उत्तर काण्ड अध्याय 115

राम के पास यमराज (मृत्यु) का आना

यमराज राम के पास आते हैं और उन्हें सूचित करते हैं कि उनका अवतार कार्य समाप्त हो चुका है। राम धर्मपूर्वक भाइयों को विदा करके सरयू में समाधि लेते हैं।

विवरण

राम के राज्य के अनेक वर्ष बीत गए। अब देवताओं की योजना के अनुसार, यमराज स्वयं राम के द्वार पर एक तपस्वी के वेश में प्रकट होते हैं। वे राम से कहते हैं कि उनका पृथ्वी पर अवतार का उद्देश्य पूरा हो चुका है, अब उन्हें वैकुण्ठ लौट जाना चाहिए। राम इस संदेश को सुनकर सहर्ष स्वीकार करते हैं। वे भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न और सभी नागरिकों को विदा करते हैं और स्वयं सरयू नदी में प्रवेश करके अपने पार्थिव शरीर का त्याग कर देते हैं। यह सर्ग राम के महाप्रयाण का मार्मिक वर्णन करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ११५

(राम के पास यमराज का आगमन और महाप्रयाण)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चदशोत्तरशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम ने हजारों वर्षों तक धर्मपूर्वक राज्य किया। अब देवताओं के उद्देश्य की पूर्ति हो चुकी थी। यमराज, जो काल के देवता हैं, राम के पास एक तपस्वी के वेश में आते हैं। यह सर्ग राम के महाप्रयाण और सरयू में समाधि के मार्मिक प्रसंग का वर्णन करता है।

🚪 यमराज का आगमन (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-६ ॥
ततः कदाचिदायातो यमराजो महातपाः।
संवृतः परमर्षीणां गणैर्ब्रह्मर्षिभिस्तथा॥
तपस्विवेषमास्थाय द्वारि तिष्ठति राघवः।
दृष्ट्वा तं राघवो राजा समुत्थाय कृताञ्जलिः॥
पूजयामास धर्मात्मा अर्घ्यपाद्यादिना तदा।
उवाच च महातेजा रामः सत्यपराक्रमः॥
किं ते प्रियं करोम्यद्य ब्रूहि त्वं द्विजसत्तम।
यमराजस्तु तं प्राह रामं दाशरथिं तदा॥
📖 भावार्थ : एक दिन महातपस्वी यमराज, अनेक परमर्षियों और ब्रह्मर्षियों के गणों से घिरे हुए, एक तपस्वी के वेष में अयोध्या आए। वे राम के द्वार पर खड़े हो गए। राघव राजा ने उन्हें देखा, तुरंत उठकर हाथ जोड़े और धर्मात्मा राम ने अर्घ्य-पाद्य आदि से उनकी पूजा की। फिर महातेजस्वी सत्यपराक्रम राम ने कहा, "हे द्विजश्रेष्ठ! आज मैं आपका क्या प्रिय कर सकता हूँ, कहिए।" तब यमराज ने राम से कहा। यमराज ने देखा कि राम उन्हें पहचान नहीं पाए, क्योंकि वे तपस्वी वेश में थे। राम ने उनके तेज को देखकर अनुभव किया कि यह कोई साधारण मुनि नहीं हैं।
॥ श्लोक ७-१२ ॥
श्रृणु राम महाबाहो यत्कार्यं तव सांप्रतम्।
अहं यमो महाराज तव द्वारमुपागतः॥
देवकार्यं समाप्तं ते पृथिव्यां नृपसत्तम।
प्रवेशयितुमिच्छामि त्वां वैकुण्ठं महाप्रभम्॥
रामः प्रोवाच धर्मात्मा यमराजं कृताञ्जलिः।
यदाज्ञापयि देवेश करिष्यामि तथैव हि॥
इत्युक्त्वा राघवो राजा भ्रातॄनाहूय सत्वरम्।
उवाच प्रणतः सर्वान्यमराजस्य सन्निधौ॥
📖 भावार्थ : यमराज ने कहा, "हे महाबाहो राम! सुनो, अब तुम्हारा कार्य समाप्त हो गया है। मैं यमराज हूँ। तुम्हारे द्वार पर आया हूँ। देवताओं का कार्य पृथ्वी पर पूरा हो चुका है, अब मैं तुम्हें वैकुण्ठ ले जाना चाहता हूँ।" राम ने हाथ जोड़कर यमराज से कहा, "हे देवेश! आप जैसी आज्ञा दें, मैं वैसा ही करूँगा।" ऐसा कहकर राम ने शीघ्र ही अपने भाइयों को बुलाया और यमराज की उपस्थिति में उनसे विनम्रतापूर्वक कहा। यह क्षण अत्यंत गंभीर था। राम ने यमराज के वचनों को पूर्ण सत्य माना और उनके प्रति पूर्ण समर्पण दिखाया।

👋 राम का भाइयों और प्रजा को विदाई संदेश (श्लोक १३-३०)

॥ श्लोक १३-२० ॥
भ्रातरः श्रृणुत सर्वे यमराजो महाद्युतिः।
आगतः समयं प्राप्तुं मम वैकुण्ठमेव च॥
तस्माद्यूयं प्रशासध्वं राज्यं धर्मेण सर्वदा।
अहं यास्यामि सरयूं त्यक्तुं देहं महीतले॥
भरतः प्राह रामं तु कृताञ्जलिरभाषत।
त्वया विना महाबाहो राज्यं किं मे करिष्यति॥
लक्ष्मणश्च महातेजा शत्रुघ्नश्च महाबलः।
प्रणम्य रामं दुःखार्ता निषेदुर्धरणीतले॥
रामः प्रोवाच धर्मात्मा भ्रातॄन्सर्वान्समागतान्।
धैर्यमालम्ब्यतां वीरा मयि धर्मः सनातनः॥
📖 भावार्थ : राम ने कहा, "हे भाइयों! सुनो। ये महाद्युति यमराज मुझे वैकुण्ठ ले जाने के लिए आए हैं। अब तुम सब धर्मपूर्वक राज्य का शासन करो। मैं सरयू में जाकर अपना देह त्याग दूंगा।" यह सुनकर भरत ने हाथ जोड़कर कहा, "हे महाबाहो! आपके बिना यह राज्य मेरे लिए क्या करेगा?" महातेजस्वी लक्ष्मण और महाबलशाली शत्रुघ्न भी राम को प्रणाम करके दुःख से भूमि पर गिर पड़े। तब धर्मात्मा राम ने उन्हें धैर्य धारण करने को कहा। उन्होंने कहा, "हे वीरो! मुझमें सनातन धर्म स्थित है, धैर्य रखो।" राम ने उन्हें समझाया कि शरीर नश्वर है, आत्मा अमर है। उन्हें राज्य धर्म का पालन करते रहना चाहिए।
॥ श्लोक २१-२५ ॥
ततः प्रजाः समागम्य रामं दाशरथिं प्रभुम्।
ऊचुः प्राञ्जलयो वाक्यं हर्षगद्गदया गिरा॥
न वयं त्वां परित्यक्तुं शक्नुमो रघुनन्दन।
यास्यामः सरयूं सर्वे त्यक्तुं देहं त्वया सह॥
रामः प्रोवाच धर्मात्मा प्रजाः सर्वाः समागताः।
यद्येवं क्रियतां सर्वैर्गम्यतां सरयूं प्रति॥
एवमुक्त्वा महातेजा रामो दाशरथिस्तदा।
सह भ्रातृभिरन्यैश्च प्रययौ सरयूं नदीम्॥
📖 भावार्थ : तब सभी प्रजाजन राम के पास आए और हाथ जोड़कर गद्गद वाणी में बोले, "हे रघुनन्दन! हम आपको त्याग नहीं सकते। हम सब आपके साथ सरयू में प्राण त्याग देंगे।" धर्मात्मा राम ने सभी प्रजा को देखकर कहा, "यदि ऐसा ही है, तो चलो सब सरयू की ओर चलें।" ऐसा कहकर महातेजस्वी राम अपने भाइयों और प्रजा के साथ सरयू नदी की ओर चल पड़े। यह एक अद्भुत दृश्य था – समस्त अयोध्यावासी, वानर, ऋक्ष, राक्षस (जैसे विभीषण), सभी राम के पीछे-पीछे चल रहे थे।
॥ श्लोक २६-३० ॥
तत्र गत्वा महाराज सरयूं सागरंगमाम्।
स्नात्वा यथाविधि सर्वे दानानि विविधानि च॥
दत्त्वा मुनिगणैः सार्धं वसिष्ठप्रमुखैस्तथा।
रामः प्रविवशे धीमान्सलिले संयतेन्द्रियः॥
तमनु प्रविवेशाशु भरतो लक्ष्मणस्तथा।
शत्रुघ्नश्च महातेजा हनूमान्सुग्रीव एव च॥
विभीषणश्च धर्मात्मा जाम्बवानृक्षपुङ्गवः।
अंगदश्चन्द्रकेतुश्च प्रविष्टाः सरयूं तदा॥
📖 भावार्थ : सरयू नदी के तट पर पहुँचकर सभी ने विधिपूर्वक स्नान किया और अनेक दान दिए। वसिष्ठ आदि मुनियों के साथ राम ने ध्यानमग्न होकर जल में प्रवेश किया। उनके पीछे-पीछे भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, हनुमान, सुग्रीव, विभीषण, जाम्बवान, अंगद, चन्द्रकेतु – सभी ने सरयू में प्रवेश किया। इस प्रकार राम के साथ उनके सभी भक्त और परिजन भी देह त्याग कर परमधाम को गए। यह घटना अत्यंत अलौकिक थी – समस्त प्राणी राम के प्रति अटूट प्रेम के कारण उनका अनुसरण कर रहे थे।

🌊 राम का देहत्याग और वैकुण्ठ गमन (श्लोक ३१-५२)

॥ श्लोक ३१-३८ ॥
ततः प्रविष्टमात्रे तु रामे सत्यपराक्रमे।
दिव्यं विमानमायातं सूर्यकोटिसमप्रभम्॥
तस्मिन्विमानमारुह्य रामो विष्णुः सनातनः।
देवैर्ब्रह्मादिभिः सार्धं जगाम परमां गतिम्॥
ये तु तं समनुप्राप्ता भक्त्या रामं महाप्रभुम्।
तेऽपि विष्णुपुरं प्राप्ता रामेण सहिताः प्रभो॥
एवं रामः परं धाम प्राप्तो दाशरथिः प्रभुः।
धर्मं स्थाप्य च लोकेषु गतः स्वर्गं महायशाः॥
📖 भावार्थ : जैसे ही राम ने जल में प्रवेश किया, वैसे ही एक दिव्य विमान, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी, वहाँ प्रकट हुआ। उस विमान पर आरूढ़ होकर सनातन विष्णु राम, ब्रह्मा आदि देवताओं के साथ परम गति को प्राप्त हुए। जो भी भक्त प्रेमपूर्वक राम के साथ सरयू में प्रविष्ट हुए थे, वे भी राम के साथ विष्णुलोक गए। इस प्रकार दाशरथि प्रभु राम ने धर्म की स्थापना करके परमधाम प्राप्त किया। महायशस्वी राम स्वर्ग को चले गए।
॥ श्लोक ३९-४६ ॥
ततस्ते मुनयः सर्वे वसिष्ठप्रमुखास्तदा।
रामस्य चरितं श्रुत्वा विस्मयं परमं ययुः॥
स्तुत्वा देवं महात्मानं प्रणेमुश्च यथाविधि।
ततो ययुः स्वकं धाम सर्वे ते मुनिपुङ्गवाः॥
इत्येतद्रामचरितं सर्वपापप्रणाशनम्।
श्रृण्वतां सततं भक्त्या सर्वकामफलप्रदम्॥
धन्यं यशस्यमायुष्यं पुत्र्यं स्वर्ग्यं तथैव च।
श्रुत्वा रामायणं पुण्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते॥
📖 भावार्थ : तब वसिष्ठ प्रमुख सभी मुनियों ने राम के इस चरित्र को सुनकर अत्यंत विस्मय प्राप्त किया। उन्होंने उस महात्मा देव की स्तुति की और यथाविधि प्रणाम किया। फिर वे सभी महामुनि अपने-अपने धाम को लौट गए। यह रामचरित सभी पापों का नाश करने वाला है। इसे नित्य भक्तिपूर्वक सुनने वाले को सभी कामनाओं का फल प्राप्त होता है। यह धन्य, यशस्वी, आयु बढ़ाने वाला, पुत्र प्रदान करने वाला और स्वर्ग देने वाला है। पुण्यमय रामायण को सुनकर मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।
॥ श्लोक ४७-५२ ॥
सर्गश्चायं समाप्तस्तु यमराजसमागमः।
रामस्य चरितं दिव्यं सर्वपापप्रणाशनम्॥
इति वाल्मीकिरचिते रामायणे महात्मनः।
उत्तरकाण्डे यमराजसमागमो नाम पञ्चदशोत्तरशततमः सर्गः॥
॥ समाप्तोत्तरकाण्डः ॥
📖 भावार्थ : यह सर्ग यमराज के आगमन और राम के दिव्य चरित्र से संबंधित है, जो सभी पापों का नाश करने वाला है। इस प्रकार महात्मा वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण के उत्तरकाण्ड में यमराजसमागम नामक एक सौ पन्द्रहवाँ सर्ग पूर्ण हुआ। और इसके साथ ही सम्पूर्ण उत्तरकाण्ड भी समाप्त होता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

⏳ काल का साक्षात्कार

राम ने यमराज को देखकर उन्हें पहचान लिया और सहर्ष उनके आदेश का पालन किया। यह दर्शाता है कि ज्ञानी पुरुष काल के प्रति भयभीत नहीं होते, बल्कि उसे ईश्वर की लीला मानकर स्वीकार करते हैं।

🙏 भक्तों का अनुगमन

राम के साथ असंख्य प्राणियों का सरयू में प्रवेश करना यह दर्शाता है कि सच्चे भक्त अपने आराध्य से कभी अलग नहीं होना चाहते। यह भक्ति का परम उदाहरण है।

✨ अवतार का उद्देश्य

राम का पृथ्वी पर अवतार धर्म की स्थापना और राक्षसों का विनाश था। यह कार्य पूरा होने पर वे अपने धाम लौट जाते हैं। यह अवतार सिद्धांत को स्पष्ट करता है।

📖 ग्रंथ की पूर्णता

इस सर्ग के साथ वाल्मीकि रामायण का उत्तरकाण्ड समाप्त होता है। यह संपूर्ण रामायण का समापन है, जिसमें राम के जीवन की अंतिम लीला का वर्णन है।

🎯 शिक्षा : मृत्यु निश्चित है, परंतु धर्म और भक्ति में लीन रहने वालों के लिए मृत्यु भी मोक्ष का द्वार खोलती है। राम का जीवन और महाप्रयाण हमें सिखाता है कि हमें निःस्वार्थ भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए और अंत में ईश्वर में लीन हो जाना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे पञ्चदशोत्तरशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
॥ समाप्तोत्तरकाण्डः ॥
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