उत्तर काण्ड अध्याय 111

रानियों की मृत्यु (कौशल्या, कैकेयी, सुमित्रा का स्वर्गारोहण)

राम के दीर्घकालीन राज्य के पश्चात् उनकी माताएँ कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा समाधि लेकर स्वर्गारोहण करती हैं। राम एवं भाइयों का विलाप और अंतिम संस्कार का वर्णन।

विवरण

राम के राज्य को अनेक वर्ष बीत चुके थे। प्रजा सुखी थी और चारों भाई धर्मपूर्वक शासन कर रहे थे। इसी बीच, राम की माताएँ – कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा – आयु के अंतिम पड़ाव पर पहुँच गईं। उन्होंने वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण करने की इच्छा जताई। राम ने गुरु वसिष्ठ की आज्ञा से उनकी इच्छा का सम्मान किया। माताओं ने पुत्रों को आशीर्वाद देते हुए गंगा तट पर समाधि ली और परमधाम को प्रस्थान किया। उनके देह त्यागने के पश्चात राम और भाई अत्यंत शोकाकुल हुए, परंतु धर्मबुद्धि से उन्होंने अंतिम संस्कार की समस्त क्रियाएँ विधिपूर्वक संपन्न कीं। इस प्रकार तीनों रानियाँ पुण्यलोक को गईं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १११

(रानियों की मृत्यु – कौशल्या, कैकेयी, सुमित्रा का स्वर्गारोहण)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकादशोत्तरशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम के अयोध्या राज्य में सुख-शांति व्याप्त थी। काल गति के अनुसार अब तीनों रानियों – कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा – के पार्थिव जीवन की संध्याकाल आ पहुँची। यह सर्ग उनके स्वर्गारोहण और राम के करुण विलाप का मार्मिक वर्णन प्रस्तुत करता है।

🧘 माताओं की वानप्रस्थ इच्छा (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः कतिपयाहस्य राघवः सत्यविक्रमः।
मातरः समुपागम्य प्रणम्येदमुवाच ह॥
कौशल्या च कुशलिनी कैकेयी च सुमित्रया।
आशीर्वादान्प्रयुज्याथ रामं परमधार्मिकम्॥
ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वा वाक्यं हर्षसमन्विताः।
पुत्र राज्यं चिरं कृत्वा वयमत्र सुखान्विताः॥
इदानीं वानप्रस्थं हि कर्तुमिच्छामहे वयम्।
अनुजानीहि धर्मज्ञ पुत्र त्वं सह लक्ष्मणः॥
रामः श्रुत्वा तु वचनं मातृणां विस्मितोऽभवत्।
वाष्पपूर्णेक्षणो दीनो धरण्यां पतितः शुचा॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; कतिपयाहस्य = कुछ दिनों के पश्चात; राघवः = राम; सत्यविक्रमः = सत्यपराक्रमी; मातरः = माताओं के पास; समुपागम्य = आकर; प्रणम्य = नमस्कार करके; इदम् = यह; उवाच ह = बोले; कौशल्या = कौशल्या; च = और; कुशलिनी = कुशलपूर्वक; कैकेयी = कैकेयी; च = और; सुमित्रया = सुमित्रा सहित; आशीर्वादान् = आशीर्वाद; प्रयुज्याथ = देकर फिर; रामम् = राम को; परमधार्मिकम् = परम धार्मिक; ऊचुः = बोलीं; प्राञ्जलयः = हाथ जोड़े; सर्वाः = सभी; वाक्यम् = वचन; हर्षसमन्विताः = हर्ष से युक्त; पुत्र = हे पुत्र; राज्यम् = राज्य; चिरम् = चिरकाल; कृत्वा = करके; वयम् = हम; अत्र = यहाँ; सुखान्विताः = सुखी; इदानीम् = अब; वानप्रस्थम् = वानप्रस्थ आश्रम; हि = ही; कर्तुम् = करने की; इच्छामहे = इच्छा रखती हैं; अनुजानीहि = आज्ञा दो; धर्मज्ञ = धर्मज्ञ; पुत्र = पुत्र; त्वम् = तुम; सह लक्ष्मणः = लक्ष्मण के साथ; रामः = राम; श्रुत्वा = सुनकर; तु = तो; वचनम् = वचन; मातृणाम् = माताओं का; विस्मितः = आश्चर्यचकित; अभवत् = हुए; वाष्पपूर्णेक्षणः = अश्रुपूरित नेत्रों वाले; दीनः = दीन; धरण्याम् = भूमि पर; पतितः = गिर पड़े; शुचा = शोक से।
📖 भावार्थ : कुछ दिनों के पश्चात् सत्यपराक्रमी राम अपनी माताओं के पास गए और उन्हें प्रणाम किया। कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा ने भी उन्हें आशीर्वाद दिया। तब तीनों माताओं ने हाथ जोड़कर हर्षपूर्वक राम से कहा: "हे पुत्र! हमने तुम्हारे राज्य में चिरकाल तक सुख भोगा है। अब हम वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण करना चाहती हैं। हे धर्मज्ञ! तुम और लक्ष्मण हमें इसकी आज्ञा दो।" राम यह सुनकर आश्चर्यचकित और अत्यन्त दुःखी हो गए। उनकी आँखों में आँसू भर आए और वे शोक से भूमि पर गिर पड़े। यह दृश्य अत्यन्त मार्मिक था, क्योंकि पुत्र के लिए माताओं का विरह सहन करना कठिन था। राम ने सोचा कि माताओं के बिना राज्य सूना हो जाएगा, परंतु धर्म की मर्यादा को समझते हुए वे चुप रहे।
॥ श्लोक ६-१० ॥
तमुत्थाप्य तु कैकेयी वाक्यमाह महीपतिम्।
मा शुचः त्वं महाबाहो धर्म एष सनातनः॥
गुरुणा वसिष्ठेनापि सह संमन्त्र्य यत्नतः।
कुरु नः सम्मतं पुत्र यथाशास्त्रं यथाक्रमम्॥
रामः प्रोवाच मातॄणां वचनं प्रतिपूज्य च।
गुरुं वसिष्ठमाहूय कृताञ्जलिरुवाच ह॥
भगवन् मातरः सर्वा वानप्रस्थं चिकीर्षवः।
कथं करोमि तद्ब्रूहि धर्मं वेदविदां वर॥
वसिष्ठः प्राह धर्मज्ञ श्रृणु राम यथाक्रमम्।
वानप्रस्थविधानं हि मातृणां त्वं समाचर॥
📖 भावार्थ : तब कैकेयी ने उन्हें उठाया और कहा: "हे महाबाहो! शोक मत करो। यही सनातन धर्म है। अब गुरु वसिष्ठ से परामर्श करके हमारी इस इच्छा को यथाशास्त्र पूर्ण करो।" राम ने माताओं के वचनों का सम्मान किया और गुरु वसिष्ठ को बुलाकर हाथ जोड़कर कहा: "हे भगवन्! माताएँ वानप्रस्थ ग्रहण करना चाहती हैं। मैं क्या करूँ? आप धर्म का उपदेश दीजिए।" वसिष्ठ ने कहा: "हे धर्मज्ञ राम! सुनो, माताओं के लिए वानप्रस्थ विधान यथाक्रम से करो। यही उचित है।" राम ने गुरु की आज्ञा शिरोधार्य की और माताओं को वानप्रस्थ के लिए तैयार करने का निश्चय किया। इस प्रकार राम ने धर्म और पितृभक्ति के बीच संतुलन बनाए रखा।

🌊 गंगा तट पर समाधि और स्वर्गारोहण (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततो रामो महातेजा भ्रातृभिः सहितोऽनघः।
मातृभिः सहितो गंगां प्रययौ धर्मसंहितः॥
तत्र स्नात्वा विधानेन दानानि विविधानि च।
दत्त्वा मुनिगणैः सार्धं वसिष्ठप्रमुखैस्तथा॥
आश्रमं कारयामास पर्णशालां मनोरमाम्।
तत्र मातर ऊषुस्ता वानप्रस्थव्रते रताः॥
कतिचित्तु दिनान्येव तपस्तप्त्वा सुदारुणम्।
समाधिं संप्रविष्टास्ता योगधारणया तदा॥
त्यक्त्वा देहं महाराज्ञ्यो दिव्यरूपाः समुत्थिताः।
दिव्याभरणसंयुक्ता दिव्यगन्धानुलेपनाः॥
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी राम अपने भाइयों और माताओं के साथ गंगा तट पर गए। वहाँ उन्होंने विधिपूर्वक स्नान किया और विविध दान दिए। वसिष्ठ आदि मुनियों की उपस्थिति में उन्होंने एक सुंदर पर्णशाला (कुटी) बनवाई। उस कुटी में माताएँ वानप्रस्थ व्रत का पालन करते हुए रहने लगीं। कुछ ही दिनों में उन्होंने कठोर तप किया और योगधारणा पूर्वक समाधि में प्रविष्ट हो गईं। देह त्यागने के पश्चात वे दिव्य रूप धारण करके, दिव्य आभूषणों और गंधों से सुसज्जित होकर स्वर्ग को प्रस्थान कर गईं। यह दृश्य अत्यन्त अलौकिक था। माताओं ने अपने पुण्य प्रभाव से साक्षात् स्वर्गलोक प्राप्त किया। उनके दिव्य रूपों को देखकर सभी मुनि और राम के भाई चकित रह गए। राम ने यह जाना कि माताएँ अपनी साधना से सिद्धि को प्राप्त हुई हैं।
॥ श्लोक १६-२० ॥
रामस्तु ता ददर्शाशु दिव्यरूपा व्यवस्थिताः।
विमानवरमारुह्य यान्तीः सूर्यसमप्रभाः॥
हाहाकारो महानासीद्भ्रातृणां शोकसंभवः।
लक्ष्मणो भरतः शत्रुघ्नश्चापि विचेतसः॥
रामः प्रोवाच तान्भ्रातॄन्धैर्यमालम्ब्य धीरवत्।
मा शुचो मा च शोचध्वं मातरः स्वर्गमास्थिताः॥
इह कीर्तिं परां प्राप्य प्रेत्य चैव सुखान्विताः।
धर्म एष सदा पुण्यो गतिरेषा सनातनी॥
अग्निकार्यं विधानेन कर्तुमर्हथ सर्वशः।
इत्युक्त्वा राघवः श्रीमान् स्वयं चक्रे विधानतः॥
📖 भावार्थ : राम ने देखा कि उनकी माताएँ दिव्य रूप धारण किए, सूर्य के समान तेजस्वी विमानों पर आरूढ़ होकर जा रही हैं। यह देख भाइयों में हाहाकार मच गया। लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न शोक से व्याकुल हो गए। तब राम ने धैर्य धारण कर उन्हें समझाया: "शोक मत करो। माताएँ स्वर्ग को गई हैं। उन्होंने इस लोक में कीर्ति प्राप्त की और परलोक में सुख भोगेंगी। यही धर्म है, यही सनातन गति है। अब तुम सब अग्निकार्य (अंतिम संस्कार) विधिपूर्वक करो।" ऐसा कहकर स्वयं राम ने भी विधि-विधान से अंतिम संस्कार की क्रियाएँ आरंभ कीं। राम का यह धैर्य और धर्मपरायणता उनके चरित्र की विशेषता को दर्शाता है।
॥ श्लोक २१-२५ ॥
ततः संभारसंयुक्तं चितास्तिस्रः सुशोभनाः।
कारयित्वा यथान्यायं मातृदेहान्निधाय च॥
अग्निना दह्यमानास्ता रुरुदुः सर्व एव ते।
रामो दाशरथिस्त्वेको धैर्यमालम्ब्य सुस्थितः॥
अग्निकार्ये समाप्ते तु तर्पणं च यथाविधि।
चक्रुस्ते भ्रातरः सर्वे पिण्डदानं च धर्मतः॥
ततो द्वादशरात्रे तु श्राद्धं कृत्वा महामतिः।
रामः प्रीतमनाः सर्वैर्भ्रातृभिः सहितोऽभवत्॥
एवं ता राममातरस्त्यक्त्वा देहं महीतले।
प्राप्ताः स्वर्गं महात्मानो रामश्च धर्ममाचरत्॥
📖 भावार्थ : तब राम ने तीनों माताओं के लिए अलग-अलग सुंदर चिताएँ बनवाईं और उनके पार्थिव शरीरों को यथान्याय रखा। अग्निदान के समय सभी रुदन कर रहे थे, केवल राम धैर्य धारण किए स्थिर रहे। अग्निकार्य समाप्त होने पर उन्होंने यथाविधि तर्पण और पिण्डदान किया। बारह दिनों तक श्राद्ध कर्म करने के बाद राम सभी भाइयों सहित शांत हुए। इस प्रकार राम की माताओं ने पृथ्वी पर देह त्याग कर स्वर्ग प्राप्त किया और राम ने धर्म का पालन किया। यह सर्ग पुत्र-धर्म और मातृ-भक्ति का अद्भुत उदाहरण है।

😢 राम का विलाप और धैर्य (श्लोक २६-४२)

॥ श्लोक २६-३० ॥
ततः सर्वे समागम्य रामं परमधार्मिकम्।
प्रशशंसुर्महात्मानो मुनयो देवतागणाः॥
राम धन्योऽसि यन्मातॄः स्वर्गस्थाः सम्प्रपादिताः।
धर्मेण नातिचारेण सत्येन च समन्विताः॥
रामः प्रोवाच तान्सर्वान्कृताञ्जलिरभाषत।
यदि प्रीता मुनिश्रेष्ठा यदि धर्मे स्थिता वयम्॥
ततः प्रसादमिच्छामि मातृणां यत्सुखावहम्।
सदा मे वर्ततां भक्तिः पित्रोश्चैव विशेषतः॥
एवं ब्रुवति रामे तु पुष्पवृष्टिः पपात ह।
देवदुन्दुभयो नेदुः साधु साध्विति वादिनः॥
📖 भावार्थ : तब सभी महात्मा मुनि और देवतागण एकत्र होकर परम धार्मिक राम की प्रशंसा करने लगे। उन्होंने कहा: "हे राम! तुम धन्य हो, जिसने अपनी माताओं को स्वर्ग प्राप्त कराया, वह भी धर्म, सत्य और मर्यादा का पालन करते हुए।" राम ने हाथ जोड़कर उन सबसे कहा: "हे मुनिश्रेष्ठों! यदि आप प्रसन्न हैं और हम धर्म पर स्थित हैं, तो मैं माताओं के प्रति सदा भक्ति और पितरों के प्रति श्रद्धा की कामना करता हूँ।" राम के ऐसा कहते ही आकाश से पुष्पों की वर्षा हुई और देवदुन्दुभियाँ बजने लगीं। आकाशवाणी हुई "साधु, साधु!" इस प्रकार देवताओं ने राम के धर्मपालन की सराहना की।
॥ श्लोक ३१-३५ ॥
ततो वसिष्ठः प्रोवाच रामं सत्यपराक्रमम्।
राज्यं पालय धर्मेण मातृशोकं परित्यज॥
एता हि तव मातरस्त्रिदिवे वसतीः शुभाः।
प्राप्ताः पुण्येन धर्मेण त्वत्प्रसादादसंशयम्॥
तस्मात्त्वं राघव श्रीमान्प्रजाः पालय धार्मिकः।
भ्रातृभिः सहितो नित्यं धर्ममेवानुपालय॥
इत्युक्तो राघवो राजा प्रत्युवाच गुरुं तदा।
भगवन्नेवमेवैतद्यथाह भगवान्गुरुः॥
अद्यप्रभृति वक्ष्यामि पालयिष्ये महीमिमाम्।
धर्मेण नातिचारेण भवतामाज्ञया मुने॥
📖 भावार्थ : तब वसिष्ठ ने सत्यपराक्रमी राम से कहा: "हे राम! मातृशोक त्याग कर धर्मपूर्वक राज्य का पालन करो। तुम्हारी माताएँ तुम्हारे ही पुण्य प्रभाव से स्वर्ग में सुख भोग रही हैं। अतः हे राघव! तुम भाइयों सहित प्रजा का धर्म से पालन करो।" गुरु के वचन सुनकर राजा राम ने कहा: "हे भगवन्! आप जैसा कहते हैं, वैसा ही है। आज से मैं आपकी आज्ञा से धर्मपूर्वक इस पृथ्वी का पालन करूँगा।" इस प्रकार राम ने गुरु की आज्ञा मानकर पुनः धर्मशासन का संकल्प लिया।
॥ श्लोक ३६-४२ ॥
ततः प्रभृति रामस्तु धर्मेण पृथिवीमिमाम्।
पालयामास धर्मात्मा भ्रातृभिः सहितोऽनघः॥
न्यायतश्च प्रजाः सर्वा रञ्जयामास राघवः।
धर्मे स्थिताः प्रजाः सर्वा न शोचन्ति स्म कर्हिचित्॥
एवं वर्षसहस्राणि रामो राज्यमकारयत्।
इष्ट्वा बहुविधैर्यज्ञैर्देवताः प्रीणयन्मुहुः॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि गन्धर्वाणां वधं प्रति।
भरतेन कृतं युद्धं शत्रुघ्नेन च धीमता॥
इति सर्गः समाप्तोऽयं राममातृविनाशनः।
श्रृण्वतां पापनाशाय पुण्याय च सदा भवेत्॥
📖 भावार्थ : उस दिन से धर्मात्मा राम भाइयों के साथ धर्मपूर्वक पृथ्वी का पालन करने लगे। उन्होंने न्यायपूर्वक सभी प्रजा को प्रसन्न किया। प्रजा धर्म पर स्थिर रहने लगी और कभी शोक नहीं करती थी। इस प्रकार राम ने हजारों वर्षों तक राज्य किया और अनेक यज्ञों द्वारा देवताओं को प्रसन्न किया। इसके आगे मैं गन्धर्वों के वध का वर्णन करूँगा, जो भरत और शत्रुघ्न द्वारा किया गया। इस प्रकार यह सर्ग, जो राम की माताओं के देहान्त से सम्बन्धित है, समाप्त होता है। इसे सुनने वालों के पाप नष्ट होते हैं और पुण्य की प्राप्ति होती है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👵 मातृभक्ति और धर्म

इस सर्ग में राम की माताओं के प्रति अगाध प्रेम और धर्म के प्रति अटल निष्ठा का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। पुत्र होने के नाते वे विलाप करते हैं, किंतु धर्मज्ञ होने के कारण वे माताओं की इच्छा का सम्मान करते हैं।

🌿 वानप्रस्थ आश्रम का महत्त्व

वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण करना वैदिक आश्रम व्यवस्था का अंग है। माताओं द्वारा इस आश्रम को अपनाना धर्म के प्रति उनकी आस्था और संसार से विरक्ति का प्रतीक है। राम का उन्हें इसके लिए प्रोत्साहित करना उनकी धर्मपरायणता को दर्शाता है।

🌟 स्वर्गारोहण का संदेश

माताओं का स्वर्गारोहण यह संदेश देता है कि सांसारिक जीवन के पश्चात आत्मा की सद्गति ही परम लक्ष्य है। राम का शोक न कर धर्मपूर्वक अंतिम संस्कार करना भी इसी सत्य को स्वीकार करना है।

🙏 राम का आदर्श चरित्र

राम ने इस सर्ग में पुत्र, राजा और धर्मपालक के रूप में अपने सभी कर्तव्यों का निर्वाह किया। उनका धैर्य और संयम सभी के लिए अनुकरणीय है।

🎯 शिक्षा : जीवन में माता-पिता की सेवा परम धर्म है, परंतु उनकी आध्यात्मिक इच्छाओं का सम्मान करना भी उतना ही आवश्यक है। धर्म का पालन करते हुए व्यक्ति को शोक पर नियंत्रण रखना चाहिए और कर्तव्यपथ पर अग्रसर रहना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे एकादशोत्तरशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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