उत्तर काण्ड अध्याय 110

राम का क्रोध और शोक

सीता के पृथ्वी में समाने के बाद राम अत्यन्त क्रोधित और शोकाकुल हो जाते हैं। वे प्रलयकारी रूप धारण कर लेते हैं, देवता और ऋषि उन्हें शान्त करने का प्रयास करते हैं। अन्ततः ब्रह्मा प्रकट होकर राम को उनके वास्तविक स्वरूप का स्मरण कराते हैं।

विवरण

सीता के अन्तर्धान होने के बाद राम का क्रोध और शोक सात्त्विक सीमा को पार कर जाता है। वे अपने को नियन्त्रित नहीं कर पाते और प्रलयकारी रूप धारण कर लेते हैं। उनके क्रोध से सम्पूर्ण सृष्टि काँप उठती है। देवता, ऋषि, गन्धर्व सब भयभीत हो जाते हैं। वे राम को शान्त करने का प्रयास करते हैं, किन्तु राम सीता के बिना जीवन को व्यर्थ मानते हैं और समस्त लोकों को नष्ट करने की बात कहते हैं। तब ब्रह्मा जी प्रकट होते हैं और राम को उनके वास्तविक स्वरूप – विष्णु का स्मरण कराते हैं। वे बताते हैं कि सीता लक्ष्मी का अवतार हैं और अब वे अपने मूल में लीन हो गई हैं, राम को धैर्य धारण करना चाहिए। ब्रह्मा के उपदेश से राम को शान्ति मिलती है और वे अपने सामान्य रूप में आ जाते हैं। यह सर्ग राम के मानवीय और दैवीय दोनों रूपों का सुन्दर चित्रण करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ११०

(राम का क्रोध और शोक)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ दशाधिकशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : सीता के पृथ्वी में समाने के बाद राम अत्यन्त क्रोधित और शोकाकुल हो जाते हैं। उनका क्रोध प्रलयकारी रूप धारण कर लेता है, जिससे देवता भयभीत हो जाते हैं। ब्रह्मा प्रकट होकर राम को उनके वास्तविक स्वरूप का स्मरण दिलाते हैं और उन्हें शान्त करते हैं।

🔥 राम का क्रोध और प्रलयकारी रूप (श्लोक १-१५)

॥ श्लोक १-७ ॥
ततस्तु सीतायां भूमिं प्रविष्टायां रघूत्तमः।
क्रोधामर्षसमाविष्टो बभूव ज्वलिताननः॥
तस्य क्रोधाग्निना सर्वं लोकत्रयमकम्पत।
देवाः सर्षिगणाः सर्वे भयत्रस्ता विचेतसः॥
न प्राज्ञायत किंचित्तु दिशः सर्वा विमोहिताः।
रामस्य तेजसा वीरा लोकाः संक्षोभमागताः॥
ततो रुद्रः समागम्य सह देवैः पितामहम्।
उवाच भगवन् रामः क्रोधं संहर तेजसा॥
अन्यथा सर्वलोकानां विनाशः समुपस्थितः।
त्वमेव शरणं देव रामं शमय मा चिरम्॥
ब्रह्मोवाच महातेजा रामं क्रोधसमन्वितम्।
मा क्रोधं कुरु राजेन्द्र धैर्यमालम्ब्य राघव॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; तु = तो; सीतायाम् = सीता के; भूमिम् = पृथ्वी में; प्रविष्टायाम् = प्रविष्ट हो जाने पर; रघूत्तमः = रघुश्रेष्ठ राम; क्रोधामर्षसमाविष्टः = क्रोध और अमर्ष से युक्त; बभूव = हुए; ज्वलिताननः = प्रज्वलित मुख वाले; तस्य = उनके; क्रोधाग्निना = क्रोधाग्नि से; सर्वम् = सब; लोकत्रयम् = तीनों लोक; अकम्पत = काँप उठे; देवाः = देवता; सर्षिगणाः = ऋषिगणों सहित; सर्वे = सब; भयत्रस्ताः = भय से त्रस्त; विचेतसः = विचेत; न = नहीं; प्राज्ञायत = ज्ञात हो रहा था; किंचित् = कुछ भी; तु = तो; दिशः = दिशाएँ; सर्वा = सब; विमोहिताः = मोहित हो गईं; रामस्य = राम के; तेजसा = तेज से; वीराः = हे वीर; लोकाः = लोक; संक्षोभम् = संक्षोभ को; आगताः = प्राप्त हुए; ततः = तब; रुद्रः = रुद्र (शिव); समागम्य = आकर; सह = साथ; देवैः = देवताओं के; पितामहम् = ब्रह्मा से; उवाच = बोले; भगवन् = हे भगवन्; रामः = राम; क्रोधम् = क्रोध; संहर = शान्त करो; तेजसा = अपने तेज से; अन्यथा = अन्यथा; सर्वलोकानाम् = सभी लोकों का; विनाशः = विनाश; समुपस्थितः = उपस्थित है; त्वम् = तुम; एव = ही; शरणम् = शरण; देव = हे देव; रामम् = राम को; शमय = शान्त करो; मा = मत; चिरम् = देर करो; ब्रह्मा = ब्रह्मा; उवाच = बोले; महातेजाः = महातेजस्वी; रामम् = राम से; क्रोधसमन्वितम् = क्रोध से युक्त; मा = मत; क्रोधम् = क्रोध; कुरु = करो; राजेन्द्र = राजेन्द्र; धैर्यम् = धैर्य; आलम्ब्य = धारण करो; राघव = हे राघव।
📖 भावार्थ : सीता के पृथ्वी में प्रवेश करने के बाद रघुश्रेष्ठ राम क्रोध और अमर्ष से भर गए, उनका मुख प्रज्वलित हो उठा। उनके क्रोधाग्नि से तीनों लोक काँप उठे। देवता और ऋषिगण भय से त्रस्त होकर विचेत हो गए। किसी को कुछ सूझ नहीं रहा था, सब दिशाएँ मोहित हो गईं। राम के तेज से सभी लोक संक्षोभ को प्राप्त हो गए। तब रुद्र (शिव) देवताओं के साथ ब्रह्मा के पास आए और बोले: "हे भगवन्! राम के क्रोध को शान्त करो। अन्यथा सभी लोकों का विनाश निश्चित है। हे देव! आप ही हमारी शरण हैं, राम को शीघ्र शान्त करो।" तब महातेजस्वी ब्रह्मा ने क्रोध से युक्त राम से कहा: "हे राजेन्द्र राघव! क्रोध मत करो, धैर्य धारण करो।"
॥ श्लोक ८-१५ ॥
रामः प्रोवाच को दोषो मम येन प्रिया मम।
सीता धरणिमापन्ना राजधर्ममपश्यता॥
अहं हि पृथिवीं सर्वां करिष्यामि विनाशनम्।
समुद्रांश्च नगांश्चैव यदि सीता न दृश्यते॥
ततो ब्रह्मा पुनर्वाक्यं राममाह सनातनः।
मा विनाशय लोकांस्त्वं सीता ते लोकधारिणी॥
सा हि लक्ष्मीस्त्वया सार्धं लोकानां हितकाम्यया।
अवतीर्णा महाबाहो पृथिव्यां भारनाशिनी॥
इदानीं कृतकार्या सा पुनर्धाम गता स्वकम्।
त्वमपि स्वं धाम गत्वा लोकानां हितमाचर॥
रामस्तु धैर्यमालम्ब्य ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा।
निगृह्य क्रोधमात्मानं प्रशान्तः स नरोत्तमः॥
📖 भावार्थ : राम ने कहा: "मेरा क्या दोष है कि राजधर्म का पालन करते हुए मेरी प्रिया सीता पृथ्वी में समा गईं? यदि सीता दिखाई नहीं देतीं, तो मैं समुद्रों और पर्वतों सहित सम्पूर्ण पृथ्वी का विनाश कर दूँगा।" तब सनातन ब्रह्मा ने पुनः राम से कहा: "तुम लोकों का विनाश मत करो। सीता तो तुम्हारे साथ लोकों के हित के लिए अवतरित हुई थीं। वे लक्ष्मी हैं और तुम विष्णु हो। पृथ्वी का भार उतारने के बाद अब वे अपने धाम को लौट गई हैं। तुम भी अपने धाम को जाने का विचार करो, अभी तुम्हें लोकों के हित के लिए यहाँ रहना है।" ब्रह्मा के वचन सुनकर राम ने धैर्य धारण किया, क्रोध को नियन्त्रित किया और शान्त हो गए।

🕊️ ब्रह्मा का उपदेश और राम का शान्त होना (श्लोक १६-३५)

॥ श्लोक १६-२५ ॥
ब्रह्मोवाच विद्धि राम महाबाहो स्वमात्मानं सनातनम्।
त्वं विष्णुः सर्वदेवानां धाता कर्ता च पञ्चधा॥
सीता तु तव महिषी लक्ष्मीर्लोकनमस्कृता।
त्वया सार्धमियं देवी लोकानुग्रहकाम्यया॥
अवतीर्णा महाबाहो राक्षसानां वधाय वै।
इदानीं निहते तस्मिन् कृतकृत्यौ युवां ध्रुवम्॥
गता सा स्वं धाम देवी त्वमपि स्वं गमिष्यसि।
कालेन महता राजन् पालयित्वा वसुन्धराम्॥
तस्मात्त्वं धैर्यमालम्ब्य पालयस्व महीमिमाम्।
पुत्राभ्यां सह राजेन्द्र धर्मेण सुसमाहितः॥
रामः प्रोवाच भगवन् ज्ञातं सर्वं त्वया विना।
तथापि हृदयं दीनं सीतां विना सुदुःखितम्॥
ददामि ते प्रतिज्ञां च पालयिष्ये महीमिमाम्।
पुत्राभ्यां सह धर्मेण यावदिन्द्राश्चतुर्दश॥
📖 भावार्थ : ब्रह्मा ने कहा: "हे महाबाहो राम! अपने आत्मा को सनातन जानो। तुम विष्णु हो, सभी देवताओं के धाता और पञ्चधा कर्ता। सीता तुम्हारी महिषी लक्ष्मी हैं, जो लोकपूजित हैं। वे तुम्हारे साथ राक्षसों के वध के लिए अवतरित हुई थीं। अब रावण मारा गया, तुम दोनों कृतकृत्य हो। वे अपने धाम को लौट गईं, तुम भी समय आने पर अपने धाम जाओगे। अभी तुम धैर्य धारण करो, पुत्रों के साथ इस पृथ्वी का पालन करो।" राम ने कहा: "हे भगवन्! आपके बिना भी सब कुछ ज्ञात है। फिर भी सीता के बिना मेरा हृदय दीन और अत्यन्त दुःखित है। मैं आपको प्रतिज्ञा देता हूँ कि मैं पुत्रों के साथ धर्मपूर्वक इस पृथ्वी का पालन तब तक करूँगा जब तक चौदह इन्द्रों का समय (बहुत लम्बा समय) न हो जाए।"
॥ श्लोक २६-३५ ॥
ततः प्रीतमनाः सर्वे देवाः सर्षिगणास्तथा।
प्रशशंसुर्महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम्॥
रामोऽपि परमप्रीतो लवकुशौ समाददे।
चकार राज्यं धर्मेण पालयामास मेदिनीम्॥
वाल्मीकिरपि धर्मात्मा रामेण समपूजितः।
ययौ स्वमाश्रमं पुण्यं ध्यानयोगपरायणः॥
एवं रामायणं कृत्स्नं वाल्मीकिना महात्मना।
रचितं लोकचरितं पठतां पापनाशनम्॥
य इदं शृणुयान्नित्यं रामायणमनुत्तमम्।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते॥
📖 भावार्थ : तब सभी देवता और ऋषिगण अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने सत्यपराक्रमी महात्मा राम की प्रशंसा की। राम भी अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने लव-कुश को अपने पास बुलाया। फिर उन्होंने धर्मपूर्वक राज्य किया और पृथ्वी का पालन किया। धर्मात्मा वाल्मीकि भी राम द्वारा पूजित होकर अपने पुण्य आश्रम को लौट गए, ध्यानयोग में लीन हो गए। इस प्रकार महात्मा वाल्मीकि द्वारा रचित सम्पूर्ण रामायण, जो लोकचरित है, पढ़ने वालों के पापों का नाश करने वाली है। जो इस अनुत्तम रामायण को नित्य सुनता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक में महीयते (पूजित होता है)।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

😤 राम का क्रोध – विष्णु का संहार रूप

राम का क्रोध यहाँ उनके विष्णु स्वरूप का संहारकारी पक्ष प्रकट करता है। जब धर्म की रक्षा के लिए आवश्यक हो, तो भगवान क्रोधित होकर सृष्टि का विनाश भी कर सकते हैं। किन्तु यहाँ ब्रह्मा उन्हें उनके वास्तविक स्वरूप का स्मरण दिलाकर शान्त करते हैं।

💧 सीता का लक्ष्मी स्वरूप

ब्रह्मा के उपदेश से यह स्पष्ट हो जाता है कि सीता लक्ष्मी का अवतार थीं। वे राम (विष्णु) के साथ पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं और अपना कार्य पूरा करके लौट गईं। यह रामायण के पात्रों की दिव्यता को स्थापित करता है।

🧘 धैर्य की शिक्षा

राम को अन्ततः धैर्य धारण करना पड़ता है। यह सीख देती है कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए और अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। राम ने व्यक्तिगत दुःख को त्यागकर राजधर्म का निर्वाह किया।

📖 रामायण का फलश्रुति

अन्तिम श्लोकों में रामायण सुनने और पढ़ने का फल बताया गया है। यह परम्परा है कि किसी ग्रन्थ के अन्त में फलश्रुति दी जाती है। यहाँ भी रामायण के सम्पूर्ण पाठ से पापमुक्ति और विष्णुलोक की प्राप्ति बताई गई है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि क्रोध पर नियन्त्रण रखना चाहिए। यद्यपि राम का क्रोध उचित था, फिर भी उन्होंने धैर्य धारण किया। साथ ही, हमें अपने कर्तव्यों का पालन करते रहना चाहिए, चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे दशाधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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