उत्तर काण्ड अध्याय 116

राम का लक्ष्मण को आदेश और काल (यम) का आगमन

समय पूरा होने पर काल (यमराज) राम के दरबार में प्रकट होते हैं और उन्हें पृथ्वी पर उनके अवतार के उद्देश्य और समय सीमा की याद दिलाते हैं। यह राम के परम धाम गमन की तैयारियों का प्रारंभ है।

विवरण

उत्तरकाण्ड के इस महत्वपूर्ण सर्ग में, जब श्रीराम अयोध्या में धर्मपूर्वक राज्य कर रहे थे, तब महर्षि दुर्वासा के आगमन के पश्चात, स्वयं काल (मृत्यु के देवता) राम के दरबार में पधारते हैं। वे ब्रह्मा जी के दूत के रूप में आते हैं। काल राम को उनके वास्तविक स्वरूप की याद दिलाते हैं कि वे स्वयं विष्णु हैं और उनका यह अवतार रावण के वध तथा तीनों लोकों के कल्याण के लिए हुआ था। काल बताते हैं कि अब उनके पृथ्वी पर रहने का निर्धारित समय (11,000 वर्ष) समाप्त होने वाला है। यदि वे और अधिक समय तक रहना चाहते हैं, तो रुक सकते हैं, अन्यथा अपने धाम (वैकुंठ) लौटने का समय आ गया है। यह संवाद राम के मानव रूप में लीला के अंत का संकेत देता है। राम इस संदेश को सुनकर प्रसन्न होते हैं और अपने मूल स्वरूप में लौटने का निर्णय लेते हैं, जो उनके परमधाम गमन की आधारशिला रखता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ११६

(राम का लक्ष्मण को आदेश और काल (यम) का आगमन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षोडशाधिकशततमः सर्गः ॥

⏳ काल का आगमन (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः स संप्रहृष्टात्मा रामः सत्यपराक्रमः।
लक्ष्मणं प्राह धर्मज्ञं रहस्ये रहिते स्थितम्॥
गच्छ सौमित्रे द्वारि त्वं मुनिवर्यो महातपाः।
दुर्वासा नाम धर्मात्मा प्राप्तः सत्यव्रतो मुनिः॥
तस्य प्रवेशं दत्त्वा तु मया सह समाविश।
एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तः कालो लोकप्रजागरः॥
तमृषिं पूजयित्वा तु रामो धर्मभृतां वरः।
प्रविश्य च गृहं श्रीमानिदं वचनमब्रवीत्॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; सः = वह; संप्रहृष्टात्मा = अत्यंत प्रसन्न चित्त वाला; रामः = राम; सत्यपराक्रमः = सत्य पराक्रमी; प्राह = बोले; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण से; धर्मज्ञम् = धर्मज्ञ; रहस्ये = एकांत में; रहिते = स्थित; स्थितम् = बैठे हुए; गच्छ = जाओ; सौमित्रे = सुमित्रा नंदन; द्वारि = द्वार पर; त्वम् = तुम; मुनिवर्यः = श्रेष्ठ मुनि; महातपाः = महान तपस्वी; दुर्वासाः = दुर्वासा; नाम = नामक; धर्मात्मा = धर्मात्मा; प्राप्तः = आए हैं; सत्यव्रतः = सत्य व्रत वाले; मुनिः = मुनि; तस्य = उनका; प्रवेशम् = प्रवेश; दत्त्वा = देकर; तु = फिर; मया = मेरे; सह = साथ; समाविश = बैठो; एतस्मिन्नन्तरे = इसी बीच; प्राप्तः = आ गए; कालः = काल (यमराज); लोकप्रजागरः = लोकों को जगाने वाले; तम् = उनका; ऋषिम् = ऋषि का; पूजयित्वा = पूजन करके; तु = तो; रामः = राम; धर्मभृतां वरः = धर्म धारण करने वालों में श्रेष्ठ; प्रविश्य = घर में प्रवेश कर; च = और; गृहम् = घर; श्रीमान् = श्रीमान्; इदम् = यह; वचनम् = वचन; अब्रवीत् = बोले।
📖 भावार्थ : उसके बाद सत्यपराक्रमी और अत्यंत प्रसन्नचित्त राम ने धर्मज्ञ लक्ष्मण से, जो एकांत में बैठे थे, कहा: "हे सौमित्रे! तुम द्वार पर जाओ। महान तपस्वी, धर्मात्मा और सत्यव्रत धारण करने वाले मुनिवर दुर्वासा आए हैं। उन्हें प्रवेश देकर उन्हें मेरे पास ले आओ।" इसी बीच, लोकों में सबको जागृत रखने वाले काल (यमराज) वहाँ प्रकट हुए। उन ऋषि का पूजन करने के बाद, धर्म के धारकों में श्रेष्ठ श्रीराम अपने महल में प्रविष्ट हुए और यह वचन बोले। यहाँ काल का आगमन अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह कोई साधारण घटना नहीं है। काल का अर्थ है समय और मृत्यु के देवता। उनका राम के दरबार में आना इस बात का प्रतीक है कि अब राम की पृथ्वी लीला समाप्त होने वाली है। वे अपने मूल स्वरूप में लौटने के लिए तत्पर हैं।

📜 काल का संदेश (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-१० ॥
ततः कालं समायान्तं ददर्श प्रणतो रघुः।
उवाच चैनं धर्मात्मा स्वागतं ते नमोऽस्तु ते॥
किमर्थमागतो ब्रूहि करवाणि तव प्रियम्।
काल उवाच दिष्ट्या राम जीवसि दिष्ट्या राक्षसा निहताः॥
त्वया देवासुरा युद्धे त्रैलोक्यं च सुरक्षितम्।
ब्रह्मणा प्रेषितश्चास्मि तवान्तिकमिहागतः॥
🔹 पदच्छेद : ततः = फिर; कालम् = काल को; समायान्तम् = आते हुए; ददर्श = देखा; प्रणतः = प्रणाम कर; रघुः = रघुनंदन ने; उवाच = कहा; च = और; एनम् = उनसे; धर्मात्मा = धर्मात्मा ने; स्वागतम् = स्वागत; ते = आपका; नमः = नमस्कार; अस्तु = हो; ते = आपको; किमर्थम् = किसलिए; आगतः = आए हैं; ब्रूहि = बताइए; करवाणि = करूँ; तव = आपका; प्रियम् = प्रिय; कालः उवाच = काल ने कहा; दिष्ट्या = सौभाग्य से; राम = हे राम; जीवसि = तुम जीवित हो; दिष्ट्या = सौभाग्य से; राक्षसाः = राक्षस; निहताः = मारे गए; त्वया = तुम्हारे द्वारा; देवासुराः = देव और असुर; युद्धे = युद्ध में; त्रैलोक्यम् = तीनों लोक; च = और; सुरक्षितम् = सुरक्षित हुए; ब्रह्मणा = ब्रह्मा द्वारा; प्रेषितः = भेजा गया; च = हूँ; अस्मि = मैं; तवान्तिकम् = तुम्हारे पास; इह = यहाँ; आगतः = आया हूँ।
📖 भावार्थ : फिर रघुनंदन राम ने काल को आते देखा और प्रणाम करके उनसे कहा: "आपका स्वागत है, आपको नमस्कार है। आप किस प्रयोजन से आए हैं? कृपया बताइए, मैं आपका प्रिय करूँ।" तब काल ने कहा: "हे राम! सौभाग्य से आप जीवित हैं और सौभाग्य से ही आपने राक्षसों का वध किया। आपने युद्ध में देवताओं और असुरों की रक्षा की तथा तीनों लोकों को सुरक्षित किया। मैं स्वयं ब्रह्मा जी द्वारा भेजा गया हूँ और इसीलिए आपके पास आया हूँ।" यह संवाद अत्यंत महत्वपूर्ण है। काल राम की स्तुति करते हुए भी उनके अवतार के वास्तविक उद्देश्य को रेखांकित कर रहे हैं। राम ने जो कार्य किया, वह केवल एक मानव का नहीं, बल्कि स्वयं विष्णु का कार्य था। काल का यह कथन राम को उनके दिव्य स्वरूप का स्मरण कराने की भूमिका तैयार करता है। ब्रह्मा का दूत होने के नाते, काल उनके संदेश का वाहक है, जो राम की लीला के अंत की घोषणा करने आया है।

🔔 अवतार समाप्ति का समय (श्लोक ११-१५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
यथा त्वं पूर्वमेवैतदवोचः परमेष्ठिनम्।
रावणं निहनिष्यामि लोकानां हितकाम्यया॥
तथा कृतं त्वया सर्वं रावणो निहतो रणे।
इदानीं किं करिष्यामि वद राम महामते॥
यदि चेच्छसि वस्तुं त्वं मर्त्यलोके सुरेश्वर।
तिष्ठ यावन्मनस्तुभ्यं यदि वा स्वर्गमाविश॥
एतच्छ्रुत्वा वचः कालाद्रामः प्रीतमना अभवत्।
उवाच च महातेजाः प्रहसन्निव भारत॥
📖 भावार्थ : काल ने आगे कहा: "हे राम! आपने पूर्वकाल में स्वयं ब्रह्मा जी से कहा था कि मैं लोकों के हित की कामना से रावण का वध करूँगा। वह सब कार्य आपने कर दिखाया। रणभूमि में रावण मारा गया। अब हे महामते राम! मैं क्या करूँ, यह बताइए। हे सुरेश्वर! यदि आप मर्त्य लोक में निवास करना चाहते हैं, तो जब तक आपका मन है, यहाँ रहिए। यदि आप स्वर्ग (अपने धाम) लौटना चाहते हैं, तो वहाँ चले जाइए।" काल के इन वचनों को सुनकर राम अत्यंत प्रसन्न हुए और महातेजस्वी राम मुस्कुराते हुए बोले। यहाँ काल सीधे प्रश्न करते हैं: अब आपका क्या संकल्प है? यह कोई सामान्य प्रश्न नहीं है। यह राम को उनके मूल स्वरूप में लौटने का निमंत्रण है। 11,000 वर्षों का कालखंड पूरा हो रहा है। राम का मुस्कुराना यह दर्शाता है कि वे इस निमंत्रण की प्रतीक्षा ही कर रहे थे। उनकी लीला अब समाप्ति की ओर है और वे सहर्ष इसे स्वीकार करने को तैयार हैं।

🙏 राम की स्वीकृति (श्लोक १६-२२)

॥ श्लोक १६-२२ ॥
स्वागतं ते महाबाहो प्रीतोऽहं यदिहागतः।
अवतीर्णोऽस्मि भवने विष्णुना प्रभविष्णुना॥
रावणस्य वधार्थाय लोकानां हितकाम्यया।
कृतं कार्यं मया सर्वं यदर्थमिह चागतः॥
इच्छामि च गतिं गन्तुं यत्र मे सदनं परम्।
एतच्छ्रुत्वा कालवाक्यं रामः प्रोवाच लक्ष्मणम्॥
आनीयतां मुनिवरो दुर्वासा वेदपारगः।
तथेति लक्ष्मणो गत्वा दुर्वाससमुपानयत्॥
पूजयित्वा मुनिं रामो विसर्जयित्वा ततः परम्।
कालेन सह संगम्य प्रययौ परमां गतिम्॥
📖 भावार्थ : राम ने काल से कहा: "हे महाबाहो! आपका स्वागत है। मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ कि आप यहाँ पधारे। मैं प्रभावशाली विष्णु के अंश से इस मानव-लोक में अवतीर्ण हुआ हूँ। मेरा उद्देश्य केवल रावण का वध करना और लोकों का हित करना था। मैं वह सब कार्य कर चुका हूँ जिसके लिए मैं आया था। अब मैं उस परम गति को प्राप्त करना चाहता हूँ, जहाँ मेरा नित्य धाम है।" यह सुनकर काल वापस लौट गए। तब राम ने लक्ष्मण से कहा कि मुनिवर दुर्वासा को लेकर आओ। लक्ष्मण उन्हें ले आए और राम ने उनकी पूजा की। इस प्रकार राम ने अपनी लीला समाप्त करने का निर्णय ले लिया। यह सर्ग राम के परमधाम गमन की आधारशिला रखता है। राम स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं कि वे विष्णु के अवतार हैं और उनका कार्य पूर्ण हो चुका है। वे अब अपने नित्य धाम लौटने की इच्छा व्यक्त करते हैं। यह घोषणा उत्तरकाण्ड के अंतिम चरण की प्रस्तावना है, जिसमें वे अयोध्या का राज्य अपने पुत्रों को सौंपकर अपने मूल स्वरूप में विलीन हो जाते हैं।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

⏰ काल का प्रतीकात्मक आगमन

इस सर्ग में काल (यमराज) का साक्षात प्राकट्य अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह समय और मृत्यु का देवता है। उनका राम के दरबार में आना इस बात का प्रतीक है कि अब राम के मानव रूप में रहने का समय समाप्त हो रहा है। यह घटना हमें सिखाती है कि समय सबसे शक्तिशाली है और कोई भी, चाहे वह भगवान का अवतार ही क्यों न हो, समय के नियमों से परे नहीं है।

🎭 अवतार का उद्देश्य

काल राम को याद दिलाते हैं कि उनके अवतार का उद्देश्य क्या था: रावण का वध और लोकों का हित। उद्देश्य पूरा होने के बाद अवतार का लौट जाना स्वाभाविक है। यह हिंदू दर्शन का मूल सिद्धांत है कि भगवान जब भी अवतार लेते हैं, वे किसी विशेष कार्य के लिए ही आते हैं और कार्य समाप्त होने पर लौट जाते हैं।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जीवन में हर चीज़ का एक समय होता है। जैसे राम ने अपने कर्तव्य का पालन किया और फिर समय आने पर संन्यास ले लिया, वैसे ही हमें भी अपने जीवन के हर चरण को स्वीकार करना चाहिए। यह सर्ग हमें सिखाता है कि समय के आगे सब विनम्र हैं और हमें समय के अनुसार अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए अंत में परमात्मा में लीन हो जाना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे षोडशाधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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