राम द्वारा अपनी अंतिम आज्ञाएँ देना और परमधाम गमन
उत्तरकाण्ड के अंतिम सर्ग में, राम अयोध्यावासियों और अपने परिजनों को अंतिम आदेश देते हैं, भरत और शत्रुघ्न को धर्म का पालन करने का निर्देश देते हैं, और अंत में सरयू नदी में प्रवेश कर अपने मूल स्वरूप विष्णु में विलीन हो जाते हैं।
विवरण
यह उत्तरकाण्ड का अंतिम और अत्यंत भावुक कर देने वाला सर्ग है। राम ने अपने पुत्रों कुश और लव को राज्य सौंप दिया है। अब वे अपने अंतिम संस्कार के लिए तैयार हैं। वे सभी मंत्रियों, भरत, शत्रुघ्न और अयोध्यावासियों को सभा में बुलाते हैं। वे उन्हें धर्मपूर्वक राज्य चलाने, प्रजा की रक्षा करने और ब्राह्मणों का सम्मान करने का निर्देश देते हैं। विशेष रूप से वे भरत को संबोधित करते हैं कि वे कुश और लव का मार्गदर्शन करें। इसके बाद, राम सभी से विदा लेते हैं और सरयू नदी के तट की ओर प्रस्थान करते हैं। उनके पीछे-पीछे भरत, शत्रुघ्न और सभी अयोध्यावासी भी चले जाते हैं, क्योंकि वे राम के बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकते। राम सरयू नदी में प्रवेश करते हैं और ब्रह्मा, शिव, इंद्र आदि देवताओं की उपस्थिति में अपने मूल स्वरूप महाविष्णु में विलीन हो जाते हैं। भरत और शत्रुघ्न भी राम के पीछे-पीछे सरयू में प्रवेश कर अपने शरीर त्याग देते हैं और राम में लीन हो जाते हैं। यह घटना राम की महालीला के समापन का प्रतीक है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १२०
(राम द्वारा अपनी अंतिम आज्ञाएँ देना और परमधाम गमन)
🎙️ अंतिम संबोधन (श्लोक १-५)
उवाच परमप्रीतो धर्म्यं वचनमुत्तमम्॥
शृण्वन्तु मम वचनं सर्वे भवन्तः समागताः।
कुशलवौ मम सुतौ राज्ये स्थापितवानहम्॥
भरत शत्रुघ्न युवां धर्मं पालयतं सदा।
प्रजाः पुत्रवत् रक्षतं ब्राह्मणान् पूजयतं सदा॥
अहं त्वद्य गमिष्यामि परां निष्ठां सनातनीम्।
अनुजानामि वः सर्वान् मा शोचत सुखं व्रज॥
👋 विदाई और प्रस्थान (श्लोक ६-१०)
निर्जगाम पुरात्तस्मात्सरयूतीरमभिययौ॥
तमन्वगच्छद्भरतः शत्रुघ्नश्च महाबलः।
सुमन्त्रः सचिवाः सर्वे प्रजाश्चापि समन्ततः॥
रामः सरयूतीरे तु समास्थाय योगतः।
प्रविवेश महातेजा ब्रह्मणः परमं पदम्॥
ततः पुष्पवृषः सर्वे देवाः प्रमुदिताः शुभम्।
ववर्षुः शिरसि रामस्य ब्रह्माद्याः सुरसत्तमाः॥
🙏 भरत-शत्रुघ्न का त्याग (श्लोक ११-२०)
राममेवानुसंप्रेक्ष्य सरयूं प्रविवेश ह॥
तयोः प्रवेशं संप्रेक्ष्य सुमन्त्रः सचिवैः सह।
प्रविवेश जलं शीघ्रं रामध्यानपरायणः॥
प्रजाश्चापि महाभागा रामं ध्यात्वा महाप्रभम्।
प्रविविशुः सरयूं सर्वे रामेण हृतचेतसः॥
ततः कुशलवौ राज्ये स्थापयित्वा यथाविधि।
ऋषयः सर्व एवैतां कथां गायन्ति राघवीम्॥
यः पठेद्रामचरितं सर्वपापैः प्रमुच्यते।
स्वर्गलोकमवाप्नोति रामस्य प्रियकृत्तथा॥
📖 फलश्रुति और समापन (श्लोक २१-३५)
रामायणमिदं वेदैरिहामुत्र च मुक्तिदम्॥
आदिकाव्यमिदं पुण्यं वाल्मीकेन यशस्विना।
निबद्धं रामचरितं शृण्वन् मुच्येत किल्बिषात्॥
य इदं शृणुयान्नित्यं रामायणमनुत्तमम्।
सर्वान् कामानवाप्नोति रामस्य प्रियकृत्तथा॥
इति वाल्मीकिना प्रोक्तं रामायणमनुत्तमम्।
उत्तरकाण्डमाहात्म्यं सर्गश्चायं प्रकीर्तितः॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे उत्तरकाण्डे समाप्तः॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🕉️ लीला समापन का दर्शन
यह सर्ग राम की महालीला के समापन का दर्शन है। राम न केवल एक राजा हैं, बल्कि स्वयं भगवान हैं। उनका सरयू में प्रवेश करना उनके मूल स्वरूप विष्णु में लीन होने का प्रतीक है। यह हिंदू दर्शन के अवतार सिद्धांत की व्याख्या करता है कि भगवान अपने कार्य को पूरा करके पुनः अपने धाम लौट जाते हैं।
💖 भक्ति और समर्पण
भरत, शत्रुघ्न, सुमंत्र और अयोध्यावासियों का राम के पीछे सरयू में प्रवेश करना भक्ति और समर्पण की पराकाष्ठा है। यह दर्शाता है कि राम के प्रति उनका प्रेम इतना गहरा था कि वे उनके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। यह आदर्श भक्ति का उदाहरण है।
📚 रामायण की पूर्णता
यह सर्ग संपूर्ण रामायण का उपसंहार है। यह कथा को समाप्त करता है और साथ ही रामायण के पाठ के महत्त्व को रेखांकित करता है। फलश्रुति के माध्यम से यह बताया गया है कि रामायण का पाठ सभी पापों का नाश करता है और मोक्ष प्रदान करता है। इस प्रकार यह सर्ग रामायण को एक पवित्र ग्रंथ के रूप में स्थापित करता है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जीवन नश्वर है, परन्तु धर्म और कीर्ति अमर हैं। राम ने धर्म का पालन करके और अपने पुत्रों को राज्य सौंपकर यह सिखाया कि व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए अंततः परमात्मा में लीन हो जाना चाहिए। रामायण का पाठ हमें सदा राम के आदर्शों का स्मरण कराता है और जीवन को धर्मपूर्वक जीने की प्रेरणा देता है।