उत्तर काण्ड अध्याय 114

राम द्वारा लक्ष्मण के पुत्रों को राज्य प्रदान करना

राम अपने भाइयों के पुत्रों का राज्याभिषेक करते हैं। लक्ष्मण के पुत्र अंगद और चन्द्रकेतु को क्रमशः अंगदीय और चन्द्रकेतु नगरों का राज्य मिलता है।

विवरण

राम ने अपने भाइयों के पुत्रों को योग्य राज्यभार सौंपने का निश्चय किया। लक्ष्मण के दो पुत्र थे – अंगद और चन्द्रकेतु। राम ने उन्हें बुलाकर उनकी शिक्षा-दीक्षा और योग्यता की परीक्षा ली। संतुष्ट होकर उन्होंने अंगद को अंगदीय नगर (वर्तमान अयोध्या के निकट) का राज्य प्रदान किया और चन्द्रकेतु को चन्द्रकेतु नगर (जो चन्द्रोदय के समान सुंदर था) का शासक नियुक्त किया। यह सर्ग राम के न्यायप्रिय और दूरदर्शी शासन का प्रतीक है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ११४

(राम द्वारा लक्ष्मण के पुत्रों को राज्य प्रदान करना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुर्दशोत्तरशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम के राज्य में सब कुशल था। अब समय आ गया था कि अगली पीढ़ी को राज्यभार सौंपा जाए। लक्ष्मण के दो पुत्र – अंगद और चन्द्रकेतु – बड़े होकर योग्य नरेश बन चुके थे। यह सर्ग उनके राज्याभिषेक और राम के आशीर्वाद का वर्णन करता है।

👦 लक्ष्मण पुत्रों का परिचय (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततः काले बहुतिथे लक्ष्मणस्य महात्मनः।
पुत्रौ जातौ महावीर्यौ सर्वलक्षणलक्षितौ॥
अंगदश्चन्द्रकेतुश्च रूपयौवनशालिनौ।
धनुर्वेदे च निष्णातौ सर्वशास्त्रविशारदौ॥
तौ दृष्ट्वा राघवो राजा परीक्ष्य च पृथक्पृथक्।
बुद्धिशौर्यगुणोपेतौ संतुष्टोऽभूद्विशेषतः॥
आहूय लक्ष्मणं राजा प्रीतिपूर्वमुवाच ह।
पुत्रौ ते लक्ष्मण वीरौ राज्यार्हौ समुपस्थितौ॥
📖 भावार्थ : बहुत समय बीत जाने पर महात्मा लक्ष्मण के दो महावीर्य पुत्र उत्पन्न हुए, जो सभी लक्षणों से युक्त थे – अंगद और चन्द्रकेतु। वे रूप और यौवन से संपन्न थे, धनुर्वेद में निष्णात और सभी शास्त्रों के विशारद थे। राजा राम ने उन्हें देखा और अलग-अलग उनकी परीक्षा ली। वे बुद्धि, शौर्य और गुणों से युक्त पाकर अत्यंत संतुष्ट हुए। उन्होंने लक्ष्मण को बुलाकर प्रीतिपूर्वक कहा, "हे लक्ष्मण! तुम्हारे ये वीर पुत्र अब राज्य के योग्य हो गए हैं।" राम की दृष्टि में अंगद और चन्द्रकेतु में वे सभी गुण थे जो एक आदर्श शासक में होने चाहिए – विनय, शास्त्रज्ञान, युद्ध कौशल और न्यायप्रियता।
॥ श्लोक ५-८ ॥
लक्ष्मणः प्राह रामं तु प्राञ्जलिः प्रणतोऽभवत्।
यदाज्ञापयि देवेश करिष्यामि न संशयः॥
रामः प्रोवाच धर्मात्मा लक्ष्मणं प्रियदर्शनम्।
अंगदं पूर्वजं राज्ये चन्द्रकेतुं च योजय॥
अंगदीयं पुरं रम्यं चन्द्रकेतोश्च तत्पुरम्।
भविष्यति महात्मानौ शास्तारौ पृथिवीमिमाम्॥
📖 भावार्थ : लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर राम को प्रणाम किया और कहा, "हे देवेश! आप जैसी आज्ञा दें, मैं वैसा ही करूँगा।" धर्मात्मा राम ने प्रियदर्शन लक्ष्मण से कहा, "अंगद और चन्द्रकेतु को राज्य में स्थापित करो। अंगद के लिए अंगदीय नामक सुंदर नगर होगा और चन्द्रकेतु के लिए चन्द्रकेतु नगर। ये दोनों महात्मा इस पृथ्वी का शासन करेंगे।" राम ने यह निर्णय लिया कि वे लक्ष्मण के पुत्रों को अलग-अलग राज्य देकर उनकी योग्यता का सम्मान करेंगे। इससे राज्य का विस्तार भी होगा और दोनों भाइयों को स्वतंत्र रूप से शासन करने का अवसर मिलेगा।

👑 राज्याभिषेक समारोह (श्लोक ९-२४)

॥ श्लोक ९-१४ ॥
ततः पुण्याहघोषेण वाचयित्वा द्विजोत्तमान्।
राज्याय कल्पयामास लक्ष्मणात्मजयोस्तदा॥
अंगदं चन्द्रकेतुं च स्नापयित्वा यथाविधि।
मन्त्रैः सुरर्षिभिः प्रोक्तै राज्यश्रियमदापयत्॥
गजाश्वरथसंपन्ने नगरे रत्नमालिनी।
प्रवेशयामास तदा भ्रातृपुत्रौ महाबलौ॥
अंगदीयं पुरं रम्यं चन्द्रकेतोश्च तत्पुरम्।
अकारयद्विशालाक्षो रामो राजीवलोचनः॥
📖 भावार्थ : फिर राम ने पुण्याहवाचन कराकर उत्तम द्विजों से आशीर्वाद लिया और लक्ष्मण के पुत्रों को राज्य के लिए अभिषिक्त किया। अंगद और चन्द्रकेतु को यथाविधि स्नान कराकर, मुनियों द्वारा प्रोक्त मन्त्रों से राज्यलक्ष्मी प्रदान की। उन्हें हाथी, घोड़े, रथों से संपन्न नगरों में – अंगदीय और चन्द्रकेतु में – प्रवेश कराया गया। विशालाक्ष राजीवलोचन राम ने स्वयं उन नगरों को सुसज्जित कराया था। यह समारोह अत्यंत भव्य था। चारों ओर मंगलध्वनियाँ गूंज रही थीं, नगरवासी उत्सव मना रहे थे। राम ने स्वयं अपने हाथों से दोनों राजकुमारों का तिलक किया और उन्हें राज्य का दायित्व सौंपा।
॥ श्लोक १५-२० ॥
तयोः प्रदाय राज्यानि लक्ष्मणाय महात्मने।
बहुधान्यं धनं रत्नं यौवराज्यमथादिशत्॥
एवं संपूज्य धर्मात्मा भ्रातृपुत्रौ महाबलौ।
रामः प्रीतमनाः श्रीमान्भ्रातृभिः सहितोऽभवत्॥
सीता देवी च साध्वी च पतिव्रतपरायणा।
आशीर्भिर्योजयामास वध्वौ पुत्रौ च सस्नुषौ॥
ततः प्रीता महात्मानो वसिष्ठप्रमुखा द्विजाः।
आशीर्वादैः समानर्चू राजानं लक्ष्मणं तथा॥
📖 भावार्थ : राम ने उन्हें राज्य देने के पश्चात् लक्ष्मण को भी बहुत सा धन, अन्न और रत्न भेंट किए और युवराज पद का सम्मान दिया। इस प्रकार धर्मात्मा राम ने अपने भतीजों का सम्मान करके अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव किया। सीता देवी, जो साध्वी और पतिव्रता थीं, ने वधुओं सहित उन पुत्रों को आशीर्वाद दिया। तब वसिष्ठ प्रमुख द्विजों ने आशीर्वाद देकर राम और लक्ष्मण की स्तुति की। इस अवसर पर सीता ने अंगद और चन्द्रकेतु की पत्नियों को भी आशीर्वाद देकर उनका मंगल कामना की। पूरा वातावरण आनंद और उल्लास से भर गया।
॥ श्लोक २१-२४ ॥
रामः प्रोवाच धर्मात्मा अंगदं चन्द्रकेतुकम्।
धर्मेण पालयेतां वै प्रजाः सर्वाः सुतौ मम॥
मया यथा कृतं राज्यं भ्रातृभिः सह धार्मिकम्।
तथा युवां प्रजाः सर्वाः पालयेतां यथाविधि॥
गुरुशुश्रूषणं नित्यं भ्रातृस्नेहं च सर्वदा।
कुरुतां धर्मनिरतौ सत्यधर्मपरायणौ॥
इत्युक्तौ प्रणिपत्यैनं जग्मतुः स्वपुरं प्रति।
रामोऽपि सुखितः श्रीमान्भ्रातृभिः सहितोऽभवत्॥
📖 भावार्थ : राम ने अंगद और चन्द्रकेतु को उपदेश देते हुए कहा, "हे मेरे पुत्रों! तुम धर्मपूर्वक सभी प्रजा का पालन करना। जैसे मैंने भाइयों के साथ मिलकर राज्य किया, वैसे ही तुम भी प्रजा का पालन करो। गुरुजनों की सेवा, भाइयों से स्नेह, और धर्म में निरत रहना – यही तुम्हारा कर्तव्य है। सत्य और धर्म का पालन करो।" राम के ऐसा कहने पर दोनों ने उन्हें प्रणाम किया और अपने-अपने नगरों को चले गए। राम भी अपने भाइयों के साथ सुखपूर्वक रहने लगे।

📜 समापन (श्लोक २५-३६)

॥ श्लोक २५-३० ॥
एवं राज्यं समासाद्य रामो दाशरथिः प्रभुः।
धर्मेण पालयामास प्रजाः सर्वाः सहोदरः॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि यमराजसमागमम्।
रामस्य विदितं सर्वं यथा वृत्तं पुरातनम्॥
शृण्वतां सततं राज्ञो धर्मनित्यस्य राघव।
सर्वपापविनिर्मुक्ता यान्ति विष्णोः परं पदम्॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार प्रभु दाशरथि राम ने धर्मपूर्वक समस्त प्रजा का पालन किया। अब आगे मैं यमराज के राम के पास आने का वर्णन करूँगा, जिसमें सब कुछ पूर्ववृत्त के अनुसार घटित हुआ। जो भी इस धर्मनिष्ठ राजा के चरित्र को नित्य सुनता है, वह सब पापों से मुक्त होकर विष्णु के परम पद को प्राप्त होता है।
॥ श्लोक ३१-३६ ॥
सर्गश्चायं समाप्तस्तु रामभक्तिसमन्वितः।
लक्ष्मणात्मजराज्याख्यो धर्मवृद्धिकरः सदा॥
इति वाल्मीकिरचिते रामायणे महात्मनः।
उत्तरकाण्डे राज्यदानो नाम चतुर्दशोत्तरशततमः सर्गः॥
📖 भावार्थ : यह सर्ग रामभक्ति से युक्त, लक्ष्मण के पुत्रों के राज्यदान से संबंधित और सदा धर्म को बढ़ाने वाला है। इस प्रकार महात्मा वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण के उत्तरकाण्ड में राज्यदान नामक एक सौ चौदहवाँ सर्ग पूर्ण हुआ।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🏛️ उत्तराधिकार की योजना

राम ने समय रहते अपने उत्तराधिकारियों को राज्य सौंपकर एक आदर्श शासक की भाँति राज्य के भविष्य की चिंता की। यह उनकी दूरदर्शिता का प्रमाण है।

🎓 योग्यता के आधार पर चयन

राम ने अंगद और चन्द्रकेतु की योग्यता परीक्षा ली और तब उन्हें राज्य सौंपा, यह दर्शाता है कि राजा का चयन योग्यता के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल जन्म से।

🤝 भ्रातृत्व का विस्तार

लक्ष्मण के पुत्रों को राज्य देना राम के अपने भाइयों और उनके परिवारों के प्रति अगाध स्नेह और सम्मान को दर्शाता है।

📜 धर्मोपदेश

राम द्वारा अंगद और चन्द्रकेतु को दिया गया उपदेश शासन के मूल सिद्धांतों – धर्म, सत्य, गुरुसेवा और भ्रातृप्रेम – की याद दिलाता है।

🎯 शिक्षा : योग्य उत्तराधिकारी तैयार करना और उन्हें समय पर राज्यभार सौंपना एक कुशल शासक का कर्तव्य है। धर्म और नीति का पालन करते हुए अगली पीढ़ी को मार्गदर्शन देना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे चतुर्दशोत्तरशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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