उत्तर काण्ड अध्याय 118

राम द्वारा लक्ष्मण का निर्वासन

दुर्वासा के प्रकोप से अयोध्या को बचाने के लिए राम की आज्ञा का उल्लंघन करने के कारण, राम को धर्मराज के रूप में अपने कर्तव्य का पालन करते हुए अपने प्रिय भाई लक्ष्मण का निर्वासन करना पड़ता है।

विवरण

यह उत्तरकाण्ड का सर्वाधिक मार्मिक और विवादास्पद सर्ग है। पिछले सर्ग में, लक्ष्मण ने महर्षि दुर्वासा को राम के पास जाने की अनुमति देकर राम के आदेश का उल्लंघन किया था कि कोई भी भीतर प्रवेश न करे। हालाँकि यह उल्लंघन अयोध्या और राम को दुर्वासा के शाप से बचाने के लिए किया गया था, फिर भी एक राजा के रूप में राम का कर्तव्य है कि वे अपने आदेश के उल्लंघन पर दंड दें। राम के सामने अब एक भयंकर धर्मसंकट है। वे अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय लक्ष्मण को दंडित करने के लिए बाध्य हैं। राजधर्म के अनुसार, आदेश का उल्लंघन मृत्युदंड का भी अपराध है। लेकिन राम लक्ष्मण को मृत्युदंड नहीं देना चाहते। अतः वे एक मध्यम मार्ग निकालते हैं। वे लक्ष्मण को जीवनदान देते हैं, लेकिन उन्हें राज्य से निर्वासित कर देते हैं। लक्ष्मण इस दंड को सिर झुकाकर स्वीकार करते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि राम के लिए राजधर्म सबसे ऊपर है। यह निर्वासन ही वह कारण बनता है जिसके कारण लक्ष्मण सरयू नदी के तट पर समाधि लेकर अपने मूल स्वरूप में लौट जाते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ११८

(राम द्वारा लक्ष्मण का निर्वासन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथाष्टादशाधिकशततमः सर्गः ॥

🤔 राम का मनन (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः रामः सभामध्ये सचिवान् पर्यपृच्छत।
किं कर्तव्यं मया राज्ञा धर्मसंकटमागते॥
यदि मे भ्रातृवात्सल्यात्क्षमिष्येऽहं व्यतिक्रमम्।
धर्महानिर्भवेद्राज्ञः प्रजा चापि विनङ्क्ष्यति॥
अथ दण्डं प्रयच्छामि लक्ष्मणाय महात्मने।
हृदयं मे विदीर्येत स्नेहाद्भ्रातुर्विशेषतः॥
इति संचिन्त्य बहुधा धर्मार्थसहितं वचः।
रामः प्रोवाच धर्मात्मा सुमन्त्रं मन्त्रिसत्तमम्॥
आनयाशु महाबाहुं लक्ष्मणं शुभलक्षणम्।
📖 भावार्थ : उसके बाद, राम ने सभा के मध्य में मंत्रियों से पूछा: "मेरे सामने धर्म का संकट आ गया है। अब मुझे क्या करना चाहिए? यदि मैं भाई के प्रति स्नेहवश उनके अपराध (आदेश उल्लंघन) को क्षमा कर दूं, तो राजा के रूप में मेरी धर्महानि होगी और प्रजा भी नष्ट हो जाएगी। और यदि मैं महात्मा लक्ष्मण को दंड देता हूँ, तो भाई के प्रति स्नेह से मेरा हृदय विदीर्ण हो जाएगा।" इस प्रकार धर्म और अर्थ से युक्त वचनों का बहुत चिंतन करके धर्मात्मा राम ने मंत्रियों में श्रेष्ठ सुमंत्र से कहा: "शीघ्र ही महाबाहु शुभलक्षण लक्ष्मण को यहाँ लाओ।" यह राम के मन की दुविधा को स्पष्ट करता है। वे एक ओर आदर्श राजा हैं, जिनके लिए राजधर्म सर्वोपरि है, तो दूसरी ओर एक स्नेही बड़े भाई हैं। उनका हृदय लक्ष्मण के लिए करुणा से भरा है, परन्तु कर्तव्य उन्हें कठोर निर्णय लेने के लिए बाध्य कर रहा है। यह संघर्ष उनके मानवीय पक्ष को उजागर करता है।

⚖️ राम का निर्णय (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
सुमन्त्रस्त्वरितं गत्वा लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत्।
राजा त्वामाह्वयति च शीघ्रमागच्छ सौम्य माम्॥
इत्युक्तः स तदा वीरः सुमन्त्रेण महात्मना।
जगाम भवनं रामः यत्र रामः प्रतिष्ठितः॥
प्रविश्य च सभां रामो दृष्ट्वा भ्रातरमच्युतम्।
उवाच परमोद्विग्नो लक्ष्मणं प्रियदर्शनम्॥
लक्ष्मण त्वं मया पूर्वं द्वारि संस्थापितः स्थितः।
त्वया मदाज्ञां भङ्क्त्वा च प्रवेशितो महामुनिः॥
राज्ञा धर्मः सदा रक्ष्यः प्रजानां हितकाम्यया।
तस्मात्त्वामहमद्यैव त्यक्ष्यामि प्रियदर्शन॥
📖 भावार्थ : सुमंत्र ने तुरंत जाकर लक्ष्मण से कहा: "राजा आपको बुला रहे हैं, हे सौम्य! शीघ्र मेरे साथ चलिए।" ऐसा कहने पर वीर लक्ष्मण महात्मा सुमंत्र के साथ राम के भवन में गए। सभा में प्रवेश करके अत्यंत व्याकुल राम ने अपने प्रियदर्शन भाई लक्ष्मण को देखकर कहा: "हे लक्ष्मण! तुम्हें मैंने पहले द्वार पर नियुक्त किया था और तुम वहाँ स्थित थे। तुमने मेरी आज्ञा का भंग करके महामुनि को भीतर प्रवेश कराया। राजा को प्रजा के हित की कामना से सदा धर्म की रक्षा करनी चाहिए। इसलिए हे प्रियदर्शन! मैं आज ही तुम्हें त्याग रहा हूँ।" राम का यह कथन अत्यंत कठोर है, परन्तु राजधर्म के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। वे स्पष्ट करते हैं कि राजा के लिए निजी संबंधों से ऊपर उठकर धर्म का पालन करना आवश्यक है। "त्याग" शब्द का प्रयोग यहाँ निर्वासन के अर्थ में है, न कि केवल संबंध विच्छेद के।

🙏 लक्ष्मण की स्वीकृति (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
लक्ष्मणस्तु वचः श्रुत्वा रामस्याक्लिष्टकर्मणः।
न विषादं न संतापं लेभे प्रीतियुतोऽभवत्॥
उवाच च प्रसन्नात्मा यथा मां त्वं त्यजिष्यसि।
तथैव त्वयि वत्स्यामि सर्वदा धर्मचारिणि॥
रामाज्ञा शिरसा धार्या मया नित्यं विशेषतः।
तस्माद्गच्छामि सरयूं त्यक्त्वा देहं सनातनम्॥
एतच्छ्रुत्वा सभासदः सर्वे बाष्पाकुलाक्षराः।
विलेपुः करुणं वाक्यं हा हा लक्ष्मण साध्विति॥
लक्ष्मणः प्रणम्य रामं परिक्रम्य च भक्तितः।
निर्जगाम पुराद्धीमान् सरयूतीरमागमत्॥
📖 भावार्थ : राम के इन अक्लिष्ट कर्मा वचनों को सुनकर लक्ष्मण न न तो विषाद प्राप्त किया और न संताप, बल्कि वे प्रीतियुक्त हो गए। उन्होंने प्रसन्न चित्त से कहा: "हे धर्मचारिन्! जैसे आप मुझे त्याग रहे हैं, वैसे ही मैं भी सदा आपमें निवास करूँगा। राम की आज्ञा का मुझे सदा, विशेष रूप से, शिरोधार्य करना चाहिए। इसलिए मैं सरयू नदी पर जाकर अपने इस सनातन शरीर का त्याग कर दूँगा।" यह सुनकर सभा के सभी सदस्य बाष्प से भरी आँखों से "हा हा लक्ष्मण! साधु!" कहकर करुण विलाप करने लगे। लक्ष्मण ने राम को प्रणाम किया और भक्तिपूर्वक उनकी परिक्रमा की। फिर वे धीमान् नगरी से बाहर निकलकर सरयू नदी के तट पर पहुँचे। लक्ष्मण का यह उत्तर उनके अद्वितीय समर्पण को दर्शाता है। उन्हें कोई दुःख नहीं है क्योंकि वे जानते हैं कि राम की आज्ञा ही उनके लिए परम धर्म है। वे राम में ही निवास करेंगे, भले ही शरीर से दूर हों। उनका सरयू तट पर जाना अगले सर्ग में उनके परमधाम गमन का मार्ग प्रशस्त करता है।

😢 सभा का विलाप (श्लोक १६-२५)

॥ श्लोक १६-२५ ॥
ततो रामः सभामध्ये दीनः संप्रेक्ष्य लक्ष्मणम्।
उवाच परमोद्विग्नो धर्मो मे जीवितात्प्रियः॥
यदि धर्मं परित्यज्य लक्ष्मणं रक्षयाम्यहम्।
प्रजा मे न भवेत्प्रीता लोकश्चापि विगर्हयेत्॥
एवं संचिन्त्य मनसा रामो धर्मपरायणः।
निवारयामास शुचः सभ्यान् बाष्पाकुलान् सतः॥
मा शोचत महाभागा लक्ष्मणं विदितात्मनाम्।
स हि धर्मपरो नित्यं प्राप्स्यते परमां गतिम्॥
इत्युक्त्वा राघवो राजा विवेश स्वगृहं तदा।
लक्ष्मणोऽपि महातेजाः सरयूतीरमाश्रितः॥
योगमास्थाय धर्मात्मा जहौ देहं महामतिः।
ततः पुष्पैः सुरगणाः समन्तात्समवाकिरन्॥
📖 भावार्थ : तब राम सभा के मध्य में दीन होकर लक्ष्मण को जाते हुए देखते रहे और अत्यंत व्याकुल होकर बोले: "मेरे लिए धर्म प्राणों से भी प्रिय है। यदि मैं धर्म को त्यागकर लक्ष्मण की रक्षा करता, तो प्रजा मुझसे प्रसन्न न होती और लोक भी मेरी निंदा करता।" इस प्रकार मन में विचार कर धर्मपरायण राम ने बाष्प से भरे हुए सभी सभासदों को शोक न करने के लिए मनाया। उन्होंने कहा: "हे महाभागो! आप लक्ष्मण के लिए शोक न करें। वे धर्मपरायण हैं और निश्चित रूप से परम गति को प्राप्त करेंगे।" ऐसा कहकर राजा राघव अपने महल में चले गए। महातेजस्वी लक्ष्मण ने सरयू के तट पर योग का आश्रय लिया और धर्मात्मा महामति ने अपने शरीर का त्याग कर दिया। तब सभी देवताओं ने चारों ओर से पुष्पों की वर्षा की। राम का यह कथन अत्यंत मार्मिक है। वे स्वयं लक्ष्मण के वियोग में व्याकुल हैं, फिर भी दूसरों को सांत्वना दे रहे हैं। लक्ष्मण का योगपूर्वक शरीर त्यागना यह दर्शाता है कि वे कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि दिव्य पुरुष थे, जो अपनी इच्छा से शरीर त्याग कर अपने मूल स्वरूप में लौट सकते हैं। देवताओं की पुष्पवर्षा इस घटना की दिव्यता को प्रमाणित करती है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 राजधर्म की प्रधानता

यह सर्ग राजधर्म की प्रधानता को दर्शाता है। राम के लिए, चाहे वह कितने ही दुखी क्यों न हों, राजधर्म का पालन करना सर्वोपरि है। वे व्यक्तिगत संबंधों और स्नेह को धर्म के आगे त्याग देते हैं। यह एक आदर्श राजा का लक्षण है, जो निष्पक्ष और धर्मपरायण होता है।

🙇 लक्ष्मण का समर्पण

लक्ष्मण का समर्पण अद्वितीय है। वे बिना किसी शिकायत के, प्रसन्न मन से राम के निर्वासन आदेश को स्वीकार करते हैं। उनके लिए राम की आज्ञा ही परम धर्म है। यह भक्ति और समर्पण की पराकाष्ठा है। वे योग के माध्यम से शरीर त्यागकर राम में ही लीन हो जाते हैं।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जीवन में कर्तव्य और धर्म का पालन सबसे ऊपर है, चाहे उसके लिए हमें कितने ही कठोर निर्णय क्यों न लेने पड़ें। राम ने राजधर्म का पालन किया और लक्ष्मण ने भक्ति धर्म का। यह सर्ग हमें सिखाता है कि धर्म के मार्ग पर चलने में त्याग और बलिदान अवश्यम्भावी हैं, परन्तु अंत में वही परम गति की ओर ले जाता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे अष्टादशाधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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