रानियों की मृत्यु (कौशल्या, कैकेयी, सुमित्रा का स्वर्गारोहण)
राम के दीर्घकालीन राज्य के पश्चात् उनकी माताएँ कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा समाधि लेकर स्वर्गारोहण करती हैं। राम एवं भाइयों का विलाप और अंतिम संस्कार का वर्णन।
विवरण
राम के राज्य को अनेक वर्ष बीत चुके थे। प्रजा सुखी थी और चारों भाई धर्मपूर्वक शासन कर रहे थे। इसी बीच, राम की माताएँ – कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा – आयु के अंतिम पड़ाव पर पहुँच गईं। उन्होंने वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण करने की इच्छा जताई। राम ने गुरु वसिष्ठ की आज्ञा से उनकी इच्छा का सम्मान किया। माताओं ने पुत्रों को आशीर्वाद देते हुए गंगा तट पर समाधि ली और परमधाम को प्रस्थान किया। उनके देह त्यागने के पश्चात राम और भाई अत्यंत शोकाकुल हुए, परंतु धर्मबुद्धि से उन्होंने अंतिम संस्कार की समस्त क्रियाएँ विधिपूर्वक संपन्न कीं। इस प्रकार तीनों रानियाँ पुण्यलोक को गईं।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १११
(रानियों की मृत्यु – कौशल्या, कैकेयी, सुमित्रा का स्वर्गारोहण)
🔆 प्रस्तावना : राम के अयोध्या राज्य में सुख-शांति व्याप्त थी। काल गति के अनुसार अब तीनों रानियों – कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा – के पार्थिव जीवन की संध्याकाल आ पहुँची। यह सर्ग उनके स्वर्गारोहण और राम के करुण विलाप का मार्मिक वर्णन प्रस्तुत करता है।
🧘 माताओं की वानप्रस्थ इच्छा (श्लोक १-१०)
मातरः समुपागम्य प्रणम्येदमुवाच ह॥
कौशल्या च कुशलिनी कैकेयी च सुमित्रया।
आशीर्वादान्प्रयुज्याथ रामं परमधार्मिकम्॥
ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वा वाक्यं हर्षसमन्विताः।
पुत्र राज्यं चिरं कृत्वा वयमत्र सुखान्विताः॥
इदानीं वानप्रस्थं हि कर्तुमिच्छामहे वयम्।
अनुजानीहि धर्मज्ञ पुत्र त्वं सह लक्ष्मणः॥
रामः श्रुत्वा तु वचनं मातृणां विस्मितोऽभवत्।
वाष्पपूर्णेक्षणो दीनो धरण्यां पतितः शुचा॥
मा शुचः त्वं महाबाहो धर्म एष सनातनः॥
गुरुणा वसिष्ठेनापि सह संमन्त्र्य यत्नतः।
कुरु नः सम्मतं पुत्र यथाशास्त्रं यथाक्रमम्॥
रामः प्रोवाच मातॄणां वचनं प्रतिपूज्य च।
गुरुं वसिष्ठमाहूय कृताञ्जलिरुवाच ह॥
भगवन् मातरः सर्वा वानप्रस्थं चिकीर्षवः।
कथं करोमि तद्ब्रूहि धर्मं वेदविदां वर॥
वसिष्ठः प्राह धर्मज्ञ श्रृणु राम यथाक्रमम्।
वानप्रस्थविधानं हि मातृणां त्वं समाचर॥
🌊 गंगा तट पर समाधि और स्वर्गारोहण (श्लोक ११-२५)
मातृभिः सहितो गंगां प्रययौ धर्मसंहितः॥
तत्र स्नात्वा विधानेन दानानि विविधानि च।
दत्त्वा मुनिगणैः सार्धं वसिष्ठप्रमुखैस्तथा॥
आश्रमं कारयामास पर्णशालां मनोरमाम्।
तत्र मातर ऊषुस्ता वानप्रस्थव्रते रताः॥
कतिचित्तु दिनान्येव तपस्तप्त्वा सुदारुणम्।
समाधिं संप्रविष्टास्ता योगधारणया तदा॥
त्यक्त्वा देहं महाराज्ञ्यो दिव्यरूपाः समुत्थिताः।
दिव्याभरणसंयुक्ता दिव्यगन्धानुलेपनाः॥
विमानवरमारुह्य यान्तीः सूर्यसमप्रभाः॥
हाहाकारो महानासीद्भ्रातृणां शोकसंभवः।
लक्ष्मणो भरतः शत्रुघ्नश्चापि विचेतसः॥
रामः प्रोवाच तान्भ्रातॄन्धैर्यमालम्ब्य धीरवत्।
मा शुचो मा च शोचध्वं मातरः स्वर्गमास्थिताः॥
इह कीर्तिं परां प्राप्य प्रेत्य चैव सुखान्विताः।
धर्म एष सदा पुण्यो गतिरेषा सनातनी॥
अग्निकार्यं विधानेन कर्तुमर्हथ सर्वशः।
इत्युक्त्वा राघवः श्रीमान् स्वयं चक्रे विधानतः॥
कारयित्वा यथान्यायं मातृदेहान्निधाय च॥
अग्निना दह्यमानास्ता रुरुदुः सर्व एव ते।
रामो दाशरथिस्त्वेको धैर्यमालम्ब्य सुस्थितः॥
अग्निकार्ये समाप्ते तु तर्पणं च यथाविधि।
चक्रुस्ते भ्रातरः सर्वे पिण्डदानं च धर्मतः॥
ततो द्वादशरात्रे तु श्राद्धं कृत्वा महामतिः।
रामः प्रीतमनाः सर्वैर्भ्रातृभिः सहितोऽभवत्॥
एवं ता राममातरस्त्यक्त्वा देहं महीतले।
प्राप्ताः स्वर्गं महात्मानो रामश्च धर्ममाचरत्॥
😢 राम का विलाप और धैर्य (श्लोक २६-४२)
प्रशशंसुर्महात्मानो मुनयो देवतागणाः॥
राम धन्योऽसि यन्मातॄः स्वर्गस्थाः सम्प्रपादिताः।
धर्मेण नातिचारेण सत्येन च समन्विताः॥
रामः प्रोवाच तान्सर्वान्कृताञ्जलिरभाषत।
यदि प्रीता मुनिश्रेष्ठा यदि धर्मे स्थिता वयम्॥
ततः प्रसादमिच्छामि मातृणां यत्सुखावहम्।
सदा मे वर्ततां भक्तिः पित्रोश्चैव विशेषतः॥
एवं ब्रुवति रामे तु पुष्पवृष्टिः पपात ह।
देवदुन्दुभयो नेदुः साधु साध्विति वादिनः॥
राज्यं पालय धर्मेण मातृशोकं परित्यज॥
एता हि तव मातरस्त्रिदिवे वसतीः शुभाः।
प्राप्ताः पुण्येन धर्मेण त्वत्प्रसादादसंशयम्॥
तस्मात्त्वं राघव श्रीमान्प्रजाः पालय धार्मिकः।
भ्रातृभिः सहितो नित्यं धर्ममेवानुपालय॥
इत्युक्तो राघवो राजा प्रत्युवाच गुरुं तदा।
भगवन्नेवमेवैतद्यथाह भगवान्गुरुः॥
अद्यप्रभृति वक्ष्यामि पालयिष्ये महीमिमाम्।
धर्मेण नातिचारेण भवतामाज्ञया मुने॥
पालयामास धर्मात्मा भ्रातृभिः सहितोऽनघः॥
न्यायतश्च प्रजाः सर्वा रञ्जयामास राघवः।
धर्मे स्थिताः प्रजाः सर्वा न शोचन्ति स्म कर्हिचित्॥
एवं वर्षसहस्राणि रामो राज्यमकारयत्।
इष्ट्वा बहुविधैर्यज्ञैर्देवताः प्रीणयन्मुहुः॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि गन्धर्वाणां वधं प्रति।
भरतेन कृतं युद्धं शत्रुघ्नेन च धीमता॥
इति सर्गः समाप्तोऽयं राममातृविनाशनः।
श्रृण्वतां पापनाशाय पुण्याय च सदा भवेत्॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
👵 मातृभक्ति और धर्म
इस सर्ग में राम की माताओं के प्रति अगाध प्रेम और धर्म के प्रति अटल निष्ठा का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। पुत्र होने के नाते वे विलाप करते हैं, किंतु धर्मज्ञ होने के कारण वे माताओं की इच्छा का सम्मान करते हैं।
🌿 वानप्रस्थ आश्रम का महत्त्व
वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण करना वैदिक आश्रम व्यवस्था का अंग है। माताओं द्वारा इस आश्रम को अपनाना धर्म के प्रति उनकी आस्था और संसार से विरक्ति का प्रतीक है। राम का उन्हें इसके लिए प्रोत्साहित करना उनकी धर्मपरायणता को दर्शाता है।
🌟 स्वर्गारोहण का संदेश
माताओं का स्वर्गारोहण यह संदेश देता है कि सांसारिक जीवन के पश्चात आत्मा की सद्गति ही परम लक्ष्य है। राम का शोक न कर धर्मपूर्वक अंतिम संस्कार करना भी इसी सत्य को स्वीकार करना है।
🙏 राम का आदर्श चरित्र
राम ने इस सर्ग में पुत्र, राजा और धर्मपालक के रूप में अपने सभी कर्तव्यों का निर्वाह किया। उनका धैर्य और संयम सभी के लिए अनुकरणीय है।
🎯 शिक्षा : जीवन में माता-पिता की सेवा परम धर्म है, परंतु उनकी आध्यात्मिक इच्छाओं का सम्मान करना भी उतना ही आवश्यक है। धर्म का पालन करते हुए व्यक्ति को शोक पर नियंत्रण रखना चाहिए और कर्तव्यपथ पर अग्रसर रहना चाहिए।