उत्तर काण्ड अध्याय 14

रावण और यक्षों के बीच युद्ध

रावण द्वारा यक्षों पर आक्रमण और उनके राज्य को लूटने का वर्णन। यक्षराज कुबेर के आदेश पर यक्षों ने रावण का सामना किया, परंतु रावण की अजेयता के कारण वे पराजित हुए।

विवरण

रावण ने अपनी अमित शक्ति के बल पर यक्षों के राज्य पर आक्रमण किया। यक्ष, जो कुबेर के अनुयायी थे, ने वीरतापूर्वक युद्ध किया, लेकिन रावण के प्रचंड पराक्रम के सामने टिक न सके। रावण ने यक्षों के धन-सम्पत्ति लूट ली और उनके नगर को नष्ट कर दिया। अंत में कुबेर ने हस्तक्षेप किया और यक्षों को समझाकर युद्ध समाप्त किया।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १४

(रावण और यक्षों के बीच युद्ध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ चतुर्दशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण के अत्याचार बढ़ते जा रहे थे। अब उसकी दृष्टि यक्षों के धन और ऐश्वर्य पर पड़ी। यह सर्ग रावण और यक्षों के युद्ध का वर्णन करता है, जिसमें रावण विजयी होता है।

📜 श्लोक १-५ : रावण का यक्षराज्य पर आक्रमण
रावणः क्रोधताम्राक्षः सेनया परया वृतः ।
यक्षराज्यं समुद्दिश्य प्रययौ राक्षसेश्वरः ॥
मणिभद्रः सुसेनश्च यक्षसेनापती उभौ ।
प्रत्युद्ययौ रणे राम रावणं बलदर्पितम् ॥
🔹 पदच्छेद : रावणः = रावण; क्रोधताम्राक्षः = क्रोध से लाल आँखों वाला; सेनया = सेना के साथ; परया = श्रेष्ठ; वृतः = घिरा हुआ; यक्षराज्यम् = यक्षराज्य; समुद्दिश्य = लक्ष्य करके; प्रययौ = गया; राक्षसेश्वरः = राक्षसों के स्वामी; मणिभद्रः = मणिभद्र; सुसेनः = सुसेन; च = और; यक्षसेनापती = यक्षों के सेनापति; उभौ = दोनों; प्रत्युद्ययौ = सामना करने को आए; रणे = युद्ध में; राम = हे राम; रावणम् = रावण से; बलदर्पितम् = बल के मद में चूर।
📖 भावार्थ : रावण ने अपनी विशाल सेना के साथ यक्षराज्य पर आक्रमण करने का निश्चय किया। वह यक्षों के धन और ऐश्वर्य को लूटना चाहता था। यक्षों के सेनापति मणिभद्र और सुसेन ने रावण का सामना करने के लिए अपनी सेना तैयार की। दोनों सेनाएँ युद्धस्थल में आमने-सामने हुईं। रावण अपने बल के मद में चूर था और उसे यक्षों की शक्ति की कोई परवाह नहीं थी। दूसरी ओर, यक्ष अपने राज्य की रक्षा के लिए दृढ़ संकल्पित थे। यह युद्ध रावण के साम्राज्य विस्तार का एक महत्वपूर्ण अध्याय था, क्योंकि यक्षों को कुबेर का संरक्षण प्राप्त था, और रावण पहले ही कुबेर से शत्रुता मोल ले चुका था। इस युद्ध के माध्यम से रावण कुबेर को और अधिक उकसाना चाहता था।
📜 श्लोक ६-१० : घमासान युद्ध
बभूव तुमुलं युद्धं यक्षराक्षससेनयोः ।
शरवर्षैः महाघोरैः अन्योन्यं समवर्षयन् ॥
रावणो राक्षसैः सार्धं यक्षानीकं व्यनाशयत् ।
पेतुर्यक्षसहस्राणि रणे राम सहस्रशः ॥
🔹 पदच्छेद : बभूव = हुआ; तुमुलम् = घमासान; युद्धम् = युद्ध; यक्षराक्षससेनयोः = यक्ष और राक्षस सेनाओं के बीच; शरवर्षैः = बाणों की वर्षा से; महाघोरैः = अत्यंत भयानक; अन्योन्यम् = परस्पर; समवर्षयन् = वर्षा की; रावणः = रावण; राक्षसैः = राक्षसों के साथ; सार्धम् = सहित; यक्षानीकम् = यक्षों की सेना को; व्यनाशयत् = नष्ट कर दिया; पेतुः = गिरे; यक्षसहस्राणि = हजारों यक्ष; रणे = रण में; राम = हे राम; सहस्रशः = हजारों की संख्या में।
📖 भावार्थ : यक्षों और राक्षसों की सेनाओं के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। दोनों ओर से बाणों की घोर वर्षा होने लगी। रावण ने स्वयं रणक्षेत्र में उतरकर यक्षों का संहार करना शुरू कर दिया। उसके प्रचंड पराक्रम के सामने यक्ष टिक न सके और हजारों की संख्या में मारे गए। रावण के रथ की गर्जना से आकाश काँप उठा, और उसके बाणों की अग्नि से यक्ष सेना जलने लगी। युद्ध का यह दृश्य अत्यंत भयानक था – चारों ओर रक्त की नदियाँ बहने लगीं, और योद्धाओं के कटे अंग बिखर गए। रावण ने अपनी माया और अस्त्रों का प्रयोग कर यक्षों को परास्त कर दिया। यह युद्ध रावण की सैन्य शक्ति और उसके क्रूर स्वभाव का प्रतीक बन गया।
📜 श्लोक ११-१५ : यक्षों की पराजय और कुबेर का हस्तक्षेप
हतशेषा दिशः प्राप्ता यक्षा भग्ना हतौजसः ।
कुबेरं शरणं प्राप्ता रावणानीकपीडिताः ॥
कुबेरस्तानुवाचेदं यूयं युद्धान्निवर्तत ।
रावणो दुर्जयो युद्धे ब्रह्मदानवरो हि सः ॥
🔹 पदच्छेद : हतशेषाः = बचे हुए; दिशः = दिशाओं को; प्राप्ताः = भाग गए; यक्षाः = यक्ष; भग्नाः = पराजित; हतौजसः = मारा हुआ बल वाले; कुबेरम् = कुबेर के पास; शरणम् = शरण में; प्राप्ताः = आए; रावणानीकपीडिताः = रावण की सेना से पीड़ित; कुबेरः = कुबेर; तान् = उनसे; उवाच = बोले; इदम् = यह; यूयम् = तुम; युद्धात् = युद्ध से; निवर्तत = हट जाओ; रावणः = रावण; दुर्जयः = दुर्जय है; युद्धे = युद्ध में; ब्रह्मदानवरः = ब्रह्मा के वरदान से वरदानी; हि = निश्चय; सः = वह।
📖 भावार्थ : युद्ध में पराजित होने के बाद जो यक्ष बच गए थे, वे सभी दिशाओं में भाग गए। उनका सारा बल और साहस नष्ट हो चुका था। वे सीधे कुबेर के पास गए और रावण के अत्याचारों से पीड़ित होकर उनसे रक्षा की याचना की। कुबेर ने उन्हें देखकर कहा, “तुम लोग युद्ध से विरत हो जाओ। रावण युद्ध में अजेय है, क्योंकि उसे ब्रह्मा का वरदान प्राप्त है।” कुबेर जानते थे कि रावण को मनुष्य के अतिरिक्त कोई नहीं मार सकता, और वह मनुष्य अभी अवतरित नहीं हुआ था। इसलिए उन्होंने यक्षों को समझाया कि फिलहाल रावण का सामना करना व्यर्थ है। कुबेर का यह कथन भविष्य में राम के अवतार की ओर संकेत करता है। यक्षों ने कुबेर की आज्ञा मान ली और युद्ध समाप्त हो गया। रावण यक्षों के धन और वैभव को लूटकर विजयी होकर लंका लौट गया।
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

रावण और यक्षों का युद्ध रावण की अजेयता और उसके बढ़ते अहंकार को दर्शाता है। यक्षों की पराजय यह बताती है कि रावण के सामने उस समय कोई टिक नहीं सकता था। कुबेर का यह कथन कि रावण दुर्जय है, ब्रह्मा के वरदान के कारण, आगे चलकर राम के अवतार की आवश्यकता को रेखांकित करता है। यह सर्ग रावण की विजयगाथा का हिस्सा है, परंतु साथ ही यह संकेत देता है कि उसके अत्याचारों का अंत निकट है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे चतुर्दशः सर्गः ॥
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