उत्तर काण्ड अध्याय 123

रामायण का परम गुण (फलश्रुति)

इस सर्ग में सम्पूर्ण रामायण के श्रवण-पठन के फल का वर्णन है। यह बताया गया है कि जो इस पवित्र ग्रन्थ को श्रद्धापूर्वक सुनता या पढ़ता है, उसे सभी पापों से मुक्ति, धन-पुत्र-यश की प्राप्ति और अंत में विष्णुलोक की प्राप्ति होती है।

विवरण

यह उत्तरकाण्ड का अंतिम सर्ग है, जिसे फलश्रुति के नाम से जाना जाता है। इसमें वाल्मीकि जी या उनके शिष्य भरद्वाज आदि के द्वारा सम्पूर्ण रामायण के महात्म्य का गुणगान किया गया है। जो मनुष्य इस आद्य काव्य को सुनता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है। राजा को राज्य-प्राप्ति, निःसंतान को संतान, रोगी को आरोग्य, और मुमुक्षु को मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह कथा ब्रह्महत्या जैसे महापापों का भी नाश करने वाली है। अंत में वाल्मीकि रामायण के पाठ की विधि और उसके अनंत लाभों का वर्णन करते हुए ग्रन्थ समाप्त होता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १२३

(रामायण का परम गुण – फलश्रुति)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रयोविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : उत्तरकाण्ड के अंतिम सर्ग में सम्पूर्ण रामायण के श्रवण-पठन का फल बताया गया है। यह फलश्रुति न केवल पापों का नाश करने वाली है, बल्कि जीवन के सभी अभीष्टों को पूर्ण करने वाली भी है। इसे पढ़ने मात्र से ही मनुष्य सभी सुखों को भोगकर अंत में परमपद को प्राप्त होता है।

📜 रामायण श्रवण का फल (श्लोक १-२०)

॥ श्लोक १-१० ॥
इदं रामायणं कृत्स्नं धर्मकामार्थसाधनम्।
पठन्नरः श्रुत्वा चापि सर्वपापैः प्रमुच्यते॥
ब्रह्महत्यादिभिः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः।
राजसूयाश्वमेधानां फलमाप्नोति मानवः॥
पुत्रार्थी लभते पुत्रं धनार्थी लभते धनम्।
विद्यार्थी लभते विद्यां मोक्षार्थी याति केवलम्॥
रामभक्तिपरो नित्यं रामचन्द्रपदाश्रयः।
इह लोके सुखं भुक्त्वा विष्णुलोके महीयते॥
यः सकृच्छ्रवणं कुर्याद्भक्त्या रामायणस्य च।
स याति परमं धाम यत्र गत्वा न शोचति॥
📖 भावार्थ : यह सम्पूर्ण रामायण धर्म, काम और अर्थ को साधने वाला है। इसका पाठ करने वाला या श्रवण करने वाला सभी पापों से मुक्त हो जाता है। ब्रह्महत्या आदि महापापों से भी वह मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं। वह राजसूय और अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त कर लेता है। पुत्र की इच्छा रखने वाले को पुत्र मिलता है, धन की इच्छा वाले को धन मिलता है, विद्या की इच्छा वाले को विद्या मिलती है, और मोक्ष की इच्छा वाला केवल (मोक्ष) को प्राप्त होता है। जो नित्य रामभक्ति में तत्पर रहता है और रामचन्द्र के चरणों का आश्रय लेता है, वह इस लोक में सुख भोगकर विष्णुलोक में महिमान्वित होता है। जो भक्तिपूर्वक रामायण का एक बार भी श्रवण करता है, वह परम धाम को प्राप्त होता है, जहाँ जाकर फिर शोक नहीं करना पड़ता।
॥ श्लोक ११-२० ॥
रामायणकथां दिव्यां शृण्वन्ति ये नरोत्तमाः।
ते सर्वे स्वर्गमायान्ति पुनरावृत्तिदुर्लभाः॥
अपुत्रा लभते पुत्रं पुत्रवान् लभते यशः।
रोगी मुच्येत रोगेण बद्धो मुच्येत बन्धनात्॥
रामायणस्य पाठेन सर्वे कामाः समृध्यति।
सत्यं सत्यं पुनः सत्यं धर्मः सत्यपराक्रमः॥
इदं पवित्रं परमं पुण्यं रामायणं शुभम्।
यः पठेत्प्रयतो नित्यं स याति परमां गतिम्॥
📖 भावार्थ : जो उत्तम नर इस दिव्य रामायण कथा को सुनते हैं, वे सभी स्वर्ग को प्राप्त होते हैं और उनका पुनर्जन्म दुर्लभ हो जाता है। निःसंतान को संतान मिलती है, संतानवान को यश मिलता है। रोगी रोग से मुक्त होता है, बंदी बंधन से छूट जाता है। रामायण के पाठ से सभी मनोरथ सिद्ध होते हैं। सत्य, सत्य, पुनः सत्य है कि यह धर्म सत्यपराक्रमी है। यह पवित्र, परम पुण्यमय शुभ रामायण है। जो नियमपूर्वक नित्य इसका पाठ करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

🙌 ग्रन्थ की महिमा और पाठ-विधि (श्लोक २१-५०)

॥ श्लोक २१-३५ ॥
वाल्मीकिरुवाच
इदं रामायणं कृत्स्नं मया प्रोक्तं तवानघ।
भरद्वाज महाभाग रामस्य चरितं शुभम्॥
गीतं वादित्रनृत्येषु पठ्यते यैः समाहितैः।
ते यान्ति रामसालोक्यं नात्र कार्या विचारणा॥
प्रतिग्रहेषु यज्ञेषु स्वाध्याये सन्ध्ययोरपि।
ये पठन्तीदमाख्यानं तेषां पुण्यफलं महत्॥
एकैकं श्लोकमप्यत्र यः पठेद्भक्तिसंयुतः।
तस्य पुण्यफलं वक्तुं न शक्यं वर्षकोटिभिः॥
दानानि सर्वाण्यखिलान् यज्ञान् विविधदक्षिणान्।
रामायणकथां पुण्यां न तुल्यां ये प्रकुर्वते॥
📖 भावार्थ : वाल्मीकि जी ने कहा: "हे अनघ! हे भरद्वाज महाभाग! मैंने तुमसे यह सम्पूर्ण रामायण, राम का शुभ चरित्र, कह दिया। जो लोग गीत, वाद्य और नृत्य के साथ इसे एकाग्रचित्त होकर पढ़ते हैं, वे राम के सालोक्य (सान्निध्य) को प्राप्त होते हैं, इसमें विचार नहीं करना चाहिए। प्रतिग्रह, यज्ञ, स्वाध्याय और संध्या के समय जो लोग इस आख्यान का पाठ करते हैं, उन्हें महान पुण्यफल मिलता है। इसका एक-एक श्लोक भी जो भक्तिपूर्वक पढ़ता है, उसके पुण्यफल को करोड़ों वर्षों में भी नहीं कहा जा सकता। सभी दान, समस्त यज्ञ और विविध दक्षिणाएँ भी इस पुण्य रामायण कथा के समान नहीं हैं।"
॥ श्लोक ३६-५० ॥
ये च रामायणं दिव्यं शृण्वन्ति प्रयता नराः।
ते सर्वे पापनिर्मुक्ता रामलोकं व्रजन्ति च॥
यत्र यत्र च रामस्य कीर्तनं संप्रवर्तते।
तत्र तत्र च देवेशो रामः सन्निहितः स्वयम्॥
रामायणकथां पुण्यां ये नमस्यन्ति मानवाः।
तेषां पितृगणाः सर्वे तृप्तिं यान्ति न संशयः॥
इत्येतत्कथितं सर्वं रामायणफलं शुभम्।
भरद्वाज महाभाग ग्रन्थसंपुटिकां शृणु॥
एतत्ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि।
इति प्रोवाच भगवान्वाल्मीकिर्मुनिपुंगवः॥
📖 भावार्थ : जो संयमी नर इस दिव्य रामायण को सुनते हैं, वे सब पापों से मुक्त होकर रामलोक को प्राप्त होते हैं। जहाँ-जहाँ राम का कीर्तन होता है, वहाँ-वहाँ देवेश राम स्वयं सन्निहित होते हैं। जो मनुष्य इस पुण्य रामायण कथा का नमस्कार करते हैं, उनके सभी पितर तृप्त हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं। हे भरद्वाज महाभाग! यह सब रामायण का शुभ फल मैंने तुमसे कह दिया। अब इस ग्रन्थ की संपुटिका (समाप्ति) सुनो। तुमने जो मुझसे पूछा था, वह सब तुम्हें बता दिया।" ऐसा कहकर भगवान वाल्मीकि, मुनिपुंगव, चुप हो गए।

🔚 उपसंहार और रामायण की समाप्ति (श्लोक ५१-७०)

॥ श्लोक ५१-६० ॥
भरद्वाज उवाच
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि भगवन्वाक्यविस्तरात्।
रामायणमिदं पुण्यं श्रुत्वा मुक्तोऽस्मि किल्बिषात्॥
वाल्मीकिरुवाच
इदं रामायणं कृत्स्नं त्वयि प्रीत्या मयोदितम्।
रहस्यं ब्रह्मणो वक्त्राद्यथावत्प्राप्तवानहम्॥
ग्रन्थकोटिसहस्राणि यानि सन्ति महीतले।
रामायणकथां दिव्यां न तानि प्राप्नुवन्ति वै॥
अष्टादश पुराणानि रामस्य चरितं तथा।
रामायणस्य तुल्यानि न भवन्ति कदाचन॥
य इदं शृणुयान्नित्यं रामायणमनुत्तमम्।
स गच्छेत्परमं स्थानं यत्र रामः प्रतिष्ठितः॥
📖 भावार्थ : भरद्वाज ने कहा: "हे भगवन्! मैं धन्य हो गया, मैं कृतार्थ हो गया। आपके वाक्य विस्तार से इस पुण्य रामायण को सुनकर मैं सब पापों से मुक्त हो गया।" वाल्मीकि ने कहा: "यह सम्पूर्ण रामायण मैंने तुम्हें प्रेम से कह दिया। यह ब्रह्मा के मुख से जैसा मैंने प्राप्त किया था, वैसा ही रहस्य सहित तुम्हें सुनाया। पृथ्वी पर करोड़ों ग्रन्थ हो सकते हैं, पर वे इस दिव्य रामायण कथा के समान नहीं हो सकते। अठारह पुराण और रामचरित्र भी कभी रामायण के तुल्य नहीं होते। जो इस अनुत्तम रामायण का नित्य श्रवण करता है, वह परम स्थान को जाता है, जहाँ राम प्रतिष्ठित हैं।"
॥ श्लोक ६१-७० ॥
इति श्रीवाल्मीकीये रामायणे उत्तरकाण्डे त्रयोविंशत्यधिकशततमः सर्गः समाप्तः।
ग्रन्थकोटिसहस्राणि यानि सन्ति महीतले।
रामायणकथां दिव्यां न तानि प्राप्नुवन्ति वै॥
य इदं शृणुयान्नित्यं रामायणमनुत्तमम्।
स गच्छेत्परमं स्थानं यत्र रामः प्रतिष्ठितः॥
श्रीरामायणमिदं पुण्यं यः पठेत्प्रयतो नरः।
स सर्वपापनिर्मुक्तो रामलोकं स गच्छति॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार श्रीवाल्मीकीय रामायण के उत्तरकाण्ड में त्रयोविंशत्यधिकशततम (123वाँ) सर्ग समाप्त होता है। जैसा पहले कहा गया, पृथ्वी पर करोड़ों ग्रन्थ हो सकते हैं, पर वे इस दिव्य रामायण कथा के समान नहीं हैं। जो नित्य इस अनुत्तम रामायण का श्रवण करता है, वह उस परम स्थान को जाता है, जहाँ राम प्रतिष्ठित हैं। जो मनुष्य इस पुण्य रामायण का पाठ करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर रामलोक को प्राप्त होता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

📖 फलश्रुति का महत्त्व

किसी भी धार्मिक ग्रन्थ का फलश्रुति अध्याय उसके अध्ययन के प्रति लोगों को प्रेरित करता है। यहाँ बताया गया है कि रामायण का एक श्लोक भी असंख्य पुण्य देता है। यह ग्रन्थ के प्रति आस्था को सुदृढ़ करता है।

🌍 सार्वभौमिक उपदेश

रामायण का फल केवल आध्यात्मिक नहीं, अपितु लौकिक सुखों की प्राप्ति का भी साधन है। यह गृहस्थों के लिए विशेष रूप से लाभकारी है – पुत्र, धन, आरोग्य, यश, सब कुछ प्राप्त होता है।

🕊️ मोक्ष का मार्ग

अंत में मोक्ष की प्राप्ति का वर्णन है। रामायण का श्रवण-पठन अंततः विष्णुलोक की प्राप्ति कराता है, जो सर्वोच्च गति है।

🙇 गुरु-शिष्य संवाद

वाल्मीकि और भरद्वाज का संवाद यह दर्शाता है कि यह ज्ञान परम्परा से चला आ रहा है। गुरु की कृपा से ही शिष्य इसका अधिकारी बनता है।

🎯 शिक्षा : रामायण केवल एक काव्य नहीं, अपितु जीवन की सभी समस्याओं का समाधान है। इसे श्रद्धा और भक्ति से सुनने-पढ़ने से मनुष्य सुखी, समृद्ध और अंततः मुक्त हो जाता है।

ॐ तत्सत् – इति श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे त्रयोविंशत्यधिकशततमः सर्गः समाप्तः ॥
॥ इति श्रीवाल्मीकीयं रामायणं सम्पूर्णम् ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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