उत्तर काण्ड अध्याय 122

राम का अन्य प्राणियों के साथ स्वर्गारोहण

राम के देह त्याग के बाद वे अपने मूल स्वरूप विष्णु में लीन हो जाते हैं। ब्रह्मा, शिव और अन्य देवता उनकी स्तुति करते हैं। राम के साथ आए सभी प्राणी भी अपने-अपने स्वरूपों को प्राप्त करके उनके धाम में विलीन हो जाते हैं।

विवरण

जब राम ने सरयू नदी के तट पर योग से अपना देह त्याग दिया, तब उनकी दिव्य ज्योति ब्रह्मलोक को प्राप्त हुई। वहाँ ब्रह्मा, शिव, इंद्र और समस्त देवताओं ने उनका स्वागत किया। राम ने अपना वास्तविक स्वरूप – चतुर्भुज विष्णु – धारण किया। उनके साथ आए सभी प्राणी – वानर, राक्षस, ऋषि, और राम के भाई – भी अपने दिव्य रूपों में परिणत हो गए। हनुमान ने राम के चरणों में स्थान पाया। सभी विष्णुधाम में विलीन हो गए। यह सर्ग राम के दिव्य धाम प्रत्यावर्तन का वर्णन करता है, जहाँ वे सदा के लिए अपने भक्तों के साथ निवास करते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १२२

(राम का अन्य प्राणियों के साथ स्वर्गारोहण)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ द्वाविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम ने सरयू तट पर अपना मानव देह त्याग दिया। उनकी दिव्य ज्योति ब्रह्मलोक पहुँची, जहाँ समस्त देवता उनके स्वागत को उपस्थित हुए। यह सर्ग राम के विष्णु रूप में प्रतिष्ठित होने और उनके अनुयायियों के दिव्य धाम में विलीन होने का वर्णन करता है।

✨ राम की दिव्य ज्योति का ब्रह्मलोक गमन (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-६ ॥
रामस्य योगमास्थाय त्यक्तदेहस्य धीमतः।
दीप्तिर्ब्रह्ममयी जज्ञे सर्वलोकप्रकाशिनी॥
सा दीप्तिर्ब्रह्मलोकं वै प्रविवेश महाप्रभा।
यत्र ब्रह्मा च रुद्रश्च सर्वे देवाः सवासवाः॥
तां दृष्ट्वा परमां ज्योतिं ब्रह्मा लोकपितामहः।
उवाच प्रहसन्वाक्यं सर्वदेवसमागमे॥
एषा ज्योतिः परा विष्णो रामस्याक्लिष्टकर्मणः।
मानुषं रूपमुत्सृज्य पुनर्धामैति शाश्वतम्॥
ततः शक्रः सहेन्द्रैश्च ववन्दे तां परात्पराम्।
सर्वे देवगणाश्चैव साध्या विश्वे मरुद्गणाः॥
तुष्टुवुः परया भक्त्या रामं सत्यपराक्रमम्।
नमो विष्णवे शाश्वताय नमस्ते पुरुषोत्तम॥
📖 भावार्थ : जब धीमान् राम ने योग से देह त्याग दिया, तब उनसे ब्रह्ममयी दीप्ति उत्पन्न हुई जो सभी लोकों को प्रकाशित करने वाली थी। वह महाप्रभा दीप्ति ब्रह्मलोक में प्रविष्ट हुई, जहाँ ब्रह्मा, रुद्र, इंद्र सहित सभी देवता विराजमान थे। उस परम ज्योति को देखकर लोकपितामह ब्रह्मा ने समस्त देवताओं के समागम में हँसते हुए कहा: "यह विष्णु की परा ज्योति है, अक्लिष्टकर्मा राम की। उन्होंने मानुष रूप को त्यागकर अब अपने शाश्वत धाम को प्राप्त किया है।" तब इंद्र सहित समस्त देवताओं ने, साध्य, विश्व, मरुद्गण आदि ने उस परात्पर ज्योति को प्रणाम किया और परम भक्ति से सत्यपराक्रमी राम की स्तुति की: "नमः विष्णवे शाश्वताय, नमः ते पुरुषोत्तम!"
॥ श्लोक ७-१२ ॥
स्तुवतां देवतानां तु रामो विष्णुः सनातनः।
प्रादुरासीन्महातेजा दिव्यरूपधरो हरिः॥
चतुर्भुजो महावीर्यः शंखचक्रगदाधरः।
पीतवासाः श्रीवत्साङ्कः कौस्तुभोद्भासितोरसः॥
तं दृष्ट्वा देवताः सर्वाः प्रणेमुर्हर्षविह्वलाः।
ब्रह्मा विष्णुं जगन्नाथं स्तोतुमेव प्रचक्रमे॥
नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते यज्ञरूपिणे।
नमो गुह्याय शुद्धाय नमस्ते परमात्मने॥
एवं स्तुतः स भगवान् रामो विष्णुः सनातनः।
प्रहसन्निव तान्सर्वानभ्यभाषत माधवः॥
📖 भावार्थ : देवताओं की स्तुति करते समय, सनातन विष्णु राम महातेजस्वी रूप में प्रकट हुए, दिव्यरूप धारण किए हरि। वे चतुर्भुज, महावीर्य, शंख, चक्र, गदा धारण किए, पीतवस्त्र पहने, श्रीवत्स चिह्न से युक्त और कौस्तुभ मणि से विभूषित वक्ष वाले थे। उन्हें देखकर सभी देवता हर्षविह्वल होकर प्रणाम करने लगे। ब्रह्मा ने जगन्नाथ विष्णु की स्तुति आरम्भ की: "नमः पुण्डरीकाक्ष, नमः यज्ञरूपिणे, नमः गुह्याय शुद्धाय, नमः परमात्मने।" इस प्रकार स्तुत होकर सनातन विष्णु भगवान राम, माधव, मुस्कुराते हुए उन सबसे बोले।

💬 देवताओं का संवाद और राम का आशीर्वाद (श्लोक १३-३०)

॥ श्लोक १३-२० ॥
राम उवाच देवेन्द्रं ब्रह्माणं च पिनाकिनम्।
दिष्ट्या भवन्तः सुप्रीता दिष्ट्या देवाः समागताः॥
अहं कृतार्थो देवेशा युष्माभिः पूजितः सदा।
अनुग्रहाय लोकानां मया मानुषमास्थितम्॥
तत्सर्वं कृतकृत्यं मे यत्कृत्यं मानुषे कुले।
इदानीं देवलोकेऽस्मिन्वत्स्यामि सह युष्माभिः॥
इत्युक्त्वा भगवान्विष्णुः सीतया सहितः प्रभुः।
बभौ सहैव लक्ष्म्या वै शेषभूतैश्च भोगिभिः॥
ततो ब्रह्मा महातेजा रामं प्रोवाच विस्मितः।
भगवन्सर्वलोकेश किमिदं वदतां वर॥
📖 भावार्थ : राम ने देवेन्द्र, ब्रह्मा और शिव से कहा: "अच्छा हुआ कि आप सब प्रसन्न हैं और देवता लोग यहाँ एकत्र हुए हैं। हे देवेश्वरो! मैं कृतार्थ हूँ कि आपने मेरी पूजा की। लोकानुग्रह के लिए मैंने मनुष्य रूप धारण किया था। अब मनुष्य कुल में जो कर्तव्य था, वह सब पूर्ण हो गया। अब मैं आप सबके साथ इस देवलोक में निवास करूँगा।" ऐसा कहकर भगवान विष्णु, सीता के साथ, लक्ष्मी और शेषनाग सहित शोभायमान हुए। तब महातेजा ब्रह्मा ने विस्मित होकर राम से कहा: "हे भगवन्! सर्वलोकेश! वदतां वर! यह क्या हो रहा है?"
॥ श्लोक २१-३० ॥
रामः प्राह ततः सर्वान्येऽनुजग्मुर्महीं गताः।
तेऽपि यास्यन्ति मे धाम योगिनो नात्र संशयः॥
इत्युक्त्वा भगवान्विष्णुः सस्मार स्वेन चक्षुषा।
ततस्ते वानरर्क्षाश्च राक्षसाश्च तपोधनाः॥
भरताद्याश्च राजानः सर्वे दिव्याकृतिं गताः।
विमानवरमारुह्य रामलोकं प्रपेदिरे॥
हनूमांस्तु महातेजा रामचन्द्रमुवाच ह।
यावद्रामकथा लोके भविष्यति सनातनी॥
तावत्स्थास्ये सदा लोके रामभक्तिपरायणः।
रामः प्राह तथा चास्तु वत्स त्वं भक्तिवत्सलः॥
अजरश्चामरश्चैव लोकपूज्यो भविष्यसि॥
📖 भावार्थ : राम ने आगे कहा: "जो मेरे साथ पृथ्वी से चले थे, वे सब योगी मेरे धाम को प्राप्त होंगे, इसमें संशय नहीं।" ऐसा कहकर भगवान विष्णु ने अपने दिव्य चक्षु से संकल्प किया। तब वे सभी वानर, ऋक्ष, राक्षस, तपोधन ऋषि, भरत आदि राजा, सभी दिव्य आकृति को प्राप्त हो गए। वे दिव्य विमानों पर आरूढ़ होकर रामलोक (वैकुण्ठ) को प्राप्त हुए। हनुमान ने रामचन्द्र से कहा: "हे प्रभु! जब तक यह रामकथा सनातन लोक में रहेगी, तब तक मैं रामभक्तिपरायण होकर इस लोक में स्थित रहूँगा।" राम ने कहा: "ऐसा ही होगा, वत्स! तुम भक्तिवत्सल हो, तुम अजर-अमर और लोकपूज्य रहोगे।"

🌀 सभी का विष्णुधाम में विलय (श्लोक ३१-५०)

॥ श्लोक ३१-४० ॥
ततः सीता महालक्ष्मी राधा कृष्णप्रिया सती।
रामस्य वक्षसि लग्ना बभूवाक्लिष्टकर्मणः॥
लक्ष्मणः शेषनागोऽभूद्भरतः शंख उच्यते।
शत्रुघ्नश्च सुदर्शनश्चक्रं सर्वायुधोत्तमम्॥
सुग्रीवो गरुडः साक्षाद्विभीषणः कुमुदस्तथा।
अंगदो नन्दकः खड्गो हनूमान् रुद्र उच्यते॥
जाम्बवान् वानरेन्द्रश्च ऋषयो देवतागणाः।
विष्णुलोकं गताः सर्वे रामेण सह शाश्वतम्॥
एवं ते देवताः सर्वे रामस्यानुचराः पुरा।
रामेण सह संयुक्ता विष्णुलोके महीयते॥
📖 भावार्थ : तब सीता, जो महालक्ष्मी हैं, राधा और कृष्णप्रिया सती, अक्लिष्टकर्मा राम के वक्षःस्थल में लीन हो गईं। लक्ष्मण शेषनाग बने, भरत को शंख कहा गया, और शत्रुघ्न सुदर्शन चक्र – सर्वोत्तम अस्त्र – बने। सुग्रीव साक्षात गरुड़ थे, विभीषण कुमुद (विष्णु के एक गण) बने। अंगद नन्दक नामक खड्ग थे, हनुमान रुद्र कहलाए। जाम्बवान वानरेन्द्र थे, ऋषि और देवतागण भी विष्णु के विभिन्न अंश थे। सभी राम के साथ शाश्वत विष्णुलोक को प्राप्त हुए। इस प्रकार वे सभी देवता जो पूर्व में राम के अनुचर थे, राम के साथ संयुक्त होकर विष्णुलोक में महिमान्वित हुए।
॥ श्लोक ४१-५० ॥
तत्र ते मुदिताः सर्वे रामं प्राप्य जनार्दनम्।
नित्यानन्दाः सुखं स्वर्गे वर्तन्ते कल्पिताः सदा॥
रामस्य चरितं पुण्यं यः पठेत्प्रयतो नरः।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते॥
इदं रामस्य चरितं सर्गोऽयं कीर्तितो मया।
स्वर्गारोहणसंज्ञश्च पुण्यः पापप्रणाशनः॥
यः शृणोति नरो भक्त्या रामस्य प्रियकाम्यया।
स याति परमं धाम यत्र रामः सनातनः॥
📖 भावार्थ : वहाँ वे सब जनार्दन राम को प्राप्त कर आनन्दित हुए, नित्यानन्द से स्वर्ग में सुखपूर्वक निवास करने लगे। जो मनुष्य इस राम के पुण्य चरित्र को पढ़ता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक में महिमान्वित होता है। इस प्रकार मैंने राम के स्वर्गारोहण नामक इस पुण्य सर्ग का कीर्तन किया है, जो पापों का नाश करने वाला है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक राम के प्रिय की कामना से इस सर्ग को सुनता है, वह परम धाम को प्राप्त करता है, जहाँ सनातन राम निवास करते हैं।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🕉️ राम का विष्णु स्वरूप

इस सर्ग में राम का चतुर्भुज विष्णु रूप में प्रकट होना उनकी दिव्यता की पुष्टि करता है। वे केवल एक आदर्श मानव नहीं, बल्कि स्वयं भगवान हैं जो धर्म की स्थापना के लिए अवतरित हुए थे।

🐒 सहयोगियों की दिव्यता

हनुमान, सुग्रीव, विभीषण, जाम्बवान आदि सभी के दिव्य अंश होने का वर्णन यह बताता है कि भगवान के सहचर भी उनके धाम के निवासी हैं। वे सदा भगवान की लीला में सहायक होते हैं।

🙏 हनुमान का वरदान

हनुमान को अजर-अमर और लोकपूज्य होने का वरदान मिलता है, जिससे वे कलयुग में भी रामकथा के माध्यम से उपस्थित रहते हैं और भक्तों की रक्षा करते हैं।

📿 फलश्रुति का संकेत

अंत में दिए गए फलश्रुति के वचन अगले सर्ग की भूमिका तैयार करते हैं। रामकथा का श्रवण-पठन विष्णुलोक की प्राप्ति कराता है।

🎯 शिक्षा : राम का स्वर्गारोहण यह सिखाता है कि भगवान और उनके भक्तों में कोई भेद नहीं। भक्त भी भगवान के धाम में उनके साथ निवास करते हैं। रामकथा का श्रवण-कीर्तन ही मुक्ति का साधन है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे द्वाविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।