उत्तर काण्ड अध्याय 117

दुर्वासा ऋषि का राम से भेंट करने आगमन

क्रोधी महर्षि दुर्वासा अयोध्या पहुँचते हैं और राम से तत्काल भेंट की माँग करते हैं। राम लक्ष्मण को द्वार पर तैनात करते हैं और भेंट का समय तय करते हैं, जो आगे लक्ष्मण के त्याग का कारण बनता है।

विवरण

यह सर्ग उत्तरकाण्ड के अंतिम चरण की एक महत्वपूर्ण घटना है। महर्षि दुर्वासा, जो अपने क्रोध और शाप के लिए प्रसिद्ध हैं, अयोध्या नगरी में पधारते हैं। उनके आगमन का समय अत्यंत नाजुक है, क्योंकि इसी समय काल (यमराज) ने राम को उनके अवतार के समाप्त होने का संदेश दिया था। राम ने अपने द्वार पर लक्ष्मण को तैनात कर रखा था और उन्हें आदेश दिया था कि जब तक वे काल से बातचीत पूरी न कर लें, किसी को भी भीतर प्रवेश न करने दें। लेकिन दुर्वासा आते हैं और लक्ष्मण से तुरंत राम से मिलने की माँग करते हैं। वे धमकी देते हैं कि यदि तुरंत दर्शन नहीं हुए, तो वे क्रोध में आकर अयोध्या, राम और पूरी प्रजा को शाप दे देंगे। यह संकट लक्ष्मण के लिए अत्यंत कठिन परिस्थिति उत्पन्न करता है। अपने कर्तव्य और भाई के प्रति प्रेम के बीच फँसकर, लक्ष्मण अंततः दुर्वासा को भीतर जाने देने का निर्णय लेते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ११७

(दुर्वासा ऋषि का राम से भेंट करने आगमन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तदशाधिकशततमः सर्गः ॥

🧘 दुर्वासा का आगमन (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः कालगते रामे लक्ष्मणो द्वारि संस्थितः।
रामाज्ञया महाबाहुर्विनयावनतोऽभवत्॥
एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तो दुर्वासा नाम धार्मिकः।
मुनिवर्यो महातेजा रामदर्शनलालसः॥
स दृष्ट्वा लक्ष्मणं द्वारि विनयावनतं स्थितम्।
उवाच रोषताम्राक्षः क्व रामः सत्यविक्रमः॥
तं दृष्ट्वा लक्ष्मणो वीरः प्रणम्य शिरसा मुनिम्।
उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं भ्राता मेऽन्तःपुरे प्रभुः॥
क्षणं प्रतीक्षतां भगवान् यावद्रामं निवेदये।
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; कालगते = काल के चले जाने पर; रामे = राम के; लक्ष्मणः = लक्ष्मण; द्वारि = द्वार पर; संस्थितः = स्थित थे; रामाज्ञया = राम की आज्ञा से; महाबाहुः = महाबाहु; विनयावनतः = विनय से झुके हुए; अभवत् = हुए; एतस्मिन्नन्तरे = इसी बीच; प्राप्तः = आ गए; दुर्वासाः = दुर्वासा; नाम = नामक; धार्मिकः = धार्मिक; मुनिवर्यः = श्रेष्ठ मुनि; महातेजाः = महान तेजस्वी; रामदर्शनलालसः = राम के दर्शन के लिए उत्सुक; सः = वे; दृष्ट्वा = देखकर; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण को; द्वारि = द्वार पर; विनयावनतम् = विनय से झुके हुए; स्थितम् = खड़े; उवाच = बोले; रोषताम्राक्षः = क्रोध से लाल आँखों वाले; क्व = कहाँ हैं; रामः = राम; सत्यविक्रमः = सत्य विक्रम वाले; तम् = उन्हें; दृष्ट्वा = देखकर; लक्ष्मणः = लक्ष्मण; वीरः = वीर; प्रणम्य = प्रणाम कर; शिरसा = सिर से; मुनिम् = मुनि को; उवाच = बोले; प्राञ्जलिः = हाथ जोड़कर; वाक्यम् = वचन; भ्राता = भाई; मे = मेरे; अन्तःपुरे = अन्तःपुर में; प्रभुः = प्रभु हैं; क्षणम् = क्षण भर; प्रतीक्षताम् = प्रतीक्षा करें; भगवान् = हे भगवन्; यावत् = जब तक; रामम् = राम को; निवेदये = सूचित करूँ।
📖 भावार्थ : उसके बाद, जब काल (यमराज) राम से मिलकर चले गए, तब राम की आज्ञा से महाबाहु लक्ष्मण द्वार पर विनयावनत होकर खड़े थे। इसी बीच, महान तेजस्वी और धार्मिक मुनिवर दुर्वासा, जो राम के दर्शन के लिए उत्सुक थे, वहाँ आ गए। उन्होंने द्वार पर विनय से झुके हुए लक्ष्मण को देखा और क्रोध से लाल-लाल आँखें करके पूछा: "सत्यविक्रम राम कहाँ हैं?" वीर लक्ष्मण ने उन्हें देखकर सिर से प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहा: "हे भगवन्! मेरे भाई प्रभु राम अन्तःपुर में हैं। कृपया क्षण भर प्रतीक्षा करें, जब तक मैं राम को सूचित करूँ।" दुर्वासा का आगमन अपने आप में एक संकट है। वे अपने क्रोध के लिए प्रसिद्ध हैं और उनके शाप से बचना लगभग असंभव होता है। लक्ष्मण उनके स्वभाव से भली-भाँति परिचित हैं, इसलिए वे अत्यंत विनयपूर्वक उनसे प्रार्थना करते हैं।

🔥 क्रोध और धमकी (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
दुर्वासा उवाच अद्यैव द्रष्टुमिच्छामि रामं दशरथात्मजम्।
नो चेद्रामं न पश्यामि शप्स्यामि सह बान्धवान्॥
सराष्ट्रं सप्रजं सैन्यं सवाहनधनं तथा।
भस्मसात्कुरुते कोपो मम नास्त्यत्र संशयः॥
लक्ष्मणस्तु वचः श्रुत्वा दुर्वासस उदीरितम्।
चिन्तयामास दुःखार्तः किं करोमि क्व गच्छामि॥
उभयोः कार्ययोर्मध्ये गुरु चेदमुपस्थितम्।
यदि रामं प्रवेश्यामि भेत्स्याम्याज्ञां महात्मनः॥
अथवा मुनिशापं तु न शक्ष्यामि सहिष्यते।
इति संचिन्त्य बहुधा लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत्॥
📖 भावार्थ : दुर्वासा ने कहा: "मैं आज ही दशरथपुत्र राम से मिलना चाहता हूँ। यदि मैं राम को तुरंत नहीं देख पाया, तो मैं उन्हें उनके सभी बाँधवों सहित शाप दे दूँगा। राज्य सहित, प्रजा सहित, सेना सहित, वाहन और धन सहित मेरा क्रोध सबको भस्म कर देगा - इसमें कोई संदेह नहीं।" दुर्वासा के इन वचनों को सुनकर लक्ष्मण अत्यंत दुःखी और चिंतित हो गए। वे सोचने लगे: "मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? दोनों कर्तव्यों के बीच यह अत्यंत कठिन परिस्थिति आ गई है। यदि मैं राम को भीतर बुलाता हूँ, तो महात्मा राम की आज्ञा का उल्लंघन होगा। और यदि नहीं बुलाता, तो मुनि के शाप को सहन नहीं कर पाऊँगा।" इस प्रकार बहुत सोच-विचार कर लक्ष्मण ने उत्तर दिया। यहाँ लक्ष्मण की मानसिक दशा अत्यंत करुणाजनक है। वे एक ओर अपने बड़े भाई की आज्ञा का पालन करना चाहते हैं, तो दूसरी ओर पूरी अयोध्या और राम पर शाप पड़ने का भय है। उनके सामने धर्म का संकट है - किस धर्म को प्राथमिकता दें?

⚖️ लक्ष्मण का निर्णय (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
प्रविश भगवन् क्षिप्रं रामं द्रक्ष्यसि मा चिरम्।
इत्युक्त्वा लक्ष्मणो वीरः प्रविवेश निवेशनम्॥
स गत्वा राघवं द्रष्टुं यत्र रामः सह कालया।
विवेश भवनं श्रीमान् लक्ष्मणः परवीरहा॥
तं दृष्ट्वा राघवो वाक्यमुवाच परिसान्त्वयन्।
किमागमनकार्यं ते सौमित्रे वद शोभनम्॥
लक्ष्मणः प्राह दुर्वासा मुनिरागत्य मां द्वारि।
द्रष्टुं त्वामिच्छते राजन् शप्तुं वा सह बान्धवान्॥
तच्छ्रुत्वा राघवो वाक्यं सहसोत्थाय वीर्यवान्।
अगच्छत स्वयं द्रष्टुं दुर्वाससममित्रजित्॥
📖 भावार्थ : लक्ष्मण ने निर्णय लिया और दुर्वासा से कहा: "हे भगवन्! शीघ्र ही भीतर प्रवेश करें, आप राम को देख लेंगे, देर न हो।" ऐसा कहकर वीर लक्ष्मण ने महल में प्रवेश किया। परवीरहा लक्ष्मण, जहाँ राम थे, वहाँ पहुँचे। राम ने उन्हें देखकर सांत्वना देते हुए पूछा: "हे सौमित्रे! तुम्हारे आगमन का क्या कारण है? शोभन बताओ।" लक्ष्मण ने कहा: "हे राजन्! मुनि दुर्वासा मेरे पास द्वार पर आए हैं और आपसे मिलना चाहते हैं। वे आपको और सभी बाँधवों को शाप देने की धमकी दे रहे हैं।" यह सुनते ही वीर्यवान् राम सहसा उठ खड़े हुए और स्वयं दुर्वासा से मिलने के लिए चल दिए। यह घटना दर्शाती है कि राम के लिए ऋषियों का सम्मान और प्रजा की रक्षा सर्वोपरि है। उन्होंने लक्ष्मण द्वारा आदेश उल्लंघन पर कोई क्रोध नहीं दिखाया, बल्कि तुरंत ऋषि से मिलने चले गए। लेकिन यह घटना उनके मन में एक बीज बो गई कि आदेश का उल्लंघन हुआ है।

🙏 राम का स्वागत (श्लोक १६-२०)

॥ श्लोक १६-२० ॥
स गत्वा दूरमागत्य ददर्श मुनिपुंगवम्।
दुर्वाससं महात्मानं तेजसा ज्वलितं स्थितम्॥
प्रणम्य शिरसा रामो विनयावनतोऽभवत्।
उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं स्वागतं ते महामुने॥
दुर्वासा प्राह धर्मात्मन् प्रीतोऽस्मि तव राघव।
यदहं त्वां समागम्य दृष्टवानस्मि सुव्रत॥
इत्युक्त्वा मुनिशार्दूलस्तत्रैवान्तरधीयत।
रामोऽपि भवनं गत्वा चिन्तयामास लक्ष्मणम्॥
📖 भावार्थ : राम ने जाकर दूर से ही मुनिपुंगव दुर्वासा को देखा। महात्मा दुर्वासा अपने तेज से ज्वलित हो रहे थे। राम ने सिर से प्रणाम किया और विनयावनत होकर हाथ जोड़े और कहा: "हे महामुने! आपका स्वागत है।" दुर्वासा ने कहा: "हे धर्मात्मन् राघव! मैं तुमसे अत्यंत प्रसन्न हूँ। हे सुव्रत! मैं तुमसे मिलकर कृतार्थ हुआ।" ऐसा कहकर मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा वहीं अंतर्धान हो गए। राम भी महल में लौट आए और लक्ष्मण के बारे में चिंतन करने लगे। दुर्वासा का यह अंतर्धान होना अत्यंत रहस्यपूर्ण है। वे आए, क्रोध दिखाया, मिले और प्रसन्न होकर चले गए। लेकिन उनके आगमन का परिणाम यह हुआ कि लक्ष्मण ने राम की आज्ञा का उल्लंघन किया। यही घटना अगले सर्ग में लक्ष्मण के निर्वासन का कारण बनती है। राम अब सोच रहे हैं कि उनकी आज्ञा का उल्लंघन हुआ है और एक राजा के रूप में उन्हें इसका दंड देना चाहिए, भले ही वह उनके प्रिय भाई ही क्यों न हों।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

⚖️ धर्म का संकट

लक्ष्मण के सामने धर्म का संकट है: बड़े भाई की आज्ञा का पालन करना, या पूरी अयोध्या को शाप से बचाना। यह स्थिति दर्शाती है कि कभी-कभी धर्म के दो मार्ग टकरा जाते हैं और व्यक्ति को कठिन निर्णय लेना पड़ता है। लक्ष्मण ने बड़े के कल्याण को चुना, लेकिन उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी।

🎭 दुर्वासा की भूमिका

दुर्वासा का आगमन एक नाटकीय मोड़ है। वे ऋषि शक्ति के प्रतीक हैं। उनका यह आना केवल दर्शन के लिए नहीं, बल्कि राम की प्रतिबद्धता को परखने और लक्ष्मण के त्याग की घटना को जन्म देने के लिए था। यह दैवीय लीला का हिस्सा है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कभी-कभी जीवन में कठिन निर्णय लेने पड़ते हैं। हमें दूसरों के कल्याण के लिए अपने सुखों का त्याग करना पड़ सकता है। लक्ष्मण ने राम की आज्ञा तोड़कर भी उनका ही कल्याण सोचा। यह त्याग और समर्पण की पराकाष्ठा है, भले ही उसका परिणाम दुखद हो।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे सप्तदशाधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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