को कम्पित कर रहा हो। तब शूलधर भगवान रुद्र ने क्रोधित होकर उसकी ओर देखा।

🏔️ कैलाश पर्वत प्रकरण एवं नामकरण (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततः पादाङ्गुष्ठमथाक्षिप्य स शैलं दशग्रीवस्तस्थौ गिरौ।
पीड्यमानोऽथ दशग्रीवश्चुक्रोश भृशदुःखितः॥
तं श्रुत्वा निनदं घोरं सर्वे देवाः सवासवाः।
त्रस्ता विस्मयमापन्ना ब्रह्माणं शरणं ययुः॥
ब्रह्मा प्रोवाच भो देवा मा भयं वो रणे क्वचित्।
शिवेन दीयते नाम रावणो रावणो ह्ययम्॥
चन्द्रहासं च खड्गं च ददौ तस्मै महेश्वरः।
प्रीतः प्रसन्नो भगवान् दशग्रीवमुवाच ह॥
रावण त्वं महाभाग मत्प्रसादान्न संशयः।
भविष्यसि दुराधर्षः सर्वलोकेषु विश्रुतः॥
📖 भावार्थ : तब भगवान शिव ने अपने पैर के अंगूठे से पर्वत को दबा दिया, जिससे दशग्रीव पर्वत सहित दब गया और अत्यन्त पीड़ा से चिल्लाने लगा। उस भयानक चीत्कार को सुनकर सभी देवता इन्द्र सहित भयभीत हो गए और आश्चर्यचकित होकर ब्रह्मा की शरण में गए। ब्रह्मा ने कहा, "हे देवो! तुम्हें कहीं भय नहीं है। शिव जी इसे रावण नाम दे रहे हैं, क्योंकि यह रावण (चीत्कार) कर रहा है।" तब महेश्वर ने प्रसन्न होकर उसे चन्द्रहास नामक खड्ग दिया और कहा, "हे रावण! तुम महाभाग हो, मेरे प्रसाद से तुम निःसन्देह दुराधर्ष होओगे और सब लोकों में विख्यात होगे।" इस प्रकार शिव की कृपा से दशग्रीव रावण नाम से प्रतिष्ठित हुआ और उसे अमोघ खड्ग भी मिला।
॥ श्लोक १६-२० ॥
इत्युक्त्वा प्रददौ तस्मै दिव्यं खड्गं महाप्रभम्।
चन्द्रहासं महाबाहुः शूलिने नमः शूलिने॥
ततः प्रभृति लोकेऽस्मिन् रावणो नाम राक्षसः।
ख्यातिं ययौ महातेजा दशग्रीवो न संशयः॥
लब्ध्वा च वरदानानि दर्पितो रावणस्तदा।
बाधते स्म त्रिलोकेशान् देवान् ब्रह्मर्षींस्तथा॥
कुबेरं भ्रातरं ज्येष्ठं यक्षेन्द्रं धनदं प्रभुम्।
लङ्काया निरकासयत् स्वयं तस्थौ महाबलः॥
एवं रावण उत्पन्नो ब्रह्मणोऽनुग्रहात्पुरा।
शिवेन नाम चाप्युक्तो दत्तश्च खड्ग उत्तमः॥
📖 भावार्थ : ऐसा कहकर शूलधारी भगवान शिव ने उसे दिव्य महाप्रभावशाली चन्द्रहास खड्ग प्रदान किया। तब से इस लोक में वह राक्षस रावण नाम से प्रसिद्ध हुआ, और उस महातेजस्वी दशग्रीव का यही नाम प्रचलित हुआ। वरदान पाकर रावण अत्यन्त दर्पित हो गया और तीनों लोकों के देवताओं, ब्रह्मर्षियों को सताने लगा। उसने अपने बड़े भाई कुबेर, जो यक्षेन्द्र एवं धनद थे, को लंका से निकाल दिया और स्वयं वहाँ रहने लगा। इस प्रकार पूर्वकाल में ब्रह्मा के वरदान से रावण की उत्पत्ति हुई और शिव जी ने उसका नामकरण कर उत्तम खड्ग दिया।
॥ श्लोक २१-२५ ॥
ततः प्रभृति दुष्टात्मा बलवान् रावणोऽभवत्।
त्रासयन् सर्वभूतानि चरति स्म महीतले॥
न तस्य देवाः सङ्ग्रामे यक्षाः पनगगुह्यकाः।
शक्ताः प्रतिमुखं गन्तुं ब्रह्मदत्तवरोत्कटः॥
एवं वः कथितं राम रावणस्य यथातथम्।
नाम्नः कारणमाख्यातं शिवेन परमात्मना॥
यः शृणोति नरो नित्यं रावणस्य च नाम च।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते॥
इत्याख्यानं समाकर्ण्य रामः प्रीतमना भवत्।
उवाच मुनिशार्दूलं कृताञ्जलिपुटो नृपः॥
📖 भावार्थ : तब से वह दुष्टात्मा रावण अत्यन्त बलवान् हो गया और समस्त प्राणियों को भयभीत करता हुआ पृथ्वी पर विचरने लगा। ब्रह्मा द्वारा प्रदत्त वरदान के कारण वह इतना प्रबल हो गया कि देवता, यक्ष, सर्प और गुह्यक भी उसके सामने युद्ध में खड़े होने में असमर्थ थे। हे राम! इस प्रकार तुमसे रावण के नाम का यथार्थ कारण कहा गया, जो परमात्मा शिव द्वारा दिया गया। जो मनुष्य प्रतिदिन रावण के नाम की इस कथा को सुनता है, वह सब पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है। इस आख्यान को सुनकर राजा राम प्रसन्नचित्त हुए और हाथ जोड़कर मुनिश्रेष्ठ से बोले।

🙏 राम की प्रतिक्रिया एवं फलश्रुति (श्लोक २६-३५)

॥ श्लोक २६-३० ॥
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यद्भवन्तो महामुनिः।
कथयामास दिव्यां मे रावणस्य च नामतः॥
अहो महात्मनः शम्भोर्दिव्यं चरितमद्भुतम्।
येन दुष्टो हि दशग्रीवो रावणत्वमुपागतः॥
अद्यप्रभृति वक्ष्यामि पालयिष्ये महीमिमाम्।
धर्मेण नातिचारेण भवतामाज्ञया मुने॥
एवमुक्त्वा रघुश्रेष्ठो मुनीन्द्रं समपूजयत्।
ददौ रत्नानि वस्त्राणि गाश्च धेनूः सहस्रशः॥
ततः स मुनिशार्दूलो राममामन्त्र्य राघवम्।
जगाम स्वाश्रमं प्रीतो रावणस्य कथां स्मरन्॥
📖 भावार्थ : राम ने कहा, "मैं धन्य हूँ, कृतार्थ हूँ कि आप महामुनि ने मुझे रावण के नाम की यह दिव्य कथा सुनाई। अहो! महात्मा शम्भु का यह चरित्र अद्भुत है, जिससे दुष्ट दशग्रीव रावण नाम को प्राप्त हुआ। हे मुने! आपकी आज्ञा से आज से मैं धर्म का उल्लंघन न करते हुए इस पृथ्वी का पालन करूँगा।" ऐसा कहकर रघुश्रेष्ठ ने मुनीन्द्र की पूजा की और हजारों गौएँ, रत्न एवं वस्त्र दान किए। तब वे मुनिश्रेष्ठ राम से आज्ञा लेकर रावण की कथा का स्मरण करते हुए प्रसन्नतापूर्वक अपने आश्रम को चले गए।
॥ श्लोक ३१-३५ ॥
एवमेतन्मया ख्यातं रावणस्य यशस्विनः।
नामकारणमुदारं शिवेन परमेष्ठिना॥
य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद्वा समाहितः।
सर्वपापैः प्रमुच्येत रुद्रलोकं स गच्छति॥
न तस्य व्याधयो रोगा न दुःखं न च विप्लवः।
भवन्ति राम भद्रं ते शिवभक्तस्य सर्वदा॥
इति वाल्मीकि भगवता प्रोक्तं रामस्य धीमतः।
उत्तरकाण्डमाहात्म्यं रावणस्य च नामतः॥
॥ इति श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे षोडशः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार मैंने तुम्हें यशस्वी रावण के नाम के उदार कारण का वर्णन किया, जो परमेष्ठी शिव जी ने दिया था। जो इस कथा को नित्य सुनता या सुनाता है, वह सब पापों से मुक्त होकर रुद्रलोक को प्राप्त करता है। हे राम! तुम्हारा कल्याण हो, शिवभक्त के सदा रोग, शोक और उपद्रव नहीं होते। भगवान वाल्मीकि ने धीमान् राम से इस प्रकार उत्तरकाण्ड की महिमा और रावण के नाम की कथा कही।

शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह ज्ञान मिलता है कि अहंकार और वरदान का दुरुपयोग करने वाला भी अन्ततः भगवद्भक्ति द्वारा कल्याण पा सकता है। रावण ने शिव की घोर तपस्या कर नाम और खड्ग प्राप्त किया, फिर भी उसके दुष्कर्मों ने उसका पतन किया। भगवन्नाम की महिमा अपार है।

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