उत्तर काण्ड अध्याय 119

राम द्वारा कुश और लव को सिंहासन पर आसीन करना

अपने परमधाम गमन से पूर्व, राम अयोध्या के राज्य को सुव्यवस्थित करते हुए अपने पुत्रों कुश और लव को उत्तरी और दक्षिणी कोशल का राज्य सौंपते हैं और उनका राज्याभिषेक करते हैं।

विवरण

लक्ष्मण के निर्वासन और परमधाम गमन के पश्चात, राम अब अपने राज्य को सुव्यवस्थित करने की दिशा में अग्रसर होते हैं। उनके दो पुत्र कुश और लव अब युवा हो चुके हैं और राज्य संभालने योग्य हैं। राम जानते हैं कि अब उनके भी इस लोक से जाने का समय निकट है, इसलिए वे राज्य के भविष्य की चिंता करते हैं। वे अपने गुरु वशिष्ठ और मंत्रियों की सलाह से कुश और लव का राज्याभिषेक करने का निर्णय लेते हैं। कुश को उत्तरी कोशल (अयोध्या सहित) का राज्य सौंपा जाता है, जबकि लव को दक्षिणी कोशल (श्रावस्ती को राजधानी बनाकर) का राज्य दिया जाता है। यह विभाजन यह दर्शाता है कि राम ने राज्य के भविष्य की योजना कितनी सोच-समझकर बनाई थी। दोनों पुत्रों का यथोचित राज्याभिषेक होता है और वे अपने-अपने राज्यों के राजा बनते हैं। इस प्रकार राम अपने राज्य को अपने वंश के लिए सुरक्षित कर लेते हैं और परमधाम गमन के लिए तैयार हो जाते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ११९

(राम द्वारा कुश और लव को सिंहासन पर आसीन करना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ नवदशाधिकशततमः सर्गः ॥

👑 राज्य हस्तांतरण का निर्णय (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः रामः सभामध्ये वसिष्ठप्रमुखान् द्विजान्।
समानीय महातेजाः प्रोवाचेदं वचस्तदा॥
कुशलवौ मम सुतौ धर्मज्ञौ सत्यवादिनौ।
वयःस्थितौ महाभागौ राज्ययोग्यौ मतौ मम॥
इच्छामि राज्यं संप्राप्तुं स्थापयित्वा सुताविमौ।
यदि वो रोचते विप्रा यदि धर्म्यं वदन्तु मे॥
वसिष्ठः प्राह धर्मात्मन् युक्तमाह महीपते।
राज्यं हि रक्षितुं शक्यं राजपुत्रैः सुशिक्षितैः॥
तस्मात्कुरु यथा प्राज्ञ सुतयो राज्यमर्पणम्।
📖 भावार्थ : उसके बाद महातेजस्वी राम ने सभा के मध्य में वसिष्ठ आदि ब्राह्मणों को बुलाकर यह वचन कहा: "मेरे दो पुत्र कुश और लव हैं, जो धर्मज्ञ, सत्यवादी और युवा हो चुके हैं। वे महाभाग हैं और मेरी मति में राज्य के योग्य हैं। मैं इन दोनों पुत्रों को राज्य पर स्थापित करके स्वयं (परमधाम को) प्राप्त होना चाहता हूँ। हे विप्रवरो! यदि आपको यह उचित लगे और यदि यह धर्म्य हो, तो मुझे बताइए।" वसिष्ठ ने कहा: "हे धर्मात्मन् महीपते! आपने उचित कहा। राज्य की रक्षा सुशिक्षित राजपुत्रों द्वारा ही की जा सकती है। इसलिए हे प्राज्ञ! आप अपने पुत्रों को राज्य सौंपने की क्रिया करें।" यह संवाद राम के दूरदर्शी और धर्मपरायण होने का प्रमाण है। वे अपने पुत्रों की योग्यता को पहचानते हैं और समय रहते राज्य हस्तांतरण का निर्णय लेते हैं। वे मंत्रियों और गुरु की सलाह के बिना कोई निर्णय नहीं लेते, जो उनके लोकतांत्रिक दृष्टिकोण को दर्शाता है।

🌟 कुश-लव का आगमन (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
ततः रामो महातेजाः सुमन्त्रं प्राह सत्वरम्।
कुशलवौ मम सुतौ शीघ्रमानय सुव्रतौ॥
सुमन्त्रस्त्वरितं गत्वा यत्र तौ तापसौ स्थितौ।
रामपुत्रौ महाभागौ वाल्मीकेराश्रमे शुभे॥
तावानीय सभामध्ये कृताञ्जली पुरः स्थितौ।
रामः परिष्वज्य सुतौ परमं प्रीतिमानभवत्॥
उवाच च महातेजाः पुत्रयोः शृण्वतां सताम्।
अद्यप्रभृति वां राज्यं ददामि सह बान्धवम्॥
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी राम ने सुमंत्र से शीघ्र कहा: "मेरे पुत्र कुश और लव, जो सुव्रत हैं, उन्हें शीघ्र यहाँ लाओ।" सुमंत्र ने तुरंत जाकर, जहाँ वे दोनों तापस (मुनि) महाभाग रामपुत्र वाल्मीकि आश्रम में स्थित थे, उन्हें ले आए। उन दोनों को सभा के मध्य में हाथ जोड़े सामने खड़ा देखकर राम ने पुत्रों को गले लगाया और परम प्रीतियुक्त हुए। महातेजस्वी राम ने पुत्रों और सभा में उपस्थित सज्जनों के सुनते हुए कहा: "आज से मैं तुम दोनों को बाँधवों सहित यह राज्य देता हूँ।" यह दृश्य अत्यंत हृदयस्पर्शी है। वाल्मीकि आश्रम में तपस्या करते हुए कुश और लव अब अयोध्या की शोभा बढ़ा रहे हैं। राम का उन्हें गले लगाना पिता के प्रेम को दर्शाता है, जो इतने वर्षों बाद भी अटूट है।

🎉 राज्याभिषेक समारोह (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-२० ॥
कुशाय च ददौ राज्यमुत्तरं कोशलं महत्।
अयोध्यां सपुरीं रम्यां सर्वसस्यसमन्विताम्॥
लवाय च ददौ राज्यं दक्षिणं कोशलं तथा।
श्रावस्तीं नगरीं मुख्यां राजधानीमकल्पयत्॥
तयोरभिषेकं कृत्वा रामो धर्मभृतां वरः।
वसिष्ठेन सह राजा मन्त्रिभिश्च समन्वितः॥
पूजयामास गोविप्रान् ददौ दानं सुविस्तरम्।
हर्षिताः प्रजाः सर्वा राजपुत्राभिषेचनात्॥
कुशलवौ च धर्मात्मानौ पितुराज्ञां शिरोधृताम्।
प्रतिगृह्य महात्मानौ राज्यं चक्रतुरव्ययम्॥
📖 भावार्थ : राम ने कुश को उत्तरी कोशल का महान राज्य दिया, जिसमें रम्य अयोध्या नगरी और सभी प्रकार के अन्न-धन से युक्त प्रदेश शामिल थे। उन्होंने लव को दक्षिणी कोशल का राज्य दिया और श्रावस्ती नगरी को उनकी राजधानी बनाया। धर्म धारण करने वालों में श्रेष्ठ राम ने वसिष्ठ और मंत्रियों के साथ मिलकर दोनों का राज्याभिषेक किया। उन्होंने गौओं और ब्राह्मणों की पूजा की और अत्यंत विस्तार से दान दिया। राजपुत्रों के राज्याभिषेक से सभी प्रजा हर्षित हुई। धर्मात्मा महात्मा कुश और लव ने पिता की आज्ञा शिरोधार्य करके अव्यय (अटूट) राज्य किया। यह विभाजन अत्यंत महत्वपूर्ण है। राम ने राज्य का विभाजन करके सूर्यवंश की दो शाखाएँ स्थापित कीं। कुश के वंशज कुशवंशी कहलाए और लव के वंशज लववंशी। इस प्रकार राम ने अपने वंश को अमर बना दिया। राज्याभिषेक के बाद प्रजा का हर्षित होना यह दर्शाता है कि कुश और लव पहले से ही प्रजा के प्रिय थे।

🕊️ अंतिम तैयारी (श्लोक २१-३०)

॥ श्लोक २१-३० ॥
रामः पुत्राभिषेकेण कृतकृत्योऽभवत्तदा।
प्रजाः सर्वाः समाश्वास्य धर्मेण पालयन् सुखम्॥
चिन्तयामास मनसा कालस्यागमनं प्रति।
यथा मां काल आख्यातं तथा सर्वमुपस्थितम्॥
सुमन्त्रमाह्वयामास रामो राजीवलोचनः।
उवाच च महातेजाः शृणु सौम्य वचो मम॥
अहं त्वद्य महाबाहो गन्तुमिच्छामि तां गतिम्।
यत्र गत्वा न शोचन्ति योगिनः संशितव्रताः॥
तस्मात्त्वं सचिवान् सर्वानानयाशु ममान्तिकम्।
इत्युक्त्वा राघवो राजा विरराम महामतिः॥
📖 भावार्थ : राम पुत्रों के राज्याभिषेक से कृतकृत्य हो गए। उन्होंने सभी प्रजा को आश्वासन दिया और धर्मपूर्वक सुखपूर्वक राज्य का पालन किया। अब वे मन में काल के आगमन के बारे में चिंतन करने लगे। काल ने उन्हें जैसा बताया था, वैसा ही सब कुछ उपस्थित था (पुत्र राज्याभिषिक्त हो चुके थे)। राजीवलोचन राम ने सुमंत्र को बुलाया और महातेजस्वी ने कहा: "हे सौम्य! मेरे वचन सुनो। हे महाबाहो! मैं आज उस गति को प्राप्त करना चाहता हूँ, जहाँ जाने के बाद संशितव्रत योगी भी शोक नहीं करते। इसलिए तुम शीघ्र ही मेरे समस्त मंत्रियों को मेरे पास लाओ।" ऐसा कहकर महामति राजा राघव चुप हो गए। यह राम के परमधाम गमन की अंतिम तैयारी है। वे अपने कर्तव्यों से निवृत्त हो चुके हैं। पुत्रों को राज्य सौंप दिया गया है। अब वे अपने मूल स्वरूप में लौटने के लिए पूर्णतः तैयार हैं। वे अब मंत्रियों को बुलाकर अंतिम आदेश देना चाहते हैं, जो अगले सर्ग का विषय है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🌳 सूर्यवंश की निरंतरता

यह सर्ग सूर्यवंश की निरंतरता का प्रतीक है। राम ने अपने पुत्रों को राज्य सौंपकर यह सुनिश्चित किया कि उनका वंश और उनके आदर्श आगे भी चलते रहें। कुश और लव के माध्यम से राम का नाम और कीर्ति अमर हो गई।

📜 आदर्श राज्य हस्तांतरण

राम का राज्य हस्तांतरण आदर्श है। वे सलाह लेते हैं, समय रहते निर्णय लेते हैं, और अपने उत्तराधिकारियों को पूर्ण रूप से प्रशिक्षित करके राज्य सौंपते हैं। यह एक जिम्मेदार और दूरदर्शी शासक का लक्षण है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जीवन में समय पर संन्यास लेना और अगली पीढ़ी को आगे बढ़ने का अवसर देना आवश्यक है। राम ने यह सिखाया कि अपने कर्तव्यों का पालन करने के बाद, जब समय आए, तो बिना किसी मोह के उनसे विरक्त हो जाना चाहिए और परमात्मा में लीन हो जाना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे नवदशाधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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