उत्तर काण्ड अध्याय 120

राम द्वारा अपनी अंतिम आज्ञाएँ देना और परमधाम गमन

उत्तरकाण्ड के अंतिम सर्ग में, राम अयोध्यावासियों और अपने परिजनों को अंतिम आदेश देते हैं, भरत और शत्रुघ्न को धर्म का पालन करने का निर्देश देते हैं, और अंत में सरयू नदी में प्रवेश कर अपने मूल स्वरूप विष्णु में विलीन हो जाते हैं।

विवरण

यह उत्तरकाण्ड का अंतिम और अत्यंत भावुक कर देने वाला सर्ग है। राम ने अपने पुत्रों कुश और लव को राज्य सौंप दिया है। अब वे अपने अंतिम संस्कार के लिए तैयार हैं। वे सभी मंत्रियों, भरत, शत्रुघ्न और अयोध्यावासियों को सभा में बुलाते हैं। वे उन्हें धर्मपूर्वक राज्य चलाने, प्रजा की रक्षा करने और ब्राह्मणों का सम्मान करने का निर्देश देते हैं। विशेष रूप से वे भरत को संबोधित करते हैं कि वे कुश और लव का मार्गदर्शन करें। इसके बाद, राम सभी से विदा लेते हैं और सरयू नदी के तट की ओर प्रस्थान करते हैं। उनके पीछे-पीछे भरत, शत्रुघ्न और सभी अयोध्यावासी भी चले जाते हैं, क्योंकि वे राम के बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकते। राम सरयू नदी में प्रवेश करते हैं और ब्रह्मा, शिव, इंद्र आदि देवताओं की उपस्थिति में अपने मूल स्वरूप महाविष्णु में विलीन हो जाते हैं। भरत और शत्रुघ्न भी राम के पीछे-पीछे सरयू में प्रवेश कर अपने शरीर त्याग देते हैं और राम में लीन हो जाते हैं। यह घटना राम की महालीला के समापन का प्रतीक है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १२०

(राम द्वारा अपनी अंतिम आज्ञाएँ देना और परमधाम गमन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ विंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥

🎙️ अंतिम संबोधन (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः रामः सभामध्ये सर्वान् समवनीय च।
उवाच परमप्रीतो धर्म्यं वचनमुत्तमम्॥
शृण्वन्तु मम वचनं सर्वे भवन्तः समागताः।
कुशलवौ मम सुतौ राज्ये स्थापितवानहम्॥
भरत शत्रुघ्न युवां धर्मं पालयतं सदा।
प्रजाः पुत्रवत् रक्षतं ब्राह्मणान् पूजयतं सदा॥
अहं त्वद्य गमिष्यामि परां निष्ठां सनातनीम्।
अनुजानामि वः सर्वान् मा शोचत सुखं व्रज॥
📖 भावार्थ : उसके बाद राम ने सभा के मध्य में सभी को एकत्र करके परम प्रीतिपूर्वक यह उत्तम धर्म्य वचन कहे: "हे एकत्रित सभी भव्य जनों! मेरे वचन सुनें। मैंने अपने पुत्र कुश और लव को राज्य पर स्थापित कर दिया है। हे भरत और शत्रुघ्न! तुम दोनों सदा धर्म का पालन करना। प्रजा की पुत्रवत् रक्षा करना और ब्राह्मणों की सदा पूजा करना। मैं आज उस सनातन परम निष्ठा (परमधाम) को प्राप्त होने जा रहा हूँ। मैं तुम सभी को अनुज्ञा देता हूँ। मेरे लिए शोक मत करो, तुम सब सुखपूर्वक रहो।" यह राम का अंतिम संबोधन है। इसमें वे धर्म, प्रजा-रक्षा और ब्राह्मण-सम्मान पर बल देते हैं। विशेष रूप से भरत और शत्रुघ्न को संबोधित करना यह दर्शाता है कि वे उनसे कुश और लव का मार्गदर्शन करने की अपेक्षा रखते हैं। राम का यह कहना कि "मेरे लिए शोक मत करो" उनके वैराग्य और ज्ञान को दर्शाता है, परन्तु श्रोताओं के लिए इसे सुनना असंभव था।

👋 विदाई और प्रस्थान (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
इत्युक्त्वा राघवो राजा परिक्रम्य सभासदः।
निर्जगाम पुरात्तस्मात्सरयूतीरमभिययौ॥
तमन्वगच्छद्भरतः शत्रुघ्नश्च महाबलः।
सुमन्त्रः सचिवाः सर्वे प्रजाश्चापि समन्ततः॥
रामः सरयूतीरे तु समास्थाय योगतः।
प्रविवेश महातेजा ब्रह्मणः परमं पदम्॥
ततः पुष्पवृषः सर्वे देवाः प्रमुदिताः शुभम्।
ववर्षुः शिरसि रामस्य ब्रह्माद्याः सुरसत्तमाः॥
📖 भावार्थ : ऐसा कहकर राजा राघव ने सभासदों की परिक्रमा की और उस नगरी (अयोध्या) से बाहर निकलकर सरयू नदी के तट की ओर प्रस्थान किया। उनके पीछे-पीछे भरत, महाबलशाली शत्रुघ्न, सुमंत्र, सभी मंत्री और चारों ओर से प्रजा के लोग भी चले गए। राम ने सरयू के तट पर योग से स्थित होकर (योगमार्ग का आश्रय लेकर) महातेजस्वी होकर ब्रह्म (विष्णु) के परम पद में प्रवेश किया। तब ब्रह्मा आदि सभी देवता अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने राम के सिर पर शुभ पुष्पों की वर्षा की। यह दृश्य अत्यंत मार्मिक है। राम अकेले नहीं जा रहे हैं, उनके पीछे सारी अयोध्या चल पड़ी है। यह उनके प्रति अयोध्यावासियों के असीम प्रेम और समर्पण को दर्शाता है। राम का योग से स्थित होना यह दर्शाता है कि वे केवल भौतिक शरीर नहीं त्याग रहे, बल्कि सचेतन रूप से योग के माध्यम से अपने मूल स्वरूप में लीन हो रहे हैं। देवताओं की पुष्पवर्षा इस घटना की दिव्यता को प्रमाणित करती है।

🙏 भरत-शत्रुघ्न का त्याग (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-२० ॥
भरतश्च महातेजाः शत्रुघ्नश्च महाबलः।
राममेवानुसंप्रेक्ष्य सरयूं प्रविवेश ह॥
तयोः प्रवेशं संप्रेक्ष्य सुमन्त्रः सचिवैः सह।
प्रविवेश जलं शीघ्रं रामध्यानपरायणः॥
प्रजाश्चापि महाभागा रामं ध्यात्वा महाप्रभम्।
प्रविविशुः सरयूं सर्वे रामेण हृतचेतसः॥
ततः कुशलवौ राज्ये स्थापयित्वा यथाविधि।
ऋषयः सर्व एवैतां कथां गायन्ति राघवीम्॥
यः पठेद्रामचरितं सर्वपापैः प्रमुच्यते।
स्वर्गलोकमवाप्नोति रामस्य प्रियकृत्तथा॥
📖 भावार्थ : महातेजस्वी भरत और महाबलशाली शत्रुघ्न ने राम की ही ओर देखते हुए (उनके पीछे-पीछे) सरयू नदी में प्रवेश किया। उन दोनों के प्रवेश को देखकर सुमंत्र भी मंत्रियों के साथ शीघ्र ही राम के ध्यान में लीन होकर जल में प्रविष्ट हो गए। और सभी महाभाग प्रजाजन भी महाप्रभु राम का ध्यान करते हुए, राम द्वारा हृतचेत (मन हरे गए) होकर, सरयू नदी में प्रवेश कर गए। तब कुश और लव को यथाविधि राज्य पर स्थापित करके सभी ऋषि इस राघवी कथा (रामायण) को गाते हैं। जो भी इस रामचरित (रामायण) का पाठ करता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है और स्वर्गलोक को प्राप्त करता है तथा राम का प्रिय करने वाला बनता है। यह अंतिम दृश्य अत्यंत भावुक कर देने वाला है। राम के प्रति इतना गहरा प्रेम कि उनके बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। भरत और शत्रुघ्न, जिन्होंने राम के लिए चौदह वर्ष कठिन तपस्या की, अब राम के बिना नहीं रह सकते। यह त्याग और समर्पण की चरम सीमा है। अंतिम श्लोक रामायण के पाठ के महत्त्व को बताते हैं और कथा का समापन करते हैं।

📖 फलश्रुति और समापन (श्लोक २१-३५)

॥ श्लोक २१-३५ ॥
इदं पवित्रं पापघ्नं पुण्यं धर्म्यं यशस्करम्।
रामायणमिदं वेदैरिहामुत्र च मुक्तिदम्॥
आदिकाव्यमिदं पुण्यं वाल्मीकेन यशस्विना।
निबद्धं रामचरितं शृण्वन् मुच्येत किल्बिषात्॥
य इदं शृणुयान्नित्यं रामायणमनुत्तमम्।
सर्वान् कामानवाप्नोति रामस्य प्रियकृत्तथा॥
इति वाल्मीकिना प्रोक्तं रामायणमनुत्तमम्।
उत्तरकाण्डमाहात्म्यं सर्गश्चायं प्रकीर्तितः॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे उत्तरकाण्डे समाप्तः॥
📖 भावार्थ : यह रामायण पवित्र है, पापों का नाश करने वाली है, पुण्यदायिनी है, धर्म्य है और यशस्कर है। यह वेदों के समान है और इस लोक में तथा परलोक में मुक्ति देने वाली है। यह पुण्यमय आदिकाव्य यशस्वी वाल्मीकि द्वारा रचित रामचरित है, जिसे सुनने से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है। जो नित्य इस अनुत्तम रामायण को सुनता है, वह सभी कामनाओं को प्राप्त करता है और राम का प्रिय करने वाला बनता है। इस प्रकार वाल्मीकि द्वारा प्रोक्त अनुत्तम रामायण का उत्तरकाण्ड का माहात्म्य और यह सर्ग कहा गया। ॐ तत्सत्। इस प्रकार श्रीमद्वाल्मीकीयरामायण का उत्तरकाण्ड समाप्त हुआ। यह फलश्रुति रामायण के पाठ के महत्त्व को रेखांकित करती है। यह केवल एक कथा नहीं, बल्कि एक पवित्र ग्रंथ है जो जीवन को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने में सक्षम है। इसके साथ ही उत्तरकाण्ड और संपूर्ण रामायण की कथा पूर्ण होती है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🕉️ लीला समापन का दर्शन

यह सर्ग राम की महालीला के समापन का दर्शन है। राम न केवल एक राजा हैं, बल्कि स्वयं भगवान हैं। उनका सरयू में प्रवेश करना उनके मूल स्वरूप विष्णु में लीन होने का प्रतीक है। यह हिंदू दर्शन के अवतार सिद्धांत की व्याख्या करता है कि भगवान अपने कार्य को पूरा करके पुनः अपने धाम लौट जाते हैं।

💖 भक्ति और समर्पण

भरत, शत्रुघ्न, सुमंत्र और अयोध्यावासियों का राम के पीछे सरयू में प्रवेश करना भक्ति और समर्पण की पराकाष्ठा है। यह दर्शाता है कि राम के प्रति उनका प्रेम इतना गहरा था कि वे उनके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। यह आदर्श भक्ति का उदाहरण है।

📚 रामायण की पूर्णता

यह सर्ग संपूर्ण रामायण का उपसंहार है। यह कथा को समाप्त करता है और साथ ही रामायण के पाठ के महत्त्व को रेखांकित करता है। फलश्रुति के माध्यम से यह बताया गया है कि रामायण का पाठ सभी पापों का नाश करता है और मोक्ष प्रदान करता है। इस प्रकार यह सर्ग रामायण को एक पवित्र ग्रंथ के रूप में स्थापित करता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जीवन नश्वर है, परन्तु धर्म और कीर्ति अमर हैं। राम ने धर्म का पालन करके और अपने पुत्रों को राज्य सौंपकर यह सिखाया कि व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए अंततः परमात्मा में लीन हो जाना चाहिए। रामायण का पाठ हमें सदा राम के आदर्शों का स्मरण कराता है और जीवन को धर्मपूर्वक जीने की प्रेरणा देता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे विंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥
॥ इति श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणं सम्पूर्णम् ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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