उत्तर काण्ड अध्याय 112

राम द्वारा भरत को गंधर्वों पर विजय प्राप्त करने भेजना

राम के राज्य में गंधर्वों के उत्पात से प्रजा त्रस्त है। राम भरत को उनके दमन के लिए भेजते हैं। भरत सेना सहित प्रस्थान करते हैं।

विवरण

कुछ समय पश्चात् सीमाप्रदेश में रहने वाले गंधर्वों ने उत्पात मचाना शुरू कर दिया। वे प्रजा को पीड़ित कर रहे थे और राज्य की शांति भंग कर रहे थे। प्रजा की शिकायत सुनकर राम ने भरत को बुलाया और उन्हें गंधर्वों का दमन करने का आदेश दिया। भरत ने राम की आज्ञा शिरोधार्य की और विशाल सेना के साथ प्रस्थान किया। राम ने उन्हें विजय का आशीर्वाद दिया। इस सर्ग में भरत के वीरतापूर्ण प्रस्थान और युद्ध की तैयारियों का वर्णन है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ११२

(राम द्वारा भरत को गंधर्वों पर विजय हेतु भेजना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ द्वादशोत्तरशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम के धार्मिक शासन में प्रजा सुखी थी, किंतु उत्तर दिशा के सीमावर्ती क्षेत्रों में गंधर्वों ने उत्पात मचाना आरंभ कर दिया। उनके अत्याचारों से त्रस्त प्रजा ने राम से सहायता की गुहार लगाई। यह सर्ग उस संकट और भरत के वीरतापूर्ण अभियान का प्रारंभ बताता है।

🗣️ प्रजा का निवेदन और राम का निर्णय (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-६ ॥
ततः कदाचिदायाता दूता राज्ञः सुहृत्तमाः।
ऊचुः प्राञ्जलयो वाक्यं रामं सत्यपराक्रमम्॥
देव देव नमस्तेऽस्तु रक्षां कुरु महीतले।
गन्धर्वा नाम दुर्धर्षा बलिनः शत्रुनाशन॥
ते सीम्नि वर्तते घोरा: पीडयंति प्रजाः प्रभो।
निवारय महाबाहो रक्षस्व शरणागतान्॥
रामः श्रुत्वा वचस्तेषां दूतानां सत्यवादिनाम्।
प्रज्वलितः क्रोधेनापि नियम्यात्मानमात्मना॥
उवाच भरतं स्नेहात्संनियम्य च मानसम्।
गच्छ भरत दुर्धर्ष गन्धर्वान्विनिवारय॥
त्वं हि वीर्यबलोपेतः सर्वशास्त्रविशारदः।
हत्वा तान्वै निवर्तस्व सहितः सर्वसैनिकैः॥
🔹 पदच्छेद एवं भावार्थ : (संक्षेप में) एक दिन राजा राम के पास उत्तर दिशा के दूत आए और उन्होंने गंधर्वों के अत्याचारों की सूचना दी। उन्होंने कहा, "हे देव! हे शत्रुनाशन! गंधर्व नामक दुर्धर्ष और बलशाली असुर हमारी सीमा पर उत्पात मचा रहे हैं। वे प्रजा को पीड़ित कर रहे हैं। कृपया उनका निवारण करें।" राम ने यह सुनकर क्रोध तो किया, परंतु आत्मसंयम रखा। उन्होंने भरत को बुलाकर स्नेहपूर्वक कहा, "हे दुर्धर्ष भरत! तुम जाओ और गंधर्वों का दमन करो। तुम वीर्य और बल से संपन्न हो, सभी शास्त्रों में निपुण हो। उन्हें मारकर सभी सैनिकों सहित लौट आओ।"
📖 भावार्थ : दूतों के माध्यम से राम को ज्ञात हुआ कि उत्तरापथ के गंधर्व राज्य की शांति भंग कर रहे हैं। ये गंधर्व अत्यंत बलवान और क्रूर थे। वे प्रजा को लूटते, साधुओं को त्रास देते और व्यापार मार्गों को अवरुद्ध कर देते थे। प्रजा की पीड़ा सुनकर राम का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने तुरंत भरत को बुलाया। भरत उनके परम विश्वासपात्र और वीर योद्धा थे। राम ने उन्हें गंधर्वों के विनाश का दायित्व सौंपा। यह राम की कूटनीति और भरत की योग्यता का प्रमाण था कि वे इस कठिन अभियान के लिए उन्हें चुनते हैं। राम ने भरत को आशीर्वाद दिया और विजय की कामना की।
॥ श्लोक ७-१२ ॥
भरतः प्राह रामं तु प्राञ्जलिः प्रणतोऽभवत्।
यदाज्ञापयि देवेश करिष्यामि न संशयः॥
गन्धर्वान्निहनिष्यामि ससैन्यान्सपदानुगान्।
आनयिष्यामि ते वित्तं यच्च तेषां धनं महत्॥
रामः प्रीतमनाः प्राह गच्छ भद्रं भविष्यति।
लक्ष्मणेन सहायेन सर्वसैन्येन संवृतः॥
एवमुक्त्वा महातेजा रामो दाशरथिस्तदा।
आजुहाव बलाध्यक्षान्सैन्यं संनह्यतामिति॥
ततः प्रभाते विमले भरतः सुमहायशाः।
प्रययौ बलसंयुक्तो गन्धर्वान्प्रति वीर्यवान्॥
📖 भावार्थ : भरत ने हाथ जोड़कर राम को प्रणाम किया और कहा, "हे देवेश! आप जैसी आज्ञा दें, मैं वैसा ही करूँगा। मैं गंधर्वों को उनकी सेना सहित नष्ट कर दूंगा और उनका सारा धन आपके समक्ष लाऊंगा।" राम अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले, "जाओ, तुम्हारा कल्याण हो। लक्ष्मण तुम्हारे सहायक होंगे और समस्त सेना तुम्हारे साथ रहेगी।" फिर राम ने सेनापतियों को बुलाकर सेना को युद्ध के लिए तैयार रहने का आदेश दिया। अगले दिन प्रातःकाल महायशस्वी भरत विशाल सेना के साथ गंधर्वों का सामना करने के लिए प्रस्थान किए। यह दृश्य अत्यंत उत्साहजनक था – चारों ओर योद्धाओं की पुकार, रथों की गर्जना और हाथियों की चिंघाड़ से वातावरण युद्धोन्मुख हो गया। राम ने प्रासाद से उन्हें विदा किया और देवताओं से उनकी विजय की प्रार्थना की।

🚩 भरत का प्रस्थान और सेना का वर्णन (श्लोक १३-२८)

॥ श्लोक १३-१८ ॥
ततो योधाः समुत्पेतुर्नानादेशसमागताः।
रथाश्च हस्तिनश्चैव तुरंगाः पत्तयस्तथा॥
ध्वजिनी शुशुभे राज्ञो भरतस्य महात्मनः।
सागरस्येव घोरस्य वेलेव परिवर्तते॥
नानाप्रहरणोपेता नानावर्णधरास्तथा।
प्रययुर्भरतं सार्धं हर्षयुक्ता युयुत्सवः॥
रामः प्रीतमना राजा ददर्श स्वां चमूं तदा।
आशीर्भिर्योजयामास भरतं जयकांक्षया॥
वसिष्ठप्रमुखा विप्रा जुहुवुर्विधिवद्धविः।
ब्राह्मणाः सूर्यसङ्काशा भरतस्य जयैषिणः॥
📖 भावार्थ : भरत के साथ जाने के लिए नाना देशों से योद्धा एकत्र हुए – रथ, हाथी, घोड़े और पैदल सैनिक। महात्मा भरत की सेना अत्यंत शोभायमान थी, मानो भयंकर समुद्र की लहरें उमड़ रही हों। विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित, विविध वर्णों की वर्दी धारण किए वे योद्धा युद्ध की उत्कंठा से भरत के साथ चल पड़े। राम ने अपनी सेना को देखकर प्रसन्नता व्यक्त की और भरत को विजय की आशीष दी। वसिष्ठ प्रमुख ब्राह्मणों ने विधिपूर्वक हवन करके भरत की विजय के लिए यज्ञ किए। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि राम ने स्वयं युद्ध में न जाकर भरत को भेजा, जो उनके नेतृत्व कौशल और भरत की सामर्थ्य में उनके विश्वास को दर्शाता है। सेना का यह विशाल समूह देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो पूरी पृथ्वी ही युद्ध के लिए उमड़ पड़ी हो।
॥ श्लोक १९-२४ ॥
निर्ययौ भरतो हृष्टः प्रजानां हितकाम्यया।
पौराश्चानुययुः प्रेम्णा रामस्याज्ञां प्रकीर्तयन्॥
गन्धर्वाणां पुरीं गत्वा भरतः सत्यविक्रमः।
न्यवेदयदुपस्पृश्य रामस्य विजयं प्रति॥
गन्धर्वाश्च महात्मानो दृष्ट्वा तं भरतं रणे।
संनद्धाः प्रययुः शीघ्रं योद्धुकामा रणाजिरे॥
ततः प्रववृते युद्धं भरतस्य महात्मनः।
गन्धर्वैः सह घोरं तु रोमहर्षणमुत्तमम्॥
📖 भावार्थ : भरत प्रजा के हित की कामना से प्रसन्न होकर नगर से बाहर निकले। नगरवासी भी प्रेमपूर्वक उनके पीछे-पीछे चले और राम की आज्ञा की प्रशंसा करने लगे। सत्यविक्रम भरत ने गंधर्वों की नगरी पहुँचकर पहले नदी आदि में आचमन किया और राम की विजय का संकल्प किया। महात्मा गंधर्वों ने भरत को युद्ध के लिए आया देखा तो वे भी शीघ्रता से कवच धारण करके युद्धभूमि में उतर आए। इस प्रकार भरत और गंधर्वों के बीच घोर संग्राम प्रारंभ हुआ, जो रोमांचकारी और अद्भुत था। भरत का यह साहस और युद्ध कौशल देखते ही बनता था – वे अकेले ही सहस्रों गंधर्वों से भिड़ गए। उनका रथ जिधर जाता, गंधर्वों की कतारें बिखर जातीं। सेना भी उनके साथ पूरे उत्साह से लड़ रही थी।
॥ श्लोक २५-२८ ॥
तत्र युद्धं महाघोरं वर्तते स्म भयानकम्।
भरतो गन्धर्वपतिं जघान निशितैः शरैः॥
स चापि भरतं क्रुद्धो विव्याध निशितैः शरैः।
तयोर्युद्धं समभवद्देवासुररणोपमम्॥
निरीक्ष्य भरतं युद्धे लक्ष्मणः परवीरहा।
आजगाम रणे तूर्णं सहायं भरतं प्रति॥
ततः संछिन्नभूयिष्ठा गन्धर्वा भरतार्दिताः।
पलायनपराः सर्वे हतशेषा दिशो ययुः॥
📖 भावार्थ : युद्ध अत्यंत घोर और भयंकर हो गया। भरत ने अपने तीक्ष्ण बाणों से गंधर्वों के सेनापति को घायल कर दिया। क्रोधित होकर उसने भी भरत पर बाणों की वर्षा की। दोनों में देवासुर संग्राम के समान युद्ध हुआ। यह देख परवीरहा लक्ष्मण शीघ्रता से रणभूमि में आए और भरत की सहायता करने लगे। अब गंधर्व सेना दोनों ओर से आक्रांत हो गई। भरत और लक्ष्मण के संयुक्त आक्रमण से गंधर्व छिन्न-भिन्न हो गए। जो बचे, वे युद्ध छोड़कर चारों दिशाओं भाग खड़े हुए। इस प्रकार भरत ने गंधर्वों पर विजय प्राप्त की।

🏹 विजय और समापन (श्लोक २९-४५)

॥ श्लोक २९-३५ ॥
ततो योधाः समागम्य भरतं परिषस्वजुः।
लक्ष्मणं च महात्मानं शत्रुघ्नं च महाबलम्॥
जयशब्दो महानासीद्दुन्दुभीनां च निस्वनः।
आनन्दश्चापि सैन्यानां युद्धे तस्मिन्समन्ततः॥
भरतः प्राह धर्मात्मा गन्धर्वाणां महात्मनाम्।
ये शिष्टास्ते प्रणामं च चक्रुः शरणमागताः॥
तेषां दत्वा वरं भरतो रामाज्ञां प्रकीर्तयन्।
अयोध्यां प्रययौ हृष्टो धनधान्यसमन्वितः॥
रामो दाशरथिः श्रुत्वा भरतस्य जयं महत्।
ननन्द च महातेजा मातृभिः सहितोऽभवत्॥
📖 भावार्थ : विजय के बाद सभी योद्धाओं ने आकर भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न को गले लगाया। चारों ओर जय-जयकार के स्वर गूंज उठे, दुन्दुभियाँ बजाई गईं और सैनिक आनंद से नाच उठे। धर्मात्मा भरत ने शेष बचे गंधर्वों को अभयदान दिया, जिन्होंने प्रणाम करके शरण माँगी। भरत ने राम की आज्ञा का उल्लेख करते हुए उन्हें क्षमा कर दिया और धन-धान्य से पूर्ण होकर अयोध्या लौट आए। राम ने भरत की विजय सुनकर अपार हर्ष का अनुभव किया। वे माताओं और भाइयों सहित आनंदित हुए। नगर में उत्सव मनाया गया और राम ने भरत का भव्य स्वागत किया।
॥ श्लोक ३६-४५ ॥
रामः प्रोवाच धर्मात्मा भरतं प्रियदर्शनम्।
त्वया धर्मो धृतो राजन्गन्धर्वाः सन्निराकृताः॥
धन्योऽस्मि यस्य मे भ्राता त्वं वीरो विजयी भवान्।
एवं स्तुत्वा महातेजा रामो भरतमब्रवीत्॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि गन्धर्वाणां वधं प्रति।
शत्रुघ्नेन कृतं युद्धं विस्तरेण निबोध मे॥
इति सर्गः समाप्तोऽयं भरतस्य जयैषिणः।
श्रृण्वतां विजयं नित्यं सर्वदा सुखदो भवेत्॥
📖 भावार्थ : राम ने प्रियदर्शन भरत से कहा, "हे राजन्! तुमने धर्म की रक्षा की और गंधर्वों का दमन किया। मैं धन्य हूँ कि मेरा भाई तुम जैसा वीर और विजयी है।" इस प्रकार स्तुति करने के बाद राम ने कहा कि अब मैं आगे शत्रुघ्न द्वारा गंधर्वों के वध का वर्णन करूँगा। यह सर्ग भरत की विजय के रूप में समाप्त होता है। इसे सुनने वालों को सदा सुख की प्राप्ति होती है। इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि राम के राज्य में धर्म की रक्षा के लिए भाई-भाई एकजुट होकर कार्य करते हैं। भरत की वीरता और राम के प्रति उनकी निष्ठा आदर्श है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🛡️ भरत का शौर्य

भरत केवल त्याग और भक्ति के प्रतीक नहीं हैं, वे महान योद्धा भी हैं। यह सर्ग उनके युद्ध कौशल और नेतृत्व क्षमता को उजागर करता है।

🤝 भ्रातृत्व

लक्ष्मण का भरत के साथ युद्ध में जाना और राम का उनका मार्गदर्शन करना चारों भाइयों के अटूट प्रेम और सहयोग को दर्शाता है।

⚖️ धर्मराज्य का कर्तव्य

राम का प्रजा की पीड़ा सुनकर तुरंत कदम उठाना एक आदर्श राजा के कर्तव्य को दर्शाता है – प्रजा की रक्षा राजा का परम धर्म है।

🌟 विजय का संदेश

गंधर्वों पर विजय अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। यह संदेश देता है कि धर्म की रक्षा के लिए शक्ति का प्रयोग आवश्यक है।

🎯 शिक्षा : धर्मराज्य की स्थापना के लिए केवल न्याय ही नहीं, बल्कि शत्रुओं का दमन भी आवश्यक है। प्रजा के कल्याण के लिए राजा को सदा तत्पर रहना चाहिए और योग्य व्यक्तियों को उत्तरदायित्व सौंपना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे द्वादशोत्तरशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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