उत्तर काण्ड अध्याय 12

राक्षसों के विवाह

रावण और उसके भाइयों के विवाहों का वर्णन, जिसमें रावण मंदोदरी को, विभीषण सरमा को और कुम्भकर्ण वज्रज्वाला को पत्नी रूप में प्राप्त करते हैं।

विवरण

रावण द्वारा लंका पर अधिकार करने के बाद, वह अपने भाइयों के साथ विवाह करता है। रावण का विवाह मय दानव की पुत्री मंदोदरी से होता है, जो अत्यंत रूपवती और गुणवती थी। विभीषण का विवाह सरमा से होता है, जो धर्मात्मा और पतिव्रता स्त्री थी। कुम्भकर्ण का विवाह वज्रज्वाला से होता है, जो एक विद्याधर कन्या थी। यह सर्ग राक्षस कुल के विस्तार और उनके वैवाहिक संबंधों का वर्णन करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १२

(राक्षसों के विवाह)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ द्वादशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : लंका पर अधिकार करने के बाद रावण ने अपने राज्य को सुदृढ़ करने के लिए वैवाहिक संबंध स्थापित किए। इस सर्ग में उसके और उसके भाइयों के विवाह का सुन्दर वर्णन है।

📜 श्लोक १-५ : मय दानव का वरदान और मंदोदरी का जन्म
मयो नाम महादानवः पुलोमा तनया तथा ।
तस्य पुत्री मंदोदरी रूपेणाप्रतिमा भुवि ॥
स्वयंवरे समायाता रावणेन वृता तदा ।
मयश्च प्रददौ हृष्टो रावणाय महात्मने ॥
🔹 पदच्छेद : मयः = मय; नाम = नामक; महादानवः = महादानव; पुलोमा तनया = पुलोमा की पुत्री; तथा = तथा; तस्य = उसकी; पुत्री = पुत्री; मंदोदरी = मंदोदरी; रूपेण = रूप में; अप्रतिमा = अद्वितीय; भुवि = पृथ्वी पर; स्वयंवरे = स्वयंवर में; समायाता = आई; रावणेन = रावण ने; वृता = वरण की; तदा = तब; मयः च = मय ने भी; प्रददौ = दे दी; हृष्टः = प्रसन्न होकर; रावणाय = रावण को; महात्मने = महात्मा को।
📖 भावार्थ : मय नामक एक महान दानव थे, जो पुलोमा की पुत्री के पति थे। उनके घर एक अत्यंत सुंदर कन्या उत्पन्न हुई, जिसका नाम मंदोदरी रखा गया। वह पृथ्वी पर अद्वितीय रूपवती थी। जब वह स्वयंवर के लिए तैयार हुई, तो अनेक राजा और दानव वहाँ एकत्र हुए। रावण भी अपने बल और पराक्रम के कारण वहाँ गया। उसने मंदोदरी का वरण किया, और मय दानव ने भी रावण के पराक्रम से प्रसन्न होकर अपनी पुत्री का विवाह उससे कर दिया। यह विवाह रावण के जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना थी, क्योंकि मंदोदरी न केवल सुंदर थी, बल्कि अत्यंत बुद्धिमती और धर्मपरायण भी थी। उसने रावण को कई बार अधर्म के मार्ग से रोकने का प्रयास किया, लेकिन रावण के अहंकार के कारण वह सफल नहीं हो सकी। इस विवाह से रावण को एक योग्य पत्नी और सहधर्मिणी मिली, जिसने उसके राज्य की स्थिरता में योगदान दिया।
📜 श्लोक ६-१० : विभीषण का सरमा से विवाह
विभीषणस्तु धर्मात्मा सरमां नाम कन्यकाम् ।
गन्धर्वराजस्य सुतां लब्धवान्विधिवत्प्रियाम् ॥
सरमा च महाभागा पतिव्रता पतिप्रिया ।
विभीषणमनुप्राप्ता धर्मेण सुसमाहिता ॥
🔹 पदच्छेद : विभीषणः तु = विभीषण ने; धर्मात्मा = धर्मात्मा; सरमाम् = सरमा; नाम = नामक; कन्यकाम् = कन्या; गन्धर्वराजस्य = गन्धर्वराज की; सुताम् = पुत्री; लब्धवान् = प्राप्त की; विधिवत् = विधिपूर्वक; प्रियाम् = प्रिय; सरमा च = और सरमा; महाभागा = महाभागा; पतिव्रता = पतिव्रता; पतिप्रिया = पति को प्रिय; विभीषणम् = विभीषण को; अनुप्राप्ता = प्राप्त हुई; धर्मेण = धर्म से; सुसमाहिता = अच्छी तरह युक्त।
📖 भावार्थ : रावण के छोटे भाई विभीषण, जो स्वभाव से धर्मात्मा और सदाचारी थे, ने गन्धर्वराज की पुत्री सरमा से विवाह किया। सरमा भी अत्यंत सुशीला, पतिव्रता और धर्मपरायण थी। उनका विवाह विधिपूर्वक संपन्न हुआ। सरमा ने विभीषण के साथ धर्म के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया। यह विवाह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बाद में जब विभीषण ने रावण का साथ छोड़कर राम का साथ दिया, तो सरमा ने उनका पूरा समर्थन किया। सरमा को अत्यंत बुद्धिमती और दूरदर्शी स्त्री के रूप में वर्णित किया गया है। उन्होंने ही रावण की सेना की गतिविधियों की सूचना हनुमान को दी थी। इस प्रकार यह विवाह केवल वैवाहिक बंधन ही नहीं, बल्कि धर्म और सद्बुद्धि का प्रतीक बना।
📜 श्लोक ११-१५ : कुम्भकर्ण का वज्रज्वाला से विवाह
कुम्भकर्णो महातेजा वज्रज्वालां समग्रहीत् ।
विद्याधराधिपस्यासीद्दुहिता रूपसंयुता ॥
विवाहं कारयामास रावणो भ्रातृवत्सलः ।
हर्षेण महता युक्तो ददौ दानानि भूरिशः ॥
🔹 पदच्छेद : कुम्भकर्णः = कुम्भकर्ण; महातेजाः = महान तेजस्वी; वज्रज्वालाम् = वज्रज्वाला को; समग्रहीत् = ग्रहण किया; विद्याधराधिपस्य = विद्याधराधिप की; आसीत् = थी; दुहिता = पुत्री; रूपसंयुता = रूप से युक्त; विवाहम् = विवाह; कारयामास = करवाया; रावणः = रावण ने; भ्रातृवत्सलः = भाई के प्रति स्नेही; हर्षेण = हर्ष से; महता = बड़े; युक्तः = युक्त; ददौ = दिए; दानानि = दान; भूरिशः = बहुत से।
📖 भावार्थ : कुम्भकर्ण, जो अपने बल और विशालकाय शरीर के लिए प्रसिद्ध थे, का विवाह विद्याधराधिप की पुत्री वज्रज्वाला से हुआ। वज्रज्वाला अत्यंत सुंदर और योग्य थी। रावण ने अपने भाई के प्रति स्नेह दिखाते हुए यह विवाह बड़े धूमधाम से करवाया। उसने इस अवसर पर बहुत सारे दान और उपहार बाँटे। कुम्भकर्ण का स्वभाव रावण से भिन्न था – वह सीधा-सादा और भोला था, परंतु ब्रह्मा के वरदान के कारण उसे लंबी नींद का शाप मिला। वज्रज्वाला ने पति के रूप में कुम्भकर्ण का सदा साथ निभाया। यह विवाह राक्षस कुल में वैवाहिक संबंधों के विस्तार को दर्शाता है, जिससे उनकी शक्ति और प्रभाव बढ़ा। रावण ने इन विवाहों के माध्यम से न केवल अपने कुल को मजबूत किया, बल्कि विभिन्न जातियों और समुदायों से भी संबंध स्थापित किए।
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

इस सर्ग में राक्षसों के वैवाहिक जीवन की झलक मिलती है। मंदोदरी, सरमा और वज्रज्वाला जैसी स्त्रियाँ केवल रूपवती ही नहीं, बल्कि गुणवती और धर्मपरायण भी थीं। यह दर्शाता है कि राक्षस कुल में भी सद्गुणों का सम्मान था। साथ ही, यह विवाह रावण के साम्राज्य विस्तार की नीति का भाग थे।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे द्वादशः सर्गः ॥
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