राम द्वारा भरत को गंधर्वों पर विजय प्राप्त करने भेजना
राम के राज्य में गंधर्वों के उत्पात से प्रजा त्रस्त है। राम भरत को उनके दमन के लिए भेजते हैं। भरत सेना सहित प्रस्थान करते हैं।
विवरण
कुछ समय पश्चात् सीमाप्रदेश में रहने वाले गंधर्वों ने उत्पात मचाना शुरू कर दिया। वे प्रजा को पीड़ित कर रहे थे और राज्य की शांति भंग कर रहे थे। प्रजा की शिकायत सुनकर राम ने भरत को बुलाया और उन्हें गंधर्वों का दमन करने का आदेश दिया। भरत ने राम की आज्ञा शिरोधार्य की और विशाल सेना के साथ प्रस्थान किया। राम ने उन्हें विजय का आशीर्वाद दिया। इस सर्ग में भरत के वीरतापूर्ण प्रस्थान और युद्ध की तैयारियों का वर्णन है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ११२
(राम द्वारा भरत को गंधर्वों पर विजय हेतु भेजना)
🔆 प्रस्तावना : राम के धार्मिक शासन में प्रजा सुखी थी, किंतु उत्तर दिशा के सीमावर्ती क्षेत्रों में गंधर्वों ने उत्पात मचाना आरंभ कर दिया। उनके अत्याचारों से त्रस्त प्रजा ने राम से सहायता की गुहार लगाई। यह सर्ग उस संकट और भरत के वीरतापूर्ण अभियान का प्रारंभ बताता है।
🗣️ प्रजा का निवेदन और राम का निर्णय (श्लोक १-१२)
ऊचुः प्राञ्जलयो वाक्यं रामं सत्यपराक्रमम्॥
देव देव नमस्तेऽस्तु रक्षां कुरु महीतले।
गन्धर्वा नाम दुर्धर्षा बलिनः शत्रुनाशन॥
ते सीम्नि वर्तते घोरा: पीडयंति प्रजाः प्रभो।
निवारय महाबाहो रक्षस्व शरणागतान्॥
रामः श्रुत्वा वचस्तेषां दूतानां सत्यवादिनाम्।
प्रज्वलितः क्रोधेनापि नियम्यात्मानमात्मना॥
उवाच भरतं स्नेहात्संनियम्य च मानसम्।
गच्छ भरत दुर्धर्ष गन्धर्वान्विनिवारय॥
त्वं हि वीर्यबलोपेतः सर्वशास्त्रविशारदः।
हत्वा तान्वै निवर्तस्व सहितः सर्वसैनिकैः॥
यदाज्ञापयि देवेश करिष्यामि न संशयः॥
गन्धर्वान्निहनिष्यामि ससैन्यान्सपदानुगान्।
आनयिष्यामि ते वित्तं यच्च तेषां धनं महत्॥
रामः प्रीतमनाः प्राह गच्छ भद्रं भविष्यति।
लक्ष्मणेन सहायेन सर्वसैन्येन संवृतः॥
एवमुक्त्वा महातेजा रामो दाशरथिस्तदा।
आजुहाव बलाध्यक्षान्सैन्यं संनह्यतामिति॥
ततः प्रभाते विमले भरतः सुमहायशाः।
प्रययौ बलसंयुक्तो गन्धर्वान्प्रति वीर्यवान्॥
🚩 भरत का प्रस्थान और सेना का वर्णन (श्लोक १३-२८)
रथाश्च हस्तिनश्चैव तुरंगाः पत्तयस्तथा॥
ध्वजिनी शुशुभे राज्ञो भरतस्य महात्मनः।
सागरस्येव घोरस्य वेलेव परिवर्तते॥
नानाप्रहरणोपेता नानावर्णधरास्तथा।
प्रययुर्भरतं सार्धं हर्षयुक्ता युयुत्सवः॥
रामः प्रीतमना राजा ददर्श स्वां चमूं तदा।
आशीर्भिर्योजयामास भरतं जयकांक्षया॥
वसिष्ठप्रमुखा विप्रा जुहुवुर्विधिवद्धविः।
ब्राह्मणाः सूर्यसङ्काशा भरतस्य जयैषिणः॥
पौराश्चानुययुः प्रेम्णा रामस्याज्ञां प्रकीर्तयन्॥
गन्धर्वाणां पुरीं गत्वा भरतः सत्यविक्रमः।
न्यवेदयदुपस्पृश्य रामस्य विजयं प्रति॥
गन्धर्वाश्च महात्मानो दृष्ट्वा तं भरतं रणे।
संनद्धाः प्रययुः शीघ्रं योद्धुकामा रणाजिरे॥
ततः प्रववृते युद्धं भरतस्य महात्मनः।
गन्धर्वैः सह घोरं तु रोमहर्षणमुत्तमम्॥
भरतो गन्धर्वपतिं जघान निशितैः शरैः॥
स चापि भरतं क्रुद्धो विव्याध निशितैः शरैः।
तयोर्युद्धं समभवद्देवासुररणोपमम्॥
निरीक्ष्य भरतं युद्धे लक्ष्मणः परवीरहा।
आजगाम रणे तूर्णं सहायं भरतं प्रति॥
ततः संछिन्नभूयिष्ठा गन्धर्वा भरतार्दिताः।
पलायनपराः सर्वे हतशेषा दिशो ययुः॥
🏹 विजय और समापन (श्लोक २९-४५)
लक्ष्मणं च महात्मानं शत्रुघ्नं च महाबलम्॥
जयशब्दो महानासीद्दुन्दुभीनां च निस्वनः।
आनन्दश्चापि सैन्यानां युद्धे तस्मिन्समन्ततः॥
भरतः प्राह धर्मात्मा गन्धर्वाणां महात्मनाम्।
ये शिष्टास्ते प्रणामं च चक्रुः शरणमागताः॥
तेषां दत्वा वरं भरतो रामाज्ञां प्रकीर्तयन्।
अयोध्यां प्रययौ हृष्टो धनधान्यसमन्वितः॥
रामो दाशरथिः श्रुत्वा भरतस्य जयं महत्।
ननन्द च महातेजा मातृभिः सहितोऽभवत्॥
त्वया धर्मो धृतो राजन्गन्धर्वाः सन्निराकृताः॥
धन्योऽस्मि यस्य मे भ्राता त्वं वीरो विजयी भवान्।
एवं स्तुत्वा महातेजा रामो भरतमब्रवीत्॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि गन्धर्वाणां वधं प्रति।
शत्रुघ्नेन कृतं युद्धं विस्तरेण निबोध मे॥
इति सर्गः समाप्तोऽयं भरतस्य जयैषिणः।
श्रृण्वतां विजयं नित्यं सर्वदा सुखदो भवेत्॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🛡️ भरत का शौर्य
भरत केवल त्याग और भक्ति के प्रतीक नहीं हैं, वे महान योद्धा भी हैं। यह सर्ग उनके युद्ध कौशल और नेतृत्व क्षमता को उजागर करता है।
🤝 भ्रातृत्व
लक्ष्मण का भरत के साथ युद्ध में जाना और राम का उनका मार्गदर्शन करना चारों भाइयों के अटूट प्रेम और सहयोग को दर्शाता है।
⚖️ धर्मराज्य का कर्तव्य
राम का प्रजा की पीड़ा सुनकर तुरंत कदम उठाना एक आदर्श राजा के कर्तव्य को दर्शाता है – प्रजा की रक्षा राजा का परम धर्म है।
🌟 विजय का संदेश
गंधर्वों पर विजय अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। यह संदेश देता है कि धर्म की रक्षा के लिए शक्ति का प्रयोग आवश्यक है।
🎯 शिक्षा : धर्मराज्य की स्थापना के लिए केवल न्याय ही नहीं, बल्कि शत्रुओं का दमन भी आवश्यक है। प्रजा के कल्याण के लिए राजा को सदा तत्पर रहना चाहिए और योग्य व्यक्तियों को उत्तरदायित्व सौंपना चाहिए।